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उत्तराखंड की विधानसभा में बैठेंगे 51 करोड़पति

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उत्तराखंड की विधानसभा चुनाव में जीतकर आए 51 करोड़पति विधानसभा में बैठेंगे। इसमें 40 बीजेपी, 10 कांग्रेज़ और एक निर्दलीय विधायक शामिल हैं।
चौबट्टाखाल के विधायक सतपाल महाराज उत्तराखंड विधानसभा के सबसे अमीर विधायक है। उनकी कुल सम्पति 80 करोड़ से अधिक की है। जबकि सबसे कम संपति वाले विधायक नानकमत्ता के प्रेम सिंह है और उनकी सम्पति कुल 17 लाख रुपये की है।
ऐ.डी.आर. की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार विधायक सतपाल महाराज ने अपनी सम्पति सबसे अधिक 80 करोड़ दिखाई है। सम्पति के मामले में दूसरे स्थान पर कार्यवाहक मुख्यमंत्री हरीश रावत को किच्छा से हराने वाले विधायक राजेश शुक्ला हैं और उनकी सम्पति 26 करोड़ है। जबकि तीसरा स्थान कांग्रेस के विधायक काजी निजामुद्दीन का है और उनकी कुल सम्पति 21.30 करोड़ दर्शाई है।
बीजेपी विधायक:
  • सतपाल महाराज-80 करोड़
  • हरक सिंह रावत 2.68 करोड़
  • बंशीधर भगत 1.34 करोड़
  • भरत चौधरी 1.93 करोड़Cr
  • दिलीप रावत 1.61 करोड़
  • देशराज कर्णवाल 1.25 करोड़
  • दीवान सिंह बिष्ट 1.67 करोड़
  • गणेश जोशी 3.27 करोड़
  • गोपाल सिंह रावत 1 करोड़
  • हरभजन सिंह चीमा 5.52 करोड़
  • कैलाश चंद्र 5.52 करोड़
  • केदार सिंह 4.74 करोड़
  • खजान दास 1.35 करोड़
  • कुंवर प्रणव चैंपियन 1.87 करोड़
  • मगन लाल शाह 1.60 करोड़
  • मुन्ना सिंह चौहान 2.43 करोड़
  • नवीन चन्द्र दुम्का 1.28 करोड़
  • प्रदीप बत्रा 3.80 करोड़
  • प्रकाश पंत 1.28 करोड़
  • प्रेमचंद अग्रवाल 3.24 करोड़
  • रघुनाथ चौहान 1.53 करोड़
  • राजेश शुक्ला 25.97 करोड़
  • रेखा आर्य 12.78 करोड़
  • ऋतू खंडूरी 3.38 करोड़
  • सहदेव पुंडीर 1.90 करोड़
  • संजय गुप्ता 2.86 करोड़
  • संजीव आर्य 4.25 करोड़
  • सौरभ बहुगुणा 6.80 करोड़
  • हरबंस कपूर 1.21 करोड़
  • सुबोध उनियाल 1.67 करोड़
  • सुरेंद्र सिंह 2.19 करोड़
  • सुरेन्द्र सिंगज जीना 10.52 करोड़
  • सुरेश राठौर 2.76 करोड़
  • त्रिवेंद्र सिंह नेगी 1.57 करोड़
  • उमेश शर्मा काऊ 3.7 करोड़
  • विजय सिंह पंवार 2.83 करोड़
  • विनोद चमोली 1.26 करोड़
  • यशपाल आर्य 5.50 करोड़
निर्दलीय:
  • प्रीतम सिंह पंवार 2.17 करोड़
कांग्रेस:
  • प्रीतम सिंह 8.10 करोड़
  • काजी निजामुद्दीन 21.30 करोड़
  • ममता राकेश 3.58 करोड़
  • करन मेहरा 1.42 करोड़
  • फुरकान अहमद 2.51 करोड़
  • गोविन्द सिंह कुंजवाल 1.82 करोड़
  • हरीश धामी 3.60 करोड़
  • राजकुमार 2.39 करोड़
  • इंदिरा हरदेश 4.18 करोड़
  • आदेश सिंह 2 करोड़
2012 और 2017 में दाखिल किए गए शपथ पत्रों पर गौर करें तो दोबारा चुनाव मैदान में उतरे 32 विधायको में से 28 की सम्पत्ति में वृद्धि हुई है, जबकि चार की सम्पत्ति कम हुई है।
सबसे ज्यादा वृद्धि पूर्व मख्यमंत्री हरीश रावत की सम्पत्ति में दर्ज हुई है। उनकी सम्पत्ति में कुल 763 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके बाद दूसरे स्थान पर इस बार हरीश रावत को मात देने वाले विधायक यतीश्वरानन्द रहे हैं। उनकी सम्पत्ति में 668 फीसदी की वृद्धि हुई है। जबकि चार विधायको की सम्पत्ति में गिरावट आई है। इनमे इंदिरा हरदेश की सम्पति में 26 फीसदी और बिशन सिंह चुफाल की सम्पति में 22 फीसदी की कमी आई है।
रिपोर्ट के अनुसार:
  • 77 फीसदी विधायक उच्च शिक्षित
  • 23 फीसदी आठवी से 12वी तक शिक्षा प्राप्त
  • 46 फीसदी विधायक 30 से 50 वर्ष आयु वर्ग के
  • 53 फीसदी विधायक 51 से 80 आयु वर्ग के
  • राज्य की विधानसभा में केवल सात फीसदी महिला प्रतिनिधित्व
  • सबसे कम आयु के विधायक विनोद कण्डारी 35 वर्ष
  • सबसे अधिक आयु की विधायक इंदिरा ह्रदयेश 75 वर्ष

गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है ”गौरैया दिवस पर विशेष”

इंसानी बस्ती के साथ आपके और हमारे घरो में फुदकने वाली गौरैया आखिर कहा चली ? ये सवाल पुरानी पीढ़ी के साथ नयी पीढ़ी के लिए भी आज चिंता  का सबब बनता जा रहा है। कंक्रीट के जंगलो में तब्दील होते शहर के शहर आज गौरैया की आवाज़ से महरूम हो गए है। आज ये चिड़िया देखे से भी दिखाई नहीं  दे रही और शहरों से  तेज़ी से विलुप्त हो रही है।
शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह ही प्रजातियां पाई जाती थी । ये हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो। इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है। यह शहरों में ज्यादा पाई जाती हैं। आज यह विश्व में सबसे अधिक पाए जाने वाले पक्षियों में से है। लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं। । इसके रहने का एक अलग ही अंदाज होता है। गोरैया रहती तो घोंसले में ही है, पर यह अपना घोंसला अधिकांशतः ऐसे स्थानों पर बनाती है, जो चारों तरफ से सुरक्षित हो। पक्षी प्रेमी  जानकार  प्रतीक पंवार मानते है कि अब लगातार नयी  तकनीकी के प्रयोग ने  गौरैया के रहन सहन पर प्रभाव डाला  है पिछले कुछ सालों में शहरों में गौरैया की कम होती संख्या पर चिन्ता प्रकट की जा रही है। आधुनिक स्थापत्य की बहुमंजिली इमारतों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती। सुपर मार्केट संस्कृति के कारण पुरानी पंसारी की दूकानें घट रही हैं। इससे गौरेया को दाना नहीं मिल पाता है। इसके अतिरिक्त मोबाइल टावरों से निकले वाली तंरगों को भी गौरैयों के लिए हानिकारक माना जा रहा है। ये तंरगें चिड़िया की दिशा खोजने वाली प्रणाली को प्रभावित कर रही है और इनके प्रजनन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है जिसके परिणाम स्वरूप गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है।
 
 गौरैया को भोजन में प्रोटीन  घास के बीज और खासकर  कीड़े काफी पसंद होते हैं जो शहर की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से मिल जाते हैं। ज्यादा तापमान गौरेया सहन नहीं कर सकती। प्रदूषण और विकिरण से शहरों का तापमान बढ़ रहा है।  खाना और घोंसले की तलाश में गौरेया शहर से दूर निकल आई  हैं और अपना नया आशियाना तलाश रही है जरुरत एस विलुप्त होती चिड़िया को बचाने की जिस से आने वाली पीढ़ी भी इसे सिर्फ किताबो में न पढ़े।

एफआरआई में मनाया गया ”इंटरनेशनल फारेस्ट डे”

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वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून में मंगलवार, 21 मार्च, 2017 को अन्र्तराष्ट्रीय वानिकी दिवस मनाया गया। इस अवसर पर संस्थान के सूचना केन्द्र में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई। वन अनुसंधान संस्थान के विभिन्न प्रभागों द्वारा पोस्टरों व माॅडलों आदि के जरिए से वानिकी शोध क्रियाकलापों को दर्शाया गया। वनस्पति प्रभाग के पादप दैहिकी शाखा द्वारा बांस की विभिन्न प्रजातियों के पौधों का बहुमात्र गुणन प्रौद्योगिकी व उसके रोपण, उपयोग आदि तकनीकी बिन्दुओं की जानकारी दर्शकों को दी गई। अकाष्ठ वन उपज प्रभाग द्वारा औषधीय पादपों के भिन्न-भिन्न बीमारियों से निदान व उनकी रोपण तकनीक आदि की वैज्ञानिक जानकारी से भी आम जनता को अवगत कराया गया। वन संवर्धन प्रभाग की केन्द्रीय पौधशाला द्वारा सजावटी व अन्य वृक्ष प्रजातियों के पौधों व बीजों के साथ ही रसायन प्रभाग द्वारा वन जैव मात्रा द्वारा प्राकृतिक रंग, खाद, अगरबत्ती, एलोवेरा जैल, हर्बल गुलाल अन्य विकसित प्रौद्योगिकियों के बारे में आम जनता को बताया गया। संस्थान निदेशक, डा. सविता ने इस प्रदर्शनी का अवलोकन किया। उन्होने सभी तकनीकियों को सरलीकरन करने की आवश्यकता पर जोर दिया। जिससे कि आम जनमानस इसे आसानी से समझ सके व उससे लाभ तथा जीविकोपार्जन वृद्वि हेतु इसे अपना सके।

इस प्रदर्शनी में विभिन्न स्कूलों के छात्रों, शैक्षणिक संस्थानों व आम जनता तथा विदेशी सेलानियों ने इस प्रदर्शनी का भ्रमण किया। इस अवसर पर विशेष रूप से प्रातः 9.00 बजे से सांय 5.00 बजे तक संस्थान के सभी पांच संग्रहालयों को आम जनता के लिए निःशल्क खुला रखा गया।

जल्द जारी होगा अधूरी परियोजनाओं के लिए बजटःसीएम त्रिवेंद्र

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मंगलवार को मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्री सुश्री उमा भारती से लखवाड़ के संबंध में फोन पर वार्ता की। केंद्रीय मंत्री ने मुख्यमंत्री के अनुरोध पर कहा कि जल्द से जल्द बजट जारी कर दिया जाएगा।
गौरतलब है कि 300 मेगावाट की लखवाड बहु उद्देशीय परियोजना को केंद्र सरकार द्वारा नेशनल प्रोजेक्ट घोषित किया गया है। देहरादून जिले में यमुना नदी पर बन रहे लखवाड़ प्रोजेक्ट से 300 मेगावाट बिजली सृजित करने के साथ ही पेयजल व सिंचाई के लिए पानी भी उपलब्ध होगा। इसकी कुल लागत 3966 करोड़ 51 लाख रूपए है। इसमें पावर कम्पोनेंट की लागत 1388 करोड़ 28 लाख रूपए है जबकि वाटर कम्पोनेंट की लागत 2578 करोड 23 लाख रूपए है। वाटर कम्पेानेंट की लागत का 90 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा ग्रान्ट के रूप में उपलब्ध करवाया जाएगा।
मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नीतिन गड़करी से भी चारधाम आॅल वैदर रोड़ प्रोजेक्ट के संबंध में फोन पर बात की। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इस प्रोजेक्ट पर तेजी से काम किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री को आश्वस्त किया कि परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण अविलम्ब किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री श्री गड़करी से फोन पर वार्ता के बाद मुख्यमंत्री ने अपर मुख्य सचिव श्री ओमप्रकाश को संबंधित जिलाधिकारियों को चार धाम आॅल वैदर रोड़ प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण को प्राथमिकता से किया जाए।

ड्रग्स और भू माफिया पर शिकंजा कसने पर दिया जाए बलःसीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत

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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने विधानसभा स्थित सीएम कार्यालय में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ राज्य में कानून व्यवस्था की समीक्षा की। मुख्यमंत्री ने फील्ड पुलिसिंग को और अधिक सक्रिय करने के निर्देश दिए। ड्रग्स माफिया व भू माफिया पर शिकंजा कसे जाने की आवश्यकता पर बल दिया। ड्रग्स की गतिविधियों में शामिल तत्वों को पहचानकर सख्त कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। इसके लिए अगर कानून में सुधार किए जाने की जरूरत हो तो इसका प्रस्ताव तैयार किया जाए। मुखबिर तंत्र को मजबूत किया जाए। ड्रग्स माफिया की जानकारी देने वाले लोगों को प्रोत्साहित किया जाए। जन जागरूकता के लिए सामाजिक अभियान चलाए जाएं। अभिभावकों व स्कूलों को नशा विरोधी अभियान में शामिल किया जाए।
मुख्यमंत्री ने अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश को जमीन संबंधी धोखाधड़ी के मामलों पर नियंत्रण के लिए अधिकारियों की समिति बनाकर कार्य योजना तैयार करने के निर्देश दिए।दुर्गम क्षेत्रों में माओवादी गतिविधियों की जानकारी दिए जाने पर मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि अभी राज्य में माओवादी गतिविधियां बहुत ही सीमित हैं, फिर भी इन पर लगातार नजर रखते हुए पूरी तरह से रोका जाए।
मुख्यमंत्री ने कहा कि कानून व्यवस्था राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में है। शिथिल अधिकारियों को चिन्हित किया जाए। पुलिस विभाग को सुधार हेतु जरुरी बजट उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने डीजीपी को निर्देशित किया कि जितने पुलिस थाने खोले जाने की आवश्यकता हो, प्रस्ताव बनाएं। पुलिस थानो के रखरखाव, पुलिसकर्मियों के आवासीय भवनों, वाहनों, सामग्री आपूर्ति के लिए भी प्रस्ताव बनाया जाए।
बैठक में अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश, डीजीपी एम.ए गणपति, डीजी अनिल रतूड़ी, एडीजी राम सिंह मीणा, अशोक कुमार सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उपस्थित थे।

सत्ता में आते ही भूल जाते है पलायन की बात

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उत्तराखंड में सत्ता की सियायत करने वाली हर राजनीतिक पार्टियां चुनाव के समय पहाड़ से पलायन करने जैसी गंभीर समस्याओं को उठाती है लेकिन जैसे ही सत्ता में आती है तो पलायन की बात भूल जाती है। टिहरी के ग्रामीणों का कहना है कि पहले किरासू गांव में 15 परिवार रहते थे, लेकिन सुविधाओं के अभाव के कारण आठ परिवार पलायन कर गए।

उत्तराखण्ड में पलायन की बात पिछले कई वर्षों से की जाती है लेकिन अब तक इसका असर नहीं दिखा और पलायन जारी है। चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल इस मुद्दे को जोरों शोरों से उठाते है लेकिन सत्ता के लोभ में इस विषय को पद आसीन होते ही भूल जाते हैं।
पलायन को रोकने के नाम पर सियासतदां, अधिकारी और कथित समाजसेवी सभी मौके के हिसाब से आलाप-प्रलाप करते रहे, लेकिन इस पलायन की तह तक जाकर उसका निदान करने की ठोस कार्ययोजना आज तक बनाया ही नही गई। अपने घरबार की आजाद हवा छोड़कर शहरों के संकुचित क्षेत्र में आ बसने के पीछे के दर्द को समझा तक नहीं गया।
प्रदेश में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा से आज भी पहाड़ के लोग कोसो दूर हैं। हालांकि कुछ क्षेत्रों ये सुविधाओं मिल रही है लेकिन संतोषजनक नहीं है। यहीं नही यहां लोगों को घर परिवार चलाने के लिए रोजी रोजगार की समस्यायें बनी रहती है। इस कारण यहां के लोग दूसरें राज्यों में नौकरी पेशा के लिए जाना बेहतर समझ रहे है।
पहाड़वासियों को अलग राज्य तो मिल गया, पर विरासत में वह संस्कार और सोच नहीं मिल पाए जो ‘कालापानी’ को देवभूमि बना पाते। उत्तर प्रदेश से राज्य को मिले अधिकारी-कर्मचारी पहाड़ चढ़ने को राजी नहीं हुए। यहां तक कि जो मुलाजिम पहाड़ी मूल के भी थे, उन्होंने राज्य के मैदानी हिस्सों में ही पांव जमाए और पहाड़ से संबंध सिर्फ मूल निवास-जाति प्रमाण पत्र लेने या फिर किसी ‘दैवी कृपा’ की चाह में अपने कुल देवी-देवता के दरबार में एक-आध घंटा जाकर मत्था टेकने तक ही सीमित रहा।
धनौल्टी के ग्रामीणों का कहना है कि उनकी ग्राम सभा किरासू में 15 परिवार रहते थे, लेकिन सुविधा नहीं होने से आठ परिवार पलायन कर गए। राजस्व गांव कुरियाणा में छह परिवार थे तीन परिवार पलायन कर गये। डाडांगांव में बिजली नहीं होने से लोग आज भी परेशान है।
21 वीं सदी में आज भी पहाड़ के लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए पहाड़ छोड़कर पलायन करने को मजबूर हैं।
भाजपा कांग्रेस दोनों राष्ट्रीय पार्टियां है और राज्य से लेकर केन्द्र की सत्ता पर इनकी पकड़ रहती है। उत्तराखण्ड में बारी-बारी से इन दोनों की सरकार बनती है। फिर भी पलायन जैसी गंभीर मुद्रा को दूर करने में विफल साबित हो रहे है।
पलायन रोकने के लिए स्वावलंबन और रोजगारपरक शिक्षा की बातें तो हर सरकार और उनके मंत्री करते है लेकिन जमीन पर उतरता दिखाई नही दे रहा है।

बीजेपी की प्रचंड बहुमत से बनी सरकार के नए सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में पलायन मुद्दे पर बात की और कहा कि सरकार पूरी कोशिश करेगी की पलायन को रोक सके और युवाओं को सारी सुविधाएं मिल सके।अभी ते शुरुआती दौर है लेकिन क्या सच में यह सरकार पलायन के लिए कुछ करेगी यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

अल्मोड़ा के गांव में पेड़ काटने वाले को 5 लाख जुर्माने के साथ लगाने पड़ेगें 270 पेड़

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एनजीटी के नए आदेश के मद्देनज़र अल्मोड़ा जिले के एक गांव चौकुनी में पेड़ काटने वाले हर मामले पर पांच लाख का जुर्माना लगाया है।जुर्माना देने के साथ ही संबधित भूमि पर आरोपी को 270 तरह के प्रजाति के पौधे लगाने के आदेश दिये हैं।एनजीटी ने एक बात साफ कह दी है कि पर्यावरण संरक्षण में पेड़ों की भूमिका सबसे अहम है और ऐसे में अगर कोइ अपनी निजी भूमि पर भी पेड़ काटने का अपराध करेगा तो उसे यह दंड भुगतना पड़ेगा।

आपको बता दैं कि गांव चौकुनी में रहने वाले विजय शील उपाध्याय और वंदना उपाध्याय के खिलाफ की गई थी जो निजी जमीन की आड़ में वन भूमि के पेड़ों को भी एक एक करके काट रहे थे।जबकि गांव वालों का कहना है जिस जमीन के पेड़ काटे गए हैं वह जमीन आज से 35 साल पहले वन विभाग को दे दी गई थी।इस केस के जवाब में न्यायाधीश स्वतंत्र कुमार ने आरोपी विजय और वंदना पर 27 पेड़ों को काटने पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।एनजीटी ने साफ कर दिया है कि यह जुर्माना सीधे वन विभाग के खाते में जाएगा जिससे फारेस्ट डिर्पाटमेंट एर बार उस जमीन पर वनीकरण करेगा।इसके साथ ही आरोपियों को एनजीटी ने आदेश दिया है कि 270 तरह के पौधे भी उस जमीन पर लगाए जाऐंगे जो विजय और वंदना लेकर आऐंगे और इन पौधों का चुनाव एनजीटी करेगा।

एनजीटी का यह फैसला अभी अल्मोड़ा जिला के लिए है लेकिन अगर यह फैसला पूरे प्रदेश के लिए हो जाए तो आए दिन पेड़ काटने वालों पर लगाम लग जाएगा। अल्मोड़ क्षेत्र आपदा के लिहाज से बहुत संवेदनशील है जिसको रोकथाम की बागडोर सरकार के हाथ में है।एनजीटी के इस फैसले से कहीं ना कहीं पैड़ों की कटौती पर रोक लगेगी।

 

हौसलों से कायम की मिसाल,अपनी कमजोरी को बनाई अपनी ताकत

कहते है अगर हौसले मजबूत हो और कुछ करने की ललक मन में हो तो कुछ भी नामुमकिन नही है। कुछ ऐसा ही देखने को मिला है धर्मनगरी ऋषिकेश में, यहाँ अंजना नाम की एक लड़की रोज गंगा किनारे बैठती है और अपने परिवार के पालन पोषण के लिए पेंटिंग बनाती है , पर आपको जानकर आश्चर्य होगा की ये अंजना माली पेंटिंग्स को अपने हाथ से नही बल्कि पांव से बनाती  है ।
बचपन से ही प्रकृति का चेलेंज झेल रही अंजना के दोनों हाथ नही है और कमर में प्रॉब्लम होने के कारण झुक कर चलती है। एक बेहत गरीब परिवार से होने के कारण आर्धिक मदद का तो सवाल ही नही होता,अंजना ने खुद ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाने  की सोची ,और अपने पैर से पेंटिंग करनी शुरु की , आज न केवल उसके द्वारा बनाई गई पेंटिंग लोगों को पसंद आती है बल्कि लोग उन पेंटिंग को खरीदते भी है। जिससे अंजना का घर चलता है।अंजना का सपना है कि एक दिन वो अपनी एक पेटिंग को प्रधानमंत्री जी को भेंट करें। अंजना माली बताती है कि अगर हम कोशिश करे और हिम्मत से काम करें तो कोई भी काम नामुमकिन नही।आज अंजना उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो प्रकृति का चेलेंज झेल रहे है । अंजजना सबको सीख दे रही है की चाहे कोई भी परिस्थिति क्यूँ न हो हमें उनका सामना करना चाहिए।

काशीपुर शहर को हादसों का इन्तजार

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शायद काशीपुर शहर को हादसों का इन्तजार है, जहां कभी भी आग लगने से बडा हादसा हो सकता है, लेकिन बजाय उपाय करने के अधिकारी है कि काम करने को तैयार नहीं है। तभी तो अग्निसमन विभाग के गम्भीर मुद्दों को अधिकारी नजर अंदाज कर रहे हैं।
पिछले तीन माह से अग्निशमन विभाग एसडीएम महोदय से शहर के दुकानों और माल में आवश्यक उपकरण लगाने और सुरक्षा मानकों को पुरा कराने के लिए गुहार लगा रहा है। लेकिन एसडीएम महोदय ने जवाब तो दिया मगर तीन माह बाद जबकि अग्निशमन विभाग कई बार एसडीएम से व्यापार मण्डल और प्रबन्धकों के साथ बैठक करने की बात कह चुका है जिससे आग की घटनाओं पर तुरन्त काबू पाया जा सके।
जबकि अग्निशमन विभाग के सामने सबसे बडी चुनोती है शहर के अंदर प्रवेश करना है। अतिक्रमण और जाम के चलते समय पर ना पहुंचपाना विभाग का दर्द है, लेकिन इनके लिए आवश्यक कार्यवाही करने वाले अधिकारी है कि कार्यवाही करने को तैयार नहीं है।

उत्तराखण्ड का डबल इंजन अब करेगा काम

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उत्तराखंड के नौंवे मुख्यमंत्री चुने गए त्रिवेंद्र सिंह रावत का संघ प्रचारक से मुख्यमंत्री बनने का सफर शानदार रहा। इस बीच वे दो बार विधानसभा चुनाव जरूर हारे, लेकिन संघठन ने उनकी क्षमताओं पर विशवास बनाए रखा। उन्हें झारखंड का प्रभारी बनाया गया गया तो बीजेपी ने वहां विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के साथ उत्तर प्रदेश के सह प्रभारी रहे और नतीजा वहां भी अपेक्षानुरूप रहा।
पौड़ी गढ़वाल में जन्मे त्रिवेंद्र सिंह रावत ने महज 19 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दामन थामा और 21 साल की उम्र में प्रचारक के रूप में सक्रीय हुए थे। करीब 12 साल तक सक्रीय प्रचारक के रूप में काम करने के बाद सन 1993 में उन्हें बीजेपी उत्तराखण्ड क्षेत्र का संघठन महामंत्री बनाया गया। फिर सन 2002 से 2012 तक वे देहरादून जनपद की डोईवाला सीट से विधायक रहे और 2007 2012 तक राज्य के कृषि मंत्री भी रहे। संगठन स्तर पर उनके शानदार प्रदर्शन के चलते ही वे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री के नजदीकी लोगो में शामिल हो गए। 2017 में राज्य के नौवे मुख्यमंत्री के रूप में एक नए सफर की शुरुआत करने चल पड़े हैं।
उत्तराखण्ड की ताज पोषी के बाद डबल इंजन यानी बीजेपी के त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपना कार्यभार भली भांति संम्भाल लिया है। इस कार्यशैली में दूसरा इंजन त्रिवेंद्र हैं जो इस राज्य को डबल इंजन की पावर देकर उत्तराखण्ड को उचाईयों की ओर ले जाएंगे। इस बार राज्य के लोगो की उम्मीदें और भी ज्यादा बढ़ गई हैं क्योंकि अब राज्य सरकार केंद्र पर अपना पल्ला नही झाड़ सकती क्योंकि अब केंद्र और राज्य में बीजेपी होने के कारण साथ ही पीएम मोदी के वजह से काम में कोई चूक नही चाहती है राज्य की जनता।
राज्य के नोवे मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे त्रिवेंद्र  के सर पर केंद्र के साथ साथ राज्य का भी दबाव है। लोगो ने भाषण बहुत सुन लिए अब सिर्फ काम चाहिए।अब देखना यह है कि राज्य की नई सरकार का रिपोट कार्ड कैसा रहता है।