उत्तराखंड के गढ़वाल में इसलिए मनाई जाती है ‘इगास’ और कुमाऊं में बूढ़ी दिवाली

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इगास

दीपावली के बाद आने वाली एकादशी को पूरे देश में हरिबोधनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इगास और कुमाऊं मंडल में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। इस वर्ष से प्रदेश की पुष्कर सिंह धामी सरकार की बड़ी पहल बताई जा रही, इस दिन इगास पर राजकीय अवकाश घोषित करने की पहल हुई है। लोग इस त्योहार के बारे में अन्जान हैं।

कहा जाता है कि इस दिन चार माह के चार्तुमास में क्षीरसागर में योगनिद्रा में सोने के बाद भगवान बिष्णु जागते हैं। इस दौरान भगवान शिव भगवान विष्णु लोक की जगह पृथ्वी लोक का पालन करते हैं। इसी बीच दीपावली पड़ती है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में दीपावली तीन स्तरों पर मनाई जाती है। पहले कोजागरी यानी शरद पूर्णिमा को छोटी दिवाली के रूप में बालिका रूप लक्ष्मी की पूजा होती है, फिर दिवाली को यहां युवा माता लक्ष्मी की घूंघट में डिगारा शैली में मूर्ति बनाई जाती है। चूंकि इस दौरान भगवान विष्णु सोये होते हैं, इसलिए अकेले माता लक्ष्मी के पदचिन्ह उकेरे जाते हैं, उनके पति श्रीविष्णु के नहीं।

हरिबोधनी एकादशी यानी गढ़वाल में मनाये जाने वाले इगास के दिन यहां बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है, और इस दिन चूंकि हरिविष्णु जाग चुके होते हैं, इसलिए इस दिन माता लक्ष्मी के साथ विष्णु के चरण भी ऐपण के माध्यम से बनाए जाते हैं।

उधर गढ़वाल मंडल में मनाया जाने वाला इगास पर्व माधो सिंह भंडारी को याद कर मनाया जाता है। कहते हैं कि 17 वीं शताब्दी में मलेथा गांव में पैदा हुए माधो सिंह भंडारी गढ़वाल के प्रसिद्ध भड़ यानी योद्धा थे। तब श्रीनगर गढ़वाल के राजाओं की राजधानी थी। माधो सिंह के पिता कालो भंडारी की बहुत ख्याति थी। माधो सिंह पहले राजा महीपत शाह, फिर रानी कर्णावती और फिर पृथ्वीपति शाह के वजीर और वर्षों तक सेनानायक भी रहे।

तब गढ़वाल और तिब्बत के बीच अक्सर युद्ध हुआ करते थे। दापा के तिब्बती सरदार गर्मियों में दर्रों से उतरकर गढ़वाल के ऊपरी भाग में अनाज की लूटपाट करते थे, इसी से उनका जीवन यापन चलता था। माधो सिंह भंडारी ने तिब्बत के सरदारों से दो या तीन युद्ध लड़े। सीमाओं का निर्धारण किया। सीमा पर भंडारी के बनवाए कुछ मुनारे (स्तंभ) आज भी चीन सीमा पर मौजूद हैं। माधो सिंह ने पश्चिमी सीमा पर हिमाचल प्रदेश की ओर भी एक बार युद्ध लड़ा।

कहते हैं कि एक बार तिब्बत से युद्ध में वे इतने उलझ गए कि दिवाली के समय तक वापस श्रीनगर गढ़वाल नहीं पहुंच पाए। आशंका थी कि वे युद्ध में मारे जा चुके हैं। इस कारण तब गढ़वाल अंचल में दिवाली नहीं मनाई गई। लेकिन दिवाली के कुछ दिन बाद माधो सिंह की युद्ध में विजय और सुरक्षित होने की खबर श्रीनगर गढ़वाल पहुंची। तब राजा की सहमति पर एकादशी के दिन दिवाली मनाने की घोषणा हुई। तभी से यहां एकादशी को दिवाली यानी इगास मनाने की शुरुआत हुए और तभी से इगास बग्वाल निरंतर लोकपर्व के रूप में मनाई जाती है।

अलबत्ता गढ़वाल के कुछ गांवों में अमावस्या की दिवाली भी मनाई जाती है, और कुछ गांवो में दिवाली के साथ इगास पर भी दिवाली मनाई जाती है। इगास बिल्कुल दीवाली की तरह ही उड़द के पकौड़े, दियों की रोशनी, भैला और मंडाण आदि के साथ मनाई जाती है।

इन्हीं माधो सिंह भंडारी ने 1634 के आसपास मलेथा की प्रसिद्ध भूमिगत सिंचाई नहर बनाई, जिसमें उनके पुत्र का बलिदान हुआ। जीवन के उत्तरार्ध में शायद 1664-65 के बाद उन्होंने तिब्बत से ही एक और युद्ध लड़ा, जिसमें उन्हें वीरगति प्राप्त हुई। इतिहास के अलावा भी अनेक लोकगाथा गीतों में माधो सिंह की शौर्य गाथा गाई जाती है।

वीरगाथा गीतों में उनके पिता कालो भंडारी, पत्नियां रुक्मा और उदीना तथा पुत्र गजे सिंह और पौत्र अमर सिंह का भी उल्लेख आता है। मलेथा में नहर निर्माण, संभवत पहाड़ की पहली भूमिगत सिंचाई नहर पर भी लोक गाथा गीत हैं।

इस प्रकार माधो सिंह भंडारी की इतिहास शौर्य गाथा और लोकगाथाएं बहुत विस्तृत हैं। उत्तराखंड के गांधी कहे जाने वाले इंद्रमणि बडोनी के निर्देशन में माधो सिंह भंडारी से सम्बन्धित गाथा गीतों को 1970 के दशक में संकलित करके नृत्य नाटिका में ढाला गया था। एक डेढ़ दशक तक दर्जनों मंचन हुए। इसमें स्वर और ताल देने वाले लोक साधक 85 वर्षीय शिवजनी अब भी टिहरी के ढुंग बजियाल गांव में रहते हैं। लोग इगास तो मनाते रहे लेकिन इसका इतिहास और इसकी गाथा भूलते चले गए।

राहुल सांकृत्यायन के अनुसार एक बार तो तिब्बत के सरदार टिहरी के निकट भल्डियाणा तक चले आए थे। इसलिए कहा जाता है कि गढ़वाल ही नहीं, पूरे भारत देश को इन योद्धाओं का ऋणी होना चाहिए। गाथा सुननी और पढ़नी चाहिए।