तिब्बती समुदाय ने मनाया 58वा जनक्रांति वर्षगांठ
उत्तराखण्ड पलायन का बढ़ता गया मर्ज
ज्यों-ज्यों दवा की गई त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया। यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है उत्तराखंड के पलायन पर। हालांकि पलायन पूरे देश की नहीं विश्व की समस्या है,लेकिन तमाम दावों के बावजूद उत्तराखंड पलायन से मुक्ति नहीं पा रहा है। लगातार बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्थागत खामियां पलायन को और बढ़ा रही हैं। उत्तराखंड के 13 जनपदों में तहसीलें उपतहसीलें बढ़ी,लेकिन विकासखंड आज भी वहीं के वहीं हैं। 9 नवंबर को 2000 को अस्तित्व में आए उत्तराखंड का कुल क्षेत्रफल 53 हजार 483 वर्ग किलोमीटर है,जबकि राज्य का कु ल वन क्षेत्र 38 हजार वर्ग किलोमीटर है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन और नेपाल से लगने वाला उत्तराखंड पलायन का दंश झेल रहा है।
उत्तराखंड की अन्तर प्रादेशिक सीमाएं उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश से लगती हैं। राज्य बनने के बाद भी उत्तराखंड में गैर आबाद गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो पलायन की कथा से कम नहीं है। प्रदेश के कुल 16 हजार 7 सौ 93 गांव में से लगभग 4 सौ के आसपास के गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं शेष गांवों में यदि 25 परिवार रहते हैं तो गांव में केवल 10-15 परिवार ही रहते हैं, उनमें भी घर के बड़े बुजुर्ग, विशेषकर महिलाएं ही पहाड़ में बचीं हैं। शेष लोग मैदानों की ओर उतर चुके हैं। जिसके कारण पहाड़ में अराजक तत्वों का जमावड़ा हो रहा है। पहले भेड़ पालक जो जाड़ों में नीचे आते थे और गर्मियों में ऊपर चले जाते थे। एक तरह से सीमा सुरक्षा का काम करते थे। इन चरवाहों से गुप्तचर जानकारियां मिलती थी,लेनिक पलायन का दंश इन पर भी पड़ा है और यह लोग भी अब पलायन की शिकार हो रहे हैं। उत्तराखंड में शासन करने वाली हर राजनैतिक पार्टी पहाड़ से पलायन जैसी गंभीर समस्या को उठाती तो हैं,लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे भूल जाती है।
राजधानी देहरादून के बाद अगला जिला टिहरी है। जहां से पलायन खूब बढ़ा है। अकेले टिहरी जनपद के किरासू गांव में 15 परिवार रहते थे,लेकिन 8 परिवार वहां से पलायन कर चुके हैं। भले ही यह पलायन रोजी-रोटी स्वास्थ्य तथा सुविधाओं को लेकर हो,लेकिन पहाड़ से लगातार बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं पलायन के प्रति सत्ता सजग नहीं है। ऐसा नहीं है कि अधिसंख्य खंडहर उत्तराखंड की गरीबी,भुखमरी, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदाएं पलायन का कारण हैं।
सच तो यह है कि पलायन इतनी बढ़ी महामारी बन गया है कि नौकरशाह ही नहीं राजनेता और जनप्रतिनिधि भी पलायन करने लगे हैं। चाहे कुमाऊं हो अथवा गढ़वाल, कुमाऊं के राजनेताओं ने अपने आवास के लिए हल्द्वानी को चुना है तो गढ़वाल के नेताओं ने अपने पलायन का केन्द्र देहरादून का माना है। पहाड़ के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं के आवास देहरादून में है। वे चाहे भाजपा के नेता हों या कांग्रेस के कोई भी पहाड़ से जनप्रतिनिधि बनकर फिर वहां नहीं रूकना चाहता।
अपवाद स्वरूप लोगों में पूर्व आई.ए.एस. स्व. डा. आर.एस. टोलिया का नाम गिना जा सकता है। जिन्होंने अपने ही क्षेत्र को अपनाया। ऐसे ही लोगों में केदार सिंह फोनिया तथा उनके पुत्र विनोद फोनिया का नाम शामिल है। जिन्होंने देहरादून के बजाय अपने ही क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। अन्य नौकरशाह और राजनेता सभी पलायन कर चुके हैं। इसका उदाहरण इस बात से लिया जा सकता है कि प्रदेश मुख्यमंत्री हरीश रावत स्वयं किच्छा और हरिद्वार देहात से चुनाव लड़ा है हार जीत का फैसला भले ही बाद में होगा,लेकिन इसे पलायन ही कहेंगे कि उन्होंने अपने क्षेत्र को छोडक़र मैदान को अपना ठिकाना बनाया है।
यही स्थिति पहाड़ के अन्य नेताओं की भी है। नेता भले ही पहाड़ के हों, लेकिन उन्होंने अपना ठिकाना मैदान ही बनाया है। ठेठ मैदानी सीट कहे जाने वाले क्षेत्रों से पहाड़ के नेता चुनाव लड़ रहे हैं जिसके कारण मैदान के नेताओं में काफी तीखी प्रतिक्रिया भी है,लेकिन दलीय अनुशासन तथा व्यवस्थाओं के कारण लोग चुप हैं।
पहाड़ के गांवों से होने वाले पलायन का एक पहलू और है। वह है कम सुगम गांवों और कस्बों से बड़े शहरों अथवा पहाड़ों की तलहटी पर बसे हल्द्वानी,कोटद्वार,देहरादून,रुद्रपुर और हरिद्वार जैसे शहरों को होता बेतहाशा पलायन। मैदानी इलाकों में रहकर रोजगार करने वाले लोग सेवा निवृत्त के बाद भी अपने गांवों में दुबारा वापस जाने से ज्यादा किसी शहर में ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं। स्थिति जितनी गम्भीर बाहर से दिखती है उससे अधिक कहीं चिंताजनक है,जो गांव शहरों से 4.5 किलोमीटर या अधिक दूरी पर हैं उनमें से अधिकांश खाली होने की कगार पर हैं।
समाजसेवी आलोक भटृ मानते हैं कि पलायन के पीछे सरकार की नाकामयाबी है। श्री भट्ट का कहना है कि सुविधाएं न होने के कारण पहाड़ पूरी तरह पहाड़ जैसे होते जा रहे हैं। सडक़ों और रेलवे की कमी के कारण वहां के उत्पाद भी समय से शहरों तक नहीं पहुंच पाते। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में जन सुविधाओं के लिए पहाड़ के यह चौकीदार मैदानों की ओर आ रहे हैं। आलोक भटृ का कहना है कि यदि सरकार पहाड़ों के विकास की ठान ले और गांवों में ही मूलभूत सुविधाएं मिल जाएं तो कोई अपना घर क्यों छोड़ेगा,लेकिन जीवन यापन के लिए व्यक्ति को मजबूरन पलायन करना पड़ता है।
समाजवादी पार्टी के युवा नेता एवं कार्यक्रम समन्वयक आलोक राय मानते हैं कि यदि सरकारों में पहाड़ पर समुचित ध्यान दिया होता तो आज यह स्थिति न आती। उनका कहना है कि पलायन आज बड़ी समस्या है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता,लेकिन पलायन का दोष केवल एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। यह निश्चित है कि पहाड़ों के साथ भेदभाव हुआ है और पहाड़ के नेताओं ने भी अपने को केवल चुनाव तक ही क्षेत्रों से जोड़े रखा। उसके बाद उन्होंने मैदान का रूख किया। इसके एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं। भाजपा के तथा कांग्रेस सभी प्रमुख एवं वरिष्ठ नेता आज मैदानों में हैं। यदि नेता ही पलायन कर गए हैं,तो जनता के सामने मजबूरी है,जिसके कारण वह भी पलायन को विवश है। इसका एक मात्र समाधान पहाड़ तक विकास की समुचित किरणें पहुंचाना होगा।
फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारत 132वें स्थान पर
फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारतीय फुटबाल टीम दो स्थान नीचे खिसक गयी है। फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारत 132वें स्थान पर है। भारत के 233 अंक हैं जो उसके पिछले महीने के योग से 11 कम हैं।
एशियाई फुटबाल परिसंघ (एएफसी) के देशों में भारत 46 देशों में 19वें स्थान पर हैं। ईरान एशिया में सबसे ऊपर है। उसकी विश्व रैंकिंग 33 है। अर्जेंटीना विश्व रैंकिंग में अब भी शीर्ष पर बना हुआ है। उसके बाद ब्राजील, जर्मनी, चिली और बेल्जियम का नंबर आता है।
कई अफसरों पर गिरेगी एनएच घोटाले की गाज
नेशनल हाईवे के मुआवजे में घोटाले की गाज कई पीसीएस अफसरों और कर्मचारियों पर गिर सकती है। इनके कार्यकाल में ही कृषक भूमि को अकृषक दिखाकर कई गुना मुआवजा दिलाया गया। बैक डेट में यह खेल खेला गया, जबकि उक्त स्थानों पर आज भी फसल लहलहा रही है। एक पूर्व विधायक ने भी इस मामले की शिकायत प्रधानमंत्री के साथ ही वित्त मंत्री व भूतल परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री से की थी।
ज्ञातव्य है कि एनएच 74 यानी जसपुर से खटीमा राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण के गजट नोटिफिकेशन के साथ ही खेल शुरू हो गया था। किसानों को मुआवजे के लिए चक्कर कटवाए जाने लगे। जमीन का मुआवजा उन्हें मिलना था लेकिन अफसरों की नीयत खराब हो गई। कमीशनखोरी के फेर में कृषक भूमि को अकृषक में दर्ज कर कई गुना मुआवजा दे दिया गया। सेटिंग-गेटिंग से चल रहे इस खेल में कई तहसीलों और एसडीएम दफ्तरों से घालमेल हुआ।
यहां तक कि एसएलएओ का जो पद लोग जानते नहीं थे, वह चर्चा में आ गया। बड़ी संख्या में लोगों का यहां आना-जाना शुरू हो गया। कमीशनखोरी बढ़ती गई और किसान लालच में फंसते गए। ऐसे में एनएच चौड़ीकरण की लागत कई गुना बढ़ गई। बाजपुर में तो एक ही दिन में 120 से ज्यादा मामलों में 143 की कार्रवाई की गई। अब मामला सुर्खियों में आने के बाद इस मामले में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की गर्दन फंसना तय माना जा रहा है।
इसी मामले में संदिग्ध पीसीएस अधिकारी डी.पी. सिंह के आवास औैर कार्यालय समेत अन्य स्थानों पर इनकम टैक्स विभाग ने जिस तरह से जबरदस्त छापेमारी की उससे मामले में शामिल लोगों में हड़कंप मचा हुआ है। माना जा रहा है नई सरकार के गठन के साथ ही राज्य में ऐसे मामलों के खुलासे और तेज होंगे।
हर-हर महादेव की गूंज से खिल उठा मणिकूट पर्वत,परिक्रमा में उमड़े देशी-विदेशी श्रद्धालु
ऋषीकेश में गंगा के तट पर स्थित मणि कूट पर्वत प्राचीन समय से ही ऋषि मुनियों की तपोभूमि के नाम से जाना जाता है।यहाँ पर नीलकंठ महादेव और अन्य कई सिद्ध पीठ है।इस छेत्र को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिए पिछले 13 सालों से मणि कूट पर्वत की परिकर्मा का आयोजन किया जाता रहा है,जिस में देशी-विदेशी लोग शिरकत करते है।कहा जाता है कि मणि कूट पर्वत पर त्रिदेव निवास करते है जिसकी परिक्रमा करने से पापो का शमन होता है।ऋषियों की तपस्थली मणि कूट पर्वत अपने में असीम खूबसूरती और सिद्ध पीठ को समेटे हुए है,लेकिन इसका अधिकांश भाग राजा जी नेशनल पार्क के अंतर्गत आने के कारण ये पूरा इलाका प्रकृर्ति और पर्यटन की असीम संभावनाओ के बावजूद भी अछूता है। अब जाकर यहाँ के ग्रामीण लोगो ने अपनी पौराणिक यात्रा को फिर से शुरु किया है जिससे इस इलाके को पर्यटन से जोड़ा जा सके। कहते है पुराणों में बताया गया है की समुद्रमंथन में निकले विष को अपने कंठ में धारण करके भगवन शिव ने मणिकूट पर्वत में ही तपस्या की थी, इसी स्थान पर विष की तपन से भगवन शिव को शांति मिली थी और वो तपस्या में लीन हो गए थे। मणि कूट पर्वेर्ट परिकर्मा लगभग ६० क़ि.मी. की एक खुबसुरत ट्रेकिग रूट है जंहा प्रकर्ति ने अपनी सुन्दरता को बिखेरा हुआ है नदी ,झरने और उची नीची पर्वत मालाये यहाँ पर आने वाले यात्रियों को एक सुखद एहसास कराते है। अगर सरकार इस ट्रेकिंग रूट पर धायन दे तो आने वाले समय में ये जल्द ही पर्यटन के मानचित्र पर अपनी जगह बना लेगा,जिस से सरकार को राजस्व और गर्मिनो को स्वरोजगार मिलेगा।पिछले 12 सालों से इस यात्रा का हिस्सा बन रही एमी बताती है की ये यात्रा काफी अच्छी है और इस यात्रा को करने से एक आध्यात्मिक एनर्जी प्रवाह शरीर में होने लगता है। सिद्ध पीठो और १२ द्वारो से घिरा मणि कूट पर्वत अपने में असीम सुन्दरता समेटे हुए,जरुरत है तो इस यात्रा के प्रचार प्रसार की जिस से आने वाले समय पर्यटन के साथ-साथ ग्रामीणों को भी रोजगार एवं पलायन से मुक्ति मिल सके और इस छेत्र की आध्यात्मिक और प्राकर्तिक नज़रों का पर्यटक भी लुफ्त उठा सके।
मतों का मामूली अंतर भी बदल देता है उत्तराखण्ड की सरकार
उत्तराखण्ड के अब तक तीन विधानसभा चुनाओं में परिणाम के अनुसार भाजपा कंाग्रेस की सरकार मामुली मतों के अंतर से प्रदेश में बदलती रहती हैं। अब तक कोई भी सरकार लगातार सत्ता में नही बनी रही। ऐसे में भाजपा कांग्रेस दोनों दलों के दावे पर जनता का कहना है कि छोटे राज्य होने के नाते यहां मत प्रतिशत में मामूली अंतर पार्टियों को सत्ता से बेदखल कर देती है।
पिछले तीन विधानसभा में दलों को मिले मत का प्रतिशत:—
वर्ष 2012 : कांग्रेस, 34.03, भाजपा, 33.38, बसपा, 12.28, उक्रांत, 1.93, निर्दलीय, 12.34
वर्ष 2007, कांग्रेस, 29,59, भाजपा, 31,90, बसपा, 11.76, उक्रांत, 5.49 निर्दलीय, 11.21
वर्ष, 2002 कांग्रेस, 26.91, भाजपा, 25.91, बसपा, 11.20, उक्रांत, 6.36, निर्दलीय, 16.30
उत्तराखंड को खुशहाल राज्य बनाने के लिए नए सेवा सूत्र- किशोर
- रोजगार
- पारदर्शी प्रशासन
- सर्व साक्षरता
- नशा विहीन मुक्त
- भरपूर स्वस्थ्य
- सहिष्णुता
- शतप्रतिशत आवास
- भरपूर राजस्व
- स्वच्छ जलवायु
जब तस्वीरें करे बात,क्लिक एट ईट बेस्ट- नितिका आले
“चाहें जुबान फीकी पड़ जाए, पर तस्वीरें बोलती हैं”
इंटरनेशनल वूमेन डे को मनाने के लिए न्यूजपोस्ट ने कोशिश की आप तक उन लोगों को पहुचानें की जो वैसे तो अपने काम में परफेक्ट है लेकिन अभी लोगों तक नहीं पहुंच पाएं हैं।
ऐसी ही हमारी अगली कहानी है नितिका आले की जो एक प्रोफेशनल फोटोग्राफर तो है ही साथ में आर्ट और पेंटिंग में भी इनका कोई जवाब नहीं।कहते हैं ना कि कभी कभी कुछ तस्वीरें बातें करती हैं तो आगे आपको कुछ ऐसी तस्वीरें देखने को मिलेंगी जो सचमुच बाते करती हैं।

नितिका आले देहरादून की रहने वाली हैं।ग्रेजुएशन डीएवी पी जी कालेज से करने के साथ साथ साफ्टवेयर में डिप्लोमा किया है।फोटोग्राफी को अपना कैरियर बनाना एक संयोग था और आज नितिका इसके साथ अच्छा कर रही और आगे बढ़ रही हैं।उनसे यह पुछने पर कि क्या उन्हें कभी ऐसा लगा कि यह एक जेंडर स्पेसिफिक काम है,नितिका ने कहा कि दुनिया में कोई भी काम ऐसा नहीं होता जो जेंडर स्पेसिफिक हो,और फोटोग्राफी तो एक कला है जो किसी के अंदर भी हो सकती है चाहें वह लड़का हो या लड़की।2011 से नितिका फोटोग्राफी कर रही और आगे भी अपना समय फोटोग्राफी में ही देने का सोचती है।अपनी फोटोग्राफी के लिए नितिका को बहुत सारे पब्लिकेशन और ब्लाग में जगह मिली हैं और नितिका इसके साथ खुश हैं,उनका मानना है कि एक एक कदम चल कर ही सफलता मिलती है।

नितिका अभी लाईफस्टाईल,र्पोट्रेट,डाक्यूमेंट्री और वेडिंग फोटोग्राफी में काम कर रही और आगे भी इसके साथ ही काम करने की सोच रखती हैं।हालांकि नितिका फोटोग्राफर होने के साथ साथ एक अच्छी आर्टिस्ट भी हैं जिसपर वह आजकल काम कर रही है।नितिका से यह पूछने पर फेमस फोटोग्राफर बनने पर वो कैसा महसूस करेंगी, इसपर नितिका का जवाब था फेमस होना मेरे लिए ज्यादा खुशी देने वाला नहीं होगा लेकिन अगर मैं अपनी क्रिएटिवीटी और अपने अलग काम के लिए जानी जाऊं वो मुझे ज्यादा खुशी देगा और मेरे कांफिडेंस को बुस्ट करेगा।
दोनों ही पार्टी जीत का परचम लहराने में पीछे नहीं
उत्तराखण्ड के 2017 विधानसभा चुनाव के महा पर्व का अतिंम समय पास आ गया है। अब 11 मार्च दूर नही है और सभी राजनितिक दलों को 11 मार्च का इंतज़ार है इसकी चले बीजेपी के मीडिया प्रभारी देवेंद्र भसीन ने कहा कि अलग अलग विधानसभाऔ के प्रत्याशी अपने लेवल पर निरक्षण करवा रहे हैं जिससे परिणाम उनको एक दम से मिल सके और बीजेपी पूर्ण रूप से अपनी सरकार उत्तराखंड में लाने जा रही है।
उधर कांग्रेस के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमिटी के तरफ से सभी कार्यकर्ताओ को निर्देश देदिये गये है कि कांउटिंग के दौरान कोई गड़बड़ी ना हो इसका ध्यान रखा जाए और साथ ही तुरन्त जैसे जैसे परिणाम मिले उसको पी सीसी को बताते रहें ताकि कांग्रेस कमिट्टी को गठजोड़ करने में आसानी रहें और निरश्चित रूप से कांग्रेस अपनी सरकार बनाने जा रही है।
राज्य की दो मुख्य राजनीतिक पार्टी मान रही हैं कि जीत उनकी हो रही है लेकिन वास्तविकता में जीत किसी एक की ही होती है। राज्य इस माह पर्व में सभी दलों व निर्दलीयों ने एक दूसरे पर आरोप की बौछार की है। अब इस बौछार का असर मतदाताओं पर कितना पड़ा यह तोह वक़्त ही बताएगा। इसी के चलते बीजेपी में आए बागियो ने भी उत्तराखंड की राजनीतिक को एक नया मोड़ दे दिया था जिससे भारत के पांच राज्यो में चुनाव में सबसे आगे उत्तराखंड की राजनीति आगे आई है इन बागियो के फेर बदल के चलते लोगो की भी राजनीति में रोमांच दिखा है उत्तराखण्ड को बने हुए 16 साल हो गए हैं लेकिन इस विधानसभा चुनाव में पहली बार इतना ज्यादा उतेजना दिखी है।
इस बार हर पार्टी ने एक दूसरे के कच्चे चिट्ठे सामने लाने में कोई कसर नही छोड़ी है भ्रष्टाचार से लेकर पलायन तक सारे मुद्दे इस बार सामने आए हैं लेकिन देखना यह है कि आने वाली सरकार क्या सच में अपनी बातों पर अटल रह पाएगी।
मुख्यमंत्री हरीश रावत यह मान के चल रहे है कि अगले पांच साल उनकी सरकार बनने जा रही है उधर बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के बिना बीजेपी भी यह दावा कर चुकी है कि सरकार उनकी ही बनेगी। इस बार निर्दलीय ज्यादा होने के कारण राज्य के लोगो ने उम्मीदवारों पर ज्यादा ध्यान दिया है अब देखना यह है कि निर्दलीयों के साथ गठजोड़ ही सही लेकिन मुख्य पार्टी कौनसी जीत का परचम लेह रहा रही है।
अब आएगा 10 रुपये का नया नोट
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) जल्दी ही 10 रुपये का नया नोट जारी करेगी। इस नोट में पहले से ज्यादा सुरक्षा फीचर्स होंगे।
आरबीआई ने बताया कि 10 रुपये का नया नोट महात्मा गांधी सीरिज-2005 का होगा। इसमें अंग्रेजी वर्णमाला का ‘एल’ नंबर पैनल पर लिखा होगा। इस पर आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल के हस्ताक्षर होंगे। साथ ही नोट के पिछले भाग पर 2017 अंकित होगा। साथ ही इस नए नोट में नंबर पैनल पर अंक बाएं से दाहिने ओर आकार में बढ़ते हुए लिखे जाएंगे। जबकि पहले तीन कैरेटर समान आकार में होंगे।
आरबीआई ने यह भी बताया कि नए नोटों के जारी होने के बावजूद 10 रुपये के सभी पुराने नोट कानूनी तौर पर वैध होंगे।



























































