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25 मई से शुरु हो सकता है दिल्ली-देहरादून शताब्दी का सफर

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देहरादून से सफर करने वाले और दिल्ली से दून आने वाले टूरिस्ट के लिए एक खुशखबरी है। कुछ ही दिनों मे नई दिल्ली-देहरादून शताब्दी एक बार फिर अपने पूराने शेड्यूल से सफर कराना शुरु करेगी। जी हां लगभग 36 दिन से दून स्टेशन के रेलवे ट्रेक के मरम्मत की वजह से बहुत सी ट्रेनों को केवल हरिद्वार स्टेशन तक आने की परमिशन थी।

17 अप्रैल से सभी ट्रेन जो देहरादून से चलाई जाती है, उनका आपरेशन हरिद्वार शिफ्ट कर दिय गया था लेकिन 36 दिनों के रेनोवेशन कार्य के बाद उनका आपरेशन एक बार फिर अपने शेड्यूल टाईम से देहरादून से शुरु कर दिया जाएगा। लेकिन रेनोवेशन कार्य को ध्यान में रखते हुए हो सकता है यात्रियों को कुछ दिन का इंतजार और करना पड़े।

वहीं देहरादून रेलवे सुप्रीडेंन्डेंट करतार सिंह के मुताबिक शताब्दी के चलने की अभी तक कोई सूचना नहीं है, जबकि 22 मई तक का समय शताब्दी के लिए दिया गया था लेकिन अभी इसपर कुछ कहा नही जा सकता। उन्होंने कहा कि नई लाइन तो ठीक कर दी गई है लेकिन उसके पैरलल काम चल रहा है, बावजूद इसके अगर हमें कहा जाएगा ट्रेन चलाने के लिए तो ट्रेन चल जाएगी। लेकिन साथ में चल रहे लाइन पर काम होने की वजह से थोड़ी दिक्कत जरुर आएगी।

मुरादाबाद डिवीजन के अंदर आने वाले देहरादून रेलवे स्टेशन के डिवीजनल रेलवे मैनेजर प्रमोद कुमार, ने बताया कि रेनोवेशन का काम अब तक पूरा हो जाना चाहिए लेकिन सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आने वाले 2-3 दिन के अंदर देहरादून आने वाली ट्रेनों का संचालन शुरु हो जाएगा। हालांकि हम पूरी कोशिश करेंगे की आने वाली 25-26 मई से दिल्ली से आने वाली शताब्दी ट्रेन का संचालन अपने ओरिजनल शेड्यूल से शुरु हो जाए।

लाॅटरी सिस्टम से होगी कार्बेट जंगल सफारी की बुकिंग

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उत्तराखंड के जिम कार्बेट में एक्सपेरिमेंट के तौर पर यात्रियों की सुविधा और इस सिस्टम को ठीक ढ़ंग से मानीटर करने के लिए कार्बेट टाईगर रिर्जव, पार्क एडमिनिस्ट्रेशन ने रविवार को लाटरी बेस्ड एंट्री सिस्टम यानि जंगल सफारी के लिये लाटरी सिस्टम शुरु करने का निर्णय लिया है। एडिमिस्ट्रेशन के आफिसर ने कहा कि यह सिस्टम आनलाईन स्लाट बुकिंग के साथ ही काम करेगा।

वहीं पार्क के एक अधिकारी ने कहा कि लाटरी सिस्टम की जरुरत तब पड़ी जब हमें महसूस हुआ कि आनलाईन बुकिंग के जरिए डे सफारी का मिस यूज किया जा रहा। उन्होंने बताया कि बहुत बार ऐसा हुआ कि आनलाईन बुकिंग कराने वाले लोगों की जांच के दौरान जिनके नामों से बुकिंग होती थी उनकी जगह पार्क में दूसरे लोग आते थे – मतलब नाम किसी और सफारी में कोई और।इसके अलावा एक आफिसर ने बताया कि जिन लोगों को बुकिंग मिल जाती है वो लोग अपनी बुकिंग दूसरों को ज्यादा पैसों में बेच देते या खाने और रहने के लालच में रेजार्ट वालों को दे देते हैं। 5 जोन के लिए एक दिन में कुल 86 सफारी के बुकिंग की परमिशन दी गई है- झिरना, बिजरानी, ढिकाला, ढेला और दुर्गादेवी। सभी 5 ज़ोन अभी खुल चुके हैं और एक औसतन पर 700-1000 टूरिस्ट हर रोज इसके लिए आ रहे हैं।

कार्बेट टाईगर रिजर्व के आफिस इंचार्ज धीरज पांडे ने बताया कि लाटरी सिस्टम को फिलहाल खाली स्लाट को भरने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि अगर आनलाईन बुकिंग करवाने वाला व्यक्ति उपस्थित नहीं है या बुकिंग करवाने वाले व्यक्ति का कनर्फमेशन नहीं होता तो खाली स्लाट की बुकिंग आन द स्पाट लाटरी सिस्टम से की जाएगी।

जिम कार्बेट रिजर्व का नाम मशहूर शिकारी और कर्न्जवेशनिस्ट जिम कार्बेट के नाम पर रखा गया है जो 520 स्वायर किमी क्षेत्र में फैला हुआ है और यह देश का एक प्रीमियर टाईगर रिजर्व है।जिम कार्बेट लगभग 110 प्रजाति के पेड़ और पौधे, 50 प्रजाति के मैमल,580 प्रजाति के चिड़ियों और 25 तरह के रेपटाईल का घर है।

असम और उत्तराखण्ड राज्य में बहुत सी समानताएं: सीएम

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मुख्यमंत्री ने रविवार को लखीमपुर, असम में हिंदू छाँह जन गोष्ठी संस्कृति सुरक्षा परिषद, सेवा भारती पूर्वांचल एवं सेवायन, असम व दि हंस फाउण्डेशन द्वारा आयोजित 1000 से अधिक जोड़ों के सामूहिक विवाह अनुष्ठान समारोह में शामिल हुए। गरीब तबके हेतु सामूहिक विवाह समारोह के आयोजित किये जाने के लिये दि हंस फाउण्डेशन एवं हंस कल्चरल सेंटर की सराहना करते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि संस्था द्वारा लगातार समाज के कमजोर तबके को सहयोग दिया जा रहा है।
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मुख्यमंत्री ने कहा कि असम और उत्तराखण्ड राज्य में बहुत सी समानताएं हैं। उन्होंने कहा कि असम की प्राकृतिक सुन्दरता अनुपम है। पर्यटन, असम और उत्तराखण्ड दोनों राज्यों की इकोनाॅमी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। असम और उत्तराखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियां लगभग समान होने के कारण हम लोगों के अवसर एवं चुनौतियाँ भी एक सी हैं। असम में ब्रह्मपुत्र नदी और उत्तराखण्ड में गंगा नदी दोनों समान महत्व रखती हैं। पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा दोनों ही राज्यों को समान रूप से है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिये उत्तराखण्ड में पर्यटन के साथ-साथ कृषि को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। चारधाम यात्रा धार्मिक परिदृश्य के साथ-साथ उत्तराखण्ड में रोजगार के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है कि चारधाम यात्रा सुचारू रूप से चलती रहे। पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध करा कर पलायन रोका जा सकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए दोनों प्रदेशों में कौशल विकास को प्राथमिकता से लेते हुए अभियान चलाना जरूरी है। इसके लिए उत्तराखण्ड में कौशल विकास मंत्रालय खोला जा रहा है।

लिंग अनुपात में पिथौरागढ का नाम आंठवें स्थान पर

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आधी आबादी को लेकर पिथौरागढ़ जिले की तस्वीर बेहद डरावनी है। बेटियों की तादात जिले में तेजी से घट रही है। लिंगानुपात के मामले में देश के सबसे संवेदनशील जिलों में शामिल हो गया है। जिला देश के दस सबसे संवेदनशील जिलों में आठवें स्थान है। ताजा आंकड़ों ने प्रशासन की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी है। प्रशासन ने बेटियों की संख्या में इजाफे के लिए 27 मई तक विस्तृत कार्ययोजना बनाने का काम शुरू कर दिया है।

जिले में वर्तमान में लिंगानुपात का आंकड़ा प्रति 1000 पुरुषों पर 914 महिलाओं का है। स्वास्थ विभाग का यह आंकड़ा डराने वाला नहीं है, दरअसल 0 से 6 आयु वर्ग के बच्चों के आंकडे़ डरावने हैं। यह आंकड़ा प्रति एक हजार बालकों पर 800 से भी कम बालिकाओं तक पहुंच चुका है। यही असली चिंता का विषय है, इसी के चलते जिले को देश के दस सबसे संवेदनशील जिलों में आठवें स्थान पर रखा गया है।

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जिलाधिकारी सी.रविशंकर ने शनिवार को प्रसव पूर्व निदान टास्क फोर्स की बैठक बुलाई। जिलाधिकारी ने बालिकाओं की घटती संख्या के मामले में देश भर में जिले का आठवें स्थान पर होना गंभीर मामला बताया। डीएम ने स्वास्थ विभाग को 27 मई तक बालिकाओं की संख्या में इजाफा करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने जिले में लगाए गए अल्ट्रासाउंड केंद्रों में ट्रेकिंग डिवाइस लगाए जाने के साथ ही समय-समय पर इन केंद्रों का निरीक्षण करने के निर्देश अधिकारियों को दिए।

सीमांत जिले के अंतर्गत आठ विकास खंड हैं। इन विकास खंडों में मूनाकोट, कनालीछीना और गंगोलीहाट में बेटियों की संख्या घट गई है। स्वास्थ विभाग ने फिलहाल इन विकास खंडों के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। पीसीपीएनडीटी की बैठक में मुख्य चिकित्साधिकारी डा. ऊषा गुंज्याल ने इसकी जानकारी दी।

पैकेजिंग फैक्ट्री में आग, पांच करोड का नुकसान

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सिडकुल,रुद्रपुर के सेक्टर 11 स्थित शिवशक्ति बायो टेक्नोलॉजी में पैकेजिंग मशीन में ब्लास्ट के बाद लगी आग से पूरी फैक्ट्री जल गई। दमकल कर्मियों ने दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। प्रबंधन ने आग से लगभग पांच करोड़ के नुकसान बताया है।

सिडकुल स्थित बायो प्रोडक्ट बनाने वाली शिवशक्ति फैक्ट्री में रोज की तरह शनिवार को भी काम चल रहा था। इसी दौरान पैकेजिंग मशीन के गर्म हो जाने से ब्लास्ट हो गया और मशीन ने आग पकड़ ली। मशीन के पास ही गत्ते और पैकेजिंग के लिए रखी प्लास्टिक की बोतलों ने आग में घी का काम किया और देखते ही देखते आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। फैक्ट्री मैनेजर मुनीर अहमद ने तुरंत इसकी सूचना दमकल विभाग को दी और अपने स्तर से आग बुझाने में जुट गए। दमकल कर्मियों के पहुंचने तक आग ने फैक्ट्री को पूरी तरह से अपनी चपेट में ले लिया। देखते ही देखते आग की लपटें आसमान छूने लग गई। इससे आसपास की फैक्ट्रियों के कर्मचारियों में भी हड़कंप मच गया। दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका। फैक्ट्री प्रबंधक मुनीर अहमद ने बताया कि फैक्ट्री में लगभग तीन करोड़ की मशीनें थीं, जो पूरी तरह से जल चुकी हैं। स्टॉक से लेकर पूरा सामान और फैक्ट्री का पूरा इंफ्रास्टक्चर जल गया है। जिसमें लगभग पांच करोड़ के करीब नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है।

आग की सूचना पर अग्निशमन विभाग हरकत में आ गया। सिडकुल के दो वाहनों के साथ ही दो वाहन रुद्रपुर तथा एक टाटा और एक दमकल वाहन बजाज कंपनी का भी आग बुझाने में जुट गया। छह वाहनों की कड़ी मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका। जिस समय फैक्ट्री में आग लगी इस दौरान अंदर चार गैस सिलेंडर भी पड़े हुए थे। आसपास मौजूद लोगों ने किसी तरह सिलेंडरों को बाहर निकाला। अगर सिलेंडर आग पकड़ लेते और ब्लास्ट होता तो उससे आसपास की फैक्ट्रियों को भी खतरा पैदा हो जाता।

फैक्ट्री में जब आग लगी तो उस दौरान अंदर 23 लोग पैकेजिंग का काम कर रहे थे। आग लगने के बाद सभी सकुशल बाहर निकलने में सफल हो गए।गोदाम के अंदर आग धधक रही थी। विद्युत आपूर्ति ठप हो जाने के कारण घुप अंधेरा था। इस पर जेसीबी की व्यवस्था कर उसे फैक्ट्री के मुख्य गेट पर लगा कर उसकी लाइट से उजाला करने के बाद दमकल कर्मी अंदर गोदाम में धधक रही आग पर काबू पाने में डटे रहे।

तीन तलाक से एक और घर बर्वाद

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एक महिला ने अपने पति पर जबरन तलाक देकर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। पीछा न छोड़ने पर जान से मारने की धमकी दे रहा है। बताया पति दूसरी महिला से निकाह की तैयारी में है। महिला ने न्याय न मिलने पर पीड़ित महिला ने आत्महत्या की चेतावनी दी है।

मुजफ्फर नगर केलाखेड़ा निवासी शमीम शमीम की शादी वर्ष 2004 में ग्राम डौंगपुरी निवासी आसिफ के साथ ही हुई। उसके एक पुत्र आयान अली (11) एवं दो पुत्रियां आईना (8) और खुशी (6) हैं। शमीम ने आरोप लगाया कि निकाह के बाद से आसिफ उसे कम दहेज लाने पर आए दिन प्रताड़ित करता रहता था। निकाह के चार साल बाद पति ने दबाव बनाकर तलाक दे दिया, लेकिन एक वर्ष दोबारा निकाह कर लिया। निकाह के बाद आसिफ ने शमीम को दहेज की मांग को लेकर मारपीट करने लगा। दहेज न देने पर फिर से तलाक की धमकी देने लगा।

इस संबंध में उसने पुलिस से शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। महिला ने आरोप लगाया कि उसके पति ने तलाकनामा लिखवाकर उससे हस्ताक्षर करवा लिए। उसने नेताओं से लेकर अधिकारियों के यहां चक्कर लगाकर मदद की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। महिला ने बताया कि 20 अप्रैल को बाल कल्याण एवं महिला हेल्प लाइन से भी मदद की गुहार लगाई। जहां दोनों के बीच किसी भी बात पर सहमति न होने पर कोर्ट में जाने को कहा गया। इस बीच पता चला कि आसिफ दूसरी शादी कर रहा है। इस पर उसने गदरपुर थाना पुलिस से कार्रवाई की मांग की, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। महिला ने चेतावनी दी कि अगर समय रहते न्याय न मिला तो वह खुदकुशी कर लेगी।

दून की भीड़ में खोया हुआ एक ”टिल्टेड मंदिर”

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रोमांच और खुशनुमा मौसम के लिए मशहूर देहरादून शायद एक ऐसा शहर है जिसके आसपास कुछ ऐसी जगह है जो पल भर में आपको भीड़-भाड़ और ट्रेफिक से दूर कर देती है और शांति के बीच ले जाता है।

एक ऐसी ही जगह है देहरादून की ओल्ड मसूरी रोड पर स्थित। ओल्ड मसूरी रोड पर लगभग 200मीटर आगे आपकी बाईं तरफ एक बहुत ही पुराना मंदिर दिखता है। देखने में नया दिखने वाला यह पीला गुलाबी मंदिर 1800 शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा राजपुर के ओल्ड मसूरी रोड पर काम करते हुए दोबारा ढ़ूंढा गया था। इस मंदिर की खास बात है इसका टेढ़ापन, जी हां यह मंदिर टेढ़ा है। इस मंदिर के बारे में ना तो गूगल पर कुछ है ना ही किसी को इसके बारे में ज्यादा जानकारी है। लेकिन बहुत खोज करने पर जो थोड़ा बहुत मिला वह इस प्रकार है।

ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर बहुत साल पहले किसी लैंडस्लाईड में दब चुका था लेकिन भगवान में श्रद्धा रखने वाले श्रद्धालुओं ने इसे दोबारा ढ़ूंढा और इस मंदिर की मरम्मत करा अाज भी इसमें भगवान की पूजा पाठ होती हैं।

मंदिर में पूजा करता श्रद्धालु
मंदिर में पूजा करता श्रद्धालु

प्राचीन समय का यह मंदिर उस समय एक खाली जगह पर बना हुआ भजन स्थल था जहां आसपास की औरतें मिलकर भजन गाया करती थी। समय बीतने के साथ इस जगह पर भगवान शिव की मूर्ति की स्थापना कर दी गई और आसपास के लोगों के अनुसार बारिश,पानी और मौसम के बदलाव को देखते हुए दिल्ली की एक महिला टूरिस्ट ने इसपर छत डलवा दी। तब से आज तक यह मंदिर अभी भी बरकरार है। एक औरत हर रोज इस मंदिर की सफाई करती है और इसमें ज्योत जलाई है, पुजारी जी सुबह से शाम तक यहाँ बैठे रहते है। मसूरी रोड पर सफर करने वाले लोग इस मंदिर को अक्सर देखते होंगे लेकिन शायद ही किसी को यह सब पता होगा।

इस मंदिर की यह बनावट कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि प्रकृति की शक्ति से बढ़कर भी एक शक्ति है जिसने भारी लैंडस्लाईड के बाद भी इस मंदिर को ज्यों का त्यों खड़ा रखा है। एक और बात जो खास है इसको बनाने वाले यानि की उसकी प्राचीन संरचना जिसमें इतनी ताकत थी कि मंदिर टेढ़ा हो गया लेकिर ढ़हा नहीं।

बावड़ी
बावड़ी

मंदिर के सामने गांव वालों से पूछने पर पता चला कि वह लोग इस मदिर को ”शिव बावड़ी मंदिर” कहते हैं क्योंकि मंदिर के पीछे एक पुरानी बावड़ी है। मंदिर में शिव जी की प्रतिमा के साथ ही, मां दुर्गा, हनुमान जी और भी देवी देवाताओं की मूर्ति है। मानने वाले आज भी इस मंदिर में बैठ कर पूजा-पाठ,भजन अर्चना करते हैं।

तो अब जब आप अगली बार ओल्ड मसूरी रोड से गुजरे तो इस मंदिर की तरफ देखें तो एक बार मथ्था टेक कर जरुर जाएं।

पहाडों पर पीने के लिए पानी का हाहाकार

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बीते दो दिनों में हुई भारी वर्षा के बाद चरमराई अल्मोड़ा नगर की जलापूर्ति व्यवस्था। गत दिवस कोसी में गाद आने से बंद हुए पंप कल सुबह चल सके। इससे नगर में आंशिक जलापूर्ति हुई। दो दिन से मोहल्लों में बारी-बारी से पानी मिल रहा है। ऐसे में लोग पेयजल किल्लत का सामना कर रहे हैं।

नगर की पेयजल आपूर्ति लगभग 12 किमी दूर कोसी से बनी पंपिंग पेयजल योजना पर निर्भर है। जलापूर्ति गत बुधवार से तब प्रभावित हो चली, जब बुधवार अपराह्न अचानक मौसम ने करवट बदली और क्षेत्र में जबर्दस्त बारिश हुई। भारी वर्षा से कोसी नदी का जलस्तर बढ़ चला और बड़ी मात्रा में बहकर सिल्ट आई। यह सिल्ट कोसी स्थित पंप गृह के पंपों में घुसने लगी, जिससे पंपों को खतरा पैदा हो गया और कोसी में लगे तीनों पंप बंद करने पड़े। इसी बात की पुनरावृत्ति गुरुवार अपराह्न भारी वर्षा से हो गई। पिछले दो दिनों में पंपिंग मशीनें पूरी रात ठप रही। इससे नगर में स्थित तीन जलाशयों में पानी उपलब्ध नहीं हो सका। गुरुवार को सुबह छह बजे से अपराह्न दो बजे तक ही पंप चले। इस अवधि में जलाशयों में कुछ पानी उपलब्ध हुआ, तो चंद मोहल्लों में उसकी आंशिक आपूर्ति की गई। इसी तरह शुक्रवार को भी सुबह से पंप चले। ज्यों-ज्यों जलाशयों में पेयजल उपलब्ध होता रहा।

वैसे ही पहले दिन वंचित मोहल्लों में बारी-बारी से जलापूर्ति हुई, मगर यह भी अपर्याप्त व अनियमित रही। शुक्रवार अपराह्न बाजार क्षेत्र, धारानौला क्षेत्र व मालरोड इलाके में आपूर्ति की गई, मगर जिन मोहल्लों में गुरुवार को आंशिक आपूर्ति हुई, उनकी बारी नहीं आ सकी। नगरवासी दो दिन से पेयजल के लिए मुश्किल झेल रहे हैं। घर में एकत्रित पानी व आसपास मौजूद स्रोतों व नौलों की शरण ले रहे हैं।

कोसी पंपिंग पेयजल योजना नगर व उससे लगे चंद गांवों की करीब 1.25 लाख की आबादी की पेयजल का आधार है। इसके लिए नगर में करीब 8580 जल संयोजन और 40 जल स्तंभ हैं। महज बरसात में ही दिक्कत नहीं है, बल्कि मांग तो पहले से ही अधूरी है। इतनी आबादी के लिए 14 एमएलडी पेयजल की मांग है, मगर सामान्य स्थिति में भी योजना 6 से 8 एमएलडी (मिलीयन लीटर प्रतिदिन) ही आपूर्ति हो रही है। बरसात में इतनी भी नहीं हो पाती। इसकी वजह से योजना का आवश्यकता के अनुसार पुनर्गठन नहीं होना और घिसी-पिटी व्यवस्था के सहारे बैठे रहना। इसके अलावा राइजिंग मेन के लीकेज तक दूर नहीं हो पा रहे हैं। ये हालात व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं।

बारिश में कोसी में सिल्ट आना और जलापूर्ति बंद होने का यह सिलसिला पुराना है। इसे लोग व्यवस्था की कमजोरी मान रहे हैं। दो दिन भारी वर्षा हुई, तो दोनों ही दिन जलापूर्ति व्यवस्था चरमरा गई। शुक्रवार अपराह्न भी आसमान बादलों से पट गया। जिससे बारिश के आसार बने रहे। स्थिति ये है कि बारिश होने की संभावना से ही पेयजल संकट की चिंता सताने लग रही है। गत वर्ष भी बरसात में ऐसा ही रोना आए दिन लोगों ने झेला।

ईई जल संस्थान नंदकिशोर नदी में बताया कि सिल्ट आने से दिक्कत आ रही है। पंपों के संचालन में खलल से जलापूर्ति में बाधा आई है। फिर भी आपूर्ति करने के पूरे प्रयास हो रहे हैं और पंप संचालन में दिक्कत नहीं आने की दशा में पेयजलापूर्ति नियमित ढंग से चलती रहेगी।

मौसम विभाग ने चारधाम यात्रियों को दी सावधानी बरतने की सलाह

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उत्तराखंड में सोमवार को कई जगह हल्की से मध्यम दर्जे की बारिश हो सकती है। चूंकि चारधाम रूट पर पहले से ही बारिश हो रही है, इसलिए मौसम विभाग ने यात्रियों को पूरी तैयारी के साथ ही यात्रा पर जाने की नसीहत दी है।

देहरादून मौसम केंद्र के निदेशक बिक्रम सिंह के मुताबिक सोमवार को प्रदेश में कई स्थानों पर गरज–चमक के साथ बारिश हो सकती है। इसके बाद मंगलवार, बुधवार को भी अधिक ऊंचाई वाले जिलों में छिटपुट बारिश की संभावना है।बिक्रम सिंह के मुताबिक चारधाम यात्रा मार्ग पर रुक–रुक कर बारिश हो रही है, इससे कई जगह अचानक भूस्खलन का खतरा बना हुआ है। इसलिए यात्री स्थानीय प्रशासन के साथ तालमेल बनाए रहें, साथ ही गरम कपड़े और जरूरी तैयारी के साथ ही यात्रा पर निकलें। इधर, शनिवारको दून का अधिकतम तापमान सामान्य से एक डिग्री अधिक 36.8 डिग्री दर्ज किया गया।

देहरादून अौर अास पास में रविवार को बारिश हुई, जिस कारण तापमान में गिरावट दर्ज की गई।

गंगा के ‘जीवित व्यक्ति’ दर्जे को चुनौती देगी उत्तराखंड सरकार

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गंगा और यमुना को ‘जीवित व्यक्ति’ का दर्जा दिए जाने के राज्य हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। राज्य सरकार ने इसके पीछे ‘तकनीकी, भौगोलिक और प्रशासनिक’ कारणों का हवाला दिया है। राज्य सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट के फैसले को लागू करना मुश्किल है क्योंकि ये नदियां पांच राज्यों से होकर गुजरती हैं।

शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि राज्य सरकार ने केंद्र से सुप्रीम कोर्ट जाने की सहमति मांगते हुए पत्र लिखा है। इस साल 20 मार्च को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भारत की दो सबसे पवित्र माने जाने वाली नदियों गंगा और यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया था।

कौशिक ने बताया, ‘मैं यह साफ कर दूं कि हम दो पवित्र नदियों गंगा और यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिए जाने के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन गंगा और यमुना को जीवित व्यक्ति का दर्जा देते हुए हाई कोर्ट ने उत्तराखंड के प्रमुख सचिव, नमामि गंगे के निदेशक और राज्य के ऐडवोकेट जनरल को दोनों नदियों का कानूनी अभिभावक नियुक्त कर दिया है।’ उन्होंने कहा, ‘अगर गंगा और यमुना यूपी, बिहार या बंगाल में प्रदूषित होती हैं तो इसमें राज्य के प्रमुख सचिव कैसे जिम्मेदार हो सकते हैं? हम केवल अपने विचार सुप्रीम कोर्ट में रखना चाहते हैं।’

इसके साथ ही उत्तराखंड के पीसीसी चीफ प्रीतम सिंह ने कहा कि करोड़ो रुपये से केंद्र सरकार ने नमामि गंगा और स्वच्छ गंगा अभियान शुरु किया और अब जब हाईकोर्ट ने गंगा को जीवित व्यक्ति का दर्जा दिया तो इससे और भी तेजी आएगी गंगा के अस्तित्व को बचाने में, लेकिन अब एक बार फिर बीजेपी सरकार इस फैसले को चुनौती दे रही, तो मुझे समझ में नहीं आ रहा सरकार आखिर चाहती क्या है?