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दोस्तों ने छुपाया नदी में बहने का राज

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रानीखेत खैरना स्टेट हाईवे पर कुछ युवकों के साथ कोसी नदी में नहाने गया किशोर नदी के भंवर में डूब गया। करीब 24 घंटे बाद उसका शव बरामद कर लिया गया है। हादसे से घरबाए किशोर के साथियों ने उसके कपड़े और मोबाइल भी छिपा दिया और किसी को घटना के बारे में नहीं बताया।

अंतरजनपदीय सीमा पर भुजान क्षेत्र में ऑटोमोबाइल की दुकान में काम करने वाला आमिर अहमद, 15 साल के पुत्र जमीर अहमद आसपास ही काम करने वाले सूरज शर्मा, मो. आसिफ व कफिन अहमद के साथ स्टेट हाईवे से कुछ दूर कोसी नदी में नहाने गया था।

इस दौरान जानलेवा भंवर से अनजान आमिर उस ओर बढा जहां पानी शांत, लेकिन गहराई ज्यादा है। उसी में वह डूबता चला गया। साथ गए तीनों युवक घबरा गए, उन्होंने घटना के बारे में किसी को नहीं बताया। वापस लौटते वक्त नदी में डूबे किशोर के कपड़े व मोबाइल भी छुपा दिया। देर शाम तक जब आमिर वापस नहीं लौटा तो ऑटोमोबाइल स्वामी को चिंता सताने लगी।

उसने आसपास के क्षेत्रों में पूछताछ की तो पता लगा कि बालक तीन युवकों के साथ कोसी नदी में नहाने गया था। सूचना राजस्व पुलिस को दी गई। सख्ती से पूछताछ के बाद तीनों युवकों ने बालक के डूबने की बात स्वीकारी। तब आमिर की नदी में तलाश शुरू की गई।

किसान आत्म हत्या पर बयानबाजी तेज

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नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने हल्द्वानी मे  कहा कि सरकार चला रहे मंत्रियों को छोटे बोल शोभा नहीं देते। गंभीर मामलों को सरकार को संजीदगी से लेना चाहिए। यह टिप्पणी डॉ. हृदयेश ने उच्च शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत द्वारा रविवार को अल्मोड़ा में किसान आत्महत्या मामले में दिए गए बयान पर की।

महानगर कांग्रेस कमेटी की ओर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के जन्मदिन पर आयोजित रक्तदान शिविर के बाद पत्रकारों के सवाल पर डॉ. इंदिरा ने कहा कि पिथौरागढ़ जिले में किसान ने कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या कर ली। किसानों के हितों की रक्षा का संकल्प लेने की बात कहने वाली भाजपा सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच करानी चाहिए थी। वहीं, इस मामले में डॉ. धन सिंह रावत द्वारा जानकारी ही न होना और कांग्रेस के समय में आत्महत्या की बात कहना बेहद हल्कापन दिखाता है। सरकार को ऐसे मामलों में मदद को तत्काल आगे आना चाहिए।

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस से पहले मुख्यमंत्री का संदेश

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अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की पूर्व संध्या पर जारी अपने संदेश में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने प्रदेशवासियों से अपील की है कि वे ’योग’ को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनायें। उन्होंने कहा कि ‘योग’ भारतीय सभ्यता, संस्कृति तथा जीवन शैली का एक अभिन्न अंग है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सार्थक प्रयासों से योग को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलना देशवासियों के लिए गर्व की बात है। आज समूचा विश्व योग को अपनाने की दिशा में अग्रसर है।
सीएम ने कहा कि ‘योग’ शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देने के साथ ही लोगों को स्वस्थ जीवन के लिये प्रेरित करता है। योग हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करके सहज जीवन जीने की शक्ति प्रदान करता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमें संकल्प लेना होगा कि प्रत्येक दिन योग के लिए समय अवश्य निकाला जाए। एक बेहतर दुनिया के निर्माण में अपनी सहभागिता निभाएं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के निरोग होने से ही एक स्वस्थ उत्तराखंड और भारत का निर्माण हो सकता है।

नैनी झील को बचाने के लिए हु्ई ”एंग्री स्नेक गाॅड” की पूजा

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अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुंच चुकी नैनीताल की मशहूर नैनी झील को बचाने के लिये समाज के हर तपके से कोशिशें की जा रहीं हैं। सोमवार को नैनी झील के आस पास रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने “एंग्री” स्नेक गाॅड से अपनी आस्था के अनुसार नैनी झील को जीवंत करने के लिए प्रार्थना की। पिछले दो सालों से झील में पानी की लगातार कमी देखी जा रही है। बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी, जो बौद्ध धर्म का पालन करते हैं, जिले में रहते हैं। भिक्षुओं ने कहा कि उन्होंने भगवान से झील को ऐसी बुरी हालत से बचाने के लिये प्रार्थना की है।

उनके मुताबिक हम सभी को क्षमा करने के लिए नाग भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। इस पूजा के लिये चार भिक्षु आये जिन्होने झील के पास पूजा अर्चना की। भिक्षुओं ने सांप भगवान की मूर्ति आटा, दूध, दही,मक्खन, चीनी, गुड़ और शहद से बनाई। पूजा के बाद, मूर्ति को झील में विसर्जित कर दिया गया। 14 जून को भी तिब्बती समुदाय के लोगों ने झील को बचाने के लिये पूजा अर्चना की थी।

नैनी झील के स्तर में कमी के लिये जानकारों ने सरकार से इस इलाके को ईको सेंसटिव ज़ोन घोषित करने को कहा है। साथ ही झील के आस पास के इलाके में किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लगाने के लिये भी मांग की गई है। 4.7 वर्ग किमी में फैली इस झील के उपर पहले कभी ऐसा खतरा नहीं मंडराया है। झील के प्राकृतिक रिचार्ज स्रोतों पर अतिक्रमण और पानी की बढ़ती मांग के साथ अनियमित बारिश को झील के वर्तमान स्थिति के लिए दोषी ठहराया गया है। गौरतलब है कि स्थानीय और पर्यटकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए करीब 15 मिलियन लीटर पानी झील से हर दिन निकाला जाता है। इससे झील पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

वहीं सरकार ने झील को बचाने के लिये इसके रखरखाव का काम लोक निर्माण विभाग से लेकर सिंचाई विभाग को दे दिया है। साथ साथ मुख्यमंत्री ने नैनी झील ते संरक्षण के लिये 3 करोड़ रुपये का अनुदान भी दिया है।

अब गंगा तट पर अंतिम संस्कार भी होंगे इको-फ्रेंडली

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इस तरह की पहल में, गंगा के साथ ‘ग्रीन’ श्मशानों के गांवों में निर्माण की योजना बनाई गई है। (जिन्हें नाममी गांगे परियोजना के तहत ‘’गंगा ग्राम’’ के रूप में प्रचारित किया गया है)।

ये श्मशान, वह हैं जो ऋषिकेश, हरिद्वार, उत्तरकाशी और गंगोत्री नदी के गांवों में आएंगे, वह ‘इकोलाजिकल-रिस्पांसिबल क्रिमेशन’ प्रदान करेंगे। जिसमें कम लकड़ी का उपयोग होगा अन्य सुरक्षा उपायों के अलावा यह भी तय किया जाएगा कि अंतिम संस्कार प्रक्रिया के परिणामस्वरूप पर्यावरण और पवित्र नदी प्रदूषित न हो।

सूत्रों ने बताया कि परंपरागत श्मशान पर एक मृत शरीर 600 किलोग्राम लकड़ी का उपभोग करते हैं, जबकि ग्रीन शमशान राशि को कम करने के लिए औऱ लकड़ी को केवल 100 किलो तक सीमित कर देगा जिससे कार्बन उत्सर्जन कम हो जाएगा।

एसी सक्सेना जो राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के तकनीकी सलाहकार हैं और इस परियोजना की देखरेख कर रहे हैं उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार, विशेष रूप से निर्मित “पायर ओवन” का उपयोग करके किया जाएगा, जो कम लकड़ी का उपयोग करेगा, लेकिन शरीर को प्रभावी ढंग से जलाने के लिए पर्याप्त गर्मी पैदा करेगा। “विशेष पायर ओवन को शरीर के सिर और कमर भागों के मुताबिक अधिकतम गर्मी के लिए डिज़ाइन किया गया है क्योंकि शरीर के अंगों को गर्मी के अधिक समय और तीव्रता की आवश्यकता होती है, इसलिए कम लकड़ी के ईंधन के साथ भी, अंतिम संस्कार ठीक से किया जा सकता है।

उत्तराखंड में,यह परियोजना परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश जो यहां सबसे बड़ा आश्रम है। इसके प्रमुख स्वामी चिदानंद सरस्वती ग्लोबल इंटरफेथ वाश एलायंस, की देखरेख में शुरू किए जाएगा जो सभी के लिए स्वच्छ पानी, स्वच्छता और स्वच्छता प्रदान करने के लिए एक नई पहल है।

सरस्वती ने कहा, “गंगा का पारिस्थितिकी तंत्र वर्तमान में खतरे में है और इसके लिए ध्यान देने की जरूरत है। इसके बाद के गांवों को अपने बैंक ओडीएफ (खुले में शौच से मुक्त) के बनाने के बाद, अगले चरण में गंगा के साथ खुले में शून्य शवों को सुनिश्चित करना है। ग्रीन क्रेमेटोरियम की पहल एक सामान्य संस्कार के बाद उसमें आने वाली सामग्री के कारण नदी प्रदूषित होने से रोकी जाएगी। “

अनुमानों के अनुसार, प्रत्येक अंतिम संस्कार के परिणामस्वरूप कई टन राख और कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होते हैं। नदी के तट पर होने वाली संस्कारों के मामले में यह सब गंगा में फेंक दिया जाता है।

सरस्वती के अनुसार, परियोजना का दीर्घकालिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गंगा में राख के विसर्जन को सबसे कम न्यूनतम स्तर तक लाया गया। “आगामी गंगा नदी अधिनियम में प्रावधान होने वाला है जिससे गंगा में केवल कुछ मुश्तबी राख बसा सकते हैं। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि नदी अपनी पवित्रता बरकरार रखे।”

उत्तराखंड में, जहां से गंगा उत्पन्न होती है,वहां हजारों संस्कारों को प्रतिदिन विभिन्न श्मशानों में आयोजित किया जाता है, जो ज्यादातर गंगा या इसकी सहायक नदियों के किनारे होते हैं। हरिद्वार के विभिन्न घाटों में, हर महीने करीब 1200 से 1500 संस्कार किए जाते हैं। पवित्र शहर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है और इसके लिए एक महत्वपूर्ण योगदान है, कई लोगों का मानना है कि नदी के तट पर होने वाले खुले संस्कारों की संख्या बहुत बड़ी है।

हरिद्वार के गंगा घाटों पर श्रद्धालुओं के लिए बनेंगे चेंजिंग रुम

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पर्यटन विभाग देश-दुनिया से आने वाली  महिला यात्रियों की सहूलियत के लिए हरिद्वार के दस गंगा घाटों पर प्री-फेब्रिकेटेड चेंजिंग रूम का निर्माण कराएगा। इसके अलावा पर्यटकों व यात्रियों की सुविधा के लिए पर्यटन कार्यालय में रैन बसेरे का निर्माण भी किया जा रहा है।

जिला पर्यटन अधिकारी जसपाल सिंह चौहान ने बताया कि गंगा घाटों पर प्री-फेब्रिकेटेड महिला चेंजिंग रूम का निर्माण जिला योजना में किया जा रहा है। इनकी लागत सात लाख रुपये होगी। इसके अलावा पर्यटन विभाग कार्यालय परिसर में फोटो मैट्रिक पंजीकरण के लिए एक कक्ष का निर्माण, पर्यटकों व यात्रियों की सहूलियत के लिए आठ लाख रुपये की लागत से रैन बसेरा भी बनवा रहा है।

चेंजिंग रूम में क्या है खास:चेंजिंग रूम की फर्श कंक्रीट की होगी। साथ ही यह स्लिप प्रूफ होगा, ताकि कपड़े बदलते समय गिरने की संभावना न रहे। इसमें सैंडविच पैनल होगा और थर्मास्टाटिक टैप रहेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ेंगी सुविधाएंः पर्यटन विभाग ग्रामीण क्षेत्रों पर भी ध्यान फोकस करेगा। इसके तहत रुड़की के रामनगर में केशव पार्क के सौंदर्यीकरण समेत झबरेड़ा के लाठरदेवा, सहदेवपुर बोडाहेड़ी के पीर साहब व ग्राम डाडापट्टी अंबेडकर पार्क में बेंच लगाए जाएंगे। जबकि, ग्राम चुड़ियाला और इकबालपुर में यात्री शेड का निर्माण होगा। इसके अलावा ग्राम शांतरशाह में दो और ग्राम धनौरी व सिडकुल के बेगमपुर में एक-एक यात्री शेड बनेंगे। सभी निर्माण जिला योजना से किए जाएंगे।

बाघों की मौत पर चिंताजनक आंकडे़

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यूं तो कॉर्बेट पार्क व उससे सटे इलाके बाघों की तादाद के हिसाब से सुखद अहसास कराते हैं। इसीलिए पर्यटक देश-विदेश से यहां घूमने आते हैं लेकिन पिछले छह माह में यहां हर महीने औसतन दो बाघों की मौत हो रही है। अब तक 11 बाघ मौत की नींद सो चुके हैं। इससे कॉर्बेट प्रशासन भी सवालों के घेरे में आ गया है। लगातार हो रही बाघों की मौत के बाद बाघों के संरक्षण पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

रामनगर को बाघों की राजधानी कहा जाता है। इनकी अच्छी तादाद के चलते यह क्षेत्र मशहूर है। बाघों के कारण ही साल दर साल सरकार को करोड़ों राजस्व मिलता है। बाघों की सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये का बजट हर साल आता है लेकिन पिछले कुछ समय से बाघों की मौत ने रामनगर को सुर्खियों में ला दिया है। कभी आपसी संघर्ष में बाघ जान गंवा रहे हैं तो कभी संदिग्ध परिस्थितियों में बाघ के सड़े-गले शव बरामद हो रहे हैं। भले ही बाघों की मौत की वजह अलग-अलग हों लेकिन बाघों का लगातार मरना कई सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि कॉर्बेट के अधिकारी बाघों की मौत एक इत्तफाक ही मानते हैं।

सेही के हमले में बाघ की मौत की यह पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व भी कॉर्बेट में सही के हमले में बाघ मारे जा चुके हैं। वन अधिकारियों के मुताबिक, जंगल में सेही अचानक बाघिन के सामने आ गई होगी या बाघिन ने उसे अपना शिकार बनाने का प्रयास किया होगा। इसी वजह से उसने खतरा भांपकर बचाव में अपने शरीर पर लगे तीरनुमा कांटे छोड़ दिए। यही कांटे बाघिन के शरीर पर जगह-जगह घुस गए जिससे घाव बनने के बाद संक्रमण हो गया। अधिक रक्तस्राव बाघिन की मौत की वजह बन गया। सेही के कांटे छह इंच से एक फीट तक होते हैं।

छह माह में कहां-कहां मरे बाघ

1 जनवरी- कालाढूंगी रेंज रामनगर वन प्रभाग।

19 जनवरी-देचौरी रेंज-रामनगर वन प्रभाग।

16 फरवरी-बैलपड़ाव रेंज रामनगर वन प्रभाग।

22 फरवरी-बैलपड़ाव रेंज-रामनगर वन प्रभाग।

16 मार्च- बैलपड़ाव रेंज- तराई पश्चिमी वन प्रभाग।

31 मार्च- सर्पदुली रेंज-कॉर्बेट टाइगर रिजर्व।

14 अपै्रल-देचौरी रेंज-रामनगर वन प्रभाग।

01 मई-बैलपड़ाव रेंज-रामनगर वन प्रभाग।

02 मई- बिजरानी रेंज- कॉर्बेट टाइगर रिजर्व।

23 मई-कालागढ़ रेंज- कॉर्बेट टाइगर रिजर्व।

17 जून-सर्पदुली रेंज-कॉर्बेट टाइगर रिजर्व।

भगवान बद्रीनाथ के शीतकालीन घर पर सरकारी उदासीनता

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उत्तराखंड में आपदा के चार साल बीत जाने के बाद नेताओं ने दावे और वादे तो बहुत किये, यात्रा में आने वाली श्रद्धालुओं की संख्या भी बड़ गई लेकिन क्या सच में नेताओं के दावों और हकीकत में मेल है? भगवान बद्री विशाल के शीतकालीन पूजा स्थल पांडुकेश्वर के योगध्यान मंदिर को जाने वाला बदहाल डेढ़ किमी रास्ता तो इन दावों की कलई खोल रहा है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने पर भगवान के सखा उद्धव जी व कुबेर जी की उत्सव डोली पांडुकेश्वर के योगध्यान मंदिर में विराजमान होती है। पुरातत्व महत्व के इस मंदिर तक बद्रीनाथ हाईवे पर करुणा गदेरे से डेढ़ किमी लंबी सड़क थी। यह सड़क 2013 में आपदा के दौरान बह गया था। लोनिवि ने सड़क की मरम्मत के लिए 20 लाख का प्रस्ताव भी भेजा था, लेकिन घन की कमी का हवाला देते हुए ये मरम्मत अधर में लटक गई।

सरकारी नियमों और पेचेंदगियों में ऐसा पेच फंसा कि अब तक अधिकारी शासन को प्रस्ताव भेज रहे हैं, परंतु योजना की फाइल शासन में दब कर रह गई है। यात्री बद्रीनाथ यात्रा के दौरान योगध्यान मंदिर के दर्शन के लिए पांडुकेश्वर में रुकते हैं। लेकिन मार्ग से आवाजाही होने के चलते हर यात्री योगध्यान मंदिर नहीं जाता है।

पांडुकेश्वर में साल 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत भी कुबेर महोत्सव में आए थे और तत्काल सड़क की मरम्मत की घोषणा की थी, लेकिन मुख्यमंत्री की घोषणा के तीन साल बाद भी इस मोटर मार्ग के बजट का प्रस्ताव शासन स्तर पर गुम है।

केदारनाथ मंदिर में दर्शनों के समय में ये हुआ है बदलाव

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बदलते मौसम और बारिश के चलते केदारनाथ मंदिर में दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में कमी आने लगी है। इसको देखते हुए मंदिर प्रशासन ने मंदिर में दकॉर्शन के समय में बदलाव कर दिया है। यात्रियों की संख्या को देखते हुए मंदिर समिति ने आम दर्शनों के लिए समय सुबह 5 बजे के बजाय 6 बजे कर दिया है।

अब दो से ढाई हजार यात्री ही प्रतिदिन केदारनाथ मंदिर पहुंच रहे हैं। केदारनाथ धाम में अब तक करीब साढ़े तीन लाख यात्री दर्शन कर चुके हैं। शुरूआती दिनों में केदारनाथ में दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या प्रतिदिन करीब 10 हजार से अधिक रही। कुछ दिनों 15 से 16 हजार यात्री दर्शनों को केदारनाथ पहुंचे। अब मौसम को देखते हुए यात्री संख्या में कमी आ गई है। सोमवार को केवल 2680 तीर्थयात्रियों ने दर्शन किए।

मंदिर समिति के कार्याधिकारी अनिल शर्मा ने बताया कि “यात्री संख्या अधिक होने पर मंदिर सुबह 5 बजे आम भक्तों के लिए खोला जाता रहा है अब यह समय बदल दिया गया है। कम यात्री के कारण अब सुबह 6 बजे केदारनाथ में आम दर्शन होंगे। अन्य विशेष पूजाएं और व्यवस्थाएं यथावत चलती रहेंगी।”

नैनीताल में पर्यटकों की कार खाई में गिरी

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दिल्ली से नैनीताल घूमने आ रहे पर्यटकों की कार खाई में जा गिरी। हादसे में बच्ची सहित चार लोग घायल हो गए। कार में चालक सहित कुल दस लोग सवार थे। एक की गंभीर हालत को देखते हुए हल्द्वानी रेफर किया गया है।

जानकारी के मुताबिक, साइकिल मार्केट, चांदनी चौक, नई दिल्ली के गगन, मीना, जान्हवी व आर्यन,  चंदर नगर दिल्ली के रवि माथुर, उसकी पत्नी शुचि, अभिति रात को इनोवा में सवार होकर नैनिताल आ रहे थे।

हनुमानगढ़ी से आगे नगर से तीन किमी दूर मोड़ पर चालक वाहन पर नियंत्रण खो बैठा। इस पर इनोवा करीब 20 फिट गहरी खाई में जाकर अटक गई। इस दौरान हल्द्वानी से आ रही आशा नामक महिला ने पुलिस को हादसे की सूचना दी।

सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और घायलों को बीडी पांडेय अस्पताल भेजा। अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ एमएस दुग्ताल ने बताया कि शुचि के सिर में अधिक चोट के कारण हल्द्वानी रेफर किया गया है। रवि, मीना व अभिची को भर्ती किया गया है। शेष अन्य को मामूली उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई है।