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ग्लोबल वार्मिंग के चलते जल्द खिल उठे बुरांस के फूल

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भारत की 6 ऋतुओं में से एक वसंत ऋतु है। अंग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार फरवरी, मार्च और अप्रैल माह में वसंत ऋतु रहती है। वसंत कोऋतुओं का राजा अर्थात सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है।  इस समय पंच-तत्त्व यानी जल, वायु, धरती, आकाश और अग्नि सभी अपना मोहकरूप दिखाते हैं।ऐसे में  आकाश भी स्वच्छ रहता है, वायु सुहावनी लगती है, अग्नि यानी सूर्य रुचिकर हो जाता है तो जल पीयूष के समानसुख दाता और धरती उसका तो कहना ही क्या वह तो मानों सौंदर्य का दर्शन कराने वाली प्रतीत होती है। पुरे राज्य में वसंत ऋतु कामहोत्सव शुरू हो जाता है। उसी तरह उत्तराखंड की राजधानी राज भवन में वसंत ऋतु महोत्सव की तैयारिया भी जोरो शोरो पर हैं।

देवभूमि से ठंडक ने अब हौले-हौले विदाई की ओर कदम बढ़ा दिए हैं और इसी के साथ बिखरने लगी है वासंती छटा। खेतों में लहलहातीसरसों की फसल खिल उठे है वहीं पहाड़ में खेतों की मुंडेर और चट्टानों पर खिले फूल वसंत का स्वागत करते नजर आ रहे हैं।

मौसम भी इसमें सुर से सुर मिला रहा है। शायद तभी तीन दिन से डेरा डाले ये बादल भी शांत हैं। उधर, मौसम विभाग की मानें तो मौसमका यह रंग बरकरार रहेगा। मौसम से अब ठिठुरन करीब-करीब गायब हो चला है। वातावरण में दिन में हल्की गर्मी महसूस होने लगी है,जबकि सुबह-शाम व रात में हल्की ठंडक हैं।यानी बेहद खुशनुमा मौसम। और इसी के साथ बिखर रही है वासंती छटा। पेड़-पौधों पर नईकली फूटने लग गई हैं तो खेतों में लहलहाते सरसों के फूल आकर्षित कर रहे हैं। पहाड़ी इलाकों को ही लें तो खेत-खलिहानों की मुंडेर औरचट्टानों पर खिले फ्योंली के पीले फूल उसके सौंदर्य में चार -चांद लगा रहे हैं। पहाड़ो में बुरांस के सुर्ख फूल गजब की लालिमा बिखेर रहे हैं।

यानी हर तरफ नजर आता है तो सिर्फ और सिर्फ वसंत की छटा। और इंद्रदेव भी इसमें कोई खलल नहीं डालना चाहते। शायद यही वजहभी है कि तीन दिन तक डेरा डाले बादल को बरसना गवारा नहीं हैं।

चमोली जिला की 40 वर्षीय श्रीमती सुनीता जो पर्यवेक्षक के तौर पर कार्यरत हैं उन्होंने बताया कि उनकी फैक्ट्री में जैम, चटनी,अचार व बुरांस का रस तैयार किया जाता है, हमेशा मार्च के महीने के समय ही बुरांस खिलता था पर इस बार पहले ही हमारे फैक्ट्री में आ गया है। ऐसे ही मसूरी वासियों ने कहा कि आमतौर पर बुरांस हमेशा मार्च के आखिरी दिनों में खिला उठा दिखता था पर इस बार फरवरी के शुरुआती दिनों में ही खिलता नजर आ रहा है।सीईडीएआर के वन विशेषज्ञ विशाल सिंह के अनुसार इन सर्दियों में फूलों का जल्दी खिलना सर्दियों में कमी आना है और गर्म मौसम का आगाज है। इस तरह अगर हमने गौर किया हो तो दिसम्बर के मौसम में गर्मी का आना अपने नियमित समय से पहले आने से बुरांस की कली खिल गयी है।

मौसम परिवर्तन एक कड़वा सच है, और बुरांस बाकी और पेड़ो की तरह अपने आप को उसके अनुरूप ढाल चूका है।

उत्तराखंड में 60 प्रतिशत कम हुई जाड़े की बारिश

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उत्तराखंड जो अपनी सर्दियों के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है पर भी वैश्विक गर्मी का भारी असर पड़ रहा है। जाड़ों में यहां हफ्ते-हफ्ते की झड़ी लगती थी,लेकिन इसे जनसंख्या घनत्व का कारण कहें या वैश्विक गर्मी का बरसात काफी कम हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले वर्ष सर्दियों की तुलना में इस बार वर्षा लगभग 60 प्रतिशत कम रही है। जिसके कारण प्रदेश में सूखे की स्थिति आ गई है। मई में दहकने वाले जंगल अभी से जलने लगे हैं और अप्रैल के बाद खिलने वाला बुरांस अभी से खिल गया है,जो इस बात का प्रतीक है कि गर्मियों में पहाड़ भी भीषण गर्मी की चपेट में रहेंगे।

मौसम विभाग के विशेषज्ञ इसका कारण पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता में कमी आना बता रहे हैं। दूसरी ओर वैश्विक गर्मी (ग्लोबल वार्मिंग )का पूरा-पूरा प्रभाव भी जाड़े की बारिश पर पड़ रहा है। जिसके कारण नमी अपेक्षाकृत कम हुई है। मौसम विभाग के आंकड़े इस बात की घोषणा करते हैं कि राज्य में इस बार शीतकाल के दौरान औसतन सामान्य से लगभग 50 प्रतिशत बारिश कम हुई है।
दिसंबर से फ रवरी तक सामान्य औसत बारिश 104 मिमी मानी जाती है,लेकिन इस वर्ष यह लगभग 60 के मिमी के आसपास पहुंची है। वैज्ञानिकों के अनुसार शीतकालीन वर्षा पश्चिमी विक्षोभ पर आधारित होती है,जो इस बार सामान्य से कम रही। ऐसा नहीं है आसमान में तो बादल आए, लेकिन जो बादल आए वह भी अधिक शक्तिशाली नही रहे जिसके कारण बारिश न के बराबर हुई है। यही कारण है कि सर्दियां भी काफी कम रही हैं। शीतकालीन वर्षा के अभी कुछ दिन हैं, लेकिन अब तक जो अनुमान लगाया जा रहा है उसके अनुसार वर्षा में काफी गिरावट है। इसका पूरा-पूरा असर इस बार की ठंड पर रहा है।
वर्षा न होने का पूरा प्रभाव जाड़े पर पड़ा है वहीं आने वाली गर्मियां पेयजल के किल्लत के नाम पर रहेंगी। इसका पूरा-पूरा दुष्प्रभाव गर्मियों में दिखाई देगा। पेयजल की किल्लत के साथ-साथ वनों की आग तापमान को और बढ़ाएगी,जिसके कारण पहाड़ों का तापमान भी आसमान छूने लगेगा। मौसम विभाग के निदेशक डा. विक्रम सिंह का कहना है कि ठंड की बारिश में जो कमी आई है, अब उसकी भरपाई मार्च-अप्रैल में होने वाली वर्षा पर टिकी हुई है। पश्चिमी विक्षोभ अन्तिम अप्र्रल तक सक्रिय रहता है। इसके बाद मई मध्य अथवा जून से प्री-मानसून शुरू हो जाएगा। उन्होंने बताया कि वर्षा कम होने के कारण नमी जल्दी खत्म होने लगती है जिसके परिणामस्वरूप गर्मी अभी से बढने लगी है। अन्तिम फरवरी में1 से 3 डिग्री सेल्सियस पारा ऊपर जाना शुरू हो गया है।
मौसम विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार उत्तराखंड में सर्दियों में 67 प्रतिशत वर्षा कम रिकार्ड की गई है। ऊधमसिंह नगर कुमाऊं में इस मौसम में 96 प्रतिशत बारिश घटी है जिसके कारण क्षेत्र प्रभावित है,जबकि इसके चपेट में कई जिले आए हैं। शीतकालीन मौसमी वर्षा देहरादून मौसम विज्ञान केंद्र की ओर से जारी आंकड़ों में कहा गया है कि उत्तराखंड में जनवरी और फरवरी में बारिश का केवल 34.6 मिलीमीटर प्राप्त किया। मौसम विभाग ने बताया कि मौसम शुष्क रहने की उम्मीद है और तापमान में वृद्धि की उम्मीद है।

कहां कितनी कम बारिश जाड़ों में
जिलेवार बारिश का प्रतिशत, अल्मोड़ा 81 , बागेश्वर 94, चमोली 73, चंपावत 83,देहरादून 60 , पौड़ी गढ़वाल 80, टिहरी गढ़वाल 51 , हरिद्वार 78, नैनीताल 79, पिथौरागढ़ 57, रूद्रप्रयाग 80, ऊधम सिंह नगर 96 ,उत्तरकाशी 50, कुल अनुपातिक प्रतिशत 67 है।

जिंदा महिला को मृत घोषित कर  विभाग ने पेंशन रोकी

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अब तक ऐसी कहानी  सिर्फ फिल्मो में देखी जाती थी पर यह अब सच का सामना एक महिला कर रही है। चकराता के गांव मलेथा(भेवना) निवासी विधवा फिको देवी को मृत दर्शाकर समाज कल्याण विभाग ने पेंशन बन्द कर दी है। अब वो अपने जिन्दा होने के सबूत अफसरों को दिखाकर पेंशन की गुहार लगा रही है। मृत होने का महिला को तब पता चला जब वह देहरादून पहुंचकर एडीएम प्रशासन हरवीर सिंह के कार्यलय पहुंची। वहां उनको जानकारी मिली कि किसी ने उनका मृत प्रमाण पत्र लगाया हुआ है जिसके चलते उनकी पेंशन बंद कर दी गई है। फरवरी 2011 से उनकी पेंशन बंद कर दी गई थी। तब से वह पेंशन शुरू कराने को वो अफसरों के चक्कर काट रही है, लेकिन इसे विभाग की उदासीनता ही कहेंगे कि इतना सब कुछ पता चल जाने पर भी महिला की पेंशन बहाल नहीं की गई है। उन्होंने अपना खाता संख्या से लेकर नवम्बर में बनवाया आधार कार्ड भी एडीएम को पेश किया। हांलाकि एडीएम ने महिला से लिखित में शिकायत लेकर समाज कल्याण अफसरों को तत्काल उसकी समस्या का समाधान का निवारण करने को कहा है। साथ ही ग्राम सभा के ग्राम विकास अधिकारी दिनेश उपाध्याय ने बताया कि जन्म या मृत्यु प्रमाण पत्र  ग्राम विकास अधिकारी के स्तर से ही जारी किया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि उन्होने नवम्बर 2014 में चार्ज लिया था। यह मामला उनसे पूर्व का है। यदि मृत्यु का गलत प्रमाण पत्र जारी हुआ है तो उसे दुरस्त कर पीड़ित महिला को पेंशन चालू कराई जायेगी।

रामनगर प्लाईवुड फैक्ट्री में भीषण आग

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नैनीताल जिले के रामनगर स्थित स्टार प्लाईवुड फैक्ट्री में लगी भीषण आग । तेज आग को देखते हुए दमकल विभाग की गाड़ियां आग बुझाने के लिए बुला ली गई हैं । आग से लाखों का नुक्सान होने की सम्भावना है । गनीमत ये है की इस हादसे में किसी की जान नहीं गई ।
रामनगर के ग्राम तेलीपुरा स्थित स्टार प्लाईवुड में अचानक आग लगने से फैक्ट्री में काम कर रहे कर्मचारियों में भगदड़ मच गई । फैक्ट्री के प्रबंधन ने आग लगने की सूचना फायर स्टेशन को दी । सूचना के बाद दो दमकल वाहन मौके पर पहुचे । दमकल कर्मियों ने मौके पर पहुँचकर कड़ी मशक्कत के बाद जल्द ही आग पर काबू पा लिया गया । फ़िलहाल टीम आग से हुए कुल नुक्सान के आंकलन में जुट गई है । आग से किसी प्रकार की भी जनहानी नहीं हुई है ।

बीजेपी से पूछ कर सरकार काम नहीं करतीः हरीश रावत

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मुख्यमंत्री हरीश रावत ने विराट कोहली को भुगतान करने के बाद उठे सियासी विवाद पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि विराट कोहली को इंगेज करना क्या अपराध है । यदि उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे चार धाम की मार्केटिंग करें, तो क्या इसमें कोई गलती है । और यदि गलत है तो भाजपा कहे की हमने गलत काम किया है ।
आपदा मद से भुगतान पर रावत ने कहा कि ये सरकार को तय करना होता है कि भुगतान किस मद से किया जाए । अगर हम चार धाम की मार्केटिंग करेंगे तो इसके लिए पैसे कहां आएगा, ये कौन तय करेगा । ये सरकार तय करेगी। यह भाजपा से पूछ कर तय नहीं किया जायेगा । इसमें सरकार से कोई गलती नहीं हुई है ।  बल्कि हमारी तारीफ चाहिए कि हमने विराट कोहली जैसी शख्सियस से मात्र 47 लाख में चार धाम की मार्केटिंग करवाई, जिसके वे एक से डेढ़ करोड़ रुपए लेते हैं । भाजपा द्वारा जांच की मांग पर सीएम ने कहा कि भाजपा लिख कर के दें, मैं सारे आपदा के मामलों की जांच सुप्रीम कोर्ट के सीटिंग जज से करवाने के लिए तैयार हूं ।
भाजपा को आड़े हाथ लेते हुए सीएम ने कहा कि भाजपा शुरू से ही चुनाव आयोग पर अनावश्यक दबाव डालती हुई नज़र आई है । उसके लिए भाजपा ने हिट एंड रन पॉलिसी यहां भी अपनाई । विपक्षी पार्टी पर आरोप लगा दो और आयोग से कहो की आप जांच करिए । चुनाव प्रकिया के दौरान हमारे हेलीकाप्टर की जांच हुई, लेकिन किसी ने प्रधानमंत्री के साथ ही किसी भी केंद्रीय मंत्री की जांच नहीं की । उसी तरह से गाड़ियों के प्रयोग के मामले में भी भाजपा ने गलत प्रचार किए, पेट्रोल पम्पो का दुरुपयोग के साथ उन्होंने बहुत सारी अनियमितता की है । उस समय चुनाव लड़ते या इन सब बातों में लगे रहते हैं।

चलती कार में लगी आग,चालक ने कूद मारकर बचाई जान

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उत्तराखण्ड के सितारगंज में एक नई गाडी में चलते हुए आग लगने से चालक ने कूद मारकर अपनी जान बचाई।मामले के अनुसार सितारगंज निवासी अमरीक सिंह अपनी नई गाड़ी महिंद्रा क़े.यू.वी.100 संख्या UKO6 AK 4579 से नानकमत्ता की तरफ को जा रहे थे जब उनकी कर के इंजन से धुआं आने लगा और देखते ही देखते उसमें आग लग गई ।

इससे कुछ समय पहले ही चालक अपने परिवार को सितारगंज छोड़कर वापस घर की तरफ लौट रहा था । जैसे ही कार बिज़टी स्थित पुल के समीप पहुंची अचानक उसमें शॉर्ट सर्केट हो गया जिससे कार में आग लग गयी । चालाक ने गाडी से निकलते धुएं और आग की लपटों को देखा तो उसने होश उड़ गए और उसने अपनी जान बचने के लिए गाडी से छलांग लगाकर अपनी जान बचाई । गाड़ी को सुविधाजनक बनाने की होड़ में अब ये गाड़ियां ज्यादा इलेक्ट्रिकल होती जा रही हैं जिससे छोटी सी कमी या चूक इसमें ऐसी ही खतरनाक हादसों को दावत दे रही है ।हालाँकि इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन गाडी जलकर खाक हो गयी।

लिपिस्टिक को लेकर सेंसर फिर आया निशाने पर

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प्रकाश झा के प्रोडक्शन में डायरेक्टर अलंकृिता श्रीवास्तव की फिल्म लिप्सिटक अंडर माई बुरका को लेकर सेंसर बोर्ड फिर से निशाने पर आ गया है। सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को पास करने से मना कर दिया है। रिवाइजल कमेटी में भी ये फैसला बना रहा। अब मामला एपीलेट ट्रिब्यूनल में तय होगा, जिसके लिए फिल्म की टीम ने अप्रोच किया है। प्रकाश झा इसे सेंसर की तानाशाही बताते हैं और कहते हैं कि जरुरत पड़ी, तो वे कोर्ट तक जाएंगे। उधर, सेंसर बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी का कहना है कि सेंसर बोर्ड अपनी गाइड लाइंस के मुताबिक, काम रहा है। उन्होंने फिल्म को पास न किए जाने के फैसले की पैरवी करते हुए कहा कि ये फैसला दिशा-निर्देशों के मुताबिक हुआ है।

उधर, बालीवुड से लेकर सोशल मीडिया तक हर जगह इस फैसले के लिए सेंसर बोर्ड को आड़े हाथों लिया गया है। बालीवुड में राकेश ओमप्रकाश मेहरा से फरहान अख्तर, कबीर खान, मधुर भंडारकर, महेश भट्ट, विशाल भारद्वाज, सुजाय घोष जैसे फिल्मकारों ने इस फैसले को बेहूदा बताते हुए कहा है कि फिल्म के संघर्ष में वे एकजुट हैं। फरहान अख्तर का मानना है कि सेंसर बोर्ड के फैसले फिल्मकारों का मनोबल तोड़ रहे हैं। राकेश मेहरा ने कहा कि वे हैरान हैं कि कैसे एक फिल्म के साथ ऐसा किया जा सकता है। महेश भट्ट ने कहा कि ये फैसले बताते हैं कि हमारा सेंसर बोर्ड किस सदी में जी रहा है। कबीर खान ने कहा कि ऐसे सेंसर बोर्ड की कोई जरुरत नहीं है।
ये फिल्म समाज के अलग अलग चार वर्ग की महिलाओं की कहानी है, जो अपनी अपनी जिंदगी से ढर्रे से परेशान हैं और चेंज चाहती हैं। इन महिलाओं में दो मुस्लिम और दो हिंदू परिवारों से हैं। माना जा रहा है कि फिल्म के टाइटल में बुरका शब्द को लेकर भी सेंसर बोर्ड सहज नहीं था। फिल्म की प्रमुख भूमिकाओं में कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, पल्बिता बोरथकर और आहना कुमारा हैं। फिल्म इन चारों महिलाओं के जिंदगी के सफर की कहानी है। सेंसर बोर्ड ने फिल्म के कुछ सीन और संवादों पर आपत्ति जताई और फिल्म को सार्टिफिकेट देने से मना कर दिया। प्रकाश झा की इससे पहले बनी फिल्म जय गंगाजल में भी सेंसर ने आपत्ति की थी और फिल्म को एपीलेट ट्रिब्यूनल से क्लीयर कराना पड़ा था।
इससे पहले सेंसर बोर्ड पर हाल ही में उस वक्त भी सवाल उठे थे, जब रामगोपाल वर्मा की आने वाली फिल्म सरकार 3 को लेकर भी इसके ट्रेलर पर डिसक्लेमर लगाने को कहा था। ये अपनी तरह का पहला मामला था, जब फिल्म के ट्रेलर पर भी फिल्म के फिक्शन होने का डिसक्लेमर लगाने को कहा गया।

देखने से पहले पढ़े फिल्म रंगून का रिव्यू

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विशाल भारद्वाज हिंदी फिल्मों के उन फिल्मकारों में से हैं, जो सीधी बात कहने के लिए भी टेढ़ा रास्ता चुनने को फिल्मकारी मानते हैं और अपनी ही फिल्मों का सत्यानाश करके खुश हो जाते हैं। रंगून में भी विशाल भारद्वाज ने यही किया।
दूसरे विश्व युद्ध के बैकड्रॉप पर एक पीरियड फिल्म बनाना आसान नहीं था। इसके लिए बड़े बजट की जरूरत थी। विशाल को निर्माता साजिद नडियाडवाला ने सब कुछ मुहैया कराया। समय, पैसा और कलाकारों को लेकर कोई समस्या नहीं थी, न ही समस्या कहानी को लेकर थी। समस्या खुद विशाल थे, जिनकी समझदारी फिल्म पर एक बार फिर बुरी तरह से हावी हो गई और फिल्म का पंचर हो गया।
कहानी ब्रिटिश राज की भारतीय सेना से शुरू होती है, जो दूसरे विश्वयुद्ध में हिस्सा ले रही थी। जमादार नवाब (शाहिद कपूर) उन लड़ाकों में था। कहानी का दूसरा छोर एक अभिनेत्री जूलिया (कंगना) का था, जो फिल्मों में अपनी स्टंटबाजी और डांस के लिए मशहूर रही। फिल्म कंपनी के प्रोड्यूसर मालिक बिलिमोरिया (सैफ अली खान) से उनका अफेयर था, जो पहले से शादीशुदा था। बर्मा में लड़ रहे सैनिकों के मनोरंजन के लिए जूलिया को भेजा गया, तो उसकी हिफाजत की जिम्मेदारी जमादार नवाब को दी गई और बीच रास्ते में दोनों को एक दूसरे से प्रेम हो गया। यहां से मामला लव ट्रायंगल का बन गया, जिसमें जूलिया दो प्यार करने वालों के पाट में फंस गई और साथ ही एक शाही तलवार के साथ इस फिल्म को देशभक्ति के जज्बे से भी जोड़ दिया गया। क्लाइमैक्स का जिक्र करना ठीक नहीं होगा।
ये फिल्म विशाल भारद्वाज की नाकामयाबी का एक दस्तावेज है। उनके पास एक बेहतरीन फिल्म बनाने का मौका था, लेकिन ये मौका उन्होंने अपनी सोच के चलते गंवा दिया और अपने साथ कलाकारों की मेहनत भी ले डूबे। किसी भी फिल्म की कामयाबी का आधार ये होता है कि किरदारों के साथ फिल्म देखने वाला दर्शक कैसे जुड़ पाता है। इस फिल्म में ऐसा नहीं हो पाता। लंबे-लंबे बोरिंग सीन फिल्म को पका डालते हैं और दर्शकों को बोरियत में बांध देते हैं। कहानी ढीली और जब कहानी कहने वाला महाढीला हो, तो फिल्म का कचूमर बनना तय हो जाता है। जहां तक कलाकारों की परफॉरमेंस की बात है, तो जब किरदारों का आधार ही कमजोर हो, तो परफॉरमेंस पर भी असर होता है। फिर भी अपने-अपने किरदारों में कंगना, सैफ और शाहिद ने कोई कसर नहीं रखी। परदे पर उनकी मेहनत भी झलकती है। कंगना ने एक बार फिर फिल्म को अपने में समाहित कर लिया। इस ट्रायंगल में किरदार और परफॉरमेंस में सैफ थोड़ा पीछे रह गए। इमोशनल सीनों में शाहिद फबते हैं, तो डांस और एक्शन के अलावा भावुकता में कंगना लाजवाब रही हैं। एक और जो किरदार याद रह जाता है, वो ब्रिटिश आर्मी का अफसर, जो हिंदी शायरी से मनोरंजन के पल जुटाता है। निर्देशक के तौर पर विशाल पूरी तरह से फेल साबित हुए हैं। फिल्म का गीत-संगीत भी बहुत अच्छा नहीं रहा। कैमरावर्क, सेट और एक्शन सीन फिल्म के अच्छे पक्ष हैं। क्लाइमैक्स बेहूदा है।
फिल्म का बजट बड़ा है। प्रमोशन भी बड़े स्तर पर हुआ। बड़े सितारों के चलते उम्मीदें भी सातवें आसमान पर हैं, लेकिन फिल्म देखकर मायूसी के अलावा कुछ नहीं रहता। फिल्म का नाम रंगून है, लेकिन ये बेरंगी फिल्म है, जिसमें मनोजंरन के नाम पर जो कुछ भी है, वो कोफ्त, झुंझलाहट और मायूसी के अलावा कुछ नहीं रहने देता। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर झटका साबित होगी।

ट्रैफिक नियम तोड़ने पर पर्ची नहीं चलान का एस एम एस मिलेगा

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अब यातायात नियम तोड़ने पर पर्ची नहीं बल्कि चालान का एसएमएस आयेगा। देश के किसी भी हिस्से में किये गए चालान का भुगतान कहीं से भी ऑनलाइन किया जा सकेगा।
उत्तराखंड में पहली बार ई-चालान सिस्टम 15 मार्च से शुरू होने जा रहा है।फिलहाल यह व्यवस्था दिल्ली, चंडीगढ़ के साथ उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में चल रही है।
परिवहन विभाग  की टीम जल्द सड़को पर वाहनों का ई-चालान करते नजर आएगी। चालान करते ही वाहन की पूरी डिटेल सेंट्रल कमांन सर्वर में अपडेट हो जायेगी। इसी के साथ वाहन के मालिक के पास मैसेज आ जायेगा। जिसके जरिए वह कहीं से भी चालान का भुगतान कर सकेंगे।
इसके लिए उन्हें परिवहन विभाग के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे। भुगतान का मैसेज भी वाहन स्वामी के पास पहुचेंगे।
एआरटीओ प्रशांत अरविन्द कुमार पांडेय के मुताबिक परिवहन विभाग इसकी तैयारियों को अंतिम रूप दे रहे हैं। करीब 15 मार्च से वाहनों का ऑनलाइन चालान कटना शुरू हो जायेगा। एन.आई.सी. नेशनल इनफार्मेशन सेंटर ने ई-चालान नाम से वाहन-4 और सारथी लाइसेंस धारकों का सेंट्रल कमांन वाहन सर्वर तैयार किया है। जिसका ट्रायल अंतिम चरण में है। परिवहन विभाग वर्तमान में वाहनों का मैनुअल चालान काट रहा है। जिसके चलते यह पता लगाना मुश्किल होता है कि किस वाहन का चालान कितनी बार कटा। ऐसे में अधिकारीयो को भी काफी परेशानी होती है। विभाग ने इस पर अंकुश लगाने के लिए ऑनलाइन चालान काटने की प्रक्रिया पर जनवरी से काम शुरू किया गया था।

दून ट्रैफिक पुलिस को मिलेंगे नये साजो सामान

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आने वाले दिनों में देहरादून पुलिस आपको नये रंग रूप में नज़र आयेगी। ज़िले की ट्रैफिक व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिये अधिकारियों ने ड्यूटी पर तैनात पुलिस क्रमियों के लिये नये साजो सामान का इंतजाम करने का फैसला किया है।

इसके लिये यातायात ड्यूटी में तैनात किए गए पुलिसकर्मियों को और आधुनिक बनाने के लिये नये उकरण लिये जा रहे हैं। जिनमें

  • 200 ग्लब्स,
  • 200 बैटन लाइट,
  • 200 फ्लोरोसेंट जैकेट,
  • 197 रेनकोट,
  • 200 मास्क तथा
  • 100 सीटियां शामिल हैं।

यातायात व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये अन्य उपकरण भी लिये जा रहे हैं और मौजूदा सामानों को अपग्रेड किया जा रहा है। इसमे

  • बड़ी रिकवरी वैन पर लिफ्टर लगाया जाना
  • छोटी 207 वाहन पर हाईड्रोलिक क्रेन में परिवर्तित करना शामिल है।

बहरहाल दिनों दिन बद से बदत्तर होती जा रही देहरादून की ट्रैफिक व्यवस्था के लिये ये प्रयोग कितना कारगर साबित होगा ये तो आने वाले समय में ही पता चलेगा लेकिन इस कदम से घंटों शोर और प्रदूषण के बीच ड्यूटी करने वाले पुलिस कर्मियों को कुछ मदद तो ज़रूर मिलेगी।