Page 366

मसूरी में लाँच हुई नई और आकर्षक ”पहाड़ी टोपी”

0

बदलते समय के साथ उत्तराखंढ भी 18 साल का हो गया और राज्य के आठारहवे जन्मदिन पर मसूरी में पिछले दो दशक से रहने वाले जोड़े ने राज्य को एक तोहफा दिया है।

समीर शुक्ला और उनकी पत्नी कविता शुक्ला जोकि मसूरी में ‘सोहम हैरिटेज और आर्ट सेंटर चलाते हैं’ दोनों ने अपने अनुभव और पहाड़ी परंपरा को एक पहाड़ी टोपी के रुप में पिरोया है, जिसमे किनारे पर रंगबिरंगी धारियां और उसपर प्रदेश पुष्प ब्रह्मकमल को बहुत ही खुबसूरती से लगाया गया है।

पिछले कई सालों से इस दंपत्ति ने मिलकर उत्तराखंड की परंपरा और यहां की जीवनशैली को बढ़ावा दिया है। चाहे वह उत्तराखंड की पारंपरिक गहने हो, या फिर पहाड़ी वाद्य यंत्र, पहाड़ी कला हो या फिर शिल्प। इस दंपत्ति द्वारा यह पहाड़ी टोपी को लोगों के बीच में लाना कोई चौकाने का विषय नहीं हैं क्योंकि पिछले दो दशक यह दोनों मिलकर उत्तराखंड की सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं।

ec28ebef-927f-467c-8c30-36ffcfe423a4

समीर शुक्ला से टीम न्यूजपोस्ट की बातचीत में बताया कि, “इस टोपी को बनाने का मुख्य कारण था उत्तराखंड की पारंपरिक टोपी को एक नए अवतार में लोगों के बीच लाना। उत्तराखंडी टोपी राज्य की पहचान है उसमें भी ये टोपी गांधी टोपी का ही रुप है।” उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में हर उम्र के लोग बूढ़ा हो या जवान या फिर राजनितिज्ञ सब इस टोपी को पहनते हैं। यह टोपी उत्तराखंड राज्य के लोगों के लिए खास है, बस यही सोच कर सोहम हैरिटेज एंड आर्ट कल्चर के दंपत्ति ने पहाड़ की स्पेशल टोपी को बनाया।

समीर बताते हैं कि, “हालांकि हमे मालूम था कि लोगों को इसे पहाड़ी टोपी की तरह स्वीकार करने में थोड़ी मुश्किल होगी लेकिन आसान राह पर चलने में मजा भी नहीं आता, बस फिर गांधी टोपी में बदलाव के साथ हमने पेश किया ‘पहाड़ी टोपी’ जो अपने आप में राज्य का प्रतीक है।” टोपी में इस्तेमाल हुए चार रंगीन धागे राज्य के अलग-अलग संस्कृति को दर्शाते हैं वहीं पीतल का ब्रह्म कमल ना केवल राज्य पुष्प है बल्कि हिमालय राज्य का सबसे पवित्र फूल है।समीर ने बताया कि, “इस टोपी को बनाने में उन्हें लगभग तीन महीने लगे क्योंकि इसमें इस्तेमाल किया गया कपड़ा अलग-अलग मौसम और अलग क्षेत्रों से लाया गया है।”

इस टोपी को बनाने में सबसे ज्यादा ध्यान युवा और बूढ़े लोगों का रखा गया है और इसके अलावा पर्यटकों के अनुरुप भी इसका डिजाईन एकदम सटीक है।समीर कहते हैं कि टोपी बनाने में हमने कोई बेईमानी नही कि है और जल्द ही हम महिलाओं की पहाड़ी टोपी भी लेकर आऐंगे।

यह टोपी तीन तरह की हैः

  • ऊनी
  • सर्दियों के लिये
  • गर्मियों मे लिये

इन तीनों टोपियों के दाम 275 रुपये से लेकर 400 रुपये तक हैं।

दंपत्ति के 13 जिलों की यात्रा के दौरान राज्य की पोशाक और उनके पारंपरिक गहनों की गहन शोध ने उन्हें पहाड़ी टोपी बनाने में काफी मदद की।तो अगली बार जब आप मसूरी का रुख करें तो यहां से उत्तराखंड की यह सुंदर यादगार पहाड़ी टोपी ले जाना ना भूलें।

जल्द ही उत्तराखंड पुलिस बॉडी वार्न कैमरे से होगी लैस

0

उत्तराखंड में अब पुलिस कर्मियों की निगरानी तीसरी आँख करेगी।जल्द ही उनकी वर्दी में बॉडी वार्न कैमरा लगा हुआ नजर आएगा जो सामने वालों के साथ पुलिस कर्मियों की हर गतिविधि को कैप्चर करेगा।पुलिस आधुनिकरण के तहत मित्र पुलिसकर्मियों की जवाबदेही बढ़ाने के मकसद से वर्दी में बॉडी वार्न कैमरे लगाने का प्रस्ताव बना कर भारत सरकार को भेज दिया गया हे।

इस बारे में बात करते हुए अनिल कुमार रतूड़ी डीजीपी उत्तराखंड ने कहा कि, “पुलिस एक कठिन काम कर रही है जिसमें बहुत बार लॉ इनफोर्स करना पड़ता है और कई बार ऐसा होता है कि पुलिस के सही काम करने के बाद भी लोग उन पर आरोप लगाते हैं।ऐसे में यह बता पाना मुश्किल हो जाता है कि सही कौन है और गलत है।इस बात का ध्यान रखते हुए पुलिस के काम में पारदर्शिता लाने के लिएआधुनिकता के इस दौर में जब हर चीज आधुनिक तत्वों से लैस है तो पुलिस क्यों पीछे रहेगी।” इसी सोच के साथ बॉडी वॉर्म कैमरे पुलिस को देने का प्रयास किया जा रहा जिससे पुलिस द्वारा की जी रही कार्यवाही सीधे-सीधे कैमरे में कैद हो सके। डीजीपी रतूड़ी ने बताया कि, “इस तरह की योजना को हमने राज्य सरकार से मंजूरी के भारत सरकार के सामने पेश किया है।” इसी मसले में बीते शुक्रवार को वरिष्ठ अधिकारियों ने अपनी प्रस्तुति की और आशा जताई कि भारत सरकार इसे अपने आधुनिकिरण योजना के अंदर मंजूर कर दे और अगर ऐसा हुआ तो इससे पुलिस के कार्यों में पारदर्शिता लाने में बहुत मदद मिलेगी।

अगर यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाता है तो पहले चरण में उत्तराखंड पुलिस 500 बॉडी वार्म कैमरे खरीदेंगे।

उत्तराखंड की डबल इंजन सरकार जल्द पहाड़ों को रोपवे से जोड़ेगी

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन और चार धाम ऑल वेदर रोड परियोजना के बाद अब पहाड़ों को रोप वे से जोड़ने का सपना पूरा होने जा रहा है, केंद्र सरकार जल्द ही राज्य को रोप वे परियोजना का तोफा दे सकती है,जिसके लिए प्रदेश सरकार ने तैयारी शुरू क्र दी है। परियोजना शुरू होने से उत्तराखंड में पर्यटन को नयी दिशा मिलेगी और यहाँ रोजगार के भी अवसर खुल सकेंगे।

उत्तराखंड पूरे विश्व में अपने पर्यटक स्थल और तीर्थ स्थल के लिए जाना जाता है जहां देश विदेश से लोग हर साल आते हैं ऐसे में उत्तराखंड के पर्यटक स्थलों को अब रोप वे योजना से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है जिसके लिए प्रदेश सरकार ने तैयारी शुरू कर दी है। आपको बता दें उत्तराखंड के 7 पर्यटक स्थलों को रोप वे से जोड़ा जाना है प्रदेश सरकार ने यह प्रस्ताव ब्रिडकुल ब्रिज रोप वे एंड अदर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन से तैयार कराए हैं इन सभी रुपए की लागत 1228.06 करोड़ रुपए लगाई गई है, प्रस्तावों पर केंद्र की मंजूरी के बाद ब्रिड कुल इन रोप वे का निर्माण कराएग।

पहले भी राज्य सरकार योजनाओं को पीपीपी मोड पर बनाने की सोच रही थी लेकिन निवेशकों में दिलचस्पी नहीं दिखाई प्रदेश सरकार ने इसका जिम्मा बिल्कुल के कंधों पर सौंपा है जिसको लेकर प्रदेश के पर्यटन मंत्री भी उत्साहित हैं उनका कहना है कि यह महत्वकांक्षी योजना उत्तराखंड वासियों के लिए तीर्थ स्थल और पर्यटन स्थल को जोड़ने का काम करेगा, जिसमें ऋषिकेश से कुंजापुरी, हाथीपांव से मसूरी, स्नोव्यू से नैना पीक, बीफ, खरसाली से यमुनोत्री, बरसू से दायरा, सोनप्रयाग से केदारनाथ, घांघरिया से हेमकुंड मौजूद हैं।

उत्तराखंड में पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए यह प्रोजेक्ट काफी अहम मारा जा रहा है जिससे पर्यटन के क्षेत्र में काफी बढ़ावा होगा स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और साथ ही पहाड़ से हो रहे पलायन पर भी रोक लगेगी और पर्यटकों को जहां पहले उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों को करीब से दीदार नहीं कर सकते थे वह इसकी वजय से पहाड़ों की खूबसूरती को करीब से देख पाएंगे और जहां वह नहीं पहुंच सकते थे वहां रो रोपवे के जरिए आसानी से पहुंच सकेंगे। दूसरी ओर इस परियोजना से व्यापारियों में भी काफी खुशी है उनका मानना है कि रोप वे की मदद से पहाड़ी क्षेत्रों में भी सामान आसानी से पहुंचाया जा सकेगा, पहले ढुलाई के काफी पैसे लगते थे और वक्त भी काफी लग जाता था लेकिन इस परियोजना से यह बहुत आसान हो जाएगा और काफी फायदेमंद भी रहेगा।

उत्तराखंड में पर्यटन की असीम संभावनाएं है ऐसे में अगर केंद्र सरकार दवरा रोप वे प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिलती है तो इससे आने वाले समय में पर्यटन में तेजी होने के आसार बन जायेंगे और उत्तराखंड पर्यटन का एक नया हब बन सकेगा।

 

जारी है उत्तराखंड के संसाधनों की लूट

0

उत्तराखंड को अलग राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लंबा आंदोलन चलाने में अपने काम-धंधे के हर्ज से लेकर जान तक की कुर्बानियां तक जिन खांटी पहाड़ियों ने दीं उनकी आज न कोई पूछ है न ही कोई गिनती। उन्हीं के हाथों से चुनी गई सरकार उनके संसाधनों जैसे पानी, पर्यावरण, खनिजों तथा पर्यटन बढ़ाने के नाम पर आबोहवा तथा संस्कृति तक को बाहर वालों के हवाले करती जा रही है। दोनों हाथों से संजो कर देश को जीवनदायी गंगा और यमुना सौंपने के बदले उनके पल्ले सिर्फ प्राकृतिक आपदा और परेशानियां ही आ रही है।

गंगा और यमुना नदियों की बदौलत आज उत्तर प्रदेष से लेकर पष्चिम बंगाल ही नहीं हरियाणा और राजस्थान तक के किसान और फसलों के आढ़तिये मालामाल हैं मगर उनके बहुमूल्य पानी के बदले केंद्र सरकार उत्तराखंडियों को पांच पैसे का मुआवजा भी नहीं दिलाती। राजधानी दिल्ली सहित देश भर में कम से कम 35 करोड़ लोग अपने अस्तित्व के लिए गंगा और यमुना नदियों पर ही निर्भर है। केदारनाथ की ही आपदा को लें तो उसमें कम से कम पांच हजार उत्तराखंडियों को अपनी जान से हाथ धोने पड़े थे। उस काली विभीषिका में हजारों की तादाद में यात्री भी मारे गए थे। इतना ही नहीं हजारों यात्री और स्थानीय लोग आजतक लापता हैं।

देश के मैदानी प्रदूषण के कारण पहाड़ों में बढ़ रही बादल फटने की दुर्घटनाओं के कारण राज्य में हर साल कम से कम पांच सौ लोग हताहत होते हैं। उनके गांव-खेत उजड़ने और घरेलू सामान तथा मवेशियों की हानि अलग से है। बादल फटने की विभीषिका राज्य में हर साल पहले से अधिक विकराल हो रही है। नींद में सोते-सोते ही बेचारे पहाड़ी बाशिंदे बाढ़ में बह कर दम तोड़ रहे हैं। फिर भी उनके नाम पर बने उत्तराखंड के कथित पहाड़ी मुख्यमंत्री की सदारत वाली सरकार उन्हें बारिश के मौसम में सुरक्षित रखने का कोई भी उपाय नहीं कर रहीं। सारी नई टेक्नोलाॅजी उनके सचिवालयों के भीतर ही सिमटी हुई है। क्या बारिश में खतरनाक इलाकों के बाशिंदों को सरकार उनके मवेषियों सहित किन्हीं सुरक्षित ठिकानों पर लाकर नहीं रख सकती। आखिर पहाड़ों में अब आबादी ही कितनी बची है? इसी तरह बारिश में मानव जीवन के लिए खतरनाक सिद्ध होने वाले गांवों के आसपास क्या सेना के बंकरों की तरह सेफ हाउस नहीं बनाए जा सकते?

पीढ़ियों से दुरूह पहाड़ों में बसे लोगों को मौसम का मिजाज देख कर यह बखूबी समझ आ जाता है कि बारिश के दौरान कब बादल फटने की नौबत आ सकती है। लेकिन किसी आपात शरणस्थली के अभाव में उनके पास अपनी जान पर आसन्न खतरे को भांप लेने के बावजूद वहीं मर जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। यदि सेफ हाउस बन जाएं तो आसपास के 10-15 गांव के लोग अपने मवेशियों के साथ कयामत की रात अथवा दुपहरी सुरक्षित बिता कर बच सकते है। फिर मौसम सामान्य होने पर कुदरत के कहर से बची-खुची अपनी जिंदगी के सिरे तलाश कर फिर अपनी दिनचर्या शुरू कर सकते हैं। अफसोस यह है कि उत्तराखंड की पिछली पांच निर्वाचित सरकारों ने ही नहीं बल्कि किसी केंद्र सरकार ने भी उन्हें बचाने की कोई स्थाई व्यवस्था आज तक नहीं की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी चारधाम यात्रा मार्ग को सदाबहार बनाने के लिए तो अपना खजाना खोल दिया मगर गरीब पहाड़ियों की जान बचाने को सुध भी नहीं ली। लेते भी क्यों चारधाम यात्रा पर तो उनके पैतृक राज्य और देश के अन्य अंचलों के लाखों तीर्थ यात्री हर साल दर्शन करने आते हैं और करोड़ों रूपए का कारोबार होता है। मगर बेचारे उत्तराखंडियों से तो शायद उन्हें वोट बटोरने तक ही वास्ता था, उनकी जानमाल बचाने से क्या लेना-देना!

ऐसा नहीं है कि सेफ हाउस बनाने की टेक्नोलाॅजी देश में उपलब्ध नहीं है। कश्मीर में बनी शनानी-श्रीनगर सुरंग ऐसी टेक्नोलाॅजी मौजूद होने का सबसे बड़ा सुबूत है। लेकिन भला उत्तराखंडियों को उसका लाभ कोई भी सरकार क्यों दिलाने लगी? इस लिहाज से देखें तो अलग पहाड़ी राज्य बनने के समय जो मुद्दे ज्वलंत थे वे आज भी उत्तराखंडियों के मन में सुलग रह हैं। उत्तराखंड ही नहीं अब तो यूपी में भी उत्तराखंडी मूल के व्यक्ति योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं मगर उन्होंने भी अपने छोटे भाई यानी उत्तराखंड को उसके हिस्से की परिसंपत्तियां सौंपने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। उत्तराखंड के भीतर उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग इत्यादि की परिसंपत्तियों के बोर्ड राज्य में अनेक जगह आज भी लगे हुए हैं।

गैरसैंण में राजधानी आज सोलह साल बाद भी नहीं बनी। बस अंग्रेजों द्वारा अपनी बसाए गए देहरादून में ही राजधानी के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। हां इतना जरूर है कि पिछले सोलह साल में ही राजधानी बनने के बाद से देहरादून अपने पूरे शबाब पर आ गया है। बराए नाम भराड़ीसैंण में कुछ भवन जरूर खड़े कर दिए गए हैं ताकि आज नहीं तो कल राज्य की राजधानी गैरसैंण क्षेत्र में पहुंचने का भ्रम जनमानस में बना रहे। वैसे भी देहरादून की सरकारों को ज्यादा चिंता दायित्वधारियों की है जो अपने-अपने दलों की सरकार में जनता के पैसे पर ऐष करते हैं। वीरपुर-लच्छी से लेकर नानीसार और पोखरा तक से जनाधिकृत प्राकृतिक संसाधन जिस बेहयाई से पूंजीपतियों को सौंपे गए, उसमें नेता और नौकरशाह दोनों ही शामिल है। .

राज्य के पानी अैेर नदियों पर कब्जे की साजिश तमाम पर्यावरणीय चेतावनियों के बावजूद जारी है। पनबिजली परियोजना लगाने की हड़बड़ी में आवश्यक जन सुनवाई तक प्रषासन नहीं होने दे रहा। पंचेश्वर पनबिजली परियोजना के बाबत हाल में ऐसा ही मंजर दिखा। उसके लिए जनसुनवाई के दौरान जनता और जागरूक प्रतिनिधियों को धकेल कर एक तरफ कर दिया गया। वहां मौजूद पत्रकारों और उत्तराखंड आंदोलन के सूत्रधार काशी सिंह ऐरी तक से धक्कामुक्की की गई। अफसोस यह है कि ऐसा राज्य में जनता का तीन चैथाई से अधिक बहुमत लेकर सत्तारूढ़ हुए दल के गुर्गों ने अपने आलाकमान के इषारे पर किया। इससे साफ है कि सरकार जनसुनवाई दरअसल हर कीमत पर पंचेश्वर बांध के पक्ष में ही करवाने पर आमादा थी।

इन हालात में साफ है कि गंगा-यमुना और चार धामों को अपने में समेटे मालामाल उत्तराखंड की गरीब जनता को जरूरत फिर से जनांदोलन छेड़ने की है जो लुटेरे और दलाल नेताओं की गिरफ्त से मुक्त करके राज्य की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थिति अपने हित के अनुकूल बदल सके।

शुरु हुई सलमान खान की रेस 3 की शूटिंग

0

सलमान खान की नई फिल्म रेस 3 की शूटिंग शुरु हो गई है। मुंबई में शुरु हुए फिल्म के पहले शेड्यूल में फिल्म की पूरी टीम हिस्सा ले रही है। टिप्स के रमेश तौरानी द्वारा बनाई जा रही रेस की तीसरी कड़ी में सलमान खान के साथ जैक्लीन फर्नांडिज, बाबी देओल, साकीब सलीम, डेजी ईरानी और फ्रेडी दारुवाता काम कर रहे हैं। रिमो डिसूजा इसका निर्देशन कर रहे हैं।

मुंबई में एक सप्ताह के शेड्यूल के बाद दिसंबर में फिल्म का अगला शेड्यूल अबू धाबी में होगा, जहां सलमान ने हाल ही में अपनी फिल्म टाइगर जिंदा है की शूटिंग की थी। रेस 3 अगले साल ईद के मौके पर रिलीज की जाएगी। इस साल सलमान खान की फिल्म टाइगर जिंदा है आगामी 22 दिसंबर को रिलीज होने जा रही है, जिसमें कैटरीना कैफ के साथ उनकी जोड़ी परदे पर लौट रही है।

अली अब्बास जाफर के निर्देशन में बनी इस फिल्म मे अंगद सिंह बेदी और परेश रावल भी नजर आएंगे। फिल्म का ट्रेलर लांच हो चुका है और इसे अब तक 8 करोड़ लोग देख चुके हैं।

पद्मावती का नया गाना रिलीज हुआ

0

1 दिसंबर को रिलीज के लिए तैयार हो रही संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ का एक नया गाना रिलीज किया गया है। ये रोमांटिक गाना शाहिद कपूर और दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया है, जो फिल्म में महाराजा रतन सिंह और पद्मावती की भूमिकाएं कर रहे हैं। फिल्म का संगीत खुद संजय लीला भंसाली ने तैयार किया है।

ये रिलीज होने वाला फिल्म का दूसरा गाना है और इसके शब्द हैं- एक दिल एक जान… इसके लिए भी एक भव्य सेट तैयार किया गया है। इससे पहले दीपिका पर फिल्माया गया गाना घुमरो रिलीज किया गया था। इस गाने को काफी पसंद किया गया है और सोशल मीडिया पर इस गाने को अब तक 5 करोड़ से ज्यादा लोग देख चुके हैं।

विवादों में फंसी इस फिल्म में रणबीर सिंह भी हैं, जो अलाउद्दीन खिलजी के किरदार में हैं और उनकी पत्नी के रोल में अदिति राव हैदरी हैं।

प्रभारी जिलाधिकारी ने लिया गौचर मेले की तैयारियों का जायजा

0

गोपेश्वर, आगामी 14 नवम्बर से गौचर में आयोजित होने वाले ऐतिहासिक राज्य स्तरीय औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक मेला व्यवस्थाओं को लेकर प्रभारी जिलाधिकारी चमोली ने अधिकारियों के साथ जायजा लिया। निरीक्षण के दौरान प्रभारी जिलाधिकारी ने पेयजल, विद्युत, वाहन पार्किंग, साफ-सफाई, अस्थाई शौचालय आदि व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए मेले के मुख्य पांडाल, प्रदर्शनी स्टॉल, चरखी, खेलकूद प्रतियोगिता स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया। संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए और सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद रखने को कहा।

उन्होंने कहा कि सभी व्यवस्थाएं तय समय के भीतर पूरी कर ली जाएं। प्रभारी जिलाधिकारी ने मेले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था पर जोर देते हुए चरखी स्थल, मौत का कुंआ आदि मुख्य स्थानों पर विशेष सुरक्षा व्यवस्था रखने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने मेले में आने वाले व्यापारियों व मेलार्थियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था रखने को कहा। उन्होंने प्रत्येक दुकान पर कूड़ादान व जगह-जगह पर डस्टविन रखवाने के निर्देश नगर पंचायत गौचर के ईओ को दिए। साथ ही पर्याप्त संख्या में सीसीटीवी कैमरे भी लगवाने को कहा। उन्होंने मेले को भव्य बनाने के लिए सभी विभागीय अधिकारियों को अपने स्तर से बढ-चढ़ कर प्रतिभाग करने के निर्देश भी दिए।

 

दून, हावड़ा और चेन्नई सहित आधा दर्जन ट्रेनें लेट

0

देहरादून, रेलवे ट्रैक पर निर्माण कार्य व मैदानी इलाकों में कोहरे की मार के कारण देहरादून पहुंचने वाली लंबी दूरी की आधा दर्जन से अधिक ट्रेनें घंटो विलंब से पहुंच रही है। जबकि हावड़ा जाने वाली दो ट्रनों को एक-एक दिन के लिए रद्द किया गया।

पिछले एक सप्ताह से दून पहुंचने वाली एक दर्जन से अधिक रेल गाड़ियां अपने निर्धारित समय से काफी विलंब से पहुंच रही है। शनिवार को चेन्नई एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से करीब आठ घंटे विलंब से पहुंची तो, वहीं दून हावड़ा 11 घंटे लेट चल रही है। इलाहाबाद से चलने वाली लिंक एक्सप्रेस 1.10 मिनट पर दून पहुंचती है जो अब 10 घंटे, तो राप्ती गंगा एक्सप्रेस 13 घंटे लेट से पहुंचेगी। जबकि अमृतसर एक्सप्रेस व शताब्दी एक्सप्रेस भी घंटों विलंब से पहुंची। विलंब से पहुंचने के कारण दून से खुलने वाली कई गाड़ियां भी लेट चल रही है। इस कारण यात्रियों को अपने परिजनों को इंजतार में परेशानी उठानी पड़ रही है।

 प्रभारी स्टेशन अधीक्षक सिताराम सोनकर ने दून हावड़ा व उपासना एक्सप्रेस को उत्तर रेलवे द्वारा एक-एक दिन रद्द किया गया है। सप्ताह में दो दिन बुधवार व शनिवार को दून से हावड़ा जाने वाली उपासना एक्सप्रेस शनिवार को नही चलेगी, जबकि प्रतिदिन हावड़ा दून से चलने वाली दून हावड़ा 12 नवंबर को रद्द है। दून से हावड़ा जाने वाली दोनों ट्रेनों के रद्द होने से यात्रियों की उलझने बढ़ गई है। हालांकि रेलवे की ओर से यात्रियों को इस बारे में जानकारी दे दी गई है।

सिताराम ने बताया कि, “रेल दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के मदृेनजर विभाग द्वारा रेलवे ट्रेक पर तेजी से काम चल रहा है। इस कारण ट्रेनों के आवागमन में देरी हो रही है। साथ ही बदलते मौसम के कारण मैदानी इलाकों में कोहरे से गाड़िया प्रभावित हो रही है। इस कारण कई ट्रेनें विलंब से दूेहरादून पहुंच रही है। हालांकि नजदीक की गाड़ियों को देहरादून से समय से प्रस्थान किया जा रहा है। जबकि लंबी दूरी की गाड़ियों को प्रस्थान करने में दिक्कतें आ रही है। गाड़ियों के विलंब के कारण यात्रियों को होने वाली परेशानियों को रेल प्रशासन द्वारा ध्यान दिया जा रहा है।”

 

उपकेंद्र के पीछे मिला गार्ड का शव

0

देहरादून,  थाना पटेल नगर क्षेत्र के ग्राम पेलियों में ग्राम पेलियों में मातृ शिशु एवं परिवार कल्याण उप केंद्र के पीछे खेतों से पुलिस ने एक व्यक्ति का शव बरामद किया है। मृतक की पहचान कीर्ति सिंह नेगी, टिहरी गढ़वाल के रूप में हुई। पुलिस ने शव का पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।

चौकी प्रभारी नया गांव के अनुसार, मृतक के मुंह एवं नाक से नीले रंग का झाग व पदार्थ निकल रहा था तथा शव पूरी तरह अकड़ा हुआ था। मौके पर मृतक के पास से बरामद मोबाइल से परिजनों को सूचना दी गई।

मृतक अपने पत्नी व बच्चों सहित पेलियो में किराए के मकान पर रहता था तथा तुला इंस्टिट्यूट झाझरा में गार्ड की नौकरी करता था। मृतक के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है शरीर पर कोई चोट के निशान नहीं पाए गये। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद अग्रिम कार्रवाई की जाएगी।

दिल्ली के स्मॉग से बचने लोग पहुंचे खिली धूप और ठंडी हवाअों के बीच

0

जहां एक तरफ भारत का क्षेत्र खासकर राजधानी दिल्ली स्मॉग से भरा हुआ है, वहीं पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में चारों तरफ खिली धूप और स्वच्छ हवा है।

जैसे-जैसे दिल्ली में स्मॉग फैल रहा था वैसे ही रातों रात लोगों ने अपने बैग पैक करके अपना रुख उत्तर भारत की तरफ कर लिया ताकि दिल्ली में फैले प्रदूषण और स्मॉग जिसे प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक सेहत के लिए हानिकारक बताया था, उससे बच सके।

मैदानी क्षेत्र से लगभग 7500 फीट ऊपर बसी पहाड़ों की रानी मसूरी सर्दियों में भी खिली-खिली धूप के दर्शन देती है। मसूरी के मॉल रोड पर टहलते लोगों के धूप और साफ-सुथरी ठंडी हवा दिल्ली से दूर और कुछ दिन स्मॉग से बचने का अच्छा जरिया है।

गौतम और ङोयल पांडे ने अपनी पांच साल की बेटी इरा के साथ उसी दिन दिल्ली से छुट्टी ले मसूरी का रुख करने पर मजबूर कर दिया, “दिल्ली आजकल किसी गैस चैंबर से कम नहीं है ना केवल बच्चों के लिए बल्कि बड़े बूढ़ों को यह स्मॉग नुकसान कर रहीं है खासी, सर दर्द की वजह से हम वापस नहीं जाना चाहते।” केवल यह दंपत्ति नही, इनके जैसे बहुत से लोग है जिन्होंने स्मॉग से बचने के लिए पहाड़ों की साफ हवा को चुना है।

दूसरी तरफ कुछ लोग जो दिल्ली जाने की तैयारी में थे उन्होंने अपने जाने की ताऱीख आगे बढ़ा दी है। आभा सैली जिनकी आने वाले दिनों में दिल्ली से फ्लाईट थी उन्होंने कहा कि, “मैं उम्मीद करती हूं कि आने वाले दिनों में स्मॉग साफ हो जाएगा नहीं तो इस दौरान दिल्ली जाने से बेहतर होगा, मैं अपना प्रोग्राम बदल लूं।”

दिल्ली के इस कंडीशन को देखकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने टिव्टर के माध्यम से सभी देशवासियों को खासकर दिल्ली वालों को उत्तराखंड के साफ आसमान के नीचे बुलाया है जिससे लोग खुली और स्वच्छ हवा में सांस ले सकें। इसके अलावा सीएम रावत ने लोगों से गुजारिश की थी उत्तराखंड में आकर ##ClearBlueSkiesofUttarakhand में अपनी तस्वीरें डाले जिसे सीएम रिटिव्ट करे, खासकर ऐसे वक्त में जब दिल्ली स्मॉग से भरी है।