धर्म, जाति समुदाय पर वोट माँगा तो ख़ैर नही
चुनौती तो उत्तराखंड में हरीश रावत ही है
बर्फ और गलन भरी ठंड से ठिठुर रहे इस पहाड़ी राज्य में उम्मीदवारों द्वारा परचा भरते ही चुनाव प्रचार सरगर्म हो रहा है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही फिलहाल बगावत से जूझते हुए भी एक-दूसरे पर राजनीतिक हमले से बाज नहीं आ रहे। कांग्रेस ने जहां पार्टी घोशणा पत्र से भी पहले मुख्यमंत्री हरीष रावत का संकल्प पत्र पेश करके चुनाव प्रचार में नई मिसाल पेश की है, वहीं भाजपा लगातार मुख्यमंत्री पर निशाना साधे हुए है। कांग्रेस के इस दाव से तिलमिला कर भाजपा रणनीति के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों से उन पर जुबानी हमले करवा रही है। रावत पर सबसे ज्यादा हमलावर विजय बहुगुणा तो हैं ही और अब भाजपा ने रमेश पोखरियाल निशंक से भी निशाना सधवा दिया है। इससे जाहिर है कि कांग्रेस के भीतर बुरी तरह तोड़-फोड़ कर लेने के बावजूद भाजपा द्वारा हरीष रावत को ही प्रमुख चुनौती माना जा रहा है।
कांग्रेस में तो पूरी चुनावी बिसात ही मुख्यमंत्री के अनुसार बिछाई गई है। प्रशांत किशोर ने रावत से सलाह मषविरे के बाद जो प्रचार अभियान बनाया है, उसकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं जिससे जाहिर है कि भाजपा असमंजस में है। भाजपा ने चुनाव प्रचार का दूसरा हफ्ता बीतने के बावजूद राज्य में कोई अभिनव प्रचार शैली नहीं अपनाई है। हालांकि उम्मीदवारों की सूची सबसे पहले भाजपा ने ही 16 जनवरी को घोशित कर दी थी, लेकिन दर्जन भर कद्दावर बागी कांग्रेसियों को कमल छाप उम्मीदवार बना कर पार्टी अभी तक भीतरघात से ही जूझ रही है। अलबत्ता रोजाना कांग्रेस के कुछ पदाधिकारियों को जरूर भाजपा में शामिल कराते हुए मीडिया के सामने पेश करा दिया जाता है। तीन भाजपाई बागियों को पंजा छाप उम्मीदवार बना कर कांग्रेस ने मुंहतोड़ जवाब दे दिया। मातबर सिंह कंडारी को भी मीडिया के सामने कांग्रेस में शामिल करा लिया गया। बहरहाल सत्तारूढ़ दल में रावत के जलवे का ताजा उदाहरण धनौल्टी सीट पर पार्टी द्वारा अधिकृत घोशित उम्मीदवार मनमोहन सिंह मल्ला की जगह निर्दलीय प्रीतम पंवार को समर्थन दिया जाना है।
मनमोहन, मसूरी नगर पालिका के निर्वाचित अध्यक्ष हैं और पार्टी फैसले के खिलाफ डटे रहने का संकेत दे रहे हैं। प्रीतम पंवार पीडीएफ के उन विधायकों मे से हैं, जिन्होंने पहले विजय बहुगुणा और फिर हरीश रावत की अल्पमत सरकार को अपने समर्थन से पूरे पांच साल टिकाए रखा। हालांकि रावत के मुख्यमंत्री बनते ही कांग्रेस ने उनके समेत लगातार चार उपचुनाव जीत कर विधानसभा में अपने बूते बहुमत पा लिया था मगर मुख्यमंत्री ने पीडीएफ को सत्ता में बराबर हिस्सेदार बनाए रखा। पंवार को समर्थन देकर रावत ने राज्य के लोगों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि कांग्रेस धोखेबाज नहीं है। यदि लोग उसका साथ देंगे तो बदले में पार्टी भी अपने वादे पूरे करने में कोताही नहीं बरतेगी।

कांग्रेस द्वारा जारी रावत के संकल्प भी जनता में अपनी विष्वसनीयता मजबूत करने की कोषिष हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण, मजबूरन सरकारी जमीन पर बसे गरीब परिवारों को वहीं बसने का स्थाई अधिकार देने का वायदा है। इस संकल्प को कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रचारित पंधानमंत्री आवास योजना की काट के रूप् में पेष किया है। गौरतलब है कि मध्यप्रदेष में मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस को इसी रणनीति से जिता चुके हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने सरकारी जमीन पर बसे गरीबों को नहीं उजाड़े जाने का फरमान चुनाव से पहले ही जारी कर दिया था। इसके अलावा महिलाओं को सरकारी नौकरी में 33 फीसद आरक्षण भी कांग्रेस का आजमाया हुआ दाव है। पार्टी इसे भी मध्यप्रदेश में आजमा कर 1990 में विधानसभा चुनाव जीत चुकी है। बेरोजगार युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देना भी बेहद लोक लुभावन घोशणा है जिसने भाजपा को सुरक्षात्मक मुद्रा में कर दिया है। यह मुद्दा हालांकि सरासर विवादास्पद है, क्योंकि इस पहाड़ी राज्य में संगठित क्षेत्र के रोजगार तो मुट्ठी भर ही हैं, इसलिए बेरोजगारी तय करना सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। साथ ही सरकारी पैसे के दुरूपयोग की गुंजाइश भी इस घोषणा में अत्यधिक है। बहरहाल रावत ने फिलहाल मास्टर स्ट्रोक तो जड़ ही दिया है।
इसके अलावा प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के स्थाई और मजबूत उपाय करने की मंशा भी खासकर पहाड़ों पर बसे मतदाताओं के लिए बेहद आकर्शक साबित हो सकती है। केदारनाथ आपदा ने ये सिद्ध कर दिया कि प्रदेष में आपदा दरअसल स्थानीय नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन संबंधी कारणों से आ रही हैं। साथ ही इन आपदा के आगे-आगे और बढ़ने तथा विनाषकारी सिद्ध होने की आशंका प्रबल ही होने वाली है। ऐसे में आपदा की जद में आने वाले मतदाताओं के लिए यह बात बहुत महत्वपूर्ण है कि सत्तारूढ़ दल अपनी अगली पारी में इस समस्या का ठोस उपाय करने की मंषा जताए। वैसे भी रावत ने करीब दो साल के भीतर केदारनाथ पुनर्निर्माण और पुनर्वास की चुनौती से बखूबी निपट कर चार धाम यात्रा को फिर पटरी पर लाने की मिसाल से लोगों को प्रभावित तो किया ही है।
इस संकल्प पत्र की खूबी यह है कि इसके मुद्दे लोगों के मर्म को छूने वाले हैं, जिनका जवाब देना भाजपा के स्टार प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी मुशकिल होगा। इसकी वजह ये है कि मोदी का सारा जोर तो सबसीडी खत्म करने पर है। उनकी घोशित नीति है कि लोगों के लिए काम के अवसर हों तो उन्हें सरकार को नकद रियायतें नहीं देनी पड़ेंगी। यह बात दीगर है कि मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार करीब पौने तीन साल में नए, स्थाई रोजगारों को छोड़ भी दें तो रोजगार के मौसमी अवसरों तक को पटरी पर नहीं ला पाई है। रही-सही कसर नोट बदली ने पूरी कर दी। अब देखना यही है कि अपनी चाल, चरित्र और चेहरा तक दाव पर लगा चुकी भाजपा और मोदी-शाह की जोड़ी लाखामंडल वाले इस राज्य में चुनाव की अग्निपरीक्षा से कितनी सुर्खरू होकर निकल पाएगी।
बागियों पर पार्टी की सख्त़ नज़र: श्याम जाजू
ऋषिकेश पहुंचे उत्तराखंड बीजेपी प्रभारी श्याम जाजू ने भाजपा प्रत्याशी प्रेम चंद्र अग्रवाल के चुनावी कार्यालय का उद्धघाटन किया। दो बार के विधायक रहे प्रेम चंद्र तीसरी बार चुनावी मैदान में है , लेकिन इस बार भाजपा को अपने गढ़ में ही भाजपा के बागियों से चुनौती मिल रही है। श्याम जाजू ने ऋषिकेश पहुंचकर कार्यालय का उद्धघाटन किया और कहा कि “भाजपा एक अनुशासित पार्टी है जो भी भाजपा के अनुशासित कार्यकर्त्ता रहे है उन्हें भजपा ने टिकट दिया”।

वहीँ श्याम जाजू ने बीजेपी के बागियों को चेतावनी दी है की भाजपा के किसी भी निशान और चेहरो का अगर ये बागी प्रत्याशी प्रयोग करते है तो इनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जायेगी और भाजपा इस तरह के कार्यो की चुनाव आयोग से शिकायत करेगी। गौरतलब है की भाजपा के पूर्व राज्य मंत्री समेत पिछली जिला कार्यकारणी के सदस्यो और पदाधिकारियों ने भाजपा को छोड़कर कर निर्दलीय प्रत्याशी संदीप गुप्ता को समर्थन दिया है।
बीजेपी को ऋषिकेश में झटका, संदीप गुप्ता सहित कई सदस्यों ने खून से लिख कर सौंपा इस्तीफा
उत्तराखंड में रूठो को मानाने और डेमेज कंट्रोल की कोशिशों में लगी भाजपा को ऋषिकेश में बड़ा झटका लगा , भाजपा के बागी उम्मीदवार सहित भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष और कई कार्यकारिणी सदस्यो ने खून से लिख कर अपना इस्तीफा आलाकमान को भेज दिया है। ऋषिकेश से टिकट बंटवारे को लेकर नाराज चल रहे संदीप गुप्ता का आरोप है कि “लगातार इस विधानसभा छेत्र में भाजपा के कार्यकर्ताओ की अनदेखी हो रही है जिसके चलते निवर्तमान विधायक से सभी कार्यकत्र्ताओ में नाराजगी बनी हुयी है,पिछली बार भी मेरे टिकट की घोषणा के बाद भाजपा संगठन मंत्री के कहने पर मेरा टिकट काट दिया गया इस बार का वादा कर के फिर से संगठन मुकर गया , और एक बारी व्यक्ति को तीसरी बार ऋषिकेश विधान सभा से टिकट दिया जा रहा है जो यहाँ के छेत्र के सभी कार्यकर्ताओ की अनदेखी करता है पार्टी की कार्यकर्ताओ की विरोध की नीति के चलते मेरे साथ कई बीजेपी नेताओ ने खून से त्याग पत्र लिखकर आलाकमान को इस्तीफा दे दिया”।
गौरतलब है टिकट बंटवारे को लेकर यहाँ बीजेपी के नेतओं में नाराजगी थी जिसके चलते संदीप गुप्ता पहले ही ऋषिकेश से निर्दलीय नामांकन कर चुके है, कई बड़े नेताओ के समझने के बाद भी वो अभी तक मैदान में डटे हुए ।
“विकास” की भेंट चढ़ता देहरादून
उत्तराखंड राज्य बनते ही देहरादून को कामचलाऊ राजधानी बना दिया गया। कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और आज भी गैरसैंण को राजधानी बनाने की लड़ाई जारी है। राजधानी को देहरादून से हटाने का मुद्दा भी हर अन्य मुद्दे की तरह राजनीतिक ज़्यादा और व्यावहारिकता से दूर हो गया। जो नेता इस पर राजनीतिक रोटियाँ सेक रहे हैं वो तमाम तरह के कॉस्मैटिक मार्केटिंग स्ट्रेटेजी तो कर रहे हैं लेकिन गैरसैंण में राजधानी बनाने को लेकर ज़मीनी तैयारी क्या है इसके बारे में फ़िलहाल कोई जानकारी शायद ही किसी के पास है। ख़ुद मुख्यमंत्री ये कह चुके हैं कि ये काम “शनै शनै” यानि धीरे धीरे ही होते हैं लेकिन ये धीरे कितना धीरे होगा ये शायद चुनावों के नतीजे तय करेंगेँ। वहीं जो लोग राजधानी शिफ़्ट करने के पक्षधर हैं चाहे वो राज्य आंदोलनकर्मी हो या बेतरतीब “विकास” से परेशान हो चुके देहरादून के लोग वो भी न ये समझ पा रहे हैं न समझा पा रहे हैं कि जिस राज्य को अपने मासिक ख़र्चे चलाने के लिये केन्द्र सरकार पर निर्भर रहना पड़ रहा है उसपर एक नई राजधानी को बनाने का बोझ डालना कितना सही होगा। सिर्फ़ घोषणा करने से गैरसैंण में राजधानी तो नहीं बन पायेगी। एक समाधान इस मुद्दे का ये भी है कि जम्मू कश्मीर की तर्ज पर गैरसैंण को समर कैपिटल (गर्मियों की राजधानी) बना दिया जाये। सुनने में ये बात और मौजूद समाधानों से ज्यादा व्यवहारिक लगती है मगर सवाल फिर वही है कि क्या कर्ज के बोझ तले दबे राज्य पर दो राजधानियों का भार डालना तर्क संगत होगा। ये भी तय है कि अगर ऐसा होता है तो गैरसैंण में लोगों के लिये मूलभूत सुविधायें आये या नहीं लेकिन नेताओं और अधिकारियों के लिये आराम से रहने और काम करने का इंतजाम पहले किया जायेगा। ऐसे में आम लोगों को क्या हासिल होगा राजधानी गैरसैंण ले जा कर।
इन सब राजनीतिक और सामाजिक खिंचातनी के बीच जो हारा है वो है देहरादून शहर। पिछले एक दशक में विकास के नाम पर देहरादून में तक़रीबन सबकुछ बदल गया है। गलियों मे इमारतें खड़ी हो गई हैं, संकरी सड़कों पर देसी विदेशी गाड़ियाँ दौड़ने लगी हैं, डिमांड से ज़्यादा मकानों की सप्लाई बन गई है, किसी ख़ास कारण के चलते यहाँ के निवासी पलायन कर रहे हैं और बाक़ी सब जगह से लोग यहां आकर बस रहे हैं। पलायन भी एक राजनीतिक मसला और सेमिनारों का ज्वलंत मुद्दा बनकर रह गया है लेकिन पहाड़ों से हो रहे पलायन के मूल कारणों और इसे रोकने के लिये कोई भी राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन कुछ ठोस कर पाया हो ऐसा नहीं दिखता। किसी भी शहर के लिये ये सब फ़ैक्टर शायद विकास के पैमाने माने जायेंगे, पर यहाँ सवाल ये है कि क्या सही मायनों मे इसे विकास कहेंगे आप?
क्या हम ये भी सोचेंगे कि वास्तविकता में हमें इस तरह हो रहे “विकास” की ज़रूरत है? पिछले दस सालों में शहर में सरकारी नौकरियों के अलावा और नौकरियों के कितने मौक़े बनाये गये? सचिवालय में जितनी फाइलें कामों की होती हैं तकरीबन उतनी ही “आर्थिक सहायता” की अर्जियां उन्हें मुकाबला देती दिखती हैं। क्यों ऐसा हो गया है कि हमारे राज्य के हर वर्ग के लोग विकास के अवसरों की जगह मुख्यमंत्री राहत कोश की तरफ ज्यादा देखने लगे हैं। क्या ये अरेंजमेंट हमारे राजनेताओं को भी वोटर मैंनेजमेंट करने में ज्यादा कारगर दिखता है। राज्य बनने के बाद से ज़मीनी और ज़रूरी इंफ़्रास्ट्रक्चर बनाने के लिये क्या क़दम उठाये गये हैं? शहर में गाड़ियाँ तो हो गई हैं लेकिन सड़के नहीं, इमारतें तो बन गई हैं लेकिन सीवेज की लाइनें नहीं, मॉल हैं लेकिन ग्राहक नहीं है।
उत्तराखंड राज्य का निर्माण आंदोलन की राह पर चल कर हुआ था और वो आंदोलन और उसमें दिया गया बलिदान हमारी सांस्कृतिक विरासत का अमिट हिस्सा बन गया है। लेकिन इस समय की ज़रूरत है कि राज्य को धरना प्रदर्शन राज्य की छवि से मुक्त कराया जाये और सब लोग एक साथ आकर राजनीतिक खेल की सबसे पुरानी चाल जात पात, धर्म, भूगौलिक भिन्नता को दरकिनार कर अपने नेताओं की जवाबदेही तय करें। हम कहीं न कहीं इस मानसिकता के शिकार हो गये हैं कि हर राजनेता एक समान है और हमारी मजबूरी है इन्हें चुनना। लेकिन जब हम अपने घर के लिये सामान खरीदते हुए समझौता नहीं करते तो हम अपने राजनेताओं को चुनते समय समझौता कैसे कर सकते हैं।
शायद अब ये समय आ गया है कि देहरादून के बाशिंदे अपने हुक्मरानों से सवाल जवाब करने लगें वरना कुछ दिन पहले ही हमने आँख बंदकर हुए “विकास” के नतीजों का ट्रेलर दिल्ली और एनसीआर की हवा में देख चुके हैं।
वेतन देने को पैसा नही है लेकिन फर्जी घोषणाएं कर मुख्यमंत्री जनता को कर रहे गुमराह: निशंक
हरीश रावत उत्तराखंड के लोगों को गुमराह करने के आलावा कुछ नहीं कर रहे हैं। ये कहना है बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का। रविवार को देहरादून में पत्रकारों के साथ बात करते हुए निशंक ने आरोप लगाया कि हरीश रावत घोषणाऐं ही कर रहे हैं और इसके ज़रिये वो लोगों को गुमराह कर रहे हैं। निशंक ने आरोप लगाया कि एक तरफ हरीश रावत नई योजनाओं का शिलन्यास कर रहे हैं वहीं कई महीनों से वो सार्वजनिक तौर पर ये बात करते रहे हैं कि सरकार के पास अपने कर्मचारियों को तनख्व़ाह देने के पैसे नही हैं। ऐसे में क्या रावत सिर्फ लोगों की आंखों में धूल नहीं झों क रहे हैं?
कांग्रेस के बागियों को पार्टी में जगह मिलने और टिकट दिये जाने पर भी निशंक पार्टी के बचाव में सामने आये। उन्होने कहा कि कांग्रेस एक डूबता जहाज़ है और जो लोग पार्टी छोड़ कर बीडजेपा में आ रहे हैं वो सही फैसला कर रहे हैं। विजय बहुगुणा और उनपर कांग्रेस द्वारा लगाये गये भ्रष्टाचार के आरोंपों पर भी निशंक ने बहुगुणा का बचाव किया। निशंक ने कहा कि जब तक बहुगुणा कांग्रेस में थे सब ठीक था लेकिन जैसे ही उन्होने बीजेपी ज्वाइन की वैसे ही कांग्रेस को उनमें सारी खामियां दिखने लगी।
लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में ये बात घूम रही थी कि निशंक को उनकी पार्टी ने चुनावों में हाशिये पर डाल दिया है। इस पर बी निशंक ने बोलते हुए कहा कि वो पार्टी के कार्यकर्ता हैं और पार्टी जिस भी रूप में उनका प्रयोग करना चाहेगी वो तैयार हैं।
गौरतलब है कि भले ही पार्टी ने निशंक को चुनावों में कोई अहम भूमिका न दी हो लेकिन कांग्रेसी बागियों को टिकट देने के चलते खुद बीजेपी में दो बगावत पैदा हो गई है निशंक उसे खत्म करने के लिये काम कर रहे हैं। और मौजूदा चुनावी माहौल को देखते हुए ये काफी बड़ी चुनौती है निशंक के लिये भी औऱ बीजेपी के लिये भी।
टिकट को लेकर मल्ल ने कांग्रेस को दी कोर्ट जाने की चेतावनी
बीते शुक्रवार को धनौल्टी सीट पर पार्टी हाईकमान ने अपना फैसला बदल कर प्रीतम पंवार को सर्मथन करने की घोषणा कर दी थी।इस घोषणा के बाद धनौल्टी सीट के प्रत्याशी मनमोहन सिंह मल्ल के अंदर कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा तो था ही इसी गुस्से में उन्होंने पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ने की जिद ठान ली है और मनमोहन मल्ल ने कांग्रेस को अदालत में जाने की चेतावनी भी दी है।
साथ ही मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा है कि पीडीएफ में तो बीएसपी समेत आधा दर्जन लोग सरकार के सहयोगी रहे हैं। ऐसे मे सिर्फ धनौल्टी क्षेत्र में मेरा टिकट काट कर कांग्रेसी के कार्यकर्ताओं का मनोबल क्यों तोड़ा जा रहा है। मल्ल की माने तो वे कांग्रेस के सिंबल पर ही धनोल्टी से चुनाव लड़ेगे।
गौरतलब है कि इस सीट पर कांग्रेस ने मसूरी नगर पालिका चेयरमैन मनमोहन सिंह मल्ल को टिकट दिया था लेकिन अब पार्टी प्रीतम पंवार को समर्थन देगी।पार्टी के इस फैसले को सही ठहराते हुए पार्टी प्रवक्ता आर.पी.रतूड़ी ने कहा था कि मल्ल कांग्रेस के समर्पित और पुराने प्रत्याशी है और वह पार्टी के इस फैसले को समझेंगें।लेकिन मल्ल की जिद्द तो कुछ और ही करने की है।देखना यह होगा कि क्या पार्टी गुलजार अहमद की तरह मल्ल को अपने साथ कर लेगी या आर्येंद्र की तरह मल्ल भी अपना चुनाव लड़ेंगें।
कांग्रेस ने संकल्प पत्र में गिनाई पार्टी की उपलब्धियां और भाजपा की अपूर्ण घोषणाएं
शनिवार को मुख्यमंत्री हरीश रावत ने देहरादून में बीजेपी पर आँकड़ों और संकल्प पत्रों से हमला बोला। राज्य में कांग्रेस सरकार बनने पर उन्होंने साल 2020 तक के लिये संकल्प पत्र जारी किया।
इस पत्र के मुताबिक़ः
- मलिन बस्तियों का नियमितीकरण का कानून बना के लोगो को मालिकाना हक़,साथ ही साथ 2017 मे मलिन बस्तियों का अधिकार पत्र दिया जाएगा।
- उन युवाओं को जिनको सरकार रोज़गार देने में नाकामयाब रही उनको 2500 रुपये का बेरोजगार भत्ता जब तक उन्हें नौकरी नहीं मिलती।
- उत्तराखंड के प्रत्येक घर से सरकारी या अर्धसरकारी नौकरी, 2020 तक सरकार का हर परिवार में एक कमाऊ सदस्य देने का वादा
- महिलाओं को सरकारी नौकरी में 33% का आरक्षण
- आपदा के खिलाफ मजबूत ढाल बनेगा प्रदेश
- बिजली,पानी और सड़कों पर होगा काम
- 2022 तक का रोड मैप भी हुआ तैयार
- राज्य स्थापना के बाद बाद बीजेपी ने 6 साल 3 महीने के कार्यकाल में लगभग 2554 घोषणाएं की लेकिन सीएम रावत ने पौने तीन साल में कुल 3823 घोषणाएं की और उनपर काम भी किया
- सीएम रावत की घोषणाएं सिर्फ कागज पर नहीं हुई,2170 घोषणाएं पूरी भी हो गई।
- पूर्व मुख्यमंत्री निशंक के कार्यकाल में कुल 1245 घोषणाएं ऐसी रही जिनपर कोई काम नहीं हुआ
- बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में लगभग 48.75 प्रतिशत घोषणाएं अपूर्ण रहीं और सीएम रावत के कार्यकाल में केवल 7.06 प्रतिशत घोषणाएं अपूर्ण रही।
कांग्रेस का हाथ अब नहीं है मल्ल के साथ,धनौल्टी में पार्टी देगी प्रीतम का साथ






























































