बीएसएफ इंस्टिट्यूट के कमांडेंट राजकुमार नेगी ने बताया कि डोईवाला के BSF ट्रेनिंग संस्थान में टेकनपुर के 788 और अन्य मुख्यालयों से आये 1755 प्रशिक्षु अधिकारी को यहसंस्थान साहसिक प्रशिक्षण की ट्रेनिंग दे चुका है ट्रेनिंग के बाद यह बीएसएफ के जवान किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा त्रासदी भीषण भूकंप मे बचाओ और राहत कार्यों को बखूबी निभा सके !
डोईवाला के बीएसएफ इंस्टिट्यूट में ग्वालियर बीएसएफ के नए जवानों ने शुरू किया साहसिक प्रशिक्षण
बीएसएफ इंस्टिट्यूट के कमांडेंट राजकुमार नेगी ने बताया कि डोईवाला के BSF ट्रेनिंग संस्थान में टेकनपुर के 788 और अन्य मुख्यालयों से आये 1755 प्रशिक्षु अधिकारी को यहसंस्थान साहसिक प्रशिक्षण की ट्रेनिंग दे चुका है ट्रेनिंग के बाद यह बीएसएफ के जवान किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा त्रासदी भीषण भूकंप मे बचाओ और राहत कार्यों को बखूबी निभा सके !
नई सरकार के आते ही तेज हुआ स्वच्छता अभियान
अब देहरादून से श्रीनगर,कश्मीर तक का सफर हुआ आसान
ज़ुबीन नौटियाल और बादशाह का जौनसारी गाना इंटरनेट पर मचा रहा धूम
संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले उत्तराखंड के जुब़ीन नौटियाल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती। जी हां, हम बात कर रहे हैं उनके हाल ही में आए एमटीवी अनप्लग्ड में गाए गीत “ओ साथी ओ साथी,ओ साथी तेरी चिट्ठी पत्री आई ना” के बारे में। जुब़ीन नौटियाल और बादशाह की जोड़ी की जुगलबंदी ने पहाड़ी गाने में जान डाल दी है।
ज़ुबीन नौटियाल और बादशाह के अलग-अलग र्फामूले को एक साथ पहली बार देखा जा रहा और सराहा भी जा रहा है।संगीत में होने वाले फ्यूजन को बहुत ही खूबसूरती के साथ इस जौनसारी गाने मॆ पेश किया गया है।
आपको बता दें कि इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर 24 मार्च को पोस्ट किया गया था और रविवार (26 मार्च) दोपहर तक सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर 12 लाख से ज्यादा लोग इस वीडियो को देख चुके हैं।इस वीडियो को 40,000 से अधिक नॆ पसंद किया और 12,000 से अधिक शेयर मिल चुके हैं।
मूल रुप से इस गानो को जौनसारी गायक खजान दत्त शर्मा ने गाया है और यह गाना अपने प्रियजनों को याद करते हुए बनाया गया है।उत्तराखंड के जिला जौनसार में यह भाषा बोली जाती है।
अगर आपने यह गाना नहीं देखा तो यहां देखेंः
दून की हवा में मौजूद है स्वाइन फ्लू का वायरस
पुलिस में एंटी ड्रग दस्ते का गठन
पेशी पर आए कुख्यात चीनू पंडित को पुलिस ने रेस्टोरेंट में कराया नाश्ता
दून के गांव होंगे स्मार्ट केंद्र, श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन से बदलेगी तस्वीर
उत्तराखंड में देहरादून को भले ही स्मार्ट सिटी का दर्ज़ा मिलते -मिलते रह गया हो लेकिन एक नयी उपलब्धि अब देहरादून के ग्रामीण इलाको को मिलने जा रही है।अब दून के 12 गांव, गांव नहीं रहेगे बल्कि जल्द ही ये स्मार्ट गाँव होने जा रहे है ऋषिकेश-डोईवाला के ग्रामीण छेत्र अठूरवाला कलस्टर के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के तहत केंद्र ने की डीपीआर मंजूर कर दी है, दून के 12 गांव को स्मार्ट बनाने के लिए लगभग 1 अरब से ज्यादा रुपया खर्च किया जायेगा, विकास विभाग ने जिले से ईस्ट होप टाउन और बालावाला कलक्टर का प्रस्ताव केंद्र को भेजा था।
कलस्टर में पांच किलोमीटर परिधि में पड़ने वाले गांवों को शामिल किया गया है। मिशन के तहत गांवों में बुनियादी ढांचा तैयार करने के साथ रोजगार के लिए आर्थिक गतिविधियां शुरू की जाएंगी।इस योजना में शहर और गांव के बीच सुविधाओं का अंतर खत्म करना है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की इस योजना के क्रियान्वयन के लिए सहयोगी संस्थान है

ग्राम्य विकास विभाग के परियोजना निदेशक राजेंद्र सिंह रावत ने बताया कि मिशन को तीन साल में पूरा करने का लक्ष्य है। प्रत्येक साल केंद्र से 10-10 करोड़ रुपये के हिसाब से 30 करोड़ रुपये मिलेंगे। कुल एक अरब नौ करोड़ रुपये की डीपीआर है। शेष पैसा का प्रबंध जिला योजना, उद्यान मिशन, एनआरएचएम, सर्व शिक्षा अभियान समेत केंद्र की तमाम योजनाओं से होगा। इसकी रूपरेखा तैयार कर ली गई है।इस योजना के तहत इन 12 गांव को स्मार्ट बनाया जायेगा जो अठूरवाला कलस्टर के अन्तर्गत आते है।
एक नजर दून के स्मार्ट बनने वाले गाँव —-
अठूरवाला, माजरी ग्रांट, भानियावाला, कनहार वाला, जौलीग्रांट, रानीपुर ग्रांट, संगटिया, रैनापुर ग्रांट, लिस्टराबाद, रानी पोखरी, रानी पोखरी ग्रांट, फतेहपुर डांडा
बुद्धिजीवी और चिपको मूवमेंट मेमोरियल फाउंडेशन ने उठाई मांग,गौरा देवी को मिलना चाहिए भारत रत्न सम्मान
उत्तराखंड की मात् शक्ति हमेशा से ही पर्यावरण के प्रति बड़ी ही संवेदन रही है । जंगल को अपना मायका मानने वाली यहाँ की महिलाये आज भी वनों के सुरक्षा में सबसे आगे रही, 1974 में गौरा देवी के विश्व विख्यात चिपको आन्दोलन की गूज आज पुरे विश्व में है, लेकिन आन्दोलन की जननी को अभी तक न भारत सरकार ने और न ही उत्तराखंड सरकार कोई बड़ा पुरूस्कार दिया है। चिपको वूमन के नाम से मशहूर, 1925 में चमोली जिले के लाता गांव के एक मरछिया परिवार में श्री नारायण सिंह के घर में गौरा देवी का जन्म हुआ था।
गौरा देवी ने कक्षा पांच तक की शिक्षा भी ग्रहण की थी, जो बाद में उनके अदम्य साहस और उच्च विचारों का सम्बल बनी। मात्र ११ साल की उम्र में इनका विवाह रैंणी गांव के मेहरबान सिंह से हुआ, रैंणी भोटिया (तोलछा) का स्थायी आवासीय गांव था, ये लोग अपनी गुजर-बसर के लिये पशुपालन, ऊनी कारोबार और खेती-बाड़ी किया करते थे। गौरा देवी ने ससुराल में रह्कर छोटे बच्चे की परवरिश, वृद्ध सास-ससुर की सेवा और खेती-बाड़ी, कारोबार के लिये अत्यन्त कष्टों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने पुत्र को स्वालम्बी बनाया, उन दिनों भारत-तिब्बत व्यापार हुआ करता था, गौरा देवी ने उसके जरिये भी अपनी आजीविका का निर्वाह किया। १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद यह व्यापार बन्द हो गया और खाली समय में वह गांव के लोगों के सुख-दुःख में सहभागी होने लगीं। इसी बीच अलकनन्दा में १९७० में प्रलंयकारी बाढ़ आई, जिससे यहां के लोगों में बाढ़ के कारण और उसके उपाय के प्रति जागरुकता बनी और इस कार्य के लिये प्रख्यात पर्यावरणविद श्री चण्डी प्रसाद भट्ट ने पहल की।

भारत-चीन युद्ध के बाद भारत सरकार को चमोली की सुध आई और यहां पर सैनिकों के लिये सुगम मार्ग बनाने के लिये पेड़ों का कटान शुरु हुआ। जिससे बाढ़ से प्रभावित लोगों में संवेदनशील पहाड़ों के प्रति चेतना जागी। इसी चेतना का प्रतिफल था, हर गांव में महिला मंगल दलों की स्थापना, १९७२ में गौरा देवी जी को रैंणी गांव की महिला मंगल दल का अध्यक्ष चुना गया। इसी दौरान वह चण्डी प्रसा भट्ट, गोबिन्द सिंह रावत, वासवानन्द नौटियाल और हयात सिंह जैसे समाजिक कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आईं। जनवरी १९७४ में रैंणी गांव के २४५१ पेड़ों का छपान हुआ। २३ मार्च को रैंणी गांव में पेड़ों का कटान किये जाने के विरोध में गोपेश्वर में एक रैली का आयोजन हुआ, जिसमें गौरा देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया।
प्रशासन ने सड़क निर्माण के दौरान हुई क्षति का मुआवजा देने की तिथि २६ मार्च तय की गई, जिसे लेने के लिये सभी को चमोली आना था। इसी बीच वन विभाग ने सुनियोजित चाल के तहत जंगल काटने के लिये ठेकेदारों को निर्देशित कर दिया कि २६ मार्च को चूंकि गांव के सभी मर्द चमोली में रहेंगे और समाजिक कायकर्ताओं को वार्ता के बहाने गोपेश्वर बुला लिया जायेगा और आप मजदूरों को लेकर चुपचाप रैंणी चले जाओ और पेड़ों को काट डालो।
इसी योजना पर अमल करते हुये श्रमिक रैंणी के देवदार के जंगलों को काटने के लिये चल पड़े। इस हलचल को एक लड़की द्वारा देख लिया गया और उसने तुरंत इससे गौरा देवी को अवगत कराया। गांव में उपस्थित २१ महिलाओं और कुछ बच्चों को लेकर वह जंगल की ओर चल पड़ी। इनमें बती देवी, महादेवी, भूसी देवी, नृत्यी देवी, लीलामती, उमा देवी, हरकी देवी, बाली देवी, पासा देवी, रुक्का देवी, रुपसा देवी, तिलाड़ी देवी, इन्द्रा देवी शामिल थीं। इनका नेतृत्व कर रही थी, गौरा देवी, इन्होंने खाना बना रहे मजदूरो से कहा”भाइयो, यह जंगल हमारा मायका है, इससे हमें जड़ी-बूटी, सब्जी-फल, और लकड़ी मिलती है, जंगल काटोगे तो बाढ़ आयेगी, हमारे बगड़ बह जायेंगे, आप लोग खाना खा लो और फिर हमारे साथ चलो, जब हमारे मर्द आ जायेंगे तो फैसला होगा।” ठेकेदार और जंगलात के आदमी उन्हें डराने-धमकाने लगे, उन्हें बाधा डालने में गिरफ्तार करने की भी धमकी दी, लेकिन यह महिलायें नहीं डरी। ठेकेदार ने बन्दूक निकालकर इन्हें धमकाना चाहा तो गौरा देवी ने अपनी छाती तानकर गरजते हुये कहा “मारो गोली और काट लो हमारा मायका” इस पर मजदूर सहम गये।
गौरा देवी के अदम्य साहस से इन महिलाओं में भी शक्ति का संचार हुआ और महिलायें पेड़ों के चिपक गई और कहा कि हमारे साथ इन पेड़ों को भी काट लो। इस प्रकार से पर्यावरण के प्रति अतुलित प्रेम का प्रदर्शन करने और उसकी रक्षा के लिये अपनी जान को भी ताक पर रखकर गौरा देवी ने जो अनुकरणीय कार्य किया, उसने उन्हें रैंणी गांव की गौरा देवी से चिपको वूमेन फ्राम इण्डिया बना दिया। अब उत्तराखंड के साहित्यकार और नाट्यकर्मी श्रीश डोभाल का कहना है कि मोदी सरकार को चाहिए कि उत्तराखंड से पर्यावरण की आवाज़ उठाने वाली एक उत्तराखंड की ग्रामीण महिला के उलेखनीय कार्यो को सम्मान मिलना चाहिए, स्व .गोरा देवी के भारत रत्न सम्मान से सम्मानित किया जाये। चिपको मूवमेंट मेमोरियल फाउंडेशन के संयोजक राम राज बडूनी का कहना है कि सरकार को इस और ध्यान देना चाहिए और गौरा देवी को सम्मान मिलना चाहिए।




























































