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पूर्व मुख्यमंत्रियों का अजायब घर बनीं भाजपा

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हलद्वानी के अस्पताल से सीधे भाजपा में टपके 91 साल के नारायणदत्त तिवारी को पार्टी में शामिल करने के साथ ही पार्टी उत्तराखंड के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों का अजायब घर बन गई है। इन मुख्यमंत्रियों में तिवारी के अलावा अस्सी साल की उम्र पार कर चुके भुवनचंद्र खंडूड़ी, पचहत्तर साल की राजनीतिक अछूत सीमा छू रहे भगत सिंह कोष्यारी, आपदा राहत के कथित खलनायक विजय बहुगुणा और भ्रष्टाचार की बलिवेदी पर कुर्बान हुए रमेश पोखरियाल निशंक भी शामिल हैं। जाहिर है कि इन तमाम टिमटिमाते राजनीतिक दियों को अपने झंडे तले इकट्ठा करके भाजपा 15 फरवरी, 2017 को प्रस्तावित उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव में हर कीमत पर जीत दर्ज करने को आतुर है। यदि ऐसा नहीं है तो उम्र की 75वीं दहलीज पार कर चुके अपने दिग्गज नेताओं को राजनीतिक अछूत घोशित कर चुकी भाजपा ने इक्यानबे साल के तिवारी का उनके विवादित पुत्र रोहित शेखर को कमल छाप पर चुनाव लड़ाने की शर्त के साथ पार्टी में इस्तकबाल क्यों किया? ताज्जुब यह है कि राज्य के इन सारे भूतपूर्व माननीयों की मौजूदगी के बावजूद टिकट बांटने की माथापच्ची भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को खुद ही करनी पड़ी है। इन तमाम दिग्गजों को या तो अपनी संतानों को मिले कमल छाप अथवा अपने एकाध चहेते को टिकट मिल जाने मात्र से ही संतोश करना पड़ा है। हद तो तब हुई जब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट तक को पार्टी उम्मीदवारों के चयन में नहीं पूछा गया। इससे जाहिर है कि सत्ता पाने की अंधी दौड़ में भाजपा ने अवसरवादिता की नई लकीर खींचने के साथ ही राज्य के पार्टी संगठन के अस्तित्व को ही नकार देने की कथित कांग्रेसी संस्कृति भी और परिश्कृत रूप में अपना ली है। राजनीति की चौसर पर भाजपा ने अपनी इस चाल से यह भी जता दिया कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की मात्रा पूरी तरह केंद्रीय नेतृत्व की कृपा पर निर्भर है। साथ ही अमित शाह ने राज्य के करीब साठ लाख मतदाताओं के सामने इन पूर्व मुख्यमंत्रियों की हैसियत की पोल भी खोलकर रख दी। ऐसा करना शायद नरेंद्र मोदी को ही चुनाव प्रचार का नायक स्थापित करने और चुनाव नतीजे आने पर महाराश्ट्र, गुजरात और हरियाणा की तरह अपनी पसंद का मुख्यमंत्री बनाने के लिए अमित की मजबूरी थी।

पंजाब से दो सालों से पुलिस को छका रहा फरार अपराधी गिरफ्तार

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स्पेशल टास्क फोर्स ने सेन्ट्रल जेल, पटियाला से लगभग दो सालों से वरपरोल तोड़ कर फरार अभियुक्त प्रमोद उर्फ बिट्टू को कोतवाली रुड़की क्षेत्र से बस अड्डे के पास से गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। अभियुक्त के पास से एक देसी कट्टा बरामद किया गया। जिसके सम्बन्ध में कोतवाली रुड़की सिविल लाईन में मुकदमा किया गया है।

प्रमोद उर्फ बिट्टू उपरोक्त को सैशन जज, स्पेशल कोर्ट पटियाला ने एनडीपीएस एक्ट में 10 वर्ष की जेल और एक लाख रुपये जुर्माना की सजा सुनाई थी। इसके अलावा स्पेशल जज एस0ए0एस0 नगर, मोहाली पंजाब ने भी अभियुक्त को एनडीपीएस एक्ट मे 10 साल की जेल तथा एक लाख रुपये जुर्माना की सजा दी थी।

29 दिसंबर 2014 को प्रमोद को सेन्ट्रल जेल, पटियाला से 6 हफ़्ते के लिये पैरोल पर छोड़ा गया था, जिसके चलते उसे 10 फ़रवरी 2015 को आत्मसमर्पण करना था, लेकिन प्रमोद ने समर्पण नहीं किया गया।

जआंच में ये भी पता चला है कि फरारी के दौरान उक्त अभियुक्त उत्तर प्रदेश की सीमा पर भांग के ठेके संचालित करता था।

अभियुक्त प्रमोद उर्फ बिट्टू का अपराधिक इतिहासः-

  • वर्ष 1994 धारा 392 भादवि थाना देवबन्द जिला सहारनपुर, उ0प्र0।
  • वर्ष 1998 धारा 307, 379, 411 भादवि व 25 आम्र्स एक्ट थाना मंगलौर हरिद्वार।
  • वर्ष 1998 धारा 379, 411 भादवि थाना मॉडल टाउन, दिल्ली।
  • वर्ष 2004 धारा 302,201,120बी भादवि थाना बाबूगढ़, गाजियाबाद।
  • वर्ष 2010 धारा 15 एनडीपीएस एक्ट थाना जुल्कान, पंजाब।
  • वर्ष 2010 धारा 15 एनडीपीएस एक्ट थाना लालरु, पंजाब।

उक्त अभियुक्त के विरूद्ध पंजीकृत शेष अभियोगों की जानकारी की जा रही है।

 

 

पार्टी सत्ता के लिए अपना चरित्र,चिंतन,चेहरा और चाल खोती जा रही- विजया बर्थवाल

टिकट बँटवारे को लेकर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। गुरुवार यमकेश्वर विधानसभा क्षेत्र की भाजपा की सिटिंग विधायक विजया बर्थवाल ने पार्टी केंद्र ख़िलाफ़ सुर बुलंद कर दिये। उन्होंने बीजेपी से अपनी नाराजगी जताते हुए कहा कि मेरा राजनैतिक सफर 20-22 साल पुराना है और इसके दौरान मैंने बहुत ही ईमानदारी के साथ पार्टी की सेवा की है। उन्होंने कहा की मेरे साथ बेइंसाफी हुई है और इस बार भाजपा ने जो किया वो बहुत ही पीड़ादायक है।

उन्होंने कहा कि मैं पार्टी से यह सवाल करना चाहती हूं कि आखिर मेरा दोष क्या है या मैंने ऐसा क्या कर दिया कि पार्टी ने मेरा टिकट काट दिया। विजया ने कहा मेरे पास तमाम विकल्प है और मैं चाहूं तो बगावत कर सकती लेकिन मैं सोच समझ के ही कोई भी कदम उठाऊंगी। उन्होंने कहा कि इतनी लंबी निस्वार्थ सेवा करने के बाद भी पार्टी ने बिना किसा सलाह मशवरे के मेरा टिकट काट के किसी और के हाथ में दे दिया।उन्होंने कहा कि मैं तीन बार विधायक रही हूं और पार्टी से मेरा लगाव है इसलिए मैं कोई कदम नहीं उठा रही लेकिन पार्टी को भी अपने फैसले पर सोचना होगा।

उन्होंने कहा कि इस चुनाव में भाजपा ने अपना चरित्र,चेहरा,चाल और चिंतन सब खो दिया है और यह अपने आप में एक चिंता का विषय है।उन्होंने कहा कि यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हुआ है पार्टी के कायकर्ताओं के भावनाओं को दरकिनार कर पार्टी में मनमानी हुई है।

ग़ौरतलब है कि विजया का टिकट काट कर भुवन चंद्र खंडूरी की बेटी ऋतु खंडूरी को दिया ग़यासुद्दीन है। विजया ने भुवन चंद्र खंडूरी पर निशाना साधते हुए कहा कि खंडूड़ी जी से हुई बातचीत में मुझे यह यकिन दिलाया गया था कि मेरा टिकट पक्का है लेकिन अंत में मेरा टिकट काट दिया गया।उन्होंने कहा कि मुझे खंडूड़ी जी के इस बात से काफी धक्का पहुंचा है और रितु खंडूड़ी की मुझसे आर्शीवाद और मुलाकात वाली खबर सरासर गलत है। विजया ने कहा कि अब मैं स्वतंत्र हूं और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम करुंगी और जरुरत पड़ी तो मैं विरोध भी करुंगी।

चुनावों में शराब पर रोक के लिये उठाये कदम नाकाफी: नसीम जैदी

नसीम जैदी,प्रेस वार्ता,देहरादून

अपने दो दिन के देहरादून दौरे के बाद पत्रकारों से बात करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने कहा कि चुनावों में शराब तस्करी को रोकना एक बड़ी चुनौती रहती है और इस फ्रंट में राज्य एक्साइज विभाग के काम से वो संतुष्ट नही हैं। जैदी ने कहा कि प्रदेश की एक्साइज कमिशन का काम असंतोषजनक है जबकि प्रदेश में चुनाव के दौरान होने वाला शराब डिस्ट्रीब्यूशन एक अहम मुद्दा है। इसके लिए संबधित डिपार्टमेंट से मीटिंग भी कि है जो इस मुद्दे पर काम करेंगें।

अपने दो दिनों के दौरे के बारे में बोलते हुए जैदी ने कहा कि

  • पैरोल के खिलाफ हुई शिकायतों पर फिर से सभी मामले को जाँच के आदेश दे दिए हैं।
  • बूथ और बस्ते का खर्चा उमीदवार के खर्चे में जोड़ा जाएगा और सभी पार्टी और उम्मीदवारों को प्रचार के लिए एक समान अवसर प्राप्त होंगे।
  • उत्तराखंड के आस पास बार्डर क्षेत्रों को चुनाव के दौरान अच्छे से सील कर दिया जाएगा ताकि आस पास के क्षेत्र से चुनाव पर फर्क ना पड़े।
  • उन्होंने कहा कि इस चुनाव ड्यूटी लगने वाले सभी कर्मचारियों को टाईम से मिलेगा पोस्टल बैलेट।
  • 79 इंटर स्टेट बैरियर 71 विद इन स्टेट बैरियर लगाये है
  • वीवी पैड मशीन का इस्तेमाल इस बार प्रदेश में किया जायेगा, धरमपुर,
  • 75लाख 95 हजार वोटर
  • 1 लाख 56 हजार नाम नए जुड़े है
  • 97 हजार सर्विस वोटर
  • हरिद्वार,ज्वालापुर,लक्सर और रुद्रपुर में पोस्टल वैलेट का एले्क्ट्रोनिक ट्रांसमिशन होगा, कई दुनिया के देशो में ये पहली बार होगा,
  • 23 हजार विकलांग लोग है उनको सुविधा देने के लिए विशेष प्रयास होगा

राजनितिक पार्टियों द्वारा शिकायतों में मुख्य रुप से चुनाव में पेड न्यूज,सोशल मीडिया का दुर्पोयग,शराब बंटवारा और पैसों के मिसयूज बताया गया, इस मसले पर जैदी ने कहा कि कमीशन इन सबको ध्यान में रखेगा और इसपर काम भी किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में चल रहे एंटी सोशल इलिमेंट के खिलाफ भी काम किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि पोलिंग के दिन होने वाले मौसम से जुड़ी समस्या पर काम करने के लिए डिजास्टर रिकवरी प्लान बनाया गया है जो मौसम खराब होने की स्थिति में काम करेगा। जैदी पूरे तौर पर 4 जनवरी से आचार संहिता लागू होने के बाद उत्तराखंड प्रदेश में हुए काम से संतुष्ट दिखे। इलेक्शन के आखिरी 72 घंटे के लिए कमीशन ने स्टैडर्ड आपरेशन प्रोसिजर को कड़ाई से लागू करने के निर्देश दिए हैं। पेड न्यूज पर नजर रखने के लिए मिडिया सर्टिफिकेशन एक्टिविटि में प्रेस काउंसिल के सिनियर जर्नलिस्ट की नियुक्ति की गई है।

इस मौके पर जिला निर्वाचन कार्यालय देहरादून द्वारा मतदाता जागरुकता हेतु ऐन्ड्राइड ऐप “देहरादून वोट्स” के बारे में बताया गया। इस ऐप के माध्यम से मतदाताओं को चुनाव से संबधित सभी जानकारी मिल सकेगी।मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने इस ऐप के प्रोटो टाईप का लोकार्पण किया और 25 जनवरी नेशनल वोटर डे के दिन यह ऐप गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगा।

 

बीजेपी के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद क्या कांग्रेस दिखा पाएगी नए प्रयोग का साहस

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चित्र: प्रशांत बडूनी

कांग्रेस के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों और चार पूर्व मंत्रियों को तोड़ लेने तथा उसके दर्जन भर पूर्व विधायकों को कमल छाप टिकट देकर चुनाव में उतारने के अलावा भी भाजपा ने कांग्रेस की चैतरफा घेराबंदी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। भाजपा ने उत्तराखंड में 64 कमल छाप उम्मीदवारों की अपनी सूची से यह जता दिया कि सत्ता पाने के लिए उसे आलोचना अथवा अपने काडर की रत्ती भर चिंता नहीं है। इससे साफ है कि आगामी 15 फरवरी को राज्य विधान सभा चुनाव के लिए जो मतदान होगा उसके लिए भाजपा चुनाव प्रचार भी जबरदस्त पैमाने पर करने वाली है। उसे लगता है कि नोट बदलने की केंद्र सरकार की मुहिम के बाद बाकी सारे दल पैसा खर्च करने के मामले में अब उसके पासंग भी नहीं होंगे। इसके अलावा अवसरवाद के दाग को झुठलाने के लिए भाजपा को अपना प्रचार बेहद आक्रामक शैली में करना पड़ेगा। इसमें भाशाई संयम भी वैसे ही ताख पर रख दिए जाने की आशंका है जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों और आगे-आगे खर्च की सीमा के अतिक्रमण की ढिठाई दिखाने की भाजपा के प्रति आशंका बन रही है।

भाजपा ने डेढ़ दर्जन से ज्यादा एकदम नए चेहरों को कमल छाप सौपकर कांग्रेस पर भी युवा और बेदाग उम्मीदवारों को पंजा छाप सौंपने का दबाव बढ़ा दिया है। भाजपा की चुनावी रणनीति के रूझान से साफ है कि उसने बहुत लंबी तैयारी के बूते उत्तराखंड के आगामी विधान सभा चुनाव के लिए इतना बड़ा जुआ खेला है। टिकट जिस तरह बांटे गए हैं उससे साफ है कि कमल छाप का आवंटन तय करते समय केंद्रीय नेतृत्व ने सबसे अधिक ध्यान उम्मीदवारों की जिताउ क्षमता पर दिया है। इसके लिए बाकायदा अनेक राउंड में सर्वे कराए गए और उन्हीं के आधार पर भाजपा ने अपने अनुभवी नेताओं की बड़े पैमाने पर बगावत की आशंका को दरकिनार करके दलबदलुओं और नए लोगों को भी उम्मीदवार बनाया।

सर्वे तो प्रशांत किशोर के मार्फत कांग्रेस द्वारा भी कराए जाने के संकेत हैं, मगर भाजपा की इतनी सघन राजनैतिक व्यूह रचना के बाद क्या कांग्रेस अपनी प्रतिद्वंद्वी पार्टी जितना जोखिम उठा पाने का साहस दिखा पाएगी? क्योंकि राज्य में विपक्षी दल होने के कारण भाजपा को कुछ भी खोने की कोई चिंता ही नहीं है। कांग्रेस के लिए भी उम्मीदवार चुनने में नए प्रयोग की पूरी गुंजाइश है क्योंकि साल 2012 के विधान सभा चुनाव में जीते कांग्रेस के करीब दर्जन भर विधायक तो भाजपा के कमल छाप पर चुनाव लड़ रहे हैं। इसलिए उनकी जगह अपेक्षाकृत युवा और बेदाग उम्मीदवार उतारने का अभूतपूर्व मौका कांग्रेस के पास है। इस मौके को कांग्रेस अपने बुजुर्ग नेताओं की जगह उनकी संतानों अथवा उनके चहेतों को पंजा छाप पर चुनाव लड़ाकर और व्यापक बना सकती है। इससे भाजपा के अवसरवाद की धार भोथरी करने में कांग्रेस को बड़े पैमाने पर मदद मिल सकती है। इसके अलावा भाजपा के बागियों को टिकट अथवा गुपचुप समर्थन देकर अपने बागियों को निपटाने की पिटी-पिटाई लकीर का फकीर बनने का रास्ता तो कांग्रेस के सामने खुला है ही।

भाजपा ने तो बाकायदा रणनीति के तहत नए चेहरों को कमल छाप पर अधिकतर उन्हीं क्षेत्रों में उम्मीदवार बनाया है जो ज्यादातर गैर भाजपाई उम्मीदवारों को चुनते रहे हैं। इनमें षामिल हैं गंगोलीहाट से मीना गंगोला, नैनीताल से संजीव आर्य, सिंतारगंज से सौरभ बहुगुणा, भगवानपुर से सुबोध राकेश, यमकेश्वर से ऋतु खंडूड़ी, पौड़ी से मुकेश कोली, धारचूला से वीरेंद्र सिंह पाल आदि। इनमें से सभी हालांकि राजनीति में तो नौसिखिए नहीं हैं मगर खुद पहली बार चुनाव मैदान में उतारे गए हैं। इनमें से सुबोध, ऋतु, संजीव और सौरभ की तो मजबूत राजनैतिक विरासत रही है। देखना यही है कि भाजपा द्वारा अपनी चुनावी संस्कृति का अपहरण करके आमूल-चूल उसे अपना लिए जाने के बाद कांग्रेस अब अपनी चुनावी रणनीति में किसी कल्पनाशीलता की झलक दे पाएगी? सवाल यह भी है कि अपने पांच साला शासन के बाद दोबारा सत्ता पाकर उत्तराखंड में बारी-बारी से भाजपा और कांग्रेस को सत्ता सौंपने के जनादेश का रूख मोड़ने में कांग्रेस कैसे कामयाब होगी? कुल मिलाकर पंद्रह फरवरी का चुनाव राज्य में हरीश रावत के राजनीतिक कौशल की भी अग्निपरीक्षा होगी, क्योंकि अब उत्तराखंड में कांग्रेस के वही एकमात्र खेवनहार बचे हैं।

पीएम मोदी के कार्यक्रम के लिए डायवर्ट होंगे कुछ रुट

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21 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आईएमए दौरे के लिए यातायात डाइवर्ट प्लान इस तरह रहेगा :-

  • दौरे के दौरान आईएमए की ओर कोई भी ट्रेफिक नहीं जायेगा और आईएमए की तरफ जीरो जोन रहेगा।
  • बल्लूपुर से आने वाले सभी ट्रेफिक रांगणवाला चौकी आईएमए के पास से डायवर्ट कर मीठीबैरी से टी स्टेट होते हुए प्रेमनगर की ओर मुख्य मार्ग पर जा सकेगा।
  • प्रेमनगर की ओर से आने वाले ट्रेफिक को केन्द्रीय विद्यालय तिराहे से मीठी बेरी से रांगणवाला होते हुए भेजा जायेगा।
  • विकासनगर की ओर से आने वाले भारी वाहनों को हर्बटपुर चौक से धर्मावाला चौक की ओर डाइवर्ट किया जायेगा। तथा सेलाकुंई की ओर से आने वाला ट्रेफिक धूलकोट तिराहे से शिमला बाई पास की ओर डायवर्ट किया जायेगा।
  • देहरादून से विकासनगर हर्बटपुर होते हुए दिल्ली जाने वाले भारी वाहनों को शिमला बाईपास से डाइवर्ट कर सेंट ज्यूड्स, मेंहूवाला, नयागांव धर्मावाला की तरफ भेजा जायेगा।
  • देहरादून की ओर से विकासनगर जाने वाले समस्त भारी वाहनों को बल्लूपुर से बल्लीवाला से जीएमएम रोड होते हुए कमला पैलेस की ओर से शिमला बाईपास की ओर निकाला जायेगा। उक्त ट्रेफिक शिमला बाईपास से विकासनगर की ओर जा सकेगा।
  • समस्त भारी वाहनों को हर्बटपुर, शिमला बाईपास रोड की ओर तथा बल्लूपुर चौक से जीएमएस रोड की ओर डायवर्ट किया जायेगा।

इस दौरान प्रशासन ने आम जनता से अपील कि है 21 जनवरी को होने वाले डायवर्ट के दौरान असुविधा से बचने के लिए चौपहिया गाड़ियों का प्रयोग कम से कम करते हुये दोपहिया वाहनों का प्रयोग करे और व्यवस्था बनाने में जनपद पुलिस को अपना सहयोग प्रदान करें।

भाजपा के अवसरवाद को कैसे काटेगी कांग्रेस!

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उत्तराखंड में भाजपा की अवसरवादी चुनावी रणनीति ने कांग्रेस को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री और बुजुर्ग कांग्रेस नेता नारायणदत्त तिवारी के 18 जनवरी को भाजपा में शामिल होने के साथ ही आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए दोबारा चुनकर सत्ता पाने की चुनौती और गहरी हो गई है। हालांकि मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय भाजपा पर दलबदलुओं और वंशवाद की पालकी ढोने वाली पार्टी होने का आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने ये आरोप भाजपा की सूची में बागी कांग्रेस विधायकों, पूर्व मंत्रियों और पूर्व मुख्यमंत्री को खुद अथवा उनके बेटे-बेटियों को कमल छाप टिकट दिए जाने पर लगाए। इसके बावजूद कांग्रेस की अपनी दुष्वारियां घटने का नाम नहीं ले रहीं। भाजपा ने राज्य में ऐसे राजनीतिक हालात पैदा कर दिए हैं कि कल तक राज्य के सबसे मजबूत राज नेता के रूप में उभर रहे मुख्यमंत्री हरीश रावत अब अकेले पड़ जाने का जोखिम झेल रहे हैं। भाजपा ही नहीं कांग्रेस के करीब आधा दर्जन पूर्व मंत्रियों सहित दर्जन भर पूर्व विधायक जब हरीश रावत पर निरंकुश कार्यशैली का आरोप लगाएंगे तो जनता के बीच उनके प्रति क्या संदेश जाएगा? जाहिर है कि हरीष रावत को इसकी काट ढूंढने के लिए संयम के साथ ही साथ गहरी सूझबूझ का परिचय भी देना पड़ेगा।

इसके अलावा बागी कांग्रेसियों के वारिसों को टिकट देने पर भाजपा की आलोचना करके कांग्रेस ने अपने हाथ भी बांध लिए हैं। उसे यह घोशणा करनी पड़ी कि पार्टी एक नेता के परिवार से एक ही उम्मीदवार को पंजा छाप पर चुनाव लड़ने का टिकट देगी। इससे पहले तक ये कयास आम था कि मुख्यमंत्री हरीष रावत और उनके साथी मंत्री इंदिरा हृदयेष और यषपाल आर्य सहित अनेक कद्दावर कांग्रेसी परिवारों के एक से अधिक उम्मीदवार पंजा छाप हथियाने के जुगाड़ में हैं। इसके पीछे सोच यह थी कि पांच साल षासन कर चुकी कांग्रेस को चुनाव में जो अलोकप्रियता झेलनी पड़ेगी उसे इन कांग्रेसी खानदानों के वारिसों कीे मौजूदगी किसी हद तक भोथरा कर देगी। इनकी मदद से कांग्रेस राज्य में दोबारा बहुमत का जुगाड़ कर लेने की फिराक में थी, हालांकि पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी पहले से ही एक परिवार-एक टिकट की मर्यादा बांधने के हामी थे। इस बात की तस्दीक खुद किषोर उपाध्याय ने की थी। भाजपा द्वारा अपना कांग्रेसीकरण कर लेने के बाद अब कांग्रेस को अपनी रणनीति फूंक-फूंक कर बनानी पड़ेगी।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब भाजपा के बागी नेताओं को पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ाने के लोभ से बचने की है। हालांकि बाजपुर से अपने मंत्री यशपाल आर्य को कमल छाप टिकट मिल जाने पर कांग्रेस ने भाजपा उपाध्यक्ष सविता टम्टा बाजवा को 17 जनवरी को हाथोंहाथ पार्टी में शामिल करके इस चक्रव्यूह में फंसने की तैयारी दिखा दी है। इससे तो यही लग रहा है कि कांग्रेस भी भाजपा को मुंहतोड़ जवाब देने के फेर में उसके कुछ कद्दावर बागी नेताओं को उन सीटों पर पंजा छाप से चुनाव लड़वा सकती है जहां से उसके वर्तमान बागी विधायक कमल छाप पर चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसी सीटों में फिलहाल बाजपुर के अलावा रूड़की और कोट़द्वार सीट सबसे अधिक चर्चा में हैं। इनमें से रूड़की में भाजपा ने बागी कांग्रेसी विधायक प्रदीप बत्रा को कमल छाप पर खड़ा किया है जिससे उसके ही पूर्व विधायक सुरेश चंद जैन ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया है। इसी तरह कोटद्वार से भाजपा द्वारा बागी कांग्रेसी हरक सिंह रावत को टिकट दिए जाते ही उसके पूर्व विधायक शैलेंद्र रावत ने कांग्रेस से मोलभाव षुरू कर दिया है। इन सीटों के अलावा पुरोला, पौड़ी, केदारनाथ, नरेंद्र नगर, रूद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, बागेष्वर, कपकोट, राजपुर रोड सहित लगभग 22 चुनाव क्षेत्रों में भाजपा नेताओं ने पार्टी उम्मीदवारों की सूची देखते ही आनन-फानन पार्टी से बगावत करके चुनाव लड़ने की घोशणा कर दी है। जाहिर है कि राज्य में अधिकतर विधानसभा सीटें औसतन एक लाख से भी कम वोटों वाली होने के कारण जिताउ उम्मीदवारों के मंसूबों पर बागी उम्मीदवार आसानी से पानी फेर सकते हैं। ऐसे में देखना यही है कि कांग्रेस अपने बचे-खुचे सिपहसालारों को इकट्ठा रखते हुए भाजपा में बगावत का फायदा उठाने का आसान रास्ता अपनाएगी अथवा अपने बेदाग पुराने वफादारों और युवा चेहरों को आगे करके अपनी पांच साला उपलब्धियों के बूते भाजपा के अवसरवाद को बेनकाब करने और जनता का दोबारा समर्थन पाने में कामयाब होगी?

निष्पक्ष शान्तिपूर्ण मतदान के लिए प्रशासन को दिशानिर्देश

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पुलिस उपमहानिरीक्षक गढवाल ने पुष्पक ज्योति  ने मंगलवार को देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में आने वाले विधान सभा चुनाव 2017 की समीक्षा बैठक हुई। बैठक में विचार-विमर्श पर विस्तारपूर्वक चर्चा कर कार्यवाही करने के निर्देश दिये गये।

उन्होंनें बैठक में बताया कि समय से पुलिस बल का आंकलन करने पर पुलिस बल की ब्रीफिंग के साथ ही अधिकतम पुलिस बल का निर्वाचन ड्यूटी के लिए उनकी उपलब्धता सुनिश्चित होगी। जनपद देहरादून के मतदान केन्दों का समय से आंकलन के निर्देश दिये गये। कितने पुलिस कर्मियों के मतदाता फोटो पहचान पत्र बनाये गये है, साथ ही कितने शेष रह गये है,उनके भी पहचान पत्र बनाने के निर्देश दिये। फ्लाइंग स्क्वाड तथा स्टेटिक सर्विलांस टीम को क्रियाशील किये जाने के साथ ही अन्तर्राज्यीय बैरियरों पर प्रभावी चैकिंग करने के निर्देश दिये गये।

  • निष्पक्ष शान्तिपूर्ण मतदान
  • सविलान्स स्टैटिक टीम
  • फ्लाइंग स्क्वाड
  • दबिश/गिरफ्तारी/जिलाबदर की कार्यवाही।
  • गुण्डा एक्ट के तहत कार्यवाही
  • वांछित अपराधियों की गिरफ्तारी
  • पुरस्कार घोषित अपराधियों की गिरफ्तारी
  • धारा 107/116 दंप्रसं एवं धारा 116(3) दंप्रसं में पाबन्द
  • विधान सभा निर्वाचन नगर, ऋषिकेश, सहसपुर, (संवेदनशील)
  • रायपुर, (बागी प्रत्याशी होने के कारण)अतिसंवेदनशील
  • साम्प्रदायिक सद्भाव
  • बैरियरों की स्थापना
  • प्रत्याशी सुरक्षा
  • जोनल/सैक्टर पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति एवं दायित्व

बैठक में जनपद देहरादून के सभी अधिकारियों एवम् जनपद के सभी थाना प्राभारी मौजूद थे।

तिवारी के तेवर से कांग्रेस में खलबली

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कांग्रेस के बुजुर्ग नेता नारायण दत्त तिवारी के भाजपा का दामन थामते ही कांग्रेस ही नहीं उत्तराखंड की समूची राजनीति में हलचल पैदा हो गई है। गौरतलब है कि नब्बे साल की उम्र पार कर चुके श्री तिवारी उत्तराखंड और उससे पहले संयुक्त उत्तर प्रदेष के भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं। इसके अलावा वे केंद्रीय वित्त और उद्योग मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद भी कांग्रेस की सरकार में संभाल चुके हैं। उनकी कांग्रेस से नाराजगी की वजह उनके पुत्र रोहित षेखर को अगले महीने के विधान सभा चुनाव में पार्टी टिकट देने में राज्य और केंद्रीय नेतृत्व की आनाकानी बताई जा रही है। यह बात दीगर है कि खुद को श्री तिवारी का पुत्र सिद्ध करने के लिए रोहित को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्हें अपनाने से श्री तिवारी के इंकार पर अदालत द्वारा उनके खून से मेल कराई। रोहित के खून की डीएनए जांच मिल जाने पर उन्हें मजबूरन रोहित की मां उज्जवला शर्मा से शादी करके उन्हें अपनाना पड़ा।

कांग्रेस हाईकमान और प्रादेषिक नेतृत्व की मुष्किल यह है कि आंध्र प्रदेष के राज्यपाल पद से श्री तिवारी को राजभवन में उनके अष्लील वीडियो के वायरल होने पर नैतिकता के तकाजे पर हटाया गया था। साथ ही उन्हें अपना पिता सिद्ध करने के दौर में रोहित के आरोपों से भी उनकी तथा कांग्रेस की खासी मिट्टी पलीद हो चुकी है। ऐसे में रोहित को टिकट देकर पार्टी शायद श्री तिवारी और अपनी बदनामी के अध्यायों का रायता चुनाव के दौरान फिर से फैलने देने से बच रही है। हालांकि तथ्य यह भी है कि संयुक्त उत्तर प्रदेष और उत्तराखंड के लिए श्री तिवारी विकास पुरूश सिद्ध हुए हैं। दिल्ली की सीमा पर बसी मशहूर नोएडा औद्योगिक नगरी की नींव उन्हीं के मुख्यमंत्री काल में रखी गई थी। इसी तरह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कमान संभालते ही उन्होंने इस पिछड़े पहाड़ी राज्य में सिडकुल के नाम से औद्योगिक क्षेत्रों की जो नींव रखी उसने आज इसे अग्रणी राज्य बना दिया है। सिडकुल इतने सफल रहे कि उनकी बदौलत राज्य की आबादी और आमदनी भी पिछले दस साल में करीब दुगुनी हो गई है। श्री तिवारी अब भले ही सक्रिय राजनीति में नहीं है, मगर उनके बागी हो जाने पर उनकी भावनात्मक अपील से निपटना कांग्रेस के लिए राज्य विधानसभा के इस सबसे कठिन चुनाव में टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

राजनीति वास्तव में अनिशिचताओं का खेल है। दिलचस्प है कि जहाँ एक तरफ़ प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी में नेताओं पर 75  साल की उम्र सीमा लगा कर कई नेताओं को राजनीति से रिटायर कर दिया है वहीं 91 साल की उम्र में पंडित नारायण दत्त तिवारी को पार्टी की सदस्यता दिलाई जा रही है। पार्टी में पहले ही उम्र के चलते लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे नेताओं को हाशिये पर डाल दिया गया है और तो और प्रधानमंत्री किसी भी राजनीतिक पद पर उम्मीदवार चुनने के लिये उम्र को एक बड़ा फ़ैक्टर मानते हैं। लेकिन नारायण दत्त तिवारी को पार्टी में लेते वक़्त इस सिद्धांत को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।

एन डी तिवारी ने थामा कमल; बेटे को टिकट दिलाने के लिये चला दांव

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वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने बुधवार को कांग्रेस का साथ छोड़ कर बीजेपी का दामन थाम लिया । तिवारी ने बीजेपी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थित में दिल्ली में उनके निवास पर अपने बेटे रोहित शेखर के साथ बीजेपी ज्वाइन करी। बताया जा रहै है कि तिवारी के कांग्रेस से मोहभंग के पीछे पार्टी द्वारा उनके बेटे रोहित शेखर के लिये विधानसभा चुनाव का टिकट न दिये जाना है। पहले से ही टिकटों के बंटवारे को लेकर असमंजस में पड़ी कांग्रेस ने कई साल से हशिये पर घकेले तिवारी की अपने बेटे के लिये टिकट की मांग को दरकिनार करना ही सही समझा। हांलाकि बीजेपी का भी कहना है कि तिवारी के पार्टी में आने को किसी सीट की डील से जोड़ के न देखा जाये।

लेकिन राज्य में सत्ता पर काबिज़ होने की राह देख रही बीजेपी ने किसी ज़माने में कांग्रेस के कद्दावर नेता तिवारी को सहारा देने में राजनीतिक समझारी समझी। इसके पीछा कारण भी है, तिवारी उत्तराखंड ही नहीं उत्तरप्रदेश के भी बड़े ब्राहमण नेता के तौर पर जाने जाते हैं। तिवारी के द्वारा अपने कार्यकाल में किये गये कामों के कारण उनकी छवि भी “विकास पुरूष’ के रूप में बनी हुई है। हांलाकि अपनी निजि ज़िंदगी के कारण तिवारी हमेशा ही गलत कारणों से सुर्खियों में रहे और इसी के चलते उन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल पद भी गवाना पड़ा था। इसके बाद से ही तिवारी का राजनीतिक वनवास शुरू हो गया था। तिवारी और हरीश रावत की दूरियां जग जाहिर हैं। हांलाकि इन सालों में कांग्रेस ने तो उन्हें भुला दिया लेकिन उनके राजनीतिक कद को देखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तिवारी को अपने साथ रखने की कोशिसें करते रहे। इसके लिये तिवारी को लखनऊ में राज्य सरकार की तरफ से  सुविधाऐं दी गई और खुद मुख्यमंत्री समय समय पर तिवारी का हाल चाल पूछने जाते रहे।

तिवारी इससे पहले भी 1994 में तिवारी ने अर्जुन सिंह के साथ मिलकर इंदिरा कांग्रेस के नाम से अलग दल बनाया था। लेकिन कुछ समय में ही वो वापस कांग्रेस में आ गये। अब ये देखने की बात है कि तिवारी ने बीजेपी का दामन तो थाम लिया है पर देखने की बात ये है कि वो अपने पुत्र के लिये पार्टी से क्या सौगात ला सकते हैं। साथ ही ये भी देखना दिलचस्प होगा कि तिवारी को दरकिनार कर चुकी कांग्रेस को तिवारी अपने राजनीतिक दमखम से चुनावों में कितना नुकसान पहुंचा सकते हैं।