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तो उत्तराखंड से जमा हुए कुल 10.20 हजार करोड़ के पुराने नोट

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देहरादून। नोटबंदी के दौरान उत्तराखंड से कितनी राशि के पुराने नोट बैंकों में जमा कराए गए, इसकी तस्वीर साफ हो गई है। नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने जमा किए गए पुराने नोटों के आंकड़े जारी करते हुए बताया कि प्रदेश में करीब 10 हजार 20 करोड़ रुपये के पुराने नोट जमा कराए गए हैं।

आरबीआई के महाप्रबंधक (उत्तराखंड) सुब्रत दास के मुताबिक, राज्य में 500 व 1000 रुपये के 67 लाख 25 हजार पुराने नोट जमा कराए गए। इनमें 1000 रुपये के नोटों की संख्या 34 लाख 30 हजार है, जबकि 500 रुपये के नोटों की संख्या 32 लाख 95 हजार। राशि में इन नोटों का आंकलन करें तो पता चलता है कि उत्तराखंड में 1000 रुपये के नोटों के रूप में 3430 करोड़ रुपये बैंकों को लौटाए गए। वहीं, 500 रुपये के नोटों के रूप में यह आंकड़ा 6590 करोड़ रुपये रहा।
आरबीआइ महाप्रबंधक दास के अनुसार सबसे अधिक पुराने नोट एसबीआइ व पीएनबी में जमा कराए गए। इन दोनों बैंकों में ही पुराने नोट जमा कराने का आंकड़ा 65 फीसद से अधिक रहा। नोटबंदी के आखिरी दिनों के जमा कराए गए पुराने नोटों की राशि 7500 करोड़ रुपये से अधिक आंकी जा रही थी। जबकि अब यह आंकड़ा 10020 करोड़ रुपये निकलकर आया है। हालांकि अभी भी यह आंकड़ा अंतिम तौर पर घोषित नहीं किया गया है। इसमें आंशिक संशोधन संभव है।
नोटबंदी की अवधि समाप्त होने के बाद भी दून में 318 लोग पुराने नोट लेकर घूम रहे थे और उन्हें यह आशा थी कि उनके नोट बदल दिए जाएंगे। यह उन लोगों का आंकड़ा है, जो लोग पुराने नोट लेकर आरबीआइ महाप्रबंधक कार्यालय पहुंचे थे। इनका नाम-पता व पुराने नोटों की संख्या आरबीआइ कार्यालय के एक अस्थाई रजिस्टर में दर्ज किया गया था। इस रजिस्टर के अनुसार 500 व 1000 रुपये के 3820 पुराने नोट इन लोगों के पास थे, जिनकी राशि 24 लाख रुपये से अधिक थी। नोट बदलवाने के लिए लोगों के आरबीआइ कार्यालय पहुंचने पर यह व्यवस्था की गई थी, हालांकि लोगों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए इसे 12 दिन में ही बंद कर दिया गया। क्योंकि नोटबंदी के बाद 31 मार्च 2017 तक नोट बदलने की अनुमति सिर्फ कुछ शर्तों के साथ एनआरआइ को दी जा रही थी और ऐसे केंद्र भी दून से बाहर के राज्यों में थे।
पुराने नोटों का आरबीआइ में दर्ज ब्योरा (जनवरी 2017)
तिथि 1000 500
05 जनवरी 74 312
06 जनवरी 78 208
07 जनवरी 82 208
08 जनवरी 92 305
09 जनवरी 64 119
10 जनवरी 62 166
11 जनवरी 93 181
12 जनवरी 103 140
13 जनवरी 84 136
14 जनवरी 136 780
15 जनवरी 67 96
16 जनवरी 51 183

नोटबंटी को लेकर उत्तराखण्ड कांग्रेस ने मनाया काला दिवस

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देहरादून, भाजपा सरकार के नोटबंदी बरसी और जीएसटी के विरोध में उत्तराखण्ड कांग्रेस द्वारा आज देहरादून सहित प्रदेशभर के जिला मुख्यालयों पर जोरदार प्रदर्शन करते हुए काला दिवस मनाया गया। इस मौके पर प्रदर्शनकारियों ने केन्द्र सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह के नेतृत्व में बुधवार को कांग्रेस मुख्यालय पर भारी संख्या में कार्यकर्ता एकत्रित हुए। जहां से हजारों की संख्या में कांग्रेसी कार्य राजीव भवन से घण्टाघर-पलटन बाजार-कोतवाली-डिस्पेंसरी रोड़ होते हुए राजीव काम्प्लेक्स तक विरोध मार्च निकाला गया।

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कांग्रेस कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 8 नवम्बर 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिए गए नोटबंदी के अविवेकपूर्ण फैसले से एक वर्ष का समय पूरे होने के बाद देश में असमंजस का माहौल बना हुआ है तथा दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र में निवास करने वाला आम आदमी इस सदमे से नहीं उबर पाया है। जिससे आम गरीब एवं मध्यम वर्ग के व्यक्तियों को परेशानी उठानी पड़ रही है। जिसे कांग्रेस सहन नही करेगी और सरकार के ऐसे कार्यो को पार्टी आलोचना करती है।

उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद बैंकों में रखे अपने पैसे को वापस पाने के लिए निम्न व मध्यम वर्ग का व्यक्ति भिखारी की भांति लाईन में खड़ा होना पड़ा था। काला धन बाहर निकालने एवं जाली करेंसी को चलन से बाहर करने के नाम पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गये इस फैसले के पीछे देश के चुनिंदा औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने तथा देश की अर्थ व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की साजिश ही रही है।
उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपने तीन साल के कार्यकाल में एक भी ऐसी योजना नहीं दी जिससे गरीब व आम आदमी का भला हो सके उल्टे कुछ बड़े घरानों को फायदा पहुंचाने की नीयत से देश की आम जनता को प्रताडित करने का ही काम किया है।

प्रीतम सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस तुगलकी फरमान से पर्यटन पर आधारित उत्तराखण्ड जैसे अल्प संसाधन वाले राज्यों को भारी नुकसान उठाना पड़ा तथा पर्यटन व्यवसाय को भारी क्षति हुई। केन्द्र सरकार द्वारा जिस बिना पूर्व तैयारी के नोटबंदी और जी.एस.टी. को लागू किया गया। कांग्रेस पार्टी जीएसटी की पक्षधर रही है तथा यूपीए सरकार के समय 2004 में पहली बार तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने अपने भाषण में जीएसटी का उल्लेख किया था।

उन्होंने बताय कि यूपीए सरकार की कोशिश थी कि 2010 तक जीएसटी देश में लागू किया जाय तथा इसके लिए सभी राज्यों से जीएसटी के बारे में सहमति भी मांगी गई थी। परन्तु तत्कालीन गुजरात सरकार के मुख्यमंत्री एवं वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिह चौहान ने जीएसटी पर सहमति देने की बजाय जीएसटी को सिरे से खारिज कर दिया था। यूपीए सरकार अधिकतम 14 प्रतिशत टैक्स के साथ जीएसटी लागू करने जा रही थी, जबकि वर्तमान सरकार ने जीएसटी में टैक्स के 4 स्लैब तय किये हैं।

राज्य स्थापना दिवस पर पुलिस लाइन में परेड

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राज्य स्थापना दिवस के शुभ अवसर पर रिजर्व पुलिस लाइन देहरादून स्थित ग्राउंड में रैतिक परेड का आयोजन किया जाना प्रस्तावित है। रैतिक परेड के दौरान प्रतिभागियों एवं उपस्थित  जन समुदाय की सुरक्षा के दृष्टिगत दर्शक के रूप में विशिष्ट महानुभावों, गणमान्य व्यक्तियों एवं जनसामान्य के वाहनों की पार्किंग व्यवस्था के लिये निम्नलिखित स्थानों को पार्किंग स्थल के रूप में चयनित किया गया है :-

1.विशिष्ट महानुभावों /VIP /अधिकारीगण पार्किंग -शहीद स्मारक ग्राउंड पुलिस लाइन

2.प्रेस /मीडिया-  शहीद स्मारक के पीछे

3.सामान्य जनता पार्किंग -बन्नू स्कूल

परेड देखनेआने वाले स्कूली बच्चों के वाहन को पुलिस लाइन गेट नंबर: 2 पर उतारकर बन्नू स्कूल में पार्क किया जाएंगा।

उक्त कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले समस्त प्रतिभागियों एवं दर्शकों से अनुरोध है कि अपने वाहनों को निर्धारित पार्किंग स्थल में ही पार्क कर यातायात पुलिस को व्यवस्था बनाने में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान करें।

कलियर में हटाया गया अतिक्रमण, पुलिस के साथ रहे अफसर

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रूड़की,पिरान कलियर साबिर पाक के 749वें सालाना उर्स से पूर्व मेला क्षेत्र में अतिक्रमण हटाया गया। इस दौरान कुछ दुकानदारों ने इसका हल्का विरोध भी किया लेकिन भारी फोर्स के कारण विरोध नाकाम रहा। मेले की तैयारियों को लेकर शनिवार को ज्वाइंट मजिस्ट्रेट नितिका खंडेलवाल एव एसपी देहात मणिकांत मिश्र ने मेला क्षेत्र की व्यवस्थाओं का जायजा लिया था।

ज्वाईंट मजिस्ट्रेट व एसपी देहात ने दरगाह प्रबधक को अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। दरगाह प्रबन्धक व पुलिस ओर प्रशासन ने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ़ अभियान चला चलाया और कुछ अतिक्रमणकारियों को दो घंटे का समय दिया गया। दो घण्टे बाद अवैध अतिक्रमण को फिर से हटाया गया। इस मौके पर नायब तहसीलदार चित्रकुमार त्यागी,दरगाह प्रबधक शमसाद अंसारी, थाना प्रभारी देवराज शर्मा आदि मौजूद रहे।

महिला चीता पुलिस ने बुजुर्ग को सकुशल घर पहुंचाया

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थाना बसंत बिहार की महिला चीता को सूचना मिली कि एक व्यक्ति जोकि पैरालाइज है एवं चलने फिरने मे असमर्थ थे राज विहार पर बैठे हुए है। इस सूचना पर महिला चीता द्वारा उस स्थान पर पहुंचकर पूछा गया तो वह अपना घर का पता भूल गए थे।

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महिला चीता ने ड़ी मुश्किल से उनके घर का पता किया तो पता चला की उनका नाम युसूफ खान है, जोकि संजय कॉलोनी मुस्लिम बस्ती, डालनवाला में रहते है।

महिला चीता ने ऑटो बुक करके बुजुर्ग व्यक्ति को उनके घर सकुशल पहुंचाया, आस पास के लोगों ने चीता पुलिस के कार्य की भूरी भूरी प्रशंसा की गई।

भूमि पर कब्जा पाने के लिए दर-दर भटक रहा बुजुर्ग

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चमोली जिले के घाट विकासखंड के मोठा गांव के बुजुर्ग भूमि पर कब्जा पाने के लिए राजस्व अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। अधिकारी छह माह से उन्हें आश्वासन देकर टरका रहे हैं। अब ग्रामीण ने जिलाधिकारी से मदद की गुहार लगाई है।

विकासखंड घाट का सुदूरवर्ती गांव मोठा गांव के 76 वर्षीय कुंवर सिंह विगत छह माह से अपने खेत को प्राप्त करने के लिए विभागों के चक्कर काट रहा है। इस दौरान गेहूं की बुआई हो रही है, काश्तकार का कहना है कि अगर खेत उसे मिले तो वह गेहूं बोए। परंतु प्रशासन के अधिकारियों की लापरवाही के कारण वह खेतों में गेहूं तक नहीं बो पा रहा है।

मोठा गांव निवासी कुंवर सिह ने अब जिलाधिकारी से मदद की गुहार लगाई है। कुंवर सिंह का कहना है कि वर्ष 1979 में पिता ने मोठा गांव के कृपाल सिंह से 60 नाली भूमि खरीदी थी। उस पर वह उसका परिवार लगातार खेती करता आ रहा था। कुछ समय पूर्व खेतों में बुआई नहीं की तो गांव के अवतार सिंह व शराद सिंह ने बुआई कर दी। अब उन्हें खेत की जरूरत थी तो नहीं दे रहे हैं। हटाने के लिए अधिकारियों की गुहार लगाई गई।

पूर्व में जिलाधिकारी ने मामले में पटवारी गंडासू को मौके पर जाकर तस्दीक करने के निर्देश दिए गए थे। परंतु आज तक मौके की तस्दीक के लिए पटवारी तक नहीं पहुंचा है। वह काश्तकारी के जरिये ही परिवार का पालन पोषण करता है। खेत से कब्जा न हटने के कारण उसके सामने रोजी रोटी का संकट भी गहरा गया है। ग्रामीण का कहना है कि जल्द प्रशासन की ओर से कार्रवाई नहीं की जाती है तो वह न्यायालय की शरण में जाएंगे।

शराब के साथ तीन लोग गिरफ्तार

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पुलिस को अवैध शराब की तस्करी के विरोध में चलाये जा रहे अभियान में सफलता मिली है। हरियाणा से लायी जा रही अवैध 96 बोतल अंग्रेजी शराब व बीयर की 24 केन के साथ तीन लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर वाहन भी सीज कर दिया है।

पुलिस अधीक्षक तृप्ति भट्ट के अनुसार, पुलिस को जानकारी मिली थी कि चमोली जिले के आदिबद्री क्षेत्र में अवैध शराब लायी जा रही है। पुलिस ने वाहनों की चेकिंग में एक कार रोकी तो उसमें सवार तीन लोग हड़बड़ा गये। इनके पास से 98 बोलत अंग्रेजी शराब व 24 केन बीयर की बरामद हुई। आरोपियों में विकास सिंधु, दीपक पांचाल व प्रदीप देशवाल शामिल हैं। इन तीनों के विरुद्ध आबकारी अधिनियम के तहत मामला पंजीकृत कर लिया गया है।

पुलिस के अुनसार, आरोपियों का पहले से अपराधिक इतिहास रहा है। ये पहले भी यहां पर अवैध शराब का धंधा करते थे।

संदिग्ध परिस्थितियों में गोली लगने से प्रोपर्टी डीलर की मौत

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हरिद्वार, शहर कोतवाली क्षेत्रान्तर्गत उत्तरी हरिद्वार इलाके में संदिग्ध परिस्थितियों में हरियाणा के एक प्रॉपर्टी डीलर की उसी की लाइसेंसी रिवाल्वर से गोली लगने से मौत हो गई। मृतक अपने तीन साथियों के साथ हरिद्वार आया था। प्रॉपर्टी डीलर अनिल कुमारअपने साथी रणवीर, प्रदीप और दिनेश के साथ हरिद्वार आया था। अनिल यहां उत्तरी हरिद्वार के सुखधाम आश्रम में अपने मित्रों के साथ ठहरा था। बताते है कि देर रात सन्दिग्ध परिस्थितियों में अनिल के लाइसेंसी रिवाल्वर से गोली चल गई। गोली अनिल के पेट में जा लगी। लहुलुहान हालत में अनिल को कनखल के एक अस्पताल में उपचार के लिए लाया गया। जहां अनिल कुमार की मौत हो गई।

पुलिस पूछताछ में प्रॉपर्टी डीलर के साथियों ने बताया कि अनिल के हाथ से रिवाल्वर छूटकर गिरने पर खुद ही गोली चल गई। सूचना मिलते ही पुलिस अस्पताल पहुंची और शव को कब्जे में ले लिया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवाया। पुलिस ने रिवाल्वर भी कब्जे में ले लिया है। सूचना पर झज्जर से अनिल के परिजन भी हरिद्वार पहुंच गए हैं। एसपी क्राइम प्रकाश आर्या ने बताया कि पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। पुलिस मामले कि तफ्तीश शुरू कर दी है।

 

पर्यटन स्थल गुच्चु पानी में प्लास्टिक वर्जित

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राजधानी देहरादून के पर्यटन स्थल गुच्चु पानी में अब पानी की बोतल, कुरकुरे, लेज, बिस्कुट एवं अन्य खाद्य सामग्री के उन पैकेटों को ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसमें प्लास्टिक का रैपर लगा होगा। यह निर्देश मंगलवार को देर शाम जिलाधिकारी एस.ए मुरूगेशन ने कैम्प कार्यालय में गुच्चु पानी पर्यटन स्थल डीएमसी की बैठक दिए। बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये।
गुच्चुपानी पर्यटन स्थल पर गेट के भीतर कोई पर्यटक प्लास्टिक के रैपर वाली कोई भी खाद्य सामग्री मुख्य गेट से अन्दर ले जा रहा है तो उस खाद्य सामग्री के प्लास्टिक रैपर पर 10 रुपये का स्टीकर लगाया जायेगा। वह 10 रूपये पर्यटक को तब लौटाया जायेगा जब वह वापस आते समय रैपर गेट पर जमा करायेगा।

वर्तमान में यह व्यवस्था पर्यटन स्थल के अन्दर के नौ दुकानों, कैन्टीन तथा मुख्य गेट पर लागू की गयी है। जिलाधिकारी ने इस व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालन के लिए पीआरडी के माध्यम से दो जवान रखने के निर्देश पर्यटन विभाग को दिये है। जिलाधिकारी ने स्वजल परियोजना के माध्यम से पर्यटन स्थल पर 15 जैविक एवं अजैविक कूड़ेदान लगाने तथा कूड़े के निस्तारण के लिए लगभग 5 लाख की लागत से सेरीगेसन सेन्टर बनेगा, जिससे खाद भी बनाई जायेगी।

जिलाधिकारी ने निर्देश दिये कि सांय पांच बजे के बाद पर्यटन स्थल पर अनाधिकृत प्रवेश प्रतिबन्धित रहेगा, अनाधिकृत प्रवेश रोकने के लिए पर्यटन पर स्थल जाली लगाने के निर्देश दिये, जिससे सांय पांच बजे के बाद पर्यटन स्थल पर कोई अनाधिकृत प्रवेश न कर पाये। जिलाधिकारी ने पर्यटन स्थल पर साफ-सफाई के सौन्दर्यीकरण, कैन्टीन के सामने पार्क का विकास तथा गेट पर चैकीदार की व्यवस्था करने के निर्देश दिये।

सोलहवां पार उदास उत्तराखंड

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प्रदूषण की मार से कराह रहे देश को अपने पहाड़ों, नदियों, जंगलों और हिमनदों से पुरसुकून बनाने के बावजूद उत्तराखंड खुद ठंडी उदासी की चादर में लिपटा हुआ है। उत्तराखंड को अलग राज्य बने सोलह साल पूरे हो गए मगर यहां के मूल निवासियों में इसका कोई उत्साह ही नहीं है। अलबत्ता राज्योत्सव का सरकारी तामझाम और प्रभु वर्ग में उत्सव का उल्लास जाहिर है कि ठाठें मार रहा है। फिर भी लड़कर हासिल किए गए अपने ही राज्य में पहाड़ी जनता आज बेरौनक है। पलायन थमने के बजाए इन 16 साल में जहां दुगुनी गति से हो रहा है वहीं प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती विभीषिका पहाड़ियों का जीवन दिन ब दिन अधिक दुरूह बना रही है। उनके भीतर राज्य के किषोर हो जाने का न कोई उल्लास है और न ही अपना भविश्य सुधरने की कोई उम्मीद।
साल 2000 के नवंबर महीने में अलग राज्य बने उत्तरांचल ने पिछले 16 साल में हालांकि आंकड़ों में तो अच्छी-खासी तरक्की की है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा राज्य में कुल 53487 पंजीकृत उद्योगों का है। राज्य गठन के समय उत्तराखंड क्षेत्र में महज 14,163 पंजीकृत उद्यम थे। चालू माली साल के बजट के अनुसार इन उद्योगों में कुल 11221 करोड़ रूपए मूल्य का पूंजी निवेश हो रखा है। सोलह साल पहले कुल निवेशित पूंजी 700.29 करोड़ रूपए ही थी। इतने सारे नए उद्योग लगने के बावजूद ताज्जुब यह है कि राज्य की 60 फीसद जनता अंत्योदय अन्न योजना में गरीबों को मिलने वाले राशन से जीवनयापन को मजबूर है। जबकि इतने सारे उद्योग लगने के बाद तो राज्य में सारे गरीबों-बेरोजगारों को कमाई का हिल्ला आसानी से मिल जाना चाहिए था!
विडंबना यह है कि रोजगार की तलाश में पहाड़ियों के पलायन का आंकड़ा बढ़कर दुगुना हो गया है। पिछले 16 साल में बनी पांच सरकारों के तमाम जुबानी जमा-खर्च के बावजूद न तो पलायन रूका और न ही खांटी पहाड़ियों की जिंदगी आसान और सुरक्षित हुई। रही-सही कसर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन खेती का रकबा 70,000 हेक्टेयर घट कर सात लाख हेक्टेयर रह जाने ने पूरी कर दी। जाहिर है कि यह जमीन उन मगरमच्छों के पेट में हजम हो गई जो उसे किसानों से कौड़ियों के मोल खरीद कर सोने के भाव बेच रहे हैं।

गौरतलब है कि उत्तराखंड का भौगोलिक क्षेत्रफल यूं तो 53.48 लाख हेक्टेयर है मगर इसमें से मात्र 28.50 प्रतिशत क्षेत्र ही मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध है। बाकी 71.05 प्रतिशत भूभाग में जंगल फैले हुए हैं जिनकी जमीन के अतिक्रमण पर कानूनन रोक है। इसीलिए राज्य में जमीन बेशकीमती है। इसी वजह से राज्य की अधिकतर दौलत देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर जैसे अपेक्षाकृत मैदानी जिलों में सिमटती जा रही है। ज्यादातर कारोबार भी इन्हीं संपन्न जिलों में ठिठक जाने से सरकार को राजस्व की मोटी कमाई यहीं से हो रही है। लिहाजा आबादी की बसाहट और विकास की दौड़ में भी यही जिले अव्वल हैं। बाकी प्रदेष को इनका नाका पूरने के बाद बची-खुची रकम से ही गुजारा करना पड़ रहा है।
औद्योगिकरण की तरह ही उत्तराखंड में बाल विकास योजनाओं की संख्या भी कई गुना बढ़कर 105 हो गई है। इनके तहत सरकारी आंकड़ों के अनुसार 14,947 आंगनबाड़ी और दूरदराज इलाकों में 5120 लघु आंगनबाड़ी चल रही हैं। इसके बावजूद बाल मृत्यु दर बेकाबू है। राज्य में जनाना-मर्दाना स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी बढ़कर कुल 35014 हो गई है। फिर भी पहाड़ों में जचगी के दौरान जच्चा का जीवन बचा पाना कठिन चुनौती है।
गंगा और यमुना नदियों को अपने 43.70 प्रतिषत भूभाग में संजो कर उत्तराखंड देश के करोड़ों किसानों के खेतों, कारखानों और घरों की प्यास बुझाता है। औसतन 35 करोड़ आबादी का जीवन इन दोनों नदियों पर निर्भर है। ये जहां से गुजरी इन्होंने किसानों-कारोबारियों और पंडों को मालामाल कर दिया। फिर भी इनसे जुड़ी बेशुमार प्राकृतिक आपदाओं की निरंतर मार झेलने वाले पहाड्यिों का कोई पुरसा हाल नहीं है। आश्चर्य यह है कि पर्यटन और बिजली घरों से कमाई बढ़ाने के बुनियादी ढांचे में अरबों रूपए फूंकने को तैयार केंद्र और राज्य की सरकार इन पीड़ितों की सुरक्षा अथवा आजीविका के भरोसेमंद इंतजाम के प्रति से आंखें मूंदे बैठी हैं।
राजनीति ने राज्य में भ्रश्टाचार की जड़ें और गहरी कर दीं। फर्क सिर्फ इतना है कि उत्तर प्रदेश के राज में मैदानी सरकारी अमला, पहाड़ियों के प्रति हिकारत जता कर अपनी जेबें भरता था। अब उत्तराखंड नामकरण के बाद पहाड़ी ही अपने हिमबंधुओं का गला काट रहे हैं। इस तरह पिछले सोलह साल में बड़ी आशा और विश्वास से हासिल किए गए कुदरती ताजगी से भरपूर इस राज्य में दो उत्तराखंड बन गए हैं।
एक उत्तराखंड वो है जिसमें सरकारी नौकरी, ठेकेदारी, नेतागीरी, पर्यटन, बिजलीघर निर्माण, बेशकीमती जमीन की दलाली, औद्योगिकरण और सेना को सप्लाई से मालामाल करीब बीस फीसद जनता है। दूसरा उत्तराखंड वो है जिसमें दिन-रात कुदरती बाधाओं से जूझते, क्यारीदार खेतों में पसीना बहाते, बोझा ढोते, कारखानों में डबल पारी में सिंगल मजदूरी के लिए खटते, दो जून की रोटी की अनिश्चितता में दुबले और बच्चों को पढ़ा-लिखा कर पहाड़ की बेगारी से आजाद कराने को आतुर मां-बाप और उनके बेबस परिवार हैं। (जारी)