पलायन एक चिंतन: भराड्सर ताल,भाग-3

दिनांक-12-10-2017

देववासा के ढलानदार बुग्याल पर लेगे हमारे टैंटों में रात को सोना सच में एक युद्ध अभ्यास जैसा साबित हुआ। बेहद कड़क ठंड के साथ तंबू के अंदर बिछी मैट और स्लीपिंग बैग का कोई तालमेल ही नहीं बैठ रहा था। बस लेटते ही हम नीचे की तरफ फिसले जा रहे थे। भविष्य में ऐसे हालात दोबारा ना हों इसके लिये ये अच्छा सबक था।सुबह उठे तो एहसास हुआ की इस जगह पर धूप आने में काफी देर है। इसलिए रातभर जलते चूल्हे के इर्द-गिर्द हमारा सुबह का जमावड़ा लग गया। काली चाय के मीठे घूंट और गपशप के साथ आराम से सब तैयार हुऐ।

वहीं थोड़ी दूर एक कोने पर सभी स्थानीय गाँवों के हमारे साथी धूप में सबसे अलग बैठे बातें कर रहे थे। मुझे लगा कि मुझे उनके बीच उनके साथ उस बातचीत का हिस्सा होना चाहिए। मैं पंहुचा तो वे सरकारों की अनदेखी बदहाल सड़क, बिजली और स्वास्थ्य की चर्चा पर मशगूल थे। रैक्चा के प्रधान प्रहलाद रावत ने मुझे अपनी बातचीत में शामिल करते हुऐ बताया की हमने अपने गाँव में तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का जोरदार स्वागत किया था लेकिन उन्होंने भी सड़क के लिये हमें कागजी औपचारिकता में उलझा कर लौटा दिया, लेकिन तत्कालीन पंचायत मंत्री प्रितम सिंह के प्रयास से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क के टेंडर कर जल्दी काम शुरू किया गया। यहां सड़क की बदहाल व्यवस्था के चलते ही इस क्षेत्र को ग्रामीण सेब फल पट्टी के रूप में विकसित नहीं कर पा रहे हैं। सरकारी योजनाओं की सैटिंग के लिये बदनाम मोरी ब्लाक के लोगों के लिये रोजगार के अन्य बेहतरीन विकल्प ना होने कि बात पर तो मुझे भी उनसे आंशिक रूप से सहमत होना पड़ा। गोविंद वन पशु बिहार के कारण टिहरी बांध की तर्ज पर वे भी विस्थापन के एवज में मोटे मुआवजा लेने के अलग-अलग सुझावों पर भी बात कर रहे थे, जिस पर हस्तक्षेप करते हुऐ मैंने उन्हें सरकार की वर्तमान विस्थापन नीती के खिलाफ पर्वतीय क्षेत्रों से मैदानी क्षेत्रों में विस्थापन के विरूद्ध इसी भौगोलिक वातावरण के समतुल्य दूसरे पर्वतीय क्षेत्र में विस्थापन की मांग पर जोर देने की सलाह दी। जिससे उनकी संस्कृति,खान-पान,वेश-भूषा, कृषी, पशु-पालन, भवन निर्माण शैली और भाषा दुष्प्रभावित ना हो। मैंने टिहरी से विस्थापित अपने रिश्तेदारों का हवाला देते हुऐ बताया की किस तरह वे आज अपने पहाड़ के अस्तित्व को खोकर पहाड़ और मैदान के बीच की अजीब सी अव्यवस्थित संस्कृति में जीने को मजबूर हैं। मेरी बात से सहमत होते हुऐ उन्होंने इस विषय पर नये सिरे से विचार करने की बात कही।

मुझे आज भी याद है 2007-08 में पुरोला के एक राजनीतिक कार्यक्रम पर आये कांग्रेस नेता राहुल गाँधी के सामने तब के नौजवान छात्र और हमारी इस यात्रा के स्थानीय साथी जयमोहन राणा ने यहाँ 60 रूपये किलो मोटा नमक खरीदने को मजबूर दुख भरे हालात से राहुल गांधी को चौंका दिया था। हम कितनी भी बड़ी बड़ी बातें कर लें लेकिन अपनी धरती और गाँव की ये तकलीफें इनके लिये रोजमर्रा की दिनचर्या का हिस्सा है। इतने दूर यहाँ के बाशिंदों के दुख-तकलीफ के साथ उनके मन के इस मर्म को दुनिया के सामने लाना भी हमारे इस अभियान का हिस्सा है।

रैक्चा-फिताड़ी से हमारे साथ आये सभी स्थानीय साथियों में प्रधान प्रहलाद रावत, प्रह्लाद पंवार, राजपाल रावत,जयमोहन, रोजी सिंह, कृष्णा के साथ हमारे पलायन एक चिंतन दल के साथी और असिस्टेंट कमिश्नर फाइनेंस मनमोहन असवाल ने आज यहाँ से वापस रैक्चा-फिताडी लौटना था। गले लगाकर दोस्तों को विदा किया गया। बाकी सभी टीम के सदस्यों को आज देववासा से सीधे धार-धार लंबा सफर तय करते हुऐ भीतरी गाँव के लिये ढलानदार रास्ते से नीचे उतरना था। हमारे टीम लीडर रतन असवाल ने हम सब को सारा नीजी सामान खुद ही उठाने की हिदायत देते हुऐ सामान ढुलान पर लगी चार में से दो खच्चरों को वापस फिताडी भेज दिया।

मैं सीमा सुरक्षा बल का गुरिल्ला प्रशिक्षु रहा हूँ। सन 1998-99 के दौरान हिमांचल के सराहन और उत्तराखंड के ग्वालदम कैंप में जंगल ट्रैनिंग तथा माउंट ट्रेनिंग के का प्रशिक्षण लिया था। ये छण मुझे उन दिनों के एहसास और अनुभवों को याद करा रहे थे। आसपास के हालात में चलने से लेकर खाने-पिने के एहतियातन मैं बेहद सूझ-बूझ से काम ले रहा था। ऐसी जगह पर आप किसी पर लापरवाही के चलते बिमार या चोटिल होकर कर बोझ नहीं बनना चाहेंगे। इसलिए सही तरीके से अपना पिठु कस कर पीठ पर बांध कर मैं तैयार हुआ। चलते हुऐ मुझे एहसास होने लगा की खाली चलने से ज्यादा आरामदायक थोड़ा बहुत वजनदार सामान पीठ पर लाद कर चलना होता है।

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हम देववासा से लौटेने लगे तो एक ऊंची पहाड़ी से रतन असवाल ने हमें चारों तरफ फैले “हिमालय दिग्दर्शन” से परिचित कराया। एक तरफ चांगशील की ऊंची चोटी तक हिमांचल सरकार की सड़क दिखाई दे रही थी वहीं दूसरी तरफ उससे बहुत नीचे रूपीन सुपीन की नदी घाटियों के दोनों तरफ के गाँव तक भी सड़क से पूरी तरह नहीं जुड़े थे। हिमालय की बंदरपूंछ चोटी से लेकर राड़ी का बौख पर्वत तक वहां से दिखाई दे रहा था। सुदूर पर्वतों की ढ़लान पर लाल केदार मार्छा की खूबसूरत छटा हिमांचल और उत्तराखंड के गाँवों का एहसास करा रही थी।

आज के अगले सफर भीतरी गाँव की तरफ बढ़े तो फिर से एक खड़ी चढ़ाई भरे रास्ते ने मोर्चा खोल दिया। मैने झल्लाकर कर गाइड सुरेन्द्र से इस बाबत पूछा तो उसने हमेशा की तरह बड़ी साफगोई से कह दिया की बस ये सीधा-सिधा रास्ता है। फिर समझ आया की इनका सिधा सिधा रास्ता भी कितना खड़ी चढ़ाई भरा होता है। विकल्प हीन भारतीय जनता की तरह हम भी तमाम दुश्वारियों के बावजूद आगे बढ़ने के लिये मजबूर थे।

लगभग डेढ़ किलोमीटर बाद तो हम मानों दुनिया के सबसे खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर थे। जो हरे-भरे बुग्यालो के बीचों-बीच शानदार छफुटी के रूप में सिधा निकल रहा था। बेहद सुगंधित खुशबू हमें आसपास कस्तूरी मृग के होने का एहसास करा रही थी। हो सकता है वो खुशबु बुग्यालों में अज्ञात जड़ी-बूटीयों या औषधिय पौधों की रही हो। खैर हम सब एक उत्साह से अपने ढलते सफर की तरफ बढ़ चले गये। चलते-चलते रास्ते में गुड़ चना खाते हुऐ एक घाटी से हमें सांकरी का छोटा सा बाजार नजर आने लगा तो मोबाइल पर नेटवर्क मिलने की उम्मीद जाग उठी फोन खोला तो हाल जस के तस थे। घर पर पिछले तीन दिनों से कोई बात नहीं हुई थी। इस दौर में बिजली और मोबाइल सेवा से इस क्षेत्र के ग्रामीण लोगों के कटे होने का एहसास हमें समझ आ रहा था। लगभग 10 किलोमीटर चलने के बाद आसमान में काले बादल मंडराते नजर आये तो बारिश का डर सताने लगा।

हम पथरीली ढलान पर एक घने जंगल में बने जंगलात के एक जीर्ण-शीर्ण पैदल रास्ते पर चल रहे थे। जो शायद काफी समय खुद के बदहाल हालत का बयान कर रहा था। ट्रैकिंग के नजरिये से बेहद खूबसूरत इस रास्ते की सबसे बड़ी कमी दूर-दूर तक पानी का नामो-निशान ना होना था। हम सब बेहद संतुलित मात्रा में पानी का घूंट पी कर चल रहे थे। तनु जोशी, नेत्रपाल यादव, सौरभ और मुझे छोड़ सभी लोग काफी आगे निकल चुके थे। शाम ढलने को थी। हमारे साथ सबसे आखिरी में रास्ते भटकने के एहतियातन हमारा पोटर जुनैल भी चल रहा था। हमसे थोड़ा दूरी पर आगे अजय कुकरेती और दलबीर रावत भी धीमी रफ्तार से आगे सरक रहे थे। चढ़ाई की तरह ढलान पर तेज चलना भी कठिन होता है।

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काफी नीचे उतर आने के बाद हमें एक छोटे से बुग्याल में अपने नीले कैंप लगे दिखाई दिये। हमारे लिये ये राहत भरा एहसास था। लगभग 14 किलोमीटर चलने के बाद हमने भीतरी गाँव से लगभग 8 किलोमीटर ऊपर इस जंगल के पहले पानी के बहते स्रोत के पास “बणांग” नामक इस जगह को रात्रि विश्राम के लिया चुना था। चारों तरफ जंगल से घिरे इस बुग्याल में गुजरों का एक उजड़ा हुआ डेरा भी था। रतन भाई ने बताया जंगल में जहाँ गुजरों का डेरा होता है वह उस जंगल की सबसे शानदार और सुरक्षित जगह होती है। आस पास बांझ के पेड़ों की चोटी तक बारीक लोपिंग भी इस जगह पर गुजरों के नियमित प्रवास की पहचान करा रही थी।

हमारे पंहुचने से पहले कैंप के नजदीक जल रहे आग के भट्टे पर दाल का कुकर सिटी मार रहा था। आखिरी पदयात्री के रूप में जैसे ही हम कैंप में पंहुचे तो जबरदस्त बारिश और ओलों ने हमारा जोरदार स्वागत किया। हम सब टैंट में दुबक गये। बारिश थमी तो बाहर निकल कर चूल्हे की आग को दुरूस्त कर रात्रि भोजन की तैयारी में जुट गये।

रतन भाई द्वारा दाल का गर्म सूप तैयार किया गया था। जो गिलासों में भर भर कर पिया गया, जिससे हमें थकान मिटने के साथ ऊर्जा मिल रही थी। भोजन पकने के साथ साथ चूल्हे के आसपास किर्तम मामटी ने खच्चर के प्लान की बोरीयां बिछा कर बैठने की व्यवस्था कर दी।

महफिल सजने लगी होंठो पर हिमांचली और जौनसारी गीतों के सुर बुबुदाने लगे फिर रतन भाई और गणेश काला ने खुले कंठ से नरेन्द्र नेगी जी के गीतों की तान छेड़ी तो मुकेश बहुगुणा ने चुटकलों के ब्रेकअप से शमा खुशनुमा कर दिया। दलबीर रावत ने भी एक शानदार गीत गाया तो नेत्रपाल यादव को भोजपुरी गीतों की तान पर में नृत्य करना पढ़ा। कुछ एक कुंमाऊनी गानों पर तनु ने भी गला साफ किया तो हमारे स्थानीय गाइड सुरेन्द्र और पोटर जुनैल और खच्चर वाले किर्तम मामटी के साथ मैने लोकल गीतों के पर यथा संभव तांदी नृत्य किया।

भराड़सर की सफल यात्रा के एहसास भरे रोमांचकारी इन छणों में भोजन के बाद हम एक बार फिर खामोश जंगल की इस खूबसूरत रात के आगोश में सो गये।