हिमालयन हॉस्पिटल ने दिया नन्ही गुड़िया को नया जीवन

0
250

डोईवाला- एसआरएचयू-हिमालयन हॉस्पिटल के बाल शल्य चिकित्सा विभाग के चिकित्सकों ने तीन वर्षीय गुड़िया (काल्पनिक नाम) को नया जीवन दिया है। भोजन की नली (इसोफेगस) बनाने का सफल ऑपरेशन किया। गुड़िया अब सामान्य बच्चों की तरह खा पी सकती है और पूरी तरह स्वस्थ है।

गुड़िया के जन्म से ही भोजन की नली (इसोफेगस) नहीं बनी थी। इस वजह से कुछ खाने-पीने में अक्षम थी। गुड़िया के परिजन उसे तरंत हिमालयन अस्पताल ले कर आए। हिमालयन हॉस्पिटल के वरिष्ठ पीडियट्रिक सर्जन डॉ.संतोष कुमार ने बताया कि मेडिकल भाषा में इसे “इसोफेजिअल एट्रेजिया” कहते हैं। गुड़िया इस वजह से थूक भी नहीं निगल सकती थी इस कारण थूक के फेफड़ों में चले जाने से उसे निमोनिया होने का भी खतरा था। उसका पहला ऑपरेशन जन्म के तुरंत बाद किया गया। गर्दन में एक ऑपरेशन कर के उसके थूक के लिये एक रास्ता बनाया गया। वहीं, पेट में दूसरा ऑपरेशन कर के उसके आमाशय में एक छोटी ट्यूब डाल दी गयी जिससे उसे दूध व दवाइयाँ दी जा सके। तीन वर्ष की उम्र में उसके भोजन की नई नली बनाने का ऑपरेशन किया गया।

इस ऑपरेशन को “इसोफेजिअल रिप्लेसमेंट” कहते हैं। करीब साढ़े छह घंटों की जटिल सर्जरी के दौरान डॉ.संतोष कुमार और उनकी टीम ने गुड़िया के पूरे आमाशय को इस्तेमाल करते हुए (‘गैस्ट्रिक पुल-अप’) भोजन की नली की जगह स्थापित किया। साथ ही उसे थूक की नली से गले में जोड़ दिया गया। सर्जरी सफल रही और गुड़िया अब अन्य बच्चों की तरह खा-पी सकती है। पीडियट्रिक सर्जन डॉ.संतोष कुमार सहित डॉ.आईशा, डॉ.साहिल, डॉ.गुरजीत, डॉ.पारुल, डॉ.निकिता के अलावा नर्सिंग स्टाफ माधवी, रंजना, आशा, हिमानी, नवीन आदि ने सहयोग दिया।

क्या है “इसोफेजिअल एट्रेजिया”?

हिमालयन हॉस्पिटल के पीडियट्रिक सर्जन डॉ.संतोष कुमार ने बताया कि इसोफेजिअल एट्रेजिया एक जन्मजात संरचनात्मक दोष है जो चार से पांच हजार में से एक बच्चे को होता है। अधिकांश 85 प्रतिशत मामलों में अधूरी बनी हुई भोजन की नली (इसोफेगस) सांस की नली (ट्रैकिया) से जुड़ी हुई भी होती है। इसे ट्रेकियो-इसोफेजिअल फिस्चुला कहा जाता है। इसे जन्म के तुरंत बाद एक ही ऑपरेशन से ठीक किया जा सकता है। गुड़िया की भोजन की नली लगभग नहीं के बराबर थी। ऐसा सिर्फ चार प्रतिशत मामलों में ही होता है। इसका समाधान जन्म के तुरंत बाद आमतौर पर संभव नहीं होता है।

क्या है “इसोफेजिअल रिप्लेसमेंट”?

“इसोफेजिअल रिप्लेसमेंट” भोजन की नली को किसी अन्य अंग का प्रयोग करते हुए बनाने का ऑपरेशन है। आमतौर पर इसे सम्पूर्ण आमाशय या आमाशय या बड़ी आंत के एक हिस्से से बनाया जाता है। अनेक चीजों को ध्यान में रखते हुए ये निर्णय लिया जाता है कि किस अंग या उसके एक हिस्से से भोजन की नई नली बनाई जाए। इस नई नली या मार्ग को पहले बनाए गए थूक के रास्ते से जोड़ दिया जाता है। ऑपरेशन के बाद चूंकी इस नए मार्ग से भोजन तुरंत नहीं दिया जा सकता, इसलिए छोटी आंत में अस्थायी रूप से एक नली स्थापित की जाती है (फीडिंग जेजुनोस्टोमी) जिससे बच्चे को पोषण दिया जा सके। नए भोजन मार्ग के परिपक्व हो जाने के बाद ये अस्थायी नली निकल दी जाती है। ये सम्पूर्ण प्रक्रिया जटिल व लम्बी है तथा बच्चे की सम्पूर्ण जांच व पूरी तैयारी के बाद ही इसे किया जाना चाहिए। ये ऑपरेशन एक वर्ष की उम्र के बाद कभी भी किया सकता है।
उत्तराखंड में इस तरह का सम्भवतः यह पहला ऑपरेशन है