उत्तराखंड में 2012 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से कांग्रेस मात्र आधा प्रतिशत अधिक वोट पाकर तत्कालीन भाजपा सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया था।
पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है। लेकिन इस बार दोनों दलों के बागियों द्वारा मैदान में ताल ठोकना राष्ट्रीय पार्टियों के लिए चुनौती बना हुआ है। हालांकि कई सीटों पर निर्दलीय भी टक्कर देते हुए दिखाई पड़ रहे है। अब ऐसे में स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशी का चुनाव मत निर्णायक साबित होंगे।
उस वक्त भाजपा से कांग्रेस एक सीट अधिक यानी 32 सीटें लेकर राज्य के बड़े दल के रूप में उभरी और बसपा, निर्दलीयों के सहारे प्रदेश में सरकार बना ली। अगर मत प्रतिशत की बात की जाये तो कांग्रेस को 33.79 और भाजपा को 33.13 फीसदी मत मिले थे।
उत्तराखण्ड में मतों का प्रतिशत बिगाड़ सकता है खेल
नन्हें मुन्ने बच्चों की आवाज बनकर उनकी जिंदगी संवारती – आदिती
‘’जिंदगी और कुछ भी नहीं तेरी मेरी कहानी है’’
कहानी किसी की भी इसमें दम होना चाहिए,और ऐसी ही कहानी है- गैर सरकारी संस्था पर्वतीय बाल मंच की संयोजक अदिती पी कौर की।वैसे तो हमारे आस पास बहुत से संस्था काम कर रहे हैं लेकिन यह खास है क्योंकि यह उन नन्हें मुन्ने बच्चों के लिए काम कर रहा जिनकी आवाज भीड़ में ही दबी रह जाती है।
आइये अदिती से जानते हैं कुछ उनके बारे में, कुछ उनकी संस्था के बारे में।
अदिती देहरादून की रहने वाली हैं।इन्होंने स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद होटल मैनेजमेंण्ट की डिग्री ली और कुछ समय होटल में काम भी किया हैं।इस दौरान अदिती की मुलाकात एस0बी0एम0ए0 अंजनीसैंण,टिहरी गढ़वाल में संस्था के सचिव सिरिल आर. रैफियल से हुई।यह शायद इनकी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट था, सिरिल जी से मिलने के बाद अदिती को सामाजिक क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं के बारे में पता चला और सामाजिक क्षेत्र में काम करने का इनका नया सफर यहीं से शुरू हुआ।
अदिती कहती हैं कि जैसे कि किसी भी नए काम को शुरु करने में हजारों चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, मुझे भी संस्था में काम करते हुए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा क्योंकि यह मेरे लिए नया अनुभव था।साल 2002 में अन्तर्राष्ट्रीय पर्वतीय वर्ष के अवसर पर ’’पर्वतीय बच्चों का अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन’’ (आईसीएमसी) आयोजित किया गया, जहां विभिन्न पर्वतीय देशों के बच्चों ने प्रतिभाग किया तथा अपने लिए एक ऐसा मंच बनाने की बात की जहां पर वो अपनी बात रख सके।बस फिर क्या था मैंने ठान ली कि अब मुझे इन बच्चों की आवाज आगे तक पहुंचानी हैं।

अदिती कहती हैं कि मेरा मुख्य काम था कि पर्वतीय बच्चों की बात को आगे बढ़ाया जाए। मुझे लगा कि बच्चों के लिए एक ऐसी जगह होनी चाहिए जिसके माध्यम से वो अपनी बात अपने समुदाय और सरकार तक पहुंचा सके।इसी सोच के साथ अदिती ने वर्ष 2003 में पर्वतीय बाल मंच (माउण्टेन चिल्ड्रन्स फाउण्डेशन) की शुरूआत कि जो बच्चों के अधिकारों को संरक्षित करते हुए बाल संरक्षण, बाल सहभागिता के माध्यम से बालक एवं बालिका के बीच भेदभाव, स्वच्छता एवं सफाई जैसे मुद्दों पर काम कर रहा है।इसके जरिए बच्चे अपने अधिकारों एवं कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार हो रहे हैं और समुदाय को जागरूक करने में अपनी भागीदारी निभा रहे हैं। आज पर्वतीय बाल मंच अपनी सहयोगी संस्थाओं के माध्यम से लगभग 15000 बच्चों से जुड़ा हुआ है।
आज अदिती ने इन सभी बच्चों के लिए एक ऐसा मंच तैयार कर दिया है जिसके माध्यम से नन्हें मुन्ने बच्चों को अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने का मौका मिला है।
उत्तराखण्ड में आने वाली नई सरकार के सामने होंगी आर्थिक चुनौतियां
उत्तराखण्ड में11 मार्च को ईवीएम (इलेक्शन वोटिंग मशीन ) चुनाव परिणाम आने के बाद चाहे जिसकी सरकार बने लेकिन नयी सरकार के लिए आर्थिक संकट एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरेगा। एक बात तो सच है कि जिस आर्थिक अराजकता का परिचय वर्तमान सरकार ने दिया है उससे नई सरकार के सामने विकास के रास्ते को छूना आसान काम नही है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में अकेले स्टाम्प और रजिस्ट्री से होने वाली कमाई में 10 प्रतिशत की कमी आयी है। इसी तरह शराब के ठेके हाइवे से हटाने के कोर्ट के आदेश के बाद अब आबकारी से होने वाली आय भी कम होगी। वैसे आबकारी को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष ने लंबे अरसे से वाद छिड़ा रहा है।
नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट मानते हैं कि वर्तमान मुख्यमंत्री ने कुछ लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार को करोड़ों का चूना लगाया, जबकि सत्तापक्ष इसे उपलब्धि मानता है। उनका कहना है कि उन्होंने शराब के कारोबार से अच्छी उपलब्धि हासिल की है पर यह अर्धसत्य है। लगभग 40 हजार करोड़ के कर्ज से जूझ रहे प्रदेश को नोटबंदी से बड़ा झटका लगा है। उससे पहले सरकार के उपायों ने भी प्रदेश को आर्थिक गर्त में ढकेला है।
आंकड़े बताते हैं कि अकेले स्टांप और रजिस्ट्री शुल्क से ही सरकार को इस वित्तीय वर्ष में 1200 करोड़ रुपये की आय का अनुमान था किन्तु फरवरी महीने में वह 554 करोड़ रुपये पर ही पहुंच सकी है, जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में इस महीने 683 करोड़ रुपये का राजस्व अर्जित हो चुका था। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में इस बार की कमाई 10 प्रतिशत कम है। रजिस्ट्री में भारी गिरावट आने के कारण यह कमी आई है। इसके कई कारण बताए जा रहे हैं।
कांग्रेस ने सत्ता में आने के 100 दिन में बेरोजगारी भत्ता देने और नई नौकरियां खोलने का वादा किया है। इन दो पमुख घोषणाओं को कंपलीट में लगभग 200 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। पात्रों की संख्या बढ़ी तो खर्च और भी बढ़ेगा।
कांग्रेस ने अपने संकल्प पत्र में जहां कई वादे किए हैं और लोगों को सब्जबाग दिखाने का काम किया है। जिनमें महिला मंगलदलों को स्टार्टअप के तौर पर 20 हजार तथा सामूहिक खेती के लिए एक लाख तक अनुदान शामिल है। इसी प्रकार युवाओं के लिए ढाई हजार प्रति युवाओं को ढाई हजार रूपए तथा सौ दिन का रोजगार दिए जाने की बात कही है। इससे भाजपा कहीं कम नहीं है।
भाजपा ने भी मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए नि:शुल्क लैपटॉप, स्मार्टफोन वितरित करने जैसे वादे किए हैं जो उत्तराखंड जैसे आर्थिक रूप से सम्मान राज्य के लिए बहुत उपयोगी नहीं है।
कुल मिलाकर जहां सरकार के कामों से जहां आर्थिक क्षरण हुआ है। वहीं दो-दो दलों द्वारा सक्षम अर्थ नीति का अनुपालन न करना भी अर्थ नीति के लिए अच्छा नहीं माना जाएगा, जो इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड की आर्थिक स्थिति आने वाले सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगी।
होली मिलन का आयोजन, फूलों के साथ खेली होली
15 केंद्रों पर होगी 70 विधानसभा सीटों के लिए मतगणना
उत्तराखंड के चुनावी नतीजे के एक्जिट पोल सर्वे ने निकाली पीके की हवा
उत्तराखंड विधानसभा के चुनावों के एक्जिट पोल ने पहाड़ पर बीजेपी का परचम लहराकर सरकार बनाने की कयासबाजी को हवा दे दी है। 2017 के विधान सभा चुनाव में से पहले से विभिन्न सर्वेक्षणों में पीछे चल रही कांग्रेस को एक बड़ा झटका अलग-अलग चुनावी रुझानों के एक्जिट पोल से लगा है। जिसकी गाज अब चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पर पड़नी शुरू हो गयी है। लगातार पहाड़ों पर कार्यकर्ताओ की नाराजगी समय समय पर पीके को लेकर सामने आयी और कार्यकर्ताओं ने इसका गुस्सा जाहिर किया।ऋषिकेश में राहुल गाँधी की जनसभा सिर्फ कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में तब्दील हो गयी जिसमे अपेक्षा अनुसार भीड़ नहीं जुट पायी। कार्यकर्ताओ ने उस समय भी पीके की टीम को लेकर नाराजगी उठायी जिसे संगठन ने दबा दिया था क्योंकि सूबे के मुख्यमंत्री पीके के जादुई चमत्कार से प्रभावित थे और प्रशांत किशोर को बढ़ती उम्र में टॉनिक और ‘‘च्यवनप्राश’’ का नाम देकर बस उसके सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की सोच रहे थे। लेकिन एक्जिट पोल के रुझानों ने कार्यकर्ताओ को बोलने का मौका दे दिया है।
अब कांग्रेसी कार्यकर्ता मुख्यमंत्री हरीश रावत के प्रशांत किशोर को ‘च्यवनप्राश’ बताने वाले बयान पर सीधा निशाना साध रहे है। गौरतलब है मुख्यमंत्री ने कहा था कि ‘‘बढ़ती उम्र में ऐसे टॉनिकों का सहारा लेना पड़ता है।’’ हरिद्वार -ऋषिकेश और देहरादून में प्रशांत किशोर को लेकर लगातार कार्यकर्ता नाराजगी जाहिर करते रहे जिस से आने वाले नतीजो 11 मार्च को अगर कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलता तो प्रशांत किशोर की न केवल पहाड़ में हवा निकल जाएगी और ये सबसे बड़ा झटका हरीश रावत के साथ साथ विजयी रथ पर निकले प्रशांत किशोर उर्फ़ पीके के लिए भी होने जा रहा है।हरीश रावत ने एक्जिट पोल के सर्वे को लेकर पूछे प्रश्नों में इन रुझानों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है और कहा है कि पहले भी पहाड़ की जनता इन सभी सर्वे को गलत साबित कर चुकी है और अब भी यही होने जा रहा है 11 तारीख को सब आपके सामने होगा।
तिब्बती समुदाय ने मनाया 58वा जनक्रांति वर्षगांठ
उत्तराखण्ड पलायन का बढ़ता गया मर्ज
ज्यों-ज्यों दवा की गई त्यों-त्यों मर्ज बढ़ता गया। यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है उत्तराखंड के पलायन पर। हालांकि पलायन पूरे देश की नहीं विश्व की समस्या है,लेकिन तमाम दावों के बावजूद उत्तराखंड पलायन से मुक्ति नहीं पा रहा है। लगातार बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्थागत खामियां पलायन को और बढ़ा रही हैं। उत्तराखंड के 13 जनपदों में तहसीलें उपतहसीलें बढ़ी,लेकिन विकासखंड आज भी वहीं के वहीं हैं। 9 नवंबर को 2000 को अस्तित्व में आए उत्तराखंड का कुल क्षेत्रफल 53 हजार 483 वर्ग किलोमीटर है,जबकि राज्य का कु ल वन क्षेत्र 38 हजार वर्ग किलोमीटर है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन और नेपाल से लगने वाला उत्तराखंड पलायन का दंश झेल रहा है।
उत्तराखंड की अन्तर प्रादेशिक सीमाएं उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश से लगती हैं। राज्य बनने के बाद भी उत्तराखंड में गैर आबाद गांवों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो पलायन की कथा से कम नहीं है। प्रदेश के कुल 16 हजार 7 सौ 93 गांव में से लगभग 4 सौ के आसपास के गांव पूरी तरह खाली हो गए हैं शेष गांवों में यदि 25 परिवार रहते हैं तो गांव में केवल 10-15 परिवार ही रहते हैं, उनमें भी घर के बड़े बुजुर्ग, विशेषकर महिलाएं ही पहाड़ में बचीं हैं। शेष लोग मैदानों की ओर उतर चुके हैं। जिसके कारण पहाड़ में अराजक तत्वों का जमावड़ा हो रहा है। पहले भेड़ पालक जो जाड़ों में नीचे आते थे और गर्मियों में ऊपर चले जाते थे। एक तरह से सीमा सुरक्षा का काम करते थे। इन चरवाहों से गुप्तचर जानकारियां मिलती थी,लेनिक पलायन का दंश इन पर भी पड़ा है और यह लोग भी अब पलायन की शिकार हो रहे हैं। उत्तराखंड में शासन करने वाली हर राजनैतिक पार्टी पहाड़ से पलायन जैसी गंभीर समस्या को उठाती तो हैं,लेकिन सत्ता में आने के बाद उसे भूल जाती है।
राजधानी देहरादून के बाद अगला जिला टिहरी है। जहां से पलायन खूब बढ़ा है। अकेले टिहरी जनपद के किरासू गांव में 15 परिवार रहते थे,लेकिन 8 परिवार वहां से पलायन कर चुके हैं। भले ही यह पलायन रोजी-रोटी स्वास्थ्य तथा सुविधाओं को लेकर हो,लेकिन पहाड़ से लगातार बढ़ता पलायन इस बात का संकेत है कि कहीं न कहीं पलायन के प्रति सत्ता सजग नहीं है। ऐसा नहीं है कि अधिसंख्य खंडहर उत्तराखंड की गरीबी,भुखमरी, बेरोजगारी और प्राकृतिक आपदाएं पलायन का कारण हैं।
सच तो यह है कि पलायन इतनी बढ़ी महामारी बन गया है कि नौकरशाह ही नहीं राजनेता और जनप्रतिनिधि भी पलायन करने लगे हैं। चाहे कुमाऊं हो अथवा गढ़वाल, कुमाऊं के राजनेताओं ने अपने आवास के लिए हल्द्वानी को चुना है तो गढ़वाल के नेताओं ने अपने पलायन का केन्द्र देहरादून का माना है। पहाड़ के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं के आवास देहरादून में है। वे चाहे भाजपा के नेता हों या कांग्रेस के कोई भी पहाड़ से जनप्रतिनिधि बनकर फिर वहां नहीं रूकना चाहता।
अपवाद स्वरूप लोगों में पूर्व आई.ए.एस. स्व. डा. आर.एस. टोलिया का नाम गिना जा सकता है। जिन्होंने अपने ही क्षेत्र को अपनाया। ऐसे ही लोगों में केदार सिंह फोनिया तथा उनके पुत्र विनोद फोनिया का नाम शामिल है। जिन्होंने देहरादून के बजाय अपने ही क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। अन्य नौकरशाह और राजनेता सभी पलायन कर चुके हैं। इसका उदाहरण इस बात से लिया जा सकता है कि प्रदेश मुख्यमंत्री हरीश रावत स्वयं किच्छा और हरिद्वार देहात से चुनाव लड़ा है हार जीत का फैसला भले ही बाद में होगा,लेकिन इसे पलायन ही कहेंगे कि उन्होंने अपने क्षेत्र को छोडक़र मैदान को अपना ठिकाना बनाया है।
यही स्थिति पहाड़ के अन्य नेताओं की भी है। नेता भले ही पहाड़ के हों, लेकिन उन्होंने अपना ठिकाना मैदान ही बनाया है। ठेठ मैदानी सीट कहे जाने वाले क्षेत्रों से पहाड़ के नेता चुनाव लड़ रहे हैं जिसके कारण मैदान के नेताओं में काफी तीखी प्रतिक्रिया भी है,लेकिन दलीय अनुशासन तथा व्यवस्थाओं के कारण लोग चुप हैं।
पहाड़ के गांवों से होने वाले पलायन का एक पहलू और है। वह है कम सुगम गांवों और कस्बों से बड़े शहरों अथवा पहाड़ों की तलहटी पर बसे हल्द्वानी,कोटद्वार,देहरादून,रुद्रपुर और हरिद्वार जैसे शहरों को होता बेतहाशा पलायन। मैदानी इलाकों में रहकर रोजगार करने वाले लोग सेवा निवृत्त के बाद भी अपने गांवों में दुबारा वापस जाने से ज्यादा किसी शहर में ही रहना ज्यादा पसन्द करते हैं। स्थिति जितनी गम्भीर बाहर से दिखती है उससे अधिक कहीं चिंताजनक है,जो गांव शहरों से 4.5 किलोमीटर या अधिक दूरी पर हैं उनमें से अधिकांश खाली होने की कगार पर हैं।
समाजसेवी आलोक भटृ मानते हैं कि पलायन के पीछे सरकार की नाकामयाबी है। श्री भट्ट का कहना है कि सुविधाएं न होने के कारण पहाड़ पूरी तरह पहाड़ जैसे होते जा रहे हैं। सडक़ों और रेलवे की कमी के कारण वहां के उत्पाद भी समय से शहरों तक नहीं पहुंच पाते। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसे में जन सुविधाओं के लिए पहाड़ के यह चौकीदार मैदानों की ओर आ रहे हैं। आलोक भटृ का कहना है कि यदि सरकार पहाड़ों के विकास की ठान ले और गांवों में ही मूलभूत सुविधाएं मिल जाएं तो कोई अपना घर क्यों छोड़ेगा,लेकिन जीवन यापन के लिए व्यक्ति को मजबूरन पलायन करना पड़ता है।
समाजवादी पार्टी के युवा नेता एवं कार्यक्रम समन्वयक आलोक राय मानते हैं कि यदि सरकारों में पहाड़ पर समुचित ध्यान दिया होता तो आज यह स्थिति न आती। उनका कहना है कि पलायन आज बड़ी समस्या है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता,लेकिन पलायन का दोष केवल एक व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। यह निश्चित है कि पहाड़ों के साथ भेदभाव हुआ है और पहाड़ के नेताओं ने भी अपने को केवल चुनाव तक ही क्षेत्रों से जोड़े रखा। उसके बाद उन्होंने मैदान का रूख किया। इसके एक नहीं दर्जनों उदाहरण हैं। भाजपा के तथा कांग्रेस सभी प्रमुख एवं वरिष्ठ नेता आज मैदानों में हैं। यदि नेता ही पलायन कर गए हैं,तो जनता के सामने मजबूरी है,जिसके कारण वह भी पलायन को विवश है। इसका एक मात्र समाधान पहाड़ तक विकास की समुचित किरणें पहुंचाना होगा।
फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारत 132वें स्थान पर
फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारतीय फुटबाल टीम दो स्थान नीचे खिसक गयी है। फीफा की ताजा विश्व रैंकिंग में भारत 132वें स्थान पर है। भारत के 233 अंक हैं जो उसके पिछले महीने के योग से 11 कम हैं।
एशियाई फुटबाल परिसंघ (एएफसी) के देशों में भारत 46 देशों में 19वें स्थान पर हैं। ईरान एशिया में सबसे ऊपर है। उसकी विश्व रैंकिंग 33 है। अर्जेंटीना विश्व रैंकिंग में अब भी शीर्ष पर बना हुआ है। उसके बाद ब्राजील, जर्मनी, चिली और बेल्जियम का नंबर आता है।
कई अफसरों पर गिरेगी एनएच घोटाले की गाज
नेशनल हाईवे के मुआवजे में घोटाले की गाज कई पीसीएस अफसरों और कर्मचारियों पर गिर सकती है। इनके कार्यकाल में ही कृषक भूमि को अकृषक दिखाकर कई गुना मुआवजा दिलाया गया। बैक डेट में यह खेल खेला गया, जबकि उक्त स्थानों पर आज भी फसल लहलहा रही है। एक पूर्व विधायक ने भी इस मामले की शिकायत प्रधानमंत्री के साथ ही वित्त मंत्री व भूतल परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्री से की थी।
ज्ञातव्य है कि एनएच 74 यानी जसपुर से खटीमा राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण के गजट नोटिफिकेशन के साथ ही खेल शुरू हो गया था। किसानों को मुआवजे के लिए चक्कर कटवाए जाने लगे। जमीन का मुआवजा उन्हें मिलना था लेकिन अफसरों की नीयत खराब हो गई। कमीशनखोरी के फेर में कृषक भूमि को अकृषक में दर्ज कर कई गुना मुआवजा दे दिया गया। सेटिंग-गेटिंग से चल रहे इस खेल में कई तहसीलों और एसडीएम दफ्तरों से घालमेल हुआ।
यहां तक कि एसएलएओ का जो पद लोग जानते नहीं थे, वह चर्चा में आ गया। बड़ी संख्या में लोगों का यहां आना-जाना शुरू हो गया। कमीशनखोरी बढ़ती गई और किसान लालच में फंसते गए। ऐसे में एनएच चौड़ीकरण की लागत कई गुना बढ़ गई। बाजपुर में तो एक ही दिन में 120 से ज्यादा मामलों में 143 की कार्रवाई की गई। अब मामला सुर्खियों में आने के बाद इस मामले में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की गर्दन फंसना तय माना जा रहा है।
इसी मामले में संदिग्ध पीसीएस अधिकारी डी.पी. सिंह के आवास औैर कार्यालय समेत अन्य स्थानों पर इनकम टैक्स विभाग ने जिस तरह से जबरदस्त छापेमारी की उससे मामले में शामिल लोगों में हड़कंप मचा हुआ है। माना जा रहा है नई सरकार के गठन के साथ ही राज्य में ऐसे मामलों के खुलासे और तेज होंगे।




























































