फिर उठेगा गैरसैंण का सुलगता सवाल

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पर्वतीय जनभावनाओं की राजधानी गैरसैंण का सवाल फिर सुलगने को तैयार है। गैरसैंण में तीन मार्च से विधानसभा सत्र प्रस्तावित है। इस दौरान यह बात फिर से उठेगी कि पर्वतीय जनभावनाओं की इस राजधानी का भविष्य क्या है? क्या वह कभी स्थायी राजधानी घोषित होगी या फिर ग्रीष्मकालीन राजधानी के लिए सरकार के कदम आगे बढे़ंगे। भाजपा और कांग्रेस दोनों के चुनाव घोषणापत्र में गैरसैंण प्रमुखता से मौजूद है। इसके बावजूद हकीकत ये है कि गैरसैंण अब तक जिला भी नहीं बन पाया है।
लंबे समय तक भाजपा और कांग्रेस गैरसैंण से दूरी बनाकर चले। इसके पीछे ये ही डर था कि उत्तराखंड में पहाड़ और मैदान की राजनीति में फिर संतुलन कैसे बनाकर रखा जा सकेगा। पर्वतीय जनभावनाओं में गैरसैंण राजधानी का मसला हमेशा जिंदा रहा। ये ही दबाव कांग्रेस की विजय बहुगुणा सरकार को पहली बार वहां कैबिनेट बैठक आयोजित कराने में सफल रहा। इसके बाद हरीश रावत सरकार के जमाने से वहां पर विधानसभा के सत्र आयोजित होने लगे। भव्य विधान भवन बनकर तैयार हो गया। गैरसैंण को स्थायी या ग्रीष्मकालीन राजधानी की बात दोनों दलों की तरफ से आने लगी। 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरते वक्त दोनों प्रमुख दलों के घोषणापत्र में गैरसैंण को जगह मिली। दोनों दलों ने गैरसैंण के विकास के लिए संकल्प जताया।
इन स्थितियों के बीच गैरसैण विकास परिषद जैसी संस्थाओं का काम बहुत तेजी से होता हुआ नहीं दिखाई दिया है। एक साल के सन्नाटे के बाद फिर से सरकार मार्च में गैरसैंण पहुंच रही है। विरोधियों ने बोलना शुरू कर दिया है कि सरकार पिकनिक मनाने गैरसैंण जा रही है। ऐसे में यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि सत्रों के आयोजन से निकलकर गैरसैंण में राजधानी के सवाल पर ठोस फैसला कब तक हो पाएगा। गैरसैंण स्थायी राजधानी की बात किसी जमाने में जोर शोर से उठाने वाली क्षेत्रीय पार्टी यूकेडी खुद रसातल में दिख रही है।
प्रमुख राज्य आंदोलनकारी प्रदीप कुकरेती का आरोप है कि गैरसैंण पर किसी भी सरकार ने गंभीरता से काम नहीं किया है। वह मानते हैं कि आंदोलनकारियों को अब पुरजोर ताकत से गैरसैंण के पक्ष में निर्णायक दबाव बनाना चाहिए। दूसरी तरफ, कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का कहना है कि गैरसैंण पर सरकार गंभीर है। चरणबद्ध ढंग से गैरसैंण के विकास के लिए काम किया जा रहा है।