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अवैध शराब की नौ पेटी छत से बरामद

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चमोली पुलिस ने लंगासू में एक मकान की छत पर अवैध रूप से रखी गई नौ पेटी अंग्रेजी शराब की पकड़ी है। पुलिस ने मकान मालिक के खिलाफ आबकारी अधिनियम के तहत मामला पंजीकृत कर लिया है।

लंगासू चौकी इंजार्च उपनिरीक्षक नितिन बिष्ट ने बताया कि रविवार को देर शाम मुखबिर ने सूचना दी कि एक व्यक्ति भारी मात्रा में शराब लेकर अपने घर गया है। सूचना पर पुलिस ने महिपाल उर्फ दम्मू के घर पर छापा मारा तो उसके मकान की छत से नौ पेटी अवैध शराब की पकड़ी गई।

अभियुक्त महिपाल के खिलाफ आबकारी अधिनियम के तहत मामला पंजीकृत किया गया है। पुलिस टीम में उपनिरीक्षक नितिन बिष्ट के साथ सिपाही बल्लभ व होमगार्ड मनोज कुमार शामिल रहे।

 

सड़क हादसे में एसएसबी के दो जवानों समेत तीन की मौत

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एक टैक्सी खाई में गिरने से एसएसबी के दो जवान समेत तीन लोगों की मौत हो गई। इसके साथ ही टैक्सी में सवार एसएसबी के दो अन्य जवान गंभीर रूप से घायल है। पुलिस के अनुसार ये जनाव मटियानी गांव में गौरा महोत्सव देखने के लिए जा रहे थे।

रविवार की देर रात रौसाल से मटियानी गांव जा रही एक टैक्सी रौसाल से करीब चार किलोमीटर पहले घटीगाड़ के पास अनियंत्रित होकर करीब 300 मीटर गहरी खाई में जा गिरी। टैक्सी में चार एसएसबी के चार जवान और चालक सवार थे। पुलिस के मुताबिक हादसे में दो एसएसबी के जवान और वाहन चालक की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दो जवान गंभीर रूप से घायल हो गए। सूचना पर एसडीआरएफ और पुलिस की टीम मौके पर पहुंची और रेस्क्यू कर गाड़ी ले घायलों और शवों को निकाला। गंभीर रूप से घायलों को लोहाघाट के सामुदायिक चिकित्सा केंद्र ले जाया गया, जहां से हायर सेंटर रेफर कर दिया गया।

पंचेश्वर कोतवाली के प्रभारी निरीक्षक डीएल वर्मा ने जानकारी दी कि टैक्सी में सवार एसएसबी के हेड कांस्टेबल संदीप कुमार मिश्रा ,कास्टेबल आंचल सिंह और वाहन चालक राजू भंडारी की मौके पर ही मौत हो गई थी, उनके शव अस्पताल भेजे गए। जबकि, कांस्टेबल सुमित कुमार तिवारी और कांस्टेबल बाल्मीकि सिंह हादसे में गंभीर रूप से घायल हुए है। उनका सीएचसी लोहाघाट में प्राथमिक उपचार के बाद रात में ही हायर सेंटर रेफर कर दिया है। उन्होंने बताया कि चारों जवान सी कंपनी एसएसबी रौसाल में तैनात थे।

साहित्यिक चोरी पर रोक को यूजीसी का कानून

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अनुसंधान और शोध के क्षेत्र में चोरी अब भारी पड़ेगी। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) ने साहित्यिक चोरियों को रोकने के लिए कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने इसके लिए खास तौर पर नया रेगूलेशन तैयार किया है। नए नियमों के तहत जहां एक ओर ऐसे मामलों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी, वहीं शिक्षण संस्थानों में अनुसंधान, अध्ययन, परियोजना के प्रति जिम्मेदार आचरण आदि को लेकर भी शैक्षणिक जागरुकता फैलाई जाएगी। अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रजुएट स्तर पर इसे पाठ्यक्रम में भी शामिल किया जाएगा।

बीते कुछ वक्त में रिसर्च आदि में शोधकर्ताओं की कॉपी-पेस्ट की बढ़ती प्रवृत्ति के तमाम मामले सामने आ रहे थे। इसे रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग(यूजीसी), आॅल इंडिया काउंसिल फोर टेक्निकल एजुकेशन(एआईसीटीई) समेत तमाम परिषदों ने कई नियम भी बनाए लेकिन बावजूद इसके कंटेंट चोरी के मामलों पर अंकुश नहीं लग पाया। इसी को देखते हुए अब यूजीसी ने ऐसे मामलों के सामने आने पर कड़ी कार्रवाई करने का फैसला किया है। नए रेगूलेशन में साहित्यिक चोरी को लेकर कड़े प्रावधान भी निर्धारित किए गए हैं।

आयोग का मानना है कि संस्थानों में ऐसे कृत्यों पर लगाम लगाना बेहद जरूरी है। आयोग ने नए रेगूलेशन में कहा है कि संस्थानों में अनुसंधान आदि कार्यो में छात्रों, फैकल्टी व अन्य स्टाफ नियम कायदों आदि को लेकर शुचिता बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में संस्थानों में इसे लेकर जागरुकता लानी होगी। इसके अलावा, संस्थानों में साहित्यिक चोरी का पता लगाने और उसे रोकने के लिए तंत्र स्थापित करना होगा। ऐसे मामलों में छात्र, फैकल्टी या कर्मचारियों को दंडित करने का कार्य भी करना होगा।

पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाएगा ईमानदारी का पाठ
आयोग के नए रेगूलेशन के अनुसार अब संस्थानों में एकेडमिक इंटीग्रिटी को पाठ्यक्रम में भी पढ़ाया जाएगा। इसके लिए संस्थानों को अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट में अनिवार्य रूप से इसे शामिल करना होगा। साथ ही एमफिल और पीएचडी स्कॉलरों के लिए भी अनिवार्य रूप से पब्लिकेशन एथिक्स को कोर्स वर्क का हिस्सा बनाया जाएगा। वर्कशॉप व सेमिनार आदि के माध्यम से छात्रों और एकेडमिक स्टाफ को साहित्यिक चोरियों के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक किया जाएगा। साहित्यिक चोरियों की पहचान करने और पकड़ने के लिए छात्रों व कर्मचारियों को संबंधित आधुनिक तकनीकि और टूल का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके अलावा छात्र, फैकल्टी, कर्मचारी और शोधकर्ता को अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ता रजिस्ट्री प्रणाली पर पंजीकृत किए जाने को लेकर भी संस्थानों द्वारा प्रेरित करना होगा।

उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पीके गर्ग ने बताया कि शोध कार्यों में शोधकर्ताओं द्वारा कामचोरी की जाती है। इसके साथ किसी अन्य के शोध से कंटेंट को चोरी कर अपने शोध में उपयोग किया जाता है। यह अपराध है। आयोग इसे लेकर सख्ती के मूड में है। इस कदम से साहित्यिक चोरियों पर लगाम लगेगी।

संस्थानों को दिए निर्देश 
-संस्थानों को साहित्यिक चोरियों को रोकने के लिए तैयार करना होगा सॉफ्टवेयर।
-किसी भी अनुसंधान, रिसर्च पेपर या अन्य शोध के जमा करने के समय देनी होगी अंडरटेकिंग।
-एमफिल, पीएचडी स्कॉलरों को उनके शोध की साहित्यिक जांच के लिए टूल उपलब्ध कराए जाएं ताकि किसी भी प्रकार से संबंधित सामग्री साहित्यिक चोरी से मुक्त हो।
-सामग्री को साहित्यिक पहचान उपकरण के माध्यम से जांचा गया है इसे लेकर संबंधित शोधकर्ता को इसका पूरा दायित्व लेना होगा।
-संस्थानों को चोरियों को रोकने के लिए पॉलिसी तैयार कर संबंधित विश्वविद्यालय समिति से अनुमोदित कराना होगा।
-रिसर्च सुपरवाइजर को शोधकर्ता की शोध सामग्री साहित्यिक चोरी से मुक्त है, इसके लिए प्रमाण पत्र देना होगा।
-आयोग की आॅनलाइन लाइब्रेरी इंफ्लिबनेट पर शोधकर्ता को शोध आदि की सॉफ्ट कॉपी अनिवार्य रूप से अपलोड करनी होगी।
-सभी संस्थान शोध, अनुसंधान, रिसर्च पेपर, थीसिस, डिजर्टेशन आदि का अपनी वेबसाइट पर संस्थागत रूप से संग्रह करेंगे।
-साहित्यिक चोरी का मामला सामने आने पर एकेडमिक मिसकंडक्ट पैनल (एएमपी)द्वारा जांच की जाएगी।
-प्लेगियारिज्म डिसिपिलिनेरी अथॉरिटी(पीडीपी) को जांच सौंपी जाएगी। इसके बाद कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

तीन लेवल पर होगी कार्रवाई 
प्लेगियारिज्म डिसिपिलिनेरी अथॉरिटी(पीडीपी) द्वारा सहित्यिक चोरी की पुष्टि होने पर संबंधित छात्र, फैकल्टी या कर्मचारी के खिलाफ तीन लेवल पर कार्रवाई की जाएगी। आयोग के रेगूलेशन के अनुसार तीन अलग अलग श्रेणी निर्धारित की गई। इसमें चोरी के प्रतिशत के आधार पर दंड निर्धारित किया जाएगा।

छात्रों पर यह होगी कार्रवाई 
लेवल 1: 10% से 40% साहित्यिक चोरी- इस मामले में छात्र को किसी भी प्रकार से कोई अंक या क्रेडिट प्रदान नहीं किया जाएगा। साथ ही छह महीने के अंदर दोबारा साहित्यिक चोर से मुक्त शोध सामग्री जमा कराने का मौका दिया जाएगा।
लेवल 2: 40% से 60% साहित्यिक चोरी- ऐसे मामले में संबंधित छात्र को कोई अंक या क्रेडिट प्रदान नहीं किया जाएगा। साथ ही शोध पुन: जमा करने के लिए अधिकतम 18 महीने का समय दिया जाएगा।
लेवल 3: 60% से अधिक की साहित्यिक चोरी- ऐसे प्रकरण में संबंधित छात्र को कमेटी द्वारा कोई अंक या क्रेडिट प्रदान किया जाएगा। साथ ही मामले की गंभीरता को देखते हुए रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया जाएगा।

फैकल्टी व स्टाफ पर यह होगी कार्रवाई
लेवल 1: 10% से 40% साहित्यिक चोरी- मामले में मैनूस्क्रिप्ट (हस्तलिपी) वापस लेने को कहा जाएगा। साथ ही किसी भी प्रकार के प्रकाशन पर एक वर्ष का प्रतिबंध।
लेवल 2: 40% से 60% साहित्यिक चोरी- मामले में मैनूस्क्रिप्ट वापस लेने को कहा जाएगा। किसी भी प्रकार के प्रकाशन पर दो वर्ष के प्रतिबंध के साथ ही एमफिल या पीएचडी स्कॉलर के गाइड के रूप में कार्य करने पर प्रतिबंध।
लेवल 3: 60% से अधिक की साहित्यिक चोरी- अगले दो साल तक वेतनमान में वृद्धि पर रोक। प्रकाशन के लिए दी गई मैनूस्क्रिप्ट स्वीकार नहीं की जाएगी। तीन वर्ष तक प्रकाशन पर प्रतिबंध व एमफिल या पीएचडी स्कॉलर के गाइड के रूप में कार्य करने पर 3 वर्ष का प्रतिबंध।

आयुर्वेद ​विवि को जल्द मिलेगा स्थाई कुलपति

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बीते काफी वक्त से स्थाई कुलपति न होने का दंश झेल रहे उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय को जल्द ही स्थाई कुलपति मिलने वाला है। कुलपति चयन समिति का गठन करते हुए नए कुलपति के लिए आवेदन भी मांगे गए हैं। कुलपति पद के लिए इच्छुक अभ्यर्थी सात अक्टूबर तक आवेदन कर सकेंगे।

उत्तराखंड आयुर्वेद विवि बीते काफी वक्त से कई मामलों को लेकर चर्चाओं में रहा है। कभी पदों की विज्ञप्तियों में खामियों को लेकर तो कभी पेपर लीक मामला। इसके अलावा कई अन्य अनियमितताओं को लेकर हंगामें प्रदर्शन भी विवि झेल चुका है। इन सब के पीछे के कारणों पर गौर करें तो यहां स्थाई कर्मचारियों के अभाव में विवि की कार्यप्रणाली पर कई बार सवाल उठ चुके हैं। लेकिन अब इन सबपर अंकुश लगाने के लिए विवि में स्थाई कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसी क्रम में अब विवि कुलपति चयन समिति ने रिक्त पड़े विवि कुलपति के पद के लिए भी आवेदन स्वीकार किए हैं।
अभी तक कुलसचिव देख रहे थे कार्यभार
उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय में स्थाई कुलपति प्रो. एसपी मिश्रा को हटाने के बाद पद की जिम्मेदारी है एचएनबी मेडिकल यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. सौदान सिंह को सौंपी गई थी। लेकिन, उनका कार्यकाल यहां पूरा हो गया था। जिसके बाद शासन ने उनका कार्यकाल आगे बढ़ाने के बजाय विश्वविद्यालय में बतौर कुलसचिव कार्य देख रहे डॉ. अरुण कुमार त्रिपाठी को कुलपति का कार्यभार सौंप दिया गया। तब से अभी तक वे बतौर प्रभारी कुलपति विवि की बागडौर संभाले हुए हैं।
विवि की कुलपति चयन समिति-2017 के सदस्य रजिस्ट्रार प्रो. अनूप गक्खड ने बताया कि विवि कुलपति के लिए आवेदन मांगे गए हैं। आवेदकों को अपने आवेदन कुलपति चयन समिति-2017 के नाम विवि को भेजने होंगे। इसके अलावा कई अन्य मानकों को भी पूरा करना होगा। उन्होंने बताया कि आवेदन के लिए आवेदन के पास बतौर प्रोफेसर न्यूनतम 10 वर्ष का शिक्षण अनुभव होना अनिवार्य है। इसके अलावा मौजूदा तैनाती स्थल अथवा विभाग से एनओसी भी प्राप्त कर विवि को भेजनी होगी। रिसर्च के क्षेत्र में कार्य, रिसर्च पेपर व शोध आदि उल्लेखनीय योगदान दिया होना चाहिए। इसके साथ ही अभ्यर्थी पर आपराधिक मामले दर्ज न हों, इसके लिए एक प्रमाण पत्र भी विवि में प्रस्तुत करना होगा। सभी दस्तावेज सेल्फ अटेस्टेड कर विवि को आवेदन के साथ भेजने होंगे। उन्होंने बताया कि आवेदक 7 अक्टूबर तक आवेदन कर सकते हैं।

श्रीकोट के बेस अस्पताल में नवजात बच्ची को टाॅयलेट में छोड़ गई मां

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मानवता को शर्मसार करने वाली घटना एक बार फिर सामने आई हैं।श्रीकोट के बेस हास्पिटल में एक नवजात शिशु को किसी ने अस्पताल के शौचालय में छोड़ दिया है।

जी हां, बेस अस्पताल श्रीनगर की यह घटना आज सुबह लगभग छः बजे की है जब हाॅस्पिटल प्रशासन के नोटिस में आया की अस्पताल के शौचालय से बच्चे की रोने की आवाज आ रही है। बच्ची की रोने की आवाज सुनकर जब अस्पताल के कर्मचारी वहां पहुंचे तो बच्ची वहां अकेली थी, छोड़ने वाले का कोई अता-पता नहीं था। खून से लथपथ बच्ची वहीं पैदा की गई, ऐसा प्रतीत हो रहा था क्योकि उसकी नाल भी नहीं कटी थी।अस्पताल के कर्मचारियो ने बच्ची को उठाया और उसकी साफ-सफाई की।

अस्पताल का कहना है कि प्रशासन के पास इस बच्ची की कोई जानकारी नहीं है, बच्ची किसकी है? किसने इसको जन्म दिया? यह सारे सवाल अभी भी बने हुए हैं। इस बाबत अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि अस्पताल के पास पिछले एक दिन मे किसी भी पेशेंट के डिलीवरी की कोई सूचना नही हैं, मतलब साफ है कि बच्ची को बाहर जन्म देने के बाद उसे अस्पताल में छोड़ दिया गय है।

इस बारे में डीएम पौड़ी सुशील कुमार को न्यूजपोस्ट ने अवगत कराया।

जानकारी के बाद डीएम ने बताया कि, “बच्ची अस्पताल के टाॅयलेट में मिली है, और पूरी तरह से स्वस्थ है।अभी बच्ची को अस्पताल प्रशासन और डाॅक्टरों की देखरेख में रखा गया है।इस संबंध में पुलिस ने केस दर्ज कर दिया है और इसपर इन्वेस्टिगेशन भी चल रही है।

डेंगू से पीड़ित सुनील ग्रोवर अस्पताल में भर्ती

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कपिल शर्मा के साथ विवादों को लेकर मीडिया की सुर्खियों में रहे कॉमेडी कलाकार सुनील ग्रोवर इन दिनों डेंगू के वायरल बुखार की चपेट में आ गए हैं और मुंबई के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है।

सुनील ग्रोवर को पिछले सप्ताह अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां डाक्टरों ने उनकी हालत को बेहतर बताया है। डाक्टरों का कहना है कि सुनील ग्रोवर पूरी तरह से आराम कर रहे हैं और उनको अभी कुछ दिन अस्पताल में ही रखा जाएगा, ताकि वे डाक्टरों की निगरानी में रहें। उधर सुनील ग्रोवर इन दिनों अस्पताल में हैं और इधर कपिल शर्मा के अस्वस्थ होने की भी खबरें आ रही हैं। अस्वस्थता के चलते कपिल शर्मा ने अपने शो के कई एपीसोड की शूटिंग कैंसिल कर दी, जिसके चलते सोनी चैनल ने कपिल शर्मा शो को कुछ दिनों के लिए ब्रेक पर भेजने का फैसला कर लिया है।

कपिल शर्मा ने जब कलर चैनल पर अपना कॉमेडी शो शुरू किया था, तो गुत्थी के किरदार में सुनील ग्रोवर इस शो की पहचान बन गए थे। कपिल का शो जब कलर चैनल से सोनी चैनल पर शिफ्ट हुआ, तो सुनील ग्रोवर यहां डाक्टर गुलाटी के रोल में छा गए। कुछ वक्त पहले एक फ्लाइट में आपसी टकराव के चलते सुनील ग्रोवर कपिल के शो से अलग हो गए। इसके बाद से लगातार कयास लगाए जा रहे हैं कि सुनील ग्रोवर अपना नया शो शुरू करेंगे। सुनील ग्रोवर को फिर से कपिल के शो में लाने की कोशिश हुई, लेकिन सुनील ग्रोवर इसके लिए नहीं माने। 

 संस्कृत को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे हजारों बच्चे

उत्तराखंड में प्राचीन काल से ही संस्कृत भाषा के कई गुरुकुल आश्रम रहे है लेकिन आज तक सरकारी मदद न मिलने के कारण इनमे पड़ रहे हजारों छात्रों का भविष्य अन्धकार में है। लगातार अपनी उपेक्षा के चलते और संस्कृत भाषा को लोकप्रिय बनाने के लिए उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी, ऋषिकेश ने एक भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया जिसमे बड़ी संख्या में छात्रों ने हिस्सा लिया।

प्राचीन काल से ही उत्तराखण्ड देव भूमि के रूप में अपनी विशेष पहचान रखती है, यहाँ कई ऋषि-मुनियों के गुरुकुल और आश्रम होने के चलते देववाणी संस्कृति का विशेष अध्यन्न केंद्र मन जाता था। लेकिन वर्तमान समाज में पश्चिमी सभ्यता का तेजी से प्रसार होने के चलते संस्कृत भाषा पिछड़ती चली गयी और वर्तमान में गुरुकुल और आश्रमों की शिक्षा पद्धति बदहाल और संकट में है।

कई बार सरकार ने संस्कृत भाषा के उथान के लिए वादे तो किये लेकिन जमीनी स्तर पर कोई काम न होने के चलते आज स्थिति खराब होती जा रही है, वहीँ संस्कृत भाषा में अपना करियर तलाश रहे युवायों को अब भविष्य की चिंता सताने लगी है। उनका कहना है कि सरकार शिक्षा में संस्कृत भाषा को भी उतना सम्मान दे और इस विषय में अध्यन कर रहे छात्रों के लिए रोजगार के अवसर भी प्रदान करे। जबकि हक़ीकत ये है कि यहाँ चल रहे कई संस्कृत महाविद्यालयों में अध्यापकों की कमी है और ये विद्यालय निजी संस्था के सहयोग से चल रहे हैं, जिनमे सरकारी सहायता न मिल पाने के कारण इनकी बंद होने की नोबत आ गई है।

सरकार भाषा संस्थान और संस्कृत अकादमी खोल कर, प्रतिक रूप में संस्कृत को बढ़ावा देने का काम तो कर रही है, लेकिन ये ऊँठ के मुँह में जीरा साबित हो रहा है। जमीनी हक़ीक़त में कई विद्यालय और माहविद्यालय दान पूण्य के पैसों से चल रहे है जिससे वहां पड़ने वाले छोत्रों को शिक्षा में ज्यादा सुविधा नहीं मिल पा रहीं है। अगर यही हालात रही तो आने वाले वक़्त में संस्कृत भाषा विलुप्ति के कगार में पहुच जाएगी।

ऐसे साधा मन की शांति को इस सरकारी अधिकारी ने

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देहरादून में चल रहे पुस्तक मेले में हर उम्र के लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। ये मेला 28 सितम्बर से 5 सितम्बर तक परेड ग्राउंड में चलेगा। तमाम विषयों की किताबों के इस मेले में पाठकों को अपनी रुची और नये आयामों से जुड़ी किताबों से रूबरू होने का मौका मिल रहा है। मेले में प्रभात प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित, ‘मैडिटेशन के नवीन आयाम’ और ‘आत्म दीप बने’ का भी स्टाॅल लगा है, यह दोनों पुस्तक पोजिटिव थिंकिंग और तनाव प्रबंधन पर आधारित है।

इनके विषय अनुक्रम, कार्मिक एकाउंट, क्रोध,माफी, पेरैंटिग, स्वीकार भाव,डिटैचमेंट, कॉम्पिटिशन, वैल्यू मूल्य, आंतरिक सुंदरता आदि पर अाधारित है। इनके लेखक मनोज श्रीवास्तव बताते हैं कि कैसे मेडिटेशन ने उनका जीवन परिवर्तित किया।

manoj shrivastav

मनोज कहते हैं कि, “मार्च 2015 से रोजना आधे घंटे मैनें मैडिटेशन करना शुरु किया, इससे मेरे जीवन पर खासा अच्छा असर पड़ा।” और यहीं से उन्हें अपने अनुभवों को लोगों के साथ साझा करने की प्रेरणा मिली। वो कहते हैं कि, “मैडिटेशन से नेगेटिव थॉट खत्म होते है और हमारी एनर्जी बचती है।”

और इसी पोजिटिव एनर्जी का नतीजा रहा 197 पन्नों की ये किताब। ध्यान करने के सिद्दातों पर आधारित ये किताब लोगों के बीच खासी पसंद की जा रही है। गौरतलब है कि यह किताब मनोज ने केवल 45 दिन में लिख डाली। मनोज का मानना हैं कि ये पल उनके लिये किसी सपने के सच होने जैसा है।

उनकी दूसरी किताब ‘आत्म दीप बने’ का अंग्रीजी संस्करण ‘Be your own light’ के नाम से बाजार में है। इसका अंग्रेजी अनुवाद पत्रकार राधिका नागरथ ने किया है।

नई पीढ़ी को मनोज यही संदेश देते हैं कि अगर वो सही लगन से मेडिटेशन करें तो वो अपने जीवन में एक बहुत सकारातमक बदलाव ला सकते हैं।

इन दिनों मनोज अपनी तीसरी किताब पर काम कर रहे हैं। ये किताब जीवन में निर्णय लेने की प्रक्रिया को और आसान बनाने के बारे में हैं।

पलायन का एक और अंदाज़ बयान करता है ये वीडियो

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उत्तराखंड के रहने वाले हो और खुद को उत्तराखंड कहने में संकोच!! अगर आप भी ऐसा महसूस करते हो तो यह स्टोरी आपके लिए है। मेट्रोपाॅलिटन सिटी में रहते हुए और वहां की चकाचौंध में अगर आप भूल चुके हैं कि आप पहाड़ी राज्य उत्तराखंड से हैं तो यह विडियो आपके लिए हैं। मूल रुप से उत्तराखंड निवासी विजय आर्यन(द्वाराहाट), मैडी(टिहरी), मुक्ता कंडियाल(कोटद्वार), दिपक नेगी(रानीखेत) और कैमरामेन निखिल गौतम(दिल्ली) ने अपना एक छोटा उत्तराखंडी विडियो लाॅंच किया है।

टीम न्यूजपोस्ट से विडियो के बारे में बात करते हुए विजय आर्यन ने बताया कि वह पिछले 4 साल से दिल्ली में रह रहे हैं और एक चीज जो उन्हें हमेशा खटकती थी वह थी लोगों में अपने राज्य को छुपाने की भावना और खुद को दिल्ली वाला दिखाना। विजय ने बताया कि वह हमेशा लोगो को मेट्रो में या तो अंग्रेजी या हिंदी में गाने सुनते देखा है।एसे में अपनी परंपरा और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए हम दोस्तों ने एक विडियो बनाया ।इस विडियों में एक मैसेज है कि चाहें आप कहीं भी रहो अपने राज्य का होने पर गर्व करना सबसे ज्यादा खुशी देता है।

angrez hai kya team

विजय कहते हैं कि अगर हर कोई अंग्रेजी और हिंदी गाने सुनेगा तो उत्तराखंड के गायक और उनके काम की इज्जत कौन करेगा, आज के दिन बहुत से उभरते सितारे उत्तराखंड से हैं।विजय का मानना हैं कि उनके इस विडियो से वह उन लोगों को संदेश देना चाहते हैं जिन्हें अपने लोकगीतों को लोगों के सामने सुनने और खुद को उत्तराखंडी बताने में शरम आती है। इसके माध्यम से वह सभी देखने वालों को उत्तराखंडी होने पर गर्व महसूस कराना चाहते हैं।

इस विडियो में काम करने वाले चारों की किरदार उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों से हैं। इनमें से कुछ मीडिया की पढ़ाई कर चुकें हैं तो कुछ अलग-अलग क्षेत्र में नौकरी कर रहे हैं।इसके अलावा इनके ग्रुप का एक एफबी पेज ”देख मिस्टर जोक्स उत्तराखंड” नाम का है जिसके जरिए यह लोगों तक अपने काम को आसानी से पहुंचा सकते हैं।विजय आर्यन और उनकी टीम के इस विडियों ने अलग-अलग माध्यमों से खूब वाह-वाही बटोरी है।अब तक लाखों हिट्स ला चुका इस विडियो ने एक मैसेज तो दे दिया है कि उत्तराखंडी किसी से कम नहीं हैं।

टीम न्यूजपोस्ट की तरफ से विजय आर्यन और सभी किरदारों को उनके काम के लिए बधाइयां और आने वाले प्रोजेक्ट के लिए शुभकामनाएं।

फूलों की घाटी को नुकसान पहुंचा रहा गोल्डन फर्न

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विश्व धरोहर फूलों की घाटी को पहले पोलीगोनियम नुकसान पहुंचा रहा था और अब एक और नई मुसीबत यहां पैर पसारने लगी है। इस घाटी में अब गोल्डन फर्न ने दस्तक देनी शुरू कर दी है। फूलों की घाटी पर अब एक और काली छाया ने फूलों को नष्ट करना शुरू कर दिया है।

फूलों की घाटी में एक दशक पहले पोलीकोनियम नामक एक फूल ने पैर पसारते हुए फूलों की घाटी को काफी नुकसान पहुंचाया है। इस पौध ने अपने आसपास के सभी फूलों को नष्ट कर दिया है, जिसको देखते हुए नंदादेवी वायोस्फियर रिजर्व ने इसे नष्ट करने पर करोड़ों रुपये खर्च कर दिया, मगर अभी भी यह पौधा घाटी में मौजूद है। इस पौधे से ही नंदादेवी वन विभाग निजात नहीं पाया था कि अब एक नया पौधा जिसे गोल्डन फर्न कहा जा रहा है, ने घाटी में पांव पसारने शुरू कर दिये हैं। तेजी से यह पौधा फैल रहा है। यदि इसे रोकने के ठोस उपाय नहीं किये गये तो फूलों की घाटी का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। गोल्डन फर्न नामक यह पौधा अपने आसपास के पौधों को नष्ट कर देता है। नंदादेवी वन सरंक्षण के अधिकारियों की माने तो इस पौधे को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है और जल्द ही इस पौध से घाटी को निजात दिलायी जायेगी।