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नैनी सैनी हैलीपैड पर उतरेंगे हवाई जहाज,जानिए क्यों

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पिथौरागढ़ की नैनी सैनी हवाई पट्टी पर शीघ्र विमान सेवा शुरू हो जाएगी। तेज रफ्तार वाले विमानों को उतारने के लिए हवाई पट्टी का रन-वे उपयुक्त पाया गया है। इसे रविवार को भारतीय विमान पत्त्तनम प्राधिकरण दिल्ली की ओर से जीपीएस उपग्रह से लैस गियरलेस स्वीडिश वाहन ने परखा।

स्वीडिश वाहन शनिवार को पिथौरागढ़ पहुंचा। रविवार को रन-वे पर हाई स्पीड विमान के उतरने पर होने वाले घर्षण की जांच की गई। वरिष्ठ अधीक्षक विक्रम सिंह, सुपर वाइजर कुलदीप सिंह, वरिष्ठ अधीक्षक धर्मवीर और तकनीकी विशेषज्ञ विनोद कुमार ने सुबह से नैनी सैनी हवाई पट्टी रन-वे में घर्षण परीक्षण को मापने की कवायद प्रारंभ की थी। इस मौके पर 1600 मीटर के रन वे पर 100 से लेकर 150 किमी प्रति घंटा तक के विमानों के उतरने की जांच की गई।

जांच के दौरान विशेषज्ञों ने पट्टी का हाइड्रोलिक प्रेशर एवरेज उपयुक्त बताया है। यह दल अब अपनी रिपोर्ट एयरपोट ऑथारिटी ऑफ इंडिया को सौंपेगा। उन्होंने बताया कि रन वे की घर्षण क्षमता को नापने आए जीपीएस उपग्रह से लैस स्वीडिश वाहन को ट्रॉले में लाया गया था। विशेषज्ञों ने बताया कि देश में अभी तक सभी जगहों पर इस वाहन के चलने योग्य सड़क नहीं होने से ट्राले में लाया जाता है।

 

इन्सानियत के हैवानों की करतूत

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बकरी ने पड़ोसी की घास क्‍या खा ली, इस पर पड़ोसी आग बबूला हो गया। उसने पहले बकरी को मार मार कर अधमरा कर दिया, फिर 12 साल के बच्‍चे को फंदे से लटका दिया। लेकिन तभी बच्‍चे की मां घर आ गई।

जनपद अल्मोड़ा के सल्ट ब्लॉक के ग्राम जक्खल, पोस्ट ऑफिस जामनी, निवासी चिमली देवी की बकरी ने गांव में किसी के घर के बाहर रखी घास को खा लिया। इससे नाराज गांव के ही दो लोगों ने बकरी को मार मार कर अधमरा कर दिया था। चिमली देवी ने उनके घर जाकर बकरी को मारने पर नाराजगी जताई, इस बीच उनमें काफी कहासुनी हो गई।

इसके बाद चिमली देवी घर आकर पानी लेने चली गई। घर में उसका 12 वर्षीय बेटा नरोत्तम पुत्र स्वर्गीय गुणाराम अकेला था। आरोप है कि बकरी को मारने पर विरोध जताने से नाराज दोनों लोग उसके घर आए। यहां नरोत्तम के गले में फंदा डाल उसे फांसी पर लटका दिया।

इसी बीच बच्चे की मां चिमली देवी घर आ गई। इस दोनों आरोपी वहां से भाग गए। चिमली देवी ने बच्चे के गले से फांसी का फंदा निकाला। गांव के प्रधान की मदद से बच्चे को सल्ट देवालय में स्वास्थ्य केंद्र ले गए, जहां से उसे रामनगर चिकित्सालय लाया गया। उसकी हालत गंभीर बनी हुई है।

कहर बरपा रही बारिश

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पिथौरागढ़ जनपद में चार दिनों से थमी वर्षा ने सोमवार को कहर बरपाया। सवा घंटे की जोरदार बारिश में जनजीवन थम गया। मुनस्यारी के तल्ला जोहार में हरड़िया नाले से आए मलबे ने सदावाहिनी रामगंगा नदी का प्रवाह थाम दिया। नदी में विशाल झील बन गई। इससे तटवर्ती लोगों में हड़कंप मच गया, शुक्र रहा कि कुछ ही देर बाद नदी का प्रवाह खुल गया वरना बड़ी तबाही की आशंका बन गई थी।

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय पर आधा दर्जन से अधिक पेड़ उखड़ गए। जिनकी चपेट में आने से एक मकान, एंबुलेंस सहित पांच वाहन क्षतिग्रस्त हो गए हैं। आसमान आधे घंटे तक और बरसता तो पिथौरागढ़ नगर में ही भारी तबाही हो जाती। आधा दर्जन स्थानों वृक्ष गिरने से नगर की सड़कों पर यातायात बंद हो गया है।

पिथौरागढ़-झूलाघाट मार्ग पर पेड़ गिरने से यातायात को बंद हो गया है। भाटकोट रोड, चिमिस्यानौला, पुराना बाजार आदि क्षेत्रों में नालियों का पानी सड़कों पर आ गया। नगर की सड़कें पानी से लबालब भर गईं।  डॉट पुल के पास जलभराव हो गया। जिस कारण यहां पर वाहन फंसे रहे। अफसर कालोनी को जाने वाले भाटकोट रोड में नाला बन गया। रई में एक मकान पर पेड़ गिर गया। रई नाला ऊफान पर आने से नाला किनारे के मकानों में रहने वाले लोगों ने मकान छोड़ दिया।

नाचनी बाजार में सभी मकानों और गोदामों में मलबा घुस गया है। नाचनी से एक किमी दूर सिमगड़ा गांव में तबाही मच गई। कई मकान मलबे और पानी से भर गए। परिवारों ने घरों से बाहर दौड़ लगा दी। थल-मुनस्यारी मार्ग में जगह-जगह मलबा आ गया है। बारिश और अंधंड़ से किसी तरह की जन और पशु हानि की कोई सूचना नहीं है। भारी मलबा आने से नाचनी-बांसबगड़ और लोध मार्ग बंद हो गए हैं। मार्ग बंद होने से एक दर्जन से अधिक वाहन फंसे हैं। लोग पैदल अपने गांवों को जा रहे हैं।

वह भूतिया गांव जिसने चीड़ के पेड़ों को बचाया

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एक छोटे से हरे रंग की परिदृश्य में, पहाड़ी के पास नुना गांव अपने खूबसूरत, घने हरियाली वाले पेड़ों के लिए जाना जाता है। यह एक हिमालयी ओक का जंगल है जिसे कई दशकों तक ग्रामीणों द्वारा उगाया और विकसित किया गया है।

नूना, अल्मोड़ा जिले के उन गांवों में से एक हैं जहां बारहमासी पानी का श्रोत बहता है। जब पड़ोसी गांव के श्रोत गर्मियों में सूख जाते हैं तब नुना, तक लोग पानी भरने अाते है। नुना वन पंचायत के पूर्व सरपंच 72 साल के देवी दत्त, का कहना है कि इस गांव ने तस्करों, ठेकेदारों और व्यवसायियों से जंगलों को दूर रखने के लिए बहुत लड़ाई लड़ी है। आज, भी गांव के बड़े-बुजुर्ग इसका ध्यान रख रहे हैं।

लेकिन नूना के खूबसूरत जंगल यहां के जवान यानि नई पीढ़ी को रोकने में नाकामयाब रहा हैं। यह उत्तराखंड के उन गांवों में से है जो भूतिया गांवों की श्रेणी में आता हैं। जर्जर और खाली टूटते मकान के मालिक अच्छी जिंदगी और शिक्षा के लिए अपने गांवों से दूर शहर में बस गए हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में वन पंचायत वो समुदाय हैं जो जंगल के प्रबंधन वाले वन संस्थान हैं। दत्त ने बताया कि उन्होंने बढ़ती उम्र की वजह से वन सरपंच के पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि जंगलों को बचाने के लिए बहुत भागदौड़ और बहुत एलर्ट रहने की आवश्यकता होती है।

दत्त बताते हैं कि जब मैं सरपंच था, ठेकेदारों ने मुझसे जंगल के बीच से एक सड़क काटने के लिए 10 लाख रुपये की पेशकश की थी। हमने उन्हें सड़क का रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। कुछ लोग बिस्किट कारखाने के लिए यहां जमीन चाहते थे, हमने उन्हें भी बाहर निकाल दिया।” दत्त कहते हैं, कि तस्कर रात में आते हैं और वे पेड़ों को काटने के लिए मशीन का उपयोग करते हैं, न कि एक कुल्हाड़ी जिसे आप बहुत दूरी से सुन सकते हैं।”

भारतीय विज्ञान संस्थान के वन-विशेषज्ञ एन एच रविंद्रनाथ के अनुसार, हिमालयी ओक एक देसी प्रजाति है। “यह मिट्टी, कीड़े और स्थानीय जलवायु के लिए अनुकूल है। इसकी नमी बरकरार रहती है और तत्काल पानी की कमी से बचाती है।”

लोक चेतना मंच के अध्यक्ष जोगिंदर बिष्ट कहते हैं कि, “स्थानीय लोग ओक को इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि यह बेहतर लकड़ी और चारा देता है, अच्छी गुणवत्ता वाला हयूम्स (कार्बनिक पदार्थ) बनाता है और कटाव को रोकता है।”

पर्यावरण संरक्षण को जीवित करेगी फिल्म ”दि विशिंग ट्री”

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दि विशिंग ट्री (कल्पवृक्ष), एक ऐसी फिल्म है जो लोगों के अंदर एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण की भावाना को जगा देगी, यह फिल्म जल्दी ही सैल्यूलाॅइड यानि की फिल्मी रील पर दिखाई देगी। आपको बतांदे कि पर्यावरण संरक्षण पर बनी यह फिल्म आने वाले 9 जून को रिलीज होगी। इस फिल्म की डायरेक्टर देहरादून की मनिका शर्मा है, और इस फिल्म को यूनियन इंवारनमेंट और फारेस्ट मिनिस्ट्री से भी सहयोग मिला है।

इस फिल्म की अदाकारा अनुभवी अभिनेत्री शबाना आज़मी हैं जो पर्यावरण की भावना के रूप में अभिनय कर रही हैं।भारतीय सिनेमा के महानायक अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म में अपनी आवाज़ दि विशिंग ट्री यानी कल्पवृक्ष को दी है। यह फिल्म, 6000 साल पुरानी कल्पवृक्ष और विशिंग ट्री के चारों ओर घूमती है और इसमें पांच बच्चों का किरदार किस तरह से इस पेड़ से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ हैं और कैसे यह एकजुट होकर अपने जादुई पेड़ को विनाश से बचाते हैं यह दिखाया गया है।

लेखक-फिल्म निर्माता जिनके माता-पिता देहरादून के रहने वाले हैं उन्होंने कहा कि, “इस फिल्म का विचार मेरे दिमाग में तब आया जब मैं कनाडा में 1000 साल पुराने पेड़ को गले से लगा रही थी। मुझे लगा कि इसमें कुछ तो ऐसा है जो मुझे कुछ हटकर करने पर मजबूर कर रहा और मैं तुरंत इस कहानी को बताने के लिए उत्सुक महसूस करने लगी।”

मेरे रिसर्च के दौरान मुझे बहुत से पुराने पेड़ो के बारें मे पता चला, जिनमें से एक पेड़ 5 हजार साल पुराना है जो अभी भी केलिफाॅर्निया में हैं, मुझे इससे भी फिल्म को बनाने में प्रेरणा मिली। शबाना आजमी के अलावा इस फिल्म में बहुत से नायाब सितारे काम कर रहे जैसे कि मकारांद देशपांडे, सौरभ शुक्ला, रंजीत कपूर और शेरनाज़ पटेल। दुनिया के कुछ बेहतरीन टेक्निशियन ने इस फिल्म में विजुवल इफ्केट दिया है।

फिल्म के निर्देशक ने कहा कि, “यह पेड़ों के लिए मेरी श्रद्धांजलि है और मुझे उम्मीद है कि यह लोगों, विशेषकर बच्चों को एक बार फिर से अपनी जन्मभूमि प्रकृति से जोड़ने का काम करेगा।” आपको बतादें कि इस फिल्म की चर्चा नेटफिल्क्स, इंटरनेट स्ट्रीमींग सर्विस व दुनिया के कोने कोने में लगभग 30 अलग-अलग भाषाओं में चला रहा है।

शर्मा ने कहा कि, “मैं हमेशा मानती हूं कि सिनेमा को सामाजिक परिवर्तन के लिए एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। पर्यावरण जागरूकता और मानवता की चिंता जैसे सभी मुद्दों के लिए आवाज उठाने के लिए फिल्मों का इस्तेमाल करना चाहिए।”

फिल्म का एक और देहरादून कनेक्शन –

शर्मा ने कहा, “मैं हमेशा देहरादून में आती हूं। यह एक ऐसी जगह जो मुझे बहुत प्रेरित करती है, मैं यहां के वातावरण और यहां के राजसी पेड़ों को धन्यवाद देती हूं। मेरे माता-पिता 2008 में देहरादून आ गए थे और तब से, जब भी मैं विश्राम लेना चाहती थी, मैं हमेशा देहरादून आती हूं।”

गंगा की आवाज को लोगों तक पहुंचा रहीं रिटायर्ड प्रोफेसर अंजली कपिला

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पूज्यनीय मां गंगा को निर्मल एवं स्वच्छ बनाए रखने के लिए लेडी इरविन कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर अंजली कपिला आगे आई हैं। प्रो. कपिला विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ गोमुख से हरिद्वार तक गंगा की आवाज (बहाव के सुरों) को गीतों के माध्यम से समेटने का प्रयास कर रही हैं। गढ़वाली समेत अन्य भाषाओं में रचित गीतों के माध्यम से वह युवा पीढ़ी को गंगा एवं पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से जोड़ने में जुटी हैं।

शनिवार को हिमालय सेवा संघ की ओर से विश्वनाथ चौक के पास रेडक्रॉस भवन में आयोजित प्रेस वार्ता में प्रो. अंजली कपिला ने बताया कि गंगा की आवाज को समेटने की मुहिम में हिमालय सेवा संघ, उत्तराखंड जन जागृति संस्थान व हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान के पदाधिकारी उनके साथ जुड़े हैं। इसके अलावा छात्र-छात्राएं, सामाजिक कार्यकर्ता, संस्कृति प्रेमी और स्थानीय लोगों को भी मुहिम से जोड़ा जा रहा है। बताया कि उनका उद्देश्य गोमुख से लेकर गंगा सागर तक गंगा और पर्यावरण को प्रदूषणमुक्त बनाना है।

प्रो. कपिला ने बताया कि उन्होंने लोक भाषाओं में 150 गीत बनाए हैं। इन गीतों को वह गढ़वाली, देवनागरी और अंग्रेजी में लिखती हैं। इन्हें उन्होंने पुस्तिका ‘मेरी आवाज’ में संग्रहीत किया है, जिसका वर्ष 2001 में उत्तराखंड के प्रथम मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने विमोचन किया था। बताया कि गंगा और पर्यावरण संरक्षण के लिए उनका अभियान जारी रहेगा। इस मौके पर हिमालयी पर्यावरण शिक्षा संस्थान के सुरेश भाई, मनोज पांडे, अरण्य रंजन, इमला, गरिमा मेंदीरत्ता, हना, ईमली आदि मौजूद थे।

विदेशी बालाओं की चिंता में गंगा

गंगा में बढ़ता प्रदूषण भले ही भारतीयों की चिंता में पूरी तरह शुमार न हो पाया हो, लेकिन विदेशी छात्राओं इससे खासी चिंतित हैं। दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज से स्नातकोत्तर कर रही अमेरिका की दो छात्राएं ईमली और हना भी प्रो. अंजली कपिला के साथ इस मुहिम से जुड़ी हुई हैं। शनिवार को उत्तरकाशी पहुंची इन अमेरिकी छात्राओं ने बताया कि गंगा की आवाज को कैसे समेटा जाता है और उसे प्रदूषणमुक्त बनाने के लिए क्या करना चाहिए, इस पर वह संस्था के साथ मिलकर अध्ययन कर रही हैं।

उन्हें पहाड़ की हसीन वादियां और यहां की संस्कृति अपनी ओर खींच रही हैं। जिले में तीन सप्ताह के प्रवास के दौरान वह आसपास के गांवों में जाकर ग्रामीणों की समस्याएं जानने का प्रयास करेंगी। यह उनका सौभाग्य है कि उन्हें गंगा की आवाज मुहिम से जुड़ने का मौका मिला।

नैनीझील में स्कूली बच्चों ने चलाया अभियान

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विश्व पर्यावरण दिवस पर, नैनीताल में रैली समेत अनेक कार्यक्रम हुए। स्कूली बच्चों ने तल्लीताल से मल्लीताल तक रैली निकाली। स्कूली बच्चों ने झील किनारे मानव श्रृंखला बनाकर झील संरक्षण का संदेश दिया, साथ ही कार सेवा कर झील से मलबा भी साफ किया।

मल्लीताल में निरंकारी फाउंडेशन की ओर से आयोजित सफाई अभियान का शुभारंभ डीएम दीपेंद्र चौधरी ने किया। साथ चिल्ड्रन पार्क में पौधरोपण किया। लोगों को प्रकर्ति से जुड़ने और संरक्षण की शपथ दिलाई।

वन विभाग की ओर से भी रैली निकाली गई। रैली में डीएफओ धर्म सिंह मीणा,  मुख्य शिक्षा अधिकारी केके गुप्ता, सीडीओ प्रकाश चंद्र, तहसलिदार प्रियंका रानी, ईओ रोहिताश शर्मा समेत अन्य थे। चिड़ियाघर में स्कूली बच्चों को मुफ्त में वन्य जीवों का दीदार कराया।

विश्व पर्यावरण दिवस पर पीसीसी चीफ प्रीतम सिंह ने किया वृक्षारोपण

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उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष श्री प्रीतम सिंह ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर गांधी पार्क में वृक्षारोपण कर प्रदेशवासियों को पर्यावरण दिवस की बधाई देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति  का दायित्व बन जाता है कि राज्य को हराभरा बनाने के लिए आज के दिन वृक्षारोपण करना चाहिए। आज विश्व में पर्यावरण संतुलन के लिए अनेक प्रकार के शोध किये जा रहे है। वृक्षारोपण करना महान कार्य है, इस कार्य को करने से न केवल हम पर्यावरण संतुलन में अपना योगदान देते है बल्कि समाज को भी वृक्षारोपण कार्य से जोडते है।

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श्री प्रीतम सिंह ने कहा उत्तराखण्ड विश्व में सबसे अधिक पर्यावरण संरक्षण का काम करता है। हमारे प्रदेश में 67 प्रतिशत वन एवं 18 प्रतिशत हिमछादित क्षेत्र है। सबसे अधिक जल संरक्षण का काम भी देवभूमि उत्तराखण्ड ही करती है। वन एवं हिमखण्डों को सुरक्षित रखना हम सबका धर्म है। श्री प्रीतम सिंह ने प्रदेश की जनता का आह्वान करते हुए कहा कि पर्यावरण की रक्षा एवं भूगर्भजल स्रोतों को संरक्षित करने में अपना योगदान दें, ताकि प्रदेश अधिक से अधिक पर्यावरण की रक्षा में अपना योगदान दे सके।

 

मेडिकल माउंटेनियर दल ने सबसे ऊंचे ”सतोपंथ शिखर” पर फहराया तिरंगा

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इंडियन मेडिकल पर्वतारोही दल ने गंगोत्री हिमालय क्षेत्र के सबसे ऊंचे सतोपंथ शिखर (7075 मीटर) पर तिरंगा फहराकर अपने जोश एवं जज्बे का परिचय दिया। लौटते हुए इस दल ने वासुकी ताल से लेकर भोजवासा तक नमामि गंगे के तहत स्वच्छता अभियान भी चलाया।

आइएमएफ (इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन) युवा अभियान और केंद्रीय खेल मंत्रालय की ओर से आयोजित मेडिकल पर्वतारोही अभियान के 17 सदस्यीय दल को केंद्रीय खेल मंत्री विजय गोयल ने नौ मई को झंडी दिखाकर गंगोत्री के लिए रवाना किया था। 11 मई को यह दल गंगोत्री से सतोपंथ के लिए रवाना हुआ।

हार्डिंग मेडिकल कॉलेज नई दिल्ली के प्रोफेसर अनिल गुत्तू के नेतृत्व में पर्वतारोही दल ने 29 मई को सतोपंथ शिखर का आरोहण किया और वहां तिरंगा फहराया। इस दौरान मेडिकल दल ने अध्ययन किया कि अभियान में नॉन-मेडिकल पर्वतारोही कैसे सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा ट्रेकर्स को प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण, अधिकतम ऊंचाई पर दवा का इस्तेमाल, नेतृत्व व सफल पर्वतारोहण जैसे बिंदुओं पर भी अध्ययन किया गया।

सतोपंथ से लौटते हुए दल के सदस्यों ने वासुकीताल, गोमुख व भोजवासा में फैले कूड़े को एकत्र कर उसे गंगोत्री तक पहुंचाया। दल के कुछ सदस्यों ने भोजवासा से भैरोंघाटी तक निम (नेहरू पर्वतारोहण संस्थान) के प्रशिक्षक रहे सी.नोरबू की याद में एक्सपेडिशन ट्रेल रेस में भी भाग लिया। उन्होंने यह दौड़ चार घंटे 52 मिनट में पूरी की।

निम पहुंचने पर संस्थान के प्रधानाचार्य कर्नल अजय कोठियाल ने दल के सदस्यों का स्वागत किया। उत्तरकाशी के पीतांबर सिंह पंवार ने बताया कि इस मेडिकल दल ने उत्तरकाशी के हाई लैंड ट्रैक एंड टूर के तत्वाधान में सतोपंथ शिखर का सफल आरोहण किया।

 

मन्नत पूरी होने पर झांसी से चौथी बार पैदल ”बद्रीनाथ” पहुंचा यह व्यक्ति

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इसे भगवान बदरी नारायण के प्रति आस्था ही कहेंगे कि झांसी (उत्तर प्रदेश) का एक बुजुर्ग चौथी बार पैदल ही दर्शनों को बदरीनाथ धाम पहुंच गया। यात्री का कहना है कि जब भी उसकी भगवान बदरी विशाल से मांगी मन्नत पूरी होती है, वह पैदल ही बदरीनाथ धाम पहुंच जाता है।

झांसी जिले के डगरवाहा गांव निवासी 72 वर्षीय अच्छे लाल की भगवान बदरी नारायण पर अटूट आस्था है। वर्ष 2002 में वह लगभग 850 किमी की पैदल यात्रा कर पहली बार बदरीनाथ धाम आए थे और लौटे भी पैदल ही। तब लाल जल संस्थान में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे।

कहते हैं, ‘पहली बार मैंने अपने दिव्यांग पुत्र के उज्जवल भविष्य की मनौती मांगी थी। यात्रा सफल रही और पुत्र को सरकारी नौकरी मिल गई। इसके बाद मैंने 2007 व 2009 में बदरीनाथ की पैदल यात्रा की।’ अच्छे लाल ने बताया कि इस बार 45 दिन तक की पैदल चलकर वह बदरीनाथ धाम पहुंचे हैं। उनकी पत्नी शिक्षक हैं, जबकि वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं।