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गर्भवती डाॅक्टर ने एम्स के टर्मिनेशन के खिलाफ एनसीडब्लू से लगाई गुहार

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उत्तराखंड की एक डॉक्टर ने राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) से संपर्क किया है और कहा है कि ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) ऋषिकेश ने किसी भी कारण का हवाला ना देते हुए उनकी सेवाएं समाप्त कर दी हैं, वो भी तब जब उन्होंने मैटरनिटी लीव के लिए बकायदा अप्लाई किया था।

डॉ निहारिका नैथानी धामी जो एम्स ऋषिकेश में दंत चिकित्सा विभाग में सीनियर रेजीडेंट की तरह काम कर रहीं थी, उन्होंने 9 जून को एनसीडब्ल्यू के पास एम्स के 5 अधिकारीयों सहित निर्देशक डॉ रवि कांत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई जिसमें उन्होंने मुद्दा बताया है, ‘मेरी सेवाओं को एक सीनियर रेजीडेंट के रूप में समाप्त करना, जब मैं मैटरनिटी लीव पर गयी।’

धामी, जो 35 हफ्ते की गर्भवती हैं, उन्होंने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि उनके टर्मिनेशन लेटर से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई थी। धामी ने बताया, ‘मेरा टर्मिनेशन लैटर देने से पहले मुझे मेरे काम में कोई गलती नहीं बताई गई और मेरा लेटर भी 12 मई से बनाया गया जबकि मैने 27 मई तक कार्य किया था।”

धामी ने लिखा है कि “मेरे करियर का भविष्य बेरहमी से कम कर दिया गया है। यह मुझे भावनात्मक और मानसिक रूप से बहुत परेशान कर रहा है। मैं अपने वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य और अपने अजन्में बच्चे को किसी भी तनाव से बचाने के लिए न्याय मांग रही हूं जो जुलाई के पहले सप्ताह में पैदा होने वाला है। कृपया मुझे न्याय देने में मेरी मदद करें और दावा करें कि किसी भी औरत को दोबारा इस तरह की चोट ना दी जाए”।

दंत चिकित्सा में एक मास्टर डिग्री, कंजरवेटिव और एंडोडाँटिक्स में (एमडीएस) करने के बाद धामी ने 3 अप्रैल को एम्स में ज्वाइन किया। धामी बताती है कि, ‘मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन करते समय मैं उचित चैनल के माध्यम से 29 मई को मैटरनिटी लीव पर चली गया।” धामी ने कहा, “2 जून को, मुझे अपनी सेवाओं के लिए टर्मिनेशन लैटर मिला, टर्मिनेशन लैटर से पहले इस संबंध में मेरी प्रशासन से कोई भी बातचीत नहीं हुई। दो महीने तक वहां काम करते समय मुझे किसी तरह की कोई चेतावनी भी नहीं मिली।”

कई प्रयासों के बावजूद निर्देशक को उनके संस्करण के लिए संपर्क नहीं किया जा सका,  एम्स के विभिन्न अधिकारियों से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। एम्स में उप निदेशक (प्रशासन) अंशुमन गुप्ता ने कहा कि उन्हें इस मामले की जानकारी नहीं है और “सोमवार तक इस पर टिप्पणी करने में सक्षम होगें।”

इस बीच, एनसीडब्ल्यू के सदस्य रेखा शर्मा ने कहा कि महिला पैनल को शिकायत मिली है और इस मामले की जांच के बाद ही मामले में कोई उचित कार्रवाई की जाएगी। शर्मा ने कहा, ‘हम (एनसीडब्ल्यू) ने पहले ही एम्स के अधिकारियों को एक नोटिस जारी कर दिया है और शिकायत के बारे में पूछताछ के लिए उन्हें शीघ्र ही बुला रहे हैं। हम डॉक्टर (धामी) को भी फोन करेंगे।’

धामी से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि वह अभी हल्द्वानी में हैं और अभी इस मामले पर अौर कुछ टिप्पणी नहीं करना चाहती।

क्यों आजादी के बाद भी विकास की बाट जोह रहा गांव

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हल्द्वानी। ये बात सुनने में थोड़ी सी अजीब लग सकती है कि जहां हमारे देश का बड़ा हिस्सा इस समय बारिश का इंतजार कर रहा है, वहीं कई गांव बारिश के नाम से ही डर जाते हैं। उत्तराखण्ड के हल्द्वानी शहर से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर बसा नकायल गांव भी इन्हीं गांवो में से एक है।

इस गांव के ग्रामीणों ने सड़क और पुल बनाने की मांग को लेकर सरकार पर गांव की अनदेखी करने का आरोप लगाया है, अब यहां के ग्रामीण अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर धरने पर बैठे हैं।

यहां बरसात लाती है मुसिबत
बरसात की काली रात में जब-जब बारिश की तेज बौछारों के साथ बिजली कड़कने की आवाज सुनाई देती है तो नकायल गांव के भयभीत ग्रामीण अपनी सलामती के लिए भगवान से दुआएं मांगने के लिए मजबूर हो जाते हैं। भारी बरसात के कारण हल्द्वानी तक जाने वाले संपर्क मार्ग का टूट जाना आम बात हो गई है। जिससे गांव के लोगों के लिए हफ़्तों तक खाद्य सामग्री और जरूरी सामग्री का अकाल पढ़ जाता है। नकायल गांव के लोग गांव के सड़क और सूखी नदी पर पुल बनाने की मांग को लेकर स्थानीय विधायक, अफसरों से लेकर सूबे के मुख्यमंत्री तक मिल चुके हैं लेकिन कोई भी उनकी फ़रियाद नहीं सुन रहा। ऐसे में वे जाएं तो जाएं कहां!

सरकार से लगा चुकें हैं गुहार: ग्रामीणों के मुताबिक पिछले 67 सालों से लगातार संघर्ष करने के लिए हम मजबूर है। पहाड़ों के दूरदराज़ सीमान्त इलाके की तरह जहां आज भी अखबार सुबह की बजाय शाम को पहुंचता हो, उस गांव के विकास की उम्मीद करना कितना मुश्किल है, इसका अंदाज़ा लगाना आसान नहीं है। 1952 से लेकर आज तक यहां के बाशिंदों का एक ही सपना रहा है की हल्द्वानी से नकायल गांव को जोड़ने वाली सड़क और उस पर बहने वाली सुखी नदी में पुल बनाया जाए लेकिन सपने हकीकत में नहीं बदल पाए।

आजादी के बाद भी नहीं बदली इस गांव की तस्वीर:1953 से गांव की कई पीढ़ियां सपने देख-देख गुजर गईं लेकिन आज तक ना ही सड़क का निर्माण हुआ है और ना ही सुखी नदी में पुल का निर्माण हो पाया है। स्थानीय लोगों की मानें तो पहाड़ों में हल्की बरसात से सूखी नदी अपना तांडव मचाना शुरू कर देती है। ऐसे में यहां के लोगों का संपर्क शहर से टूट जाता है। यही नहीं नदी के उफान की वजह से लोग जहां के तहां फंस जाते हैं। स्कूल के बच्चों को तो बरसात के दिनों में तीन-तीन माह स्कूल की छुट्टी करनी पड़ती है।

बरसात में नहीं जा पाते स्कूल:बरसात में करीब दो माह के लिए बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं और इससे उनकी पढाई भी प्रभावित होती है, इसके लिए गांव के लोगों ने सरकार को जिम्मेदार मानते हुए गांव के लोगों ने राष्ट्रपति से गुहार लगाई है कि यदि हमारा भविष्य खराब होता है और उन्हे किसी बेहतर शिक्षम संस्थान में प्रवेश नहीं मिलता है तो उन्हे इच्छा मृतु दी जाए, क्योकि पढाई के बिना वैसे ही उनका जीवन खराब हो रहा है।

एक पुल भी नहीं बनवा पाई यहां सरकार: हल्द्वानी शहर से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर बसा नकायल गांव आज भी मूलभूत चीजों के लिए तरस रहा है। इस गांव के पचास फीसदी लोग भारत माता की रक्षा के लिए या तो सरहदों पर तैनात हैं या फिर सेना से रिटायर्ड हो गए हैं। बावजूद इसके गांव की बदहाल हालत देखने के बाद भी लोगों की उम्मीद अभीतक खत्म नहीं हुई है। ऐसा नहीं की गांव में कोई मंत्री या अधिकारी नहीं पंहुचा हो और सड़क और पुल का शिलान्यास ना किया गया हो बावजूद इस के आज भी गांव की तस्वीर 1952 की तरह जस की तस बनी हुई है।

अधिकारी भी मानते है की नकायल गांव के ग्रामीणों की समस्या गंभीर है, क्योंकि बरसात के दिनों में किसी भी गांव का जिला मुख्यालय या आस-पास के नजदीकी शहर से संपर्क कटना किसी भयावह हालातों से कम नहीं है।

बता दें कि नकायल गांव कोई ऐसा पहला गांव नहीं है जो कई दशकों से सड़क और पुल के लिए तरस रहा हो। उत्तराखण्ड के सैकड़ों गांव ऐसे हैं जो आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं लेकिन सरकार के पास सिवाय आश्वासनों के अलावा कुछ और नहीं है।

उत्तराखंड में भी किसान सड़कों पर

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मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसानों के विद्रोह की आग अब लगता है उत्तराखंड में भी फैल रही है। गन्ने की फसल का बकाया भुगतान नहीं होने से आक्रोशित किसानों ने काशीपुर बाजार में जुलूस निकाला। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन एसडीएम को सौंपकर बकाया का भुगतान जल्द कराने की मांग की।

भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले शनिवार को किसान रतन सिनेमा रोड स्थित पार्किंग के पास एकत्रित हुए। यहां से उन्होंने जुलूस निकालकर शासन के खिलाफ नारेबाजी की। जुलूस बाजार, रामनगर रोड होते हुए एसडीएम आवास पहुंचे। जहां पर उन्होंने मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन एसडीएम दयानंद सरस्वती को सौंपा। इस दौरान उन्होंने कहा कि वर्ष 2012 में काशीपुर की चीनी मिल बंद हो गई है।

गन्ना किसानों का चीनी मिल पर करीब 30 करोड़ रुपये बकाया है। मिल बंद होने के बाद भी अभी तक भुगतान नहीं किया गया है। मिल बंद होने से हजारों गरीब मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट गहरा गया है। किसान गन्ने की खेती करना बंद कर दिया है। उन्होंने बकाया राशि का जल्द भुगतान करने की मांग की।

उत्तराखंड में मुसीबतों के पंख लगाकर आई हैली सर्विस

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उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के लिये हेलीकाॅप्टर सेवाऐं एक बार फिर विवादों में आ गई हैं। डीजीसीए ने राज्य के नागरिक उड्डयन विभाग से राज्य के ज्यादातर हैलीपैडों की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करते हुए एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है। डीजीसीए ने इस रिपोर्ट के आने तक चारधाम में मौजूद हैलीपैडों के साथ सहस्त्रधारा हैली पैड से उड़ानों पर रोक लगा दी थी। हांलाकि राज्य सरकार और उड्डयन विभाग से बातचीत के बाद ये रोक 16 जून तक हटा दी गई है। इस दौरान उड्डयन विभाग को अपनी रिपोर्ट डीजीसीए को सौंपनी है। गौरतलब है कि शनिवार सुबह बद्रीनाथ में टेकआॅफ करते समय हेलीकाॅप्टर अनियंत्रित हो गया जिसके चलते पंखे की चमेट में आने से एक इंजीनियर की मौत हो गई।

इस मामले में उत्तराखण्ड नागरिक उड्डयन विकास प्राधिकरण के इंजीनियर इन चीफ सितैया ने बताया कि “महानिदेशक नागर विमानन, भारत सरकार के द्वारा चारधाम यात्रा के लिये प्रयोग में लिये जा रहे हेलीपैडों पर सुरक्षित परिचालन के लिए सुझाव दिए गए थे। इन सुझावों को 31 मई 2017 तक लागू करना था। और इसके बाद एक्नश टेकन रिपोर्ट भी देनी थी। जिसके लिये 16 जून तक का समय दिया गया है। इसके चलते राज्य के अंतर्गत समस्त हेलीपैडों से सामान्य रूप से हेलीसेवा जारी है।”

उत्तराखंड में हेलीकाॅप्टर सर्विस शुरू की गई थी पर्यटकों और आम लोगों की सुविधा के लिये। लेकिन निज़ाम बदलते गये हैं पर हेली सर्विस किसी न किसी विवाद में ज़रूर घिरी रही है। हरीश रावत सरकार के दौरान सरकारी हेलीकाॅप्टरों का नाजायज इस्तेमाल हो या नई सरकार में हेली टिकटों की कालाबाज़ारी से लेकर अब हैलीपैडों की गुणवत्ता पर सवाल। इन सब हालातों को देखते हुए ये कहना गलत नहीं होगा कि राज्य में हेलीकाॅप्टर सुविधा के नहीं मुसीबतों के पंख लगा कर आया है।

सेल्समैन से लूट का खुलासा

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कुछ दिन पूर्व रुद्रपुर के सेल्समैन से हुई लूट का पुलिस ने खुलासा कर दिया है। पुलिस ने दो लुटेरों को गिरफ्तार कर लिया है। लूट का मास्टर माइंड अभी पुलिस गिरफ्त से बाहर है। पुलिस उसकी तलाश में दबिश दे रही है।

घटना का खुलासा करते हुए एएसपी देवेंद्र पिंचा ने बताया कि 29 जून को शराब के सेल्समैन की कनपटी पर तमंचा तान कर बाइक सवार बदमाशों ने करीब एक लाख तीस हजार रुपये लूट लिया और फरार हो गए। इसके बाद लुटेरे फुलसुंगा पहुंचे और रुपयों का बंटवारा कर लिया। उन्होंने बताया कि लुटेरों ने टुकटुक सवार सेल्समैन का बाइक से पीछा किया। सेल्समैन जैसे ही ओरिएंटल बैंक के पास टुकटुक से उतरा तो कुलवंत उर्फ राजू ने सेल्समैन की कनपटी पर तमंचा तान दिया और बैग छीन लिया।

पुलिस तभी से लुटेरों की तलाश में जुट गई। उन्होंने बताया कि शनिवार को गंगापुर रोड से सतवंत सिंह  थाना कुंडा व कुलवंत को गिरफ्तार कर लिया। उनके पास से लूट के 35 हजार रुपये व एक तमंचा 315 बोर, एक जिंदा कारतूस व इस्तेमाल की गई पल्सर बाइक बरामद की है।

नहीं चलेगी निजी क्लीनिकों की मनमानी

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नैनीताल हाई कोर्ट ने प्राइवेट अस्पताल या क्लीनिक में सरकारी एजेंसियों के औचक निरीक्षण के कानूनी प्रावधानों को चुनौती देती चिकित्सकों की याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट के फैसले के बाद राज्य में निजी अस्पताल तथा क्लीनिक का पंजीकरण कराना ना केवल अनिवार्य हो गया है बल्कि जिला पंजीकरण अथॉरिटी को क्लीनिक का निरीक्षण करने का कानूनी अधिकार भी मिल गया है।

विकासनगर देहरादून के चिकित्सक डॉ. यशवीर सिंह तोमर समेत 17 अन्य ने याचिका दायर कर क्लीनिकल स्टेब्लिसमेंट रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलशन अधिनियम-2010 की धारा-दो के सी, डी और ओ प्रावधान को चुनौती दी थी। इन प्रावधानों में क्लीनिकल स्टेब्लिसमेंट, इमरजेंसी मेडिकल कंडीशन, सैन्य बलों को क्लीनिकल स्टेब्लिसमेंट एक्ट से बाहर करना मुख्य था। याचिका में कहा गया था कि राज्य द्वारा बनाया गया उत्तराखंड क्लीनिकल स्टेब्लिसमेंट रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन नियम-2015 एक्ट की धाराओं के विपरीत है।

राज्य सरकार द्वारा एक्ट को प्रभावी नहीं बनाया गया है, न ही उन्हें असंवैधानिक तरीके से नियम बनाने का अधिकार है। इतना ही नहीं संविधान के अनुच्छेद-252 के तहत एक्ट बनाने के बाद विधान सभा में प्रस्ताव भी पारित नहीं किया गया। लिहाजा इस एक्ट को निरस्त किया जाए।

सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि एक्ट के संबंध में 28 अगस्त 2010 को महामहिम राष्ट्रपति की अनुमति मिलने के बाद 29 मार्च 2011 को विधान सभा में प्रस्ताव रखा गया, प्रस्ताव पारित होने के बाद एक्ट को एडॉप्ट किया गया।

इसकी अधिसूचना 18 अगस्त 2011 को जारी की गई और इसके बाद 2015 में नियम बनाए गए। यह पूरी तरह वैधानिक एक्ट है। इसलिए याचिका खारिज होने योग्य है। दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलील सुनने के बाद न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधांशु धुलिया की एकलपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया।

रानीचौरी कृषि मौसम केंद्र दे रहा आठ जिलों को सेवाएं

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औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय के रानीचौरी परिसर स्थित ग्रामीण कृषि मौसम सेवा केंद्र का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। केंद्र वर्तमान में उत्तराखंड के आठ जिलों को सेवाएं प्रदान कर रहा है। इसके तहत 49 हजार काश्तकारों को मौसम से जुड़ी जानकारी एसएमएस के माध्यम से दी जा रही है।

मौसम विज्ञान केंद्र ने जुलाई 2014 में जब इस सेवा की शुरुआत की, तब सौ के आसपास काश्तकार इससे जुड़े थे। धीरे-धीरे काश्तकारों को सेवा से जोड़ा गया और उनके मोबाइल नंबर केंद्र में फीड किए गए। नतीजा, आज यह संख्या बढ़कर 49 हजार पहुंच गई है। विदित हो कि परिसर में मौसम विज्ञान केंद्र तो पहले से ही काम कर रहा था, लेकिन किसानों को इसका लाभ नहीं मिल रहा था। इसी को देखते हुए केंद्र ने एसएमएस सेवा की शुरुआत की। ताकि किसान मौसम के हिसाब से खेती से संबंधित कार्य निष्पादित कर सकें।

प्रगतिशील काश्तकार मंगलानंद डबराल, कुशाल ङ्क्षसह आदि का कहना है कि केंद्र से मोबाइल पर जो एसएमएस मिलता है, उससे हमारे लिए खेती करना सुविधाजनक हो गया है। अब मौसम केंद्र की सूचना के हिसाब से हम रोपाई करने या फसल काटने की प्लानिंग करते हैं।

ऐसे दी जाती है जानकारीः मौसम विज्ञान केंद्र आने वाले सप्ताह के मौसम का पूर्वानुमान एसएमएस के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराता है। मसलन हल्की, मध्यम या तेज बारिश होगी अथवा धूप या बादल रहेंगे। तापमान कितना रहेगा वगैरह-वगैरह। साथ ही ये बताया जाता है कि संबंधित मौसम के हिसाब से कौन सी खेती उपयोगी होगी।

इन जिलों को मिल रही सेवाः टिहरी, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ व चंपावत।

किसान को मौसम के पूर्वानुमान को लेकर  मिल जा रही है सटीक जानकारीः इस संबंध में ग्रामीण मौसम कृषि सेवा केंद्र के तकनीकी अधिकारी प्रकाश नेगी का कहना है कि पहले किसान मौसम को लेकर अंदाजा लगाया करते थे, लेकिन अब उन्हें मौसम के पूर्वानुमान को लेकर सटीक जानकारी मिल जा रही है। आने वाले समय में इस सेवा से और काश्तकार जोड़े जाएंगे। ताकि वे किसी भी परिस्थिति के लिए अपडेट रहें।

 

पहाड़ी संगीत को नया जीवन दे रहे हैं शाश्वत जे पंडित

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उत्तराखंड मे प्रतिभा का भरमार है, चाहें वह कोई भी क्षेत्र हो, हर तरह की प्रतिभा आपको देखने को मिलेगी। ऐसे ही एक प्रतिभावान संगीतकार हैं देवप्रयाग के 29 साल के शाश्वत जे पंडित। यूं तो यह गाते बहुत अच्छा हैं लेकिन पढ़ाई में भी यह किसी से कम नहीं। बायोटेक्नालाजी में एमएसई और एम.फिल, और उसके बाद वोकल्स में प्रभाकर किया है शाश्वत ने।

परिवार में दो जुड़वा बहनें जिनकी शादी हो चुकी हैं और मां हैं। पिताजी का दो साल पहले देहांत हो गया था। एक संगीतकार की हाबी वैसे पूछने की बात है लेकिन शाश्वत ने बताया कि उन्हें नए तरह का संगीत खोजना पसंद हैं, इसके अलावा इंटरनेट सर्फिंग करना, बैडमिंटन खेलना आदि पसंद हैं लेकिन सबसे ज्यादा समय वह अपने म्यूजिक प्रोडक्शन को देते हैं। शाश्वत क्रिएटिविटी में विश्वास रखते हैं इसलिए वह अपना ज्यादा समय क्रिएटिव कामों में देते हैं।शाश्वत ने अपने घर में अपना म्यूजिक स्टूडियों बनाया है जिसपर बैठकर वह घंटों तक तरह-तरह के म्यूजिक को बनाते हैं।

शाश्वत हमेशा से ही संगीत से जुड़ाव रखते थे शायद इसलिए इतनी पढ़ाई करने के बाद भी उन्होंने अपना पैशन कभी नहीं छोड़ा। पारंपरिक उत्तराखंडी संगीत को ऊचाईंयों तक लेकर जाना शाश्वत का सपना है। अपने सपने को पूरा करने के लिए शाश्वत दिन रात एक कर रहे हैं। एक अच्छा इंसान बनना शायद हर कोई चाहता है लेकिन कुछ हटकर करना केवल गिने चुने लोग ही जानते हैं। इन्हीं कुछ लोगों में शाश्वत ने भी अपनी जगह पहाड़ी लोगों के बीच बना ली है। एक के बाद एक अपने एल्बम कवर के जरिए शाश्वत हर पहाड़ी के पसंदीदा म्यूजिशियन बन चुके हैं। यूट्यूब पर अपने कवर के जरिए शाश्वत अपने प्रशंसकों के साथ जुड़े हुए हैं। आज से कुछ साल बाद शाश्वत पहाड़ी संगीत को एक बहुत ऊंचे मुकाम पर देखना चाहते है और इसके लिए वह अपने स्तर पर काम करना शुरु कर चुके हैं।

आजकल शाश्वत पहाड़ी गानों को रिडिजाईन करके उनके कवर कर रहे हैं,इन कवर गानों को शाश्वत यूट्यूब के माध्यम से लोगों तक पहुंचा रहे हैं इतना ही नहीं इस समय शाश्वत के 1-2 लाख फाॅलोवर हैं जो इनके काम की सराहना करते हैं। इसके अलावा शाश्वत कुछ ऐसा कर रहे हैं जो आज तक के उत्तराखंड इतिहास में पहली बार है वह यूट्यूब के माध्यम से लोगों को गढ़वाली संगीत सिखाने का लेसन देते हैं।आनलाईन गढ़वाली लेसन के माध्यम से शाश्वत लोगों को ज्यादा से ज्यादा पहाड़ी संगीत की तरफ आर्कषित करना चाहते हैं।

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आने वाले समय में शाश्वत के कुछ और गानें आने वाले हैं इसके अलावा उनका खुद का कंपोज किया हुआ म्यूजिक भी श्रोताओं के बीच आने वाला है। अपने सभी गानों को वह अपने यूट्यूब चैनल के जरिए लोगों के बीच लेकर आऐंगे। अपने म्यूजिक के माध्यम से शाश्वत उन युवाओं को यह संदेश देना चाहते हैं जो अपने प्रदेश से बाहर रहते हैं और अपनी भाषा बोलने में हिचकिचाते और शर्माते हैं। शाश्वत अपने संगीत और अपने आनलाईन ट्यूटोरियल के माध्यम से लोगों के बीच पहाड़ी भाषा को एक सम्मानजनक स्थान देना चाहते हैं।

शाश्वत से यह पूछे जाने पर की इतनी पढ़ाई करने के बाद संगीत की तरफ रुख करने की कोई खास वजह इसपर उनका जवाब था कि मैं पढ़ाईं में हमेशा से अच्छा था और थोड़ी और मेहनत के बाद शायद मैं साइंटिसिट भी बन जाता लेकिन साइंटिसिट बनकर शायद मैं केवल एक ही क्षेत्र में आगे बढ़ पाता। फिर शाश्वत ने निर्णय लिया कि वह अपनी क्रिएटिवीटो को व्यर्थ नहीं जाने देंगे और उन्होंने संगीत को ही अपना सब कुछ बना लिया। पिछले चार साल से शाश्वत दून इंटरनेशनल स्कूल में म्यूजिक डिर्पाटमेंट में एचओडी के पद पर काम कर रहे हैं और वह अपने काम से बहुत खुश हैं।

शाश्वत एक साइंस बेकग्राउंड के छात्र हैं लेकिन फिर भी म्यूजिक में उनकी जान बसती हैं।वह हर रोज नया करने के लिए तैयार रहते हैं, और काम भी अपने पसंदीदा क्षेत्र म्यूजिक में ही कर रहे तो भविष्य की चिंता शाश्वत करते भी नहीं। उनका मुख्य काम है नए म्यूजिक को ढूंढ़ना।

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आपको बतादें कि शाश्वत ने इंडियान आयडल 6 में टाप 25 गायकों में अपनी जगह बनाई थी और शाश्वता का पहला गाना ”बोल चिठ्ठी किलै नी भेजी” लोगों के बीच इतना वायरल हुआ कि आज इस गाने को पसंद करने की संख्या ओरिजिनल चिठ्ठी गाने से ज्यादा है। इसके अलावा शाश्वत को उनके काम यानि की पहाड़ की संस्कृति को बचाने और उसे लोगों तक पहुचाने के लिए ”उत्तराखंड श्री अवार्ड से साल 2016” में पूर्व सीएम हरीश रावत के हाथों से नवाजा गया है।यह पल ऐसे हैं कि शाश्वत वह अपनी जिंदगी में कभी नही भूल सकते। शाश्नवत की चाह हैं कि अपनी संस्कृति और अपनी परंपरा के लिए वह इतना काम करें कि राज्य में एक और पद्मश्री अवार्ड आए और उसके लिए काम करना उन्होंने शुरु कर दिया है।

टीम न्यूज़पोस्ट की तरफ से शाश्वत को उनके आने वाल कवर एल्बम के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं।

विभाग ने सड़ा दिये 50 क्विंटल आलू

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रानीखेत उद्यान विभाग का हाल भी अजब है। अबकी बेहतर उत्पादन के लिए विभाग ने तराई से आलू बीज तो मंगा लिया। मगर किसानों को प्रोत्साहित किए बगैर डिमांड से अधिक स्टॉक कर दिया गया। नतीजतन सब्जी उत्पादक मजखाली क्षेत्र का 50 क्विंटल बीज गोदाम में ही पड़े पडे़ सड़ रहा है। किसानों का तर्क है कि समय पर काफी देरी से बीज भेजे जाने के कारण लगा पाना संभव नहीं था।

अबकी पर्वतीय अंचल के आलू उत्पादक गांवों के लिए रुद्रपुर स्थित फार्म से बीज मंगाया गया था। इसका खरीद मूल्य 1400 रुपये प्रति क्विंटल थी। उद्यान विभाग की ओर से मजखाली स्थित सचल दल केंद्र में 60 क्विंटल बीज भेजा गया। मगर इसमें से किसानों ने मात्र 10 क्विंटल ही खरीदा, और अधिक न खरीदने के पीछे देरी बताई गई।

इधर केंद्र प्रभारी पान सिंह राणा कहते हैं अप्रैल में 20 क्विंटल आलू बीज की डिंमाड भेजी गई थी। मगर 27 अप्रैल को 40 क्विंटल अतिरिक्त बीज भेज दिया गया। ऐसे में शेष 50 कुंतल गोदाम में डंप हो गया है। उधर डीएचओ भावना जोशी ने स्पष्ट किया कि मांग के अनुरूप ही बीज भेजा गया। अब उसे वापस नहीं लिया जाएगा।

गुणवत्ता पर भी उठे सवाल

आलू उत्पादक मजखाली क्षेत्र के काश्तकारों ने रुद्रपुर के बीज की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। आरोप है कि पहले तो समय पर बीज नहीं मिला। भेजा भी गया तो उत्पादकता बहुत कम है। द्वारसौं, उरोली, बबुरखोला, तुस्यारी समेत कई गांव में आलू की खेती की जाती है। बताया कि विभाग के गुणवत्ताविहीन बीजों के कारण खेती से मोह भंग होने लगा है। यह भी बताया कि बाजार से खरीदे गए आलू बीज अच्छा उत्पादन दे रहा।

भावना जोशी, जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि ‘डिमांड से अधिक कैसे भेजा जा सकता है। बीज की गुणवत्ता ठीक है। केंद्र से 60 क्विंटल की ही मांग भेजी गई थी। बीज नहीं बांटा जा सका है तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित प्रभारी की है। हम बीज वापस नहीं लेंगे।

आईये चलें उत्तराखंड के पहले प्राईवेट नेचर रिर्जव में

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पहाड़ों की रानी मसूरी अपनी खूबसूरती के लिए दुनियाभर में मशहूर है, अौर इस खूबसूरती में चार-चांद लगा रहा है “दि जबरखेत नेचर रिर्जव’’। यह नेचर रिर्जव उत्तराकंड का पहला प्राइवेट नेचर रिजर्व है। लगभग 110 एकड़ में फैला हुआ द जबरखेत अपनी तरह का पहला नेचर रिर्जव है जो पहाड़ी क्षेत्र में एडवेंचर को बढ़ावा देता है। इसमें

  • 3 किलोमीटर का हाईकिंग ट्रेल,
  • नेचर वाक,
  • बर्ड वाचिंग के साथ
  • ट्रायल मैप और फ्लोरा और फोना की पाकेट साईज का नेचर गाईड भी मौजूद है

इस रिर्जव का पहला लक्ष्य अपने प्राकृतिक खजाने को सुरक्षित रखते हुए स्थानीय लोगों के लिए आजीविका पैदा करना है।जबरखेत नेचर की मैनेजिंग डायरेक्टर सेज़ल वोहरा ने बताया कि “विकास का मतलब केवल बड़ी-बड़ी बिल्डिंगें बनाना नहीं होता, विकास के क्षेत्र में काम करने के लिये हम प्रकृति का विकास भी कर सकते हैं। इस नेचुरल रिर्जव के माध्यम से हमने प्रकृति को विकसित किया है। इस क्षेत्र के माध्यम से हमने क्षेत्रीय लोगों के जीवनयापन का ज़रिया तैयार किया है, साथ ही शिक्षा के लिए साधन,रोजगार के साधन और टूरिज्म का मौका देने के साथ हमने प्रकृति का संरक्षण भी किया है।”

इस मार्डन दौर में जब मशहूर हिल स्टेशन में छोटी-छोटी जगह में लोग मकान या दुकान बना रहें है, यह अनूठी पहल काबिले तारीफ है। मसूरी आने वाले पर्यटक भी कहते हैं कि मसूरी के लिए ये रिजर्व अलग चार्म है। “हम प्रकृति को देखने के लिए पहाड़ों पर आते हैं। अगर मसूरी आकर हम केवल भीड़-भाड़ वाले माल रोड पर घूम कर निकल जाएं तो मसूरी आने का क्या फायदा?”

तो अब आप अगली बार जब मसूरी आएं तो जबरखेत नेचर रिर्जव आपकी लिस्ट में सबसे ऊपर होना चाहिए।अगर आप सच में पहाड़ की हवाओं में खोना चाहते हैं तो यह रिर्जव आपके लिए परफेक्ट डेस्टिनेशन है।