राजनीति: भाजपा की 2022 से पहले सल्ट में कठिन परीक्षा

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सल्ट
विधानसभा के 2022 में प्रस्तावित चुनाव से पहले सल्ट सियासी सेमीफाइनल के लिए तैयार है। आमने-सामने चिर परिचित प्रतिद्वंद्वी भाजपा और कांग्रेस हैं। अपनी-अपनी कमजोरी और ताकत के साथ एक-दूसरे को पटखनी देने का दोनों ही प्रमुख दल मंसूबा पाले हैं। सरकार और संगठन का मुखिया बदलने के बाद भाजपा की इस चुनाव में प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। वहीं, उम्मीदवार चयन से लेकर अन्य तमाम मामलों में कांग्रेस के भीतर गुटबाजी की आग धधक रही है। ऐसे में किसी भी तरह बाजी पटलने को बेताब कांग्रेस किस तरह लक्ष्य हासिल कर पाएगी, यह बड़ा सवाल है।
-मुखिया बदलने से भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर 
-गुटबाजी में फंसी कांग्रेस बाजी पलटने को बेकरार
पहले सत्तासीन भाजपा की बात कर लेते हैं। सल्ट को एक तरह से भाजपा का गढ़ माना जा सकता है। दिवंगत विधायक सुरेंद्र सिंह जीना का व्यक्तिगत प्रभाव भी इस क्षेत्र में कमल खिलाने में काफी मददगार रहा है। भाजपा की मजबूती की झलक इस तथ्य से दिखती है कि वह लगातार तीन बार से इस सीट पर जीत दर्ज करती आई है। अब उन्होंने सुरेंद्र सिंह जीना के बडे़ भाई महेश जीना को मैदान में उतारा है। 2017 में प्रदेश की सत्ता में काबिज होने के बाद यह तीसरा मौका है, जबकि भाजपा ने अपने किसी विधायक की मौत के बाद उसके परिजन पर दांव खेला है। सहानुभूति की लहर अभी तक हर बार उसके काम आई है। सबसे पहले, थराली सीट पर मगन लाल शाह की मौत हुई, तो उनकी पत्नी मुन्नी देवी शाह को टिकट देकर भाजपा ने विधानसभा में उन्हें पहुंचा दिया। इसके बाद कैबिनेट मंत्री प्रकाश पंत के दिवंगत होने की स्थिति में उनकी पत्नी चंद्रा पंत भाजपा के टिकट पर पिथौरागढ़ सीट से विधायक बन गईं। अब सल्ट में सुरेंद्र सिंह जीना की मौत से खाली हुई सीट पर उनके भाई महेश जीना को उम्मीदवार बनाया गया है।
भाजपा हाईकमान ने कुछ दिन पहले ही सीएम पद पर तीरथ सिंह रावत और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद पर मदन कौशिक की ताजपोशी की है। सरकार-संगठन के नेतृत्व में आमूलचूूल परिवर्तन के बाद पहली परीक्षा के रूप में सल्ट सामने हैं। जाहिर तौर पर इस सीट पर हार-जीत से भाजपा की सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, मगर नतीजा जो भी होगा, वह पार्टी और कार्यकर्ता
के मनोबल पर सीधे प्रभाव छोडे़गा। इसलिए भाजपा चौकन्नी है और पूरी ताकत से सल्ट में जुट गई है।
कांग्रेस की बात करें तो वह यदि अपनी गुटबाजी से पार पा ले तो इस सीट पर भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। टिकट वितरण में ही जिस तरह से कांग्रेस की गुटबाजी के दर्शन हो गए हैं, वह आगे की राह को लेकर कयासबाजी के लिए पूरा आधार तैयार कर रही है। इस सीट पर पार्टी ने गंगा पंचोली को टिकट दिया है। गंगा 2017 का विधानसभा चुनाव बेहद दमदारी से लड़ चुकी हैं। उन्हें कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत के खेमे का माना जाता है। एक जमाने में हरीश रावत के बेहद खास रहे सल्ट के पूर्व विधायक रणजीत सिंह रावत के बेटे विक्रम रावत के लिए प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, नेता प्रतिपक्ष डा. इंदिरा ह्दयेश ने खूब जोर लगाया था, लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाए।
हरीश रावत भले ही गंगा पंचोली को टिकट दिलाने में कामयाब रहे, लेकिन कांग्रेस का असंतुष्ट धड़ा सल्ट में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। कांग्रेस ने इससे पहले थराली का उपचुनाव भी बेहद दमदारी से लड़ा था, लेकिन हार गई थी। कांग्रेस थराली की तरह ही सल्ट के चुनाव को भी लड़ने का इरादा जता रही है, लेकिन कामयाबी के मूल मंत्र उसे अभी तलाशने होंगे। वह भी उस तथ्य की मौजूदगी में कि राज्य बनने के बाद आज तक जितने भी उपचुनाव हुए हैं, उसमें सत्तारूढ़ दल कभी नहीं हारा है। जिन सीटों पर किसी विधायक की मौत के बाद चुनाव हुए, वहां पर उसके परिजन को टिकट दिए जाने पर उसने शानदार जीत ही हासिल की है।