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मॉरिशस के बाद अब देश को राष्ट्रपति देगा डीएवी

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मारपीट, हंगामे, आंदोलन और चुनावी शोर डीएवी की पहचान बन चुके हैं, लेकिन सिक्के के दूसरे पहलू पर गौर करें तो डीएवी पीजी कॉलेज से निकले छात्र आज भी देश और दुनिया में अपनी प्रतिभा का डंका बजा रहे हैं। तमाम हंगामों के बीच कॉलेज का अपना एक गौरवांवित करने वाला इतिहास भी रहा है। डीएवी संस्थान ने न सिर्फ देश को कई आईएएस, पीसीएस दिए बल्कि कई देशों को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति तक समर्पित किए। इसी कड़ी में एक नाम ओर जुड़ने वाला है। भारत के प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति के रूप में डीएवी के छात्र रहे रामनाथ कोविंद इस गौरवांवित इतिहास का हिस्सा बनेंगे।

डीएवी पीजी कॉलेज से शिक्षा लेकर देश और दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वालों की फेहरिस्त में एक और नाम जुड़ गया है। डीएवी पीजी कॉलेज कानपुर से शिक्षा प्राप्त करने वाले और बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को भाजपा द्वारा भारत ट्रपति पद के लिए प्रत्याशी बनाया गया है। उनकी इस उपलब्धि पर डीएवी संस्थानों में हर्ष की लहर है। बिहार के राज्यपाल कोविंद को भारत के राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किये जाने पर डीएवी पीजी कॉलेज के प्राचार्य डा. देवेंद्र भसीन ने संस्थान के लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने कहा कि इससे डीएवी परिवार अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहा है। उन्होंने कहा कि राज्यपाल कोविंद ने डीएवी पीजी कॉलेज कानपुर से विधि स्नातक उत्तीर्ण की। वे डीएवी कॉलेज परिवार के सदस्य हैं और हम सभी स्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। डीएवी कॉलेज कानपुर व डीएवी कॉलेज देहरादून एक ही संस्थान के अंग हैं। कोविंद का राष्ट्रपति पद के लिये उम्मीदवार बनाया जाना डीएवी परिवार के सभी सदस्यों को एक नई उर्जा और प्रेरणा देगा।
यह पहली बार नहीं है कि कॉलेज के छात्र ने इस प्रकार की उपलब्धि हासिल की है। डीएवी पीजी कॉलेज इससे पहले देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी चमक बिखेर चुका है। इससे पहले कॉलेज मॉरिशस के राष्ट्रपति, नेपाल के प्रधानमंत्री, थल सेना अध्यक्ष और न जाने कितने आईएएस और पीसीएस अधिकारी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं।
डीएवी पीजी कॉलेज,देहरादून के प्राचार्य डॉ देवेंद्र भसीन ने कहा कि डीएवी का अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है। यह गौरव की बात है कि डीएवी संस्थान से राष्ट्रपति जैसे संम्मानित पद के लिए कॉलेज के पूर्व छात्र को चुना गया। इससे मौजूदा छात्रों को प्रेरणा मिलेगी।

वहीं, डीएवी पीजी कॉलेज के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष अंशुल चावला ने कहा कि कॉलेज इससे पहले कई बड़ी हस्तियों को समाज के लिए समर्पित कर चुका है। विदेशों में तो पहले ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे पदों पर कॉलेज के पूर्व छात्र अपनी प्रतिभा दिखा चुके हैं। अब विश्व के सबसे बड़े गणराज्य भारत के राष्ट्रपति पद का जिम्मा मिलना अपने आप में उपलब्धि होगी।

दर्शकों पर भड़क रहे हैं ‘बैंक चोर’ रितेश

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पिछले शुक्रवार को रिलीज हुई यशराज की फिल्म बैंक चोर के बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक प्रदर्शन को लेकर फिल्म के हीरो रितेश देशमुख ने फिल्म देखने वाले दर्शकों को दोषी करार दिया है। फिल्म के नतीजों को लेकर अपनी पहली प्रतिक्रिया में रितेश देशमुख ने कहा है कि हमने अपनी तरफ से एक एंटरटेनिंग फिल्म बनाई थी, अगर पब्लिक को हमारी फिल्म अच्छी नहीं लगी, तो इसके लिए हम बिल्कुल दोषी नहीं हैं।

उनका कहना है कि वे इसे परफेक्ट एंटरटेनर मानते हैं, जिसमें कोई कमी नहीं थी। रितेश का कहना है कि दर्शक अगर ऐसी फिल्मों को पसंद नहीं करते, तो ये हमारी समस्या नहीं हो सकती, ये उनका नुकसान है। उनका कहना है कि हमारी टीम को अपनी फिल्म पर गर्व है और रहेगा। ये रितेश देशमुख की हाल ही में रिलीज हुई उनकी तीसरी ऐसी फिल्म है, जिसे दर्शकों ने खारिज कर दिया।
बैंक चोर से पहले रितेश ने ‘बैंजो’ नाम से फिल्म बनाई थी, जिसमें वे सोलो हीरो थे और फिल्म सुपर फ्लॉप रही थी। इसके अलावा पुल्कित सम्राट के साथ रिलीज हुई उनकी फिल्म ‘बंगिस्तान’ को भारत के यंगिस्तान ने खारिज कर दिया था। इसी बीच इंद्र कुमार की फिल्म ग्रेट ‘ग्रैंड मस्ती’ भी सुपर फ्लॉप रही थी, जिसमें रितेश देशमुख और विवेक दोनों थे।
मोहित सूरी की फिल्म ‘एक विलेन’ के बाद रिलीज हुई उनकी सारी फिल्में फ्लॉप रही हैं, जिनमें बैंक चोर का नाम अब जुड़ा है। रिलीज के पहले पांच दिनों में ये फिल्म पांच करोड़ का भी बिजनेस नहीं कर पाई, जबकि फिल्म का बजट ही 20 करोड़ से ज्यादा का बताया गया।

देश भर में मार्शल आर्ट्स स्कूल खोलना चाहते हैं टाइगर

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स साल 21 जुलाई को रिलीज होने जा रही अपनी नई फिल्म मुन्ना माइकल के प्रमोशन में व्यस्त जैकी श्राफ के बेटे टाइगर जल्द ही अपनी एक महत्वाकांक्षी योजना को शुरू करने जा रहे हैं। मुन्ना माइकल के प्रमोशन के लिए हुए एक समारोह में मीडिया से बातचीत करते हुए टाइगर ने अपनी इस योजना का खुलासा करते हुए बताया कि वे जल्द ही मार्शल आर्ट्स सीखाने वाले स्कूलों की एक श्रंखला शुरू करने जा रहे हैं।
टाइगर का सपना पूरे देश में इस तरह के स्कूलों की श्रृंखला शुरू करने को लेकर है, जहां बच्चों से लेकर बड़ों तक हर उम्र के पुरुष और महिलाओं को मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग दी जाएगी, जो महिलाओं के प्रति बढ़ते जा रहे अपराधों के मद्देनजर काफी अहम मानी जाती है।
टाइगर ने बताया कि पहले चरण में वे चार शहरों में ये स्कूल खोलने जा रहे हैं, जिनमें मुंबई के अलावा दिल्ली, बंगलूर और पुणे के नाम शामिल हैं।
टाइगर का कहना है कि इन स्कूलों के लिए काम शुरू हो गया है और जल्द ही ये शुरू हो जाएंगे। उनके मुताबिक, दूसरे चरण में देश के 20 और शहरों में ये स्कूल खोलने की योजना है। इन शहरों में जयपुर, अहमदाबाद, चेन्नई, कोलकाता, चंड़ीगण, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, पटना, रांची, देहरादून, शिमला, जम्मू, अमृतसर, नागपुर, कोच्ची, हैदराबाद, विशाखापट्टनम, बनारस और त्रिवेंद्रम के नाम शामिल हैं।
तीसरे चरण में इस योजना में 15 और शहरों को शामिल करने की योजना है, जिनमें जालंधर, उदयपुर, बड़ोदरा, आगरा, मथुरा, गोरखपुर, बरेली, गुड़गांव, नोएडा, कोटा इत्यादी के नाम हैं। टाइगर की योजना तीन सालों में देश के कुल सौ शहरों में ऐसे स्कूल खोलने की है।

ग्रामीणों ने श्रमदान कर गांव में पहुंचाया पानी

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प्रखण्ड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के कार्यालय में कई बार पेयजल अपूर्ति के लिए गुहार लगाने के बाद भी जब सुनवाई न हुई, तो ग्रामीणों ने स्वयं ही श्रमदान कर क्षतिग्रस्त पेयजल लाइन को ठीक कर दिया। कालसी विकासखंड के बसाया गांव के ग्रामीणों ने बताया कि गांव की पेयजल लाइन ग्राम पंचायत के अधीन है जिसके चलते देख रेख के अभाव में जीर्ण शीर्ण हो चुकी है।

इस सम्बंध में दर्जनों बार बीडीओ कार्यालय में शिकायत की गई लेकिन लाइन की मरम्मत के प्रति किसी ने रूचि नही दिखाई।रविवार दोपहर तक समस्त ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से श्रमदान कर जगह-जगह से क्षतिग्रस्त लाइन को ठीक किया और गांव तक पानी पहुंचाया। शाम को जब गांव में पानी पहुंचा, तो ग्रामीण खुशी से झूम उठे। हालांकि, ग्रामीणों ने खंड विकास कार्यालय के खिलाफ आक्रोश भी देखने को मिला। बीडीओ बीपी खंडूरी ने बताया कि लाइन का प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है और स्वीकृति मिलने पर नई लाइन बिछाई जाएगी।

बड़े खतरे का सबब बन सकता है स्वारी गाड बैली ब्रिज

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जिले में स्थित गंगोत्री हाई-वे पर स्वारी गाड का अस्थायी बैली ब्रिज जर्जर हो चुका है। इससे कभी भी हादसा हो सकता है। गंगोत्री व उपला टकनोर का संपर्क कट सकता है। इसको लेकर क्षेत्रवासियों ने चिंता जाहिर की है और प्रशासन का ध्यान खींचते हुए इसे तुरंत ठीक कराने की मांग की है।

उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से गंगोत्री की ओर 40 किलोमीटर की दूरी पर स्वारी गाड है। इस स्थान पर पहले उपला टकनौर के साथ गंगोत्री धाम व भारत-चीन बॉर्डर को जोड़ने के लिए पक्का मोटर पुल था। 2012 में स्वारी गाड में आए उफान में पुल बह गया। इसके बाद यहां बैली ब्रिज बनाया गया। अस्थायी तौर पर बनाए इस बैली ब्रिज की हालत वर्ष 2014 में ही जर्जर हो चुकी थी। मौजूदा समय में पुल के दोनों हिस्सों में धंसाव के साथ ही पुल के ऊपर बिछाया गया लोहा भी उखड़ गया है। पुल से हर दिन 500 से अधिक वाहन आवाजाही कर रहे हैं। इस पुल में कभी भी हादसा हो सकता है तथा गंगोत्री व उपला टकनोर का आपसी संपर्क भी कट सकता है।
हालांकि, बीआरओ ने इस बैली ब्रिज के स्थान पर दूसरा पुल बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था। लेकिन, 2016 में ऑल वेदर रोड की घोषणा होते ही पुल के पुराने प्रस्ताव पर ब्रेक लग गया। अब इस स्थान पर ऑल वेदर रोड के हिसाब से ही पुल बनना है। लेकिन धरासू से गंगोत्री तक होने वाले ऑल वेदर रोड के कार्य के लिए अभी एनजीटी से स्वीकृति नहीं मिली है। यह मामला अभी एनजीटी में ही लटका है।
बीआरओ के कमांडर एससी लूनिया ने बताया कि अभी एनजीटी ने धरासू से लेकर गंगोत्री तक के ऑल वेदर रोड के निर्माण पर रोक लगाई है। स्वारी गाड में नए पुल के लिए ऑल वेदर रोड के हिसाब से सर्वे से लेकर सभी चीज पूरी हैं। अगर एनजीटी से स्वीकृति मिल जाती है तो पुल निर्माण शुरू हो जाएगा।
इसके साथ ही बीते पांच सालों में भारी बारिश से उफान पर आए नालों और गदेरों के चलते हाईवे के कई पुलों पर भी खतरा मंडरा रहा है। नदी नालों में मलबे से जलस्तर ऊंचा होने से झाला पुल, बढ़ेथी चुंगी मोटर पुल, गंगोरी बैली ब्रिज, पपड़गाड मोटर पुल पर भी खतरा मंडरा रहा है।

कश्मीरी छात्रों को प्रवेश देने के विरोध में उतरे स्थानीय छात्र

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डीएवी पीजी कॉलेज में कश्मीरी छात्रों को प्रवेश देने का छात्रों ने विरोध किया है। बुधवार को छात्रसंघ के कार्यकर्ताओं ने तीखा विरोध दर्ज करते हुए कॉलेज प्राचार्य डा. देवेंद्र भसीन को ज्ञापन सौंपा। छात्रों का कहना है कि यह सुरक्षा की दृष्टि से अति संवेदनशील मसला है। छात्रों ने कॉलेज प्रशासन से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की। छात्र संघ अध्यक्ष राहुल कुमार के नेतृत्व में छात्र डीएवी पीजी के प्राचार्य डॉ. देवेंद्र भसीन से मिले। जहां उन्होंने कश्मीरी छात्रों को प्रवेश देने के फैसले को वापस लेने की मांग की। छात्रों ने ज्ञापन देते हुए कहा कि कालेज में पहले भी कश्मीरी मुस्लिम छात्रों को प्रवेश दिया गया है। लेकिन ये छात्र देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं।

अभी हाल ही में देहरादून के सेलाकूई स्थित एक कालेज में बीएससी की पढ़ाई कर रहे कश्मीरी छात्र दानिश का आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहने की बात सामने आई है। जम्मू-कश्मीर पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने के बाद इसका खुलासा हुआ। इसे किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डीएवी महाविद्यालय में पढ़ने वाले कश्मीरी छात्र भी देश विरोधी हैं। छात्रों ने कहा कि जम्मू-कश्मीर बॉर्डर पर भारतीय सैनिकों के शहीद होने पर ये छात्र खुले आम खुशी का इजहार करते हैं, जश्न मनाते हैं, इससे स्थानीय छात्रों के बीच खासा आक्रोश पनपता जा रहा है। यह स्थिति कभी भी गंभीर रूप धारण कर सकती है। छात्रों ने कहा कि जो इस देश में रहते हैं और सारी सुख-सुविधायें भोग रहे हैं। फिर भी पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी करते हैं। इनकी अवांछित हरकतों को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

छात्रों ने ज्ञापन में कहा कि कुछ समय पूर्व भी डीएवी कालेज एवं अन्य संस्थानों के छात्रों ने घंटाघर पर खुलेआम देश विरोधी नारे लगाये थे। अगर कश्मीरी छात्रों को कालेज में प्रवेश दिया जाता है तो इससे माहौल खराब होगा और अन्य छात्रों की पढ़ाई नुकसान होने की भी आशंका है। छात्रों ने कालेज प्रबंधन से स्थानीय छात्रों के हित में उचित कदम उठाने की मांग की है।छात्रों ने साथ ही चेतावनी भी दी है अगर इन सारे तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए कश्मीरी छात्रों को प्रवेश दिया जाता है तो छात्रसंघ किसी भी हद तक जाकर विरोध करेंगे। इसके बाद जो स्थिति उत्पन्न होगी उसके लिए कालेज प्रशासन जिम्मेदार होगा।

अन्नपूर्णा रोटी बैंक पाल रहा है गरीबों का पेट

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समाज सेवा की ललक जिसके मन में लग जाती है वह महान होता है। यह सूक्ति भले हो पर वास्तव में उन लोगों पर चरितार्थ होती है जो समाज के लिए तन, मन, धन न्योछावर करते हैं। भूखे को अन्न, प्यासे को पानी देना, विशेष सेवा है। इसी प्रकार की सेवा अन्नपूर्णा रोटी बैंके माध्यम से 20 वर्षीय युवा हर्ष चौहान कर रहे हैं। हर्ष चौहान ने बताया कि सड़क पर एक-एक रुपये के लिए लोगों के सामने हाथ पसारते बच्चे भी हमारा भावी भविष्य हैं, लेकिन समाज की ओर से उनके लिए विशेष चिन्तन नहीं होता। इसीलिए उन्होंने पैसे देने के बजाय इन बच्चों की क्षुधा पूर्ति के लिए अन्नपूर्णा रोटी बैंक की स्थापना की है।

हर्ष कहते है कि उनकी संस्था का नारा है ‘रोटी बैंक का यही सपना, भूखा न सोए अपना’। इसलिए हर्ष चौहान, निवासी पित्थूवाला अपने सहयोगियों के साथ प्रत्येक परिवार से रोटी, अचार लेते हैं तथा सब्जी स्वयं बनवाकर उन लोगों को बांटते हैं जो सड़कों पर गलियों में इधर-उधर रोटी के तलाश में घूमते हैं। उन्होंने कहा कि विगत दस दिन पूर्व इस संस्था का गठन किया है। रोटी सब्जी आदि के लिए आर्थिक राशि के बारे में जानकारी देते हुए उनका कहना है कि इसके लिए उन्होंने अपने परिचितों से व्यक्तिगत आर्थिक मदद ली है और रसीदें भी छपवा रखी है ताकि कोई दानदाता रसीद लेकर आर्थिक मदद कर सकता है।

डीएवी कॉलेज के प्रथम वर्ष के छात्र हर्ष चौहान ने शुक्रवार को दोपहर आईएसबीटी रेलवे स्टेशन घंटाघर, गांधी पार्क, परेड ग्रांउड तमाम स्थानों पर भूखे लोगों को खिलाने के लिए भोजन के छह सौ पैकेट तथा पानी बांटा ताकि लोग अपनी भूख शांत कर सकें। देखने में यह पहल भले छोटी है, लेकिन आम आदमी को, विशेषकर उन्हें जो गलि-सड़कों में हाथ फैलाते फिरते हैं, थोड़ी बहुत राहत जरुर देगा।

हिमालयी जड़ी बूटियों पर मंडराया खतरा

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दुनियाभर में अपनी जीवनरक्षक जड़ी बूटियों के लिए प्रसिद्ध हिमालयी राज्य उत्तराखंड को जड़ी-बूटी प्रदेश बनाने की कवायद अब ठंडी पड़ती जा रही है। इसके चलते, राज्य गठन से पहले उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदा हो रही आधा दर्जन जड़ी-बूटियां खतरे की जद में आ गई है। हालात यह है कि जंगलों में स्वतः पैदा होने वाली जड़ी-बूटियों को तस्कर खत्म कर रहे हैं। नाप भूमि पर हो रही छोटी-मोटी कवायद से ही जड़ी-बूटियों का अस्तित्व बचा हुआ है। यूं तो प्रदेश के पहाड़ी और मैदानी जिलों में जड़ी-बूटी पैदा होती है, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में पैदा होने वाली जड़ी-बूटी किसी अन्य क्षेत्र में तैयार नहीं हो सकती है।


करीब दस हजार से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पैदा होने वाली इन जड़ी बूटियों के लिए हिमपात के साथ ही मौसम में ठंडक जरूरी है। राज्य गठन से पहले उच्च हिमालयी क्षेत्र में अच्छी खासी बसावट थी। इन गांवों में रहने वाले लोग तमाम बहुमूल्य जड़ी-बूटी पैदा करते थे, लेकिन राज्य गठन के बाद जिस तेजी से पलायन बढ़ा है, इससे उच्च हिमालयी क्षेत्र के कई गांव खाली हो गए है और इसका सीधा असर जड़ी-बूटी उत्पादन पर पड़ा है। दूसरा बड़ा कारण उच्च हिमालयी क्षेत्र के बुग्यालों में लगनी वाली आग भी है। पिछले दस वर्षो से जिले के बुग्याल आग की चपेट में आ रहे हैं। आग लगने के पीछे शिकारियों की सक्रियता को भी एक बड़ा कारण माना जाता है। बुग्यालों में आग से भी जड़ी बूटी का उत्पादन सिकुड़ रहा है।

दस वर्ष पहले तक वन विभाग उच्च हिमालयी क्षेत्र की इन जड़ी-बूटियों की निकासी के लिए अनुमति पत्र (रमन्ना)जारी करता था, लेकिन खतरे में आई इन जड़ी-बूटियों के विदोहन के लिए अब अनुमति नहीं दी जाती है। इन जड़ी-बूटियों को रेड बुक में शामिल कर लिया गया है। रेड बुक में शामिल जड़ी बूटियों में अतीस, कूटी, सालम पंजा, जटामासी, अतिवसा, गरुड़ पंजा आदि के नाम शामिल हैं।

हालांकि, प्रदेश सरकारों ने जड़ी बूटी उत्पादन के लिए तमाम दावे किए। भेषज विकास इकाई, जड़ी-बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर, सगंध पौध केंद्र सेलाकुई और वन विभाग जड़ी-बूटी उत्पादन के लिऐ कार्य करते हैं, इसके बावजूद खतरे में आई उच्च हिमालयी क्षेत्र की जड़ी बूटियों को बचाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं हो पा रही है। भेषज संघ के जिला पर्यवेक्षक राजेन्द्र जोशी ने कहा कि सरकारी प्रयासों से कम ऊंचाई वाले इलाकों में जड़ी बूटी का उत्पादन बढ़ रहा है। तमाम काश्तकार तेजपत्ता और बड़ी इलाइची का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र की जड़ी बूटियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए पलायन रोकने के साथ ही बुग्यालों को आग से बचाने के इंतजाम भी करने होंगे।

‘सफेदहाथी’ बनकर न रह जाए दून यूनिवर्सिटी

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दून यूनिवर्सिटी की नींव राज्य की प्रतिभा को संवारने और जेएनयू की तरह अलग पहचान देने के लिए रखी गई थी, लेकिन जिस सपने के साथ यूनिवर्सिटी की नींव रखी गई थी वह अब तक अधूरा ही दिखाई दे रहा है।साल 2009 में शुरू हुई यूनिवर्सिटी को कोर्सेज के लिए छात्र तो पहले ही ढूंढे़ नहीं मिल रहे थे, अब सरकार की अनदेखी के चलते एडमिशन लेने वाले छात्रों को पढ़ाने के लिए शिक्षकों की भी भारी कमी है।

आलम यह है कि यूनिवर्सिटी में शिक्षकों के आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। उत्तराखंड में तमाम यूनिवर्सिटीज की भीड़ में जेएनयू की तर्ज पर शुरू हुई दून यूनिवर्सिटी अब ‘सफेद हाथी’ साबित हो रही है। यूनिवर्सिटी की बुनियाद के समय जेएनयू की तर्ज पर यूनिवर्सिटी को नए आयाम देने का सपना हर साल अधूरा रह जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण सरकार की अनदेखी है। हालात यह हैं कि सात साल के भीतर यूनिवर्सिटी के आठ स्कूलों में प्रोफेशनल और ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर बेहतर करियर प्रदान करने में सहायक 26 कोर्सेज शुरू होने के बाद भी यहां छात्र रुझान नहीं ले रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण सरकार की ओर से की जा रही लापरवाही है।

दरअसल, यूनिवर्सिटी में विभिन्न कोर्सेज के लिए तकरीबन 70 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं। लेकिन यहां नियुक्ति के नाम पर इनमें से आधे ही पद भर पाए हैं। मौजूदा स्थिति की बात करें तो यहां केवल 45 शिक्षक ही छात्रों को पढ़ा रहे हैं। ऐसे में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यानि यूजीसी के मानकों और क्वॉलिटी एजुकेशन प्रदान करने की बात करना भी बेमानी साबित होगा। सरकार से निरंतर गुजारिशें करने के बाद भी यूनिवर्सिटी के रिक्त पदों पर भर्ती नहीं हो पा रही है। यूजीसी लगातार छात्रों के लिए रोजगारपरक कोर्सेज शुरू करने पर जोर दे रही है। इसी के तहत दून यूनिवर्सिटी ने भी बीते दो सालों में कई नए कोर्सेज को शुरू करने की कवायद शुरू की। लेकिन शिक्षकों के अभाव के चलते कवायद पूरी नहीं हुई। यूनिवर्सिटी प्रशासन की बात करें तो मौजूदा सरकार से अब उन्हें कुछ उम्मीदें दिखाई दी हैं।

सरकार द्वारा शिक्षा के सुधार के लिए किए जा रहे कार्यों को देखते हुए यूनिवर्सिटी प्रशासन एक बार फिर व्यवस्था को ढर्रे पर लाने के लिए कोशिशें करने लगा है। इसी क्रम में शासन को नियुक्ति किए जाने के लिए आग्रह भी किया जा रहा है। शिक्षकों की कमी का आलम यह है कि अब पुराने कोर्स भी बंद होने लगे हैं। यूनिवर्सिटी में इस शैक्षणिक सत्र से एमए हिंदी, बैचलर ऑफ लाइब्रेरी एण्ड इनफॉरमेंशन साइंस, मास्टर ऑफ लाइब्रेरी एंड इनफॉरमेंशन साइंस, एमए सोशल वर्क, एमफिल इकॉनोमिक्स, सर्टिफिकेट कोर्स में क्लाउड कंप्यूटिंग में एडमिशन नहीं मिलेगा।

कोर्सेज में मानकों के अनुसार शिक्षक न होने के कारण यूनिवर्सिटी ने इन कोर्सेज में एडमिशन देना बंद कर दिया है। पिछले साल ही इन कोर्सों को शुरू करने की घोषणा की गई थी, लेकिन शिक्षक उपलब्ध न होने के कारण इस साल यूनिवर्सिटी ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। डॉ. बीएम हरबोला, रजिस्ट्रार, दून यूनिवर्सिटी ने बाताया कि यूनिवर्सिटी में शिक्षकों के तकरीबन 70 पद सैंक्शन हैं। इनमें 25 से ज्यादा पद अभी खाली हैं। हमारी ओर से शासन से आग्रह किया जा रहा है कि जल्द से जल्द इन पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू की जाए। यूनिवर्सिटी में शिक्षक होंगे तो नए कोर्सेज शुरू करने पर भी विचार किया जाएगा। मौजूदा मैनपावर में यह संभव नहीं हो पा रहा है, जिसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है।

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद दून में

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एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी राम नाथ कोविंद सोमवार को देहरादून पहुंचे। कोविंद सुबह 10.30 बजे जौली ग्रांट हवाई अड्डे पहुंचे। जहां उनका मुख्यमंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष व अन्य वरिष्ठ नेताओं द्वारा भव्य स्वागत किया। उनके साथ भाजपा मीडिया विभाग के राष्ट्रीय प्रमुख अनिल बलूनी भी हैं। इसके बाद जॉलीग्रांट से वे सड़क मार्ग से देहरादून के लिये रवाना हुए और डोईवाला में भी उनका स्वागत हुआ।

कोविंद इसके बाद मुख्यमंत्री आवास पहुंचे। यहां उन्होने उत्तराखंड के सभी भाजपा सांसदों व विधायकों से भेंट व वार्ता की। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष भाटी ने कोविंद के देहरादून आगमन पर हर्ष व्यक्त किया है। गौरतलब है कि जुलाई में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिये कोविंद एनडीए के उम्मीदवार हैं और उनका मुकाबला यूपीए की उम्मीदवार और पूर्व लोक सभा स्पीकर मीरा कुमार से है।