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सीएम रावत रोज़ा इफ्तार पार्टी में हुए शामिल

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मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत शुक्रवार को देहरादून के एक स्थानीय वेडिंग पॉइंट में आयोजित रोजा इफ्तार कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर बधाई देते हुए मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि इस पवित्र मौके पर जून के माह में बिना पानी पिए रह कर अपनी प्रार्थना करते हैं, भगवान उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगे।
मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि हम सब भारतवासी हैं हम सब लोग एक छत के नीचे रहते हैं। हम सबका परमात्मा एक ही है, भले ही हमारी पूजा पद्धतियां अलग-अलग हैं इसके बावजूद हम सब भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि हम 125 करोड़ लोग सब भाई-भाई हैं। हमारा एक ही नारा है सबका साथ सबका विकास।
मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि मुझे बहुत खुशी है कि यहां पर छोटे-छोटे बच्चों ने रोजा रखा है, यह बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं उनकी शिक्षा का ध्यान रखा जाएगा। जो आगे पढ़ना चाहते हैं। उनको सहयोग दिया जाएगा। मुख्यमंत्री रावत ने घोषणा की कि जो बच्चे अखिल भारतीय परीक्षाओं में शामिल होना चाहते हैं, उनको फ्री कोचिंग दी जाएगी।
इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, यशपाल आर्य, विधायक हरबंश कपूर, खजान दास सहित अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे।

कितना तैयार है उत्तराखंड 2013 जैसी आपदा के लिये?

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16 जून 213 उत्तराखंड के इतिहास में कभी न मिटने वाली भयावह यादें दे कर गई है। इस प्राकृतिक आपदा के 4 साल गुजरने के बाद लरकारों और राजनेताओं ने वादे और बातें तो तमाम की हैं लेकिन सवाल ये है कि प्रदेश 2013 जैसी आपदा के लिये वास्तविक तौर पर कितना तैयार है? पर्यावरणविद राजेंद्र सिंह जिन्हें भारत के ‘वाॅटरमेन’ के नाम से भी जाना जाता है  कहते हैं कि उत्तराखंड 2013 की तरह एक और आपदा की ओर इशारा कर रहा है। केदार बाढ़ की चौथी वर्षगांठ की संध्या पर एक संवाददाता सम्मेलन में  मैगसेसे अवाॅर्राड विजेता सिंह ने कहा कि “मैं यह देख के परेशान हूं कि केदारनाथ त्रासदी से कोई सबक नहीं सीखा गया है। मैंने एक पखवाड़े से भी कुछ समय पहले केदारनाथ बाढ़ की भविष्यवाणी की थी, और मुझे यह चिंता है कि अनियंत्रित शहरी विकास जो बाढ़ का कारण था वह, फिर भी निरंतर जारी है, जो इसी तरह की एक और त्रासदी के लिए रास्ता बना रहा है।”

उन्होंने कहा कि “बाढ़ से 20 दिन पहले, उन्होंने इस क्षेत्र का दौरा किया और पाया कि केदारनाथ से निचले मैदानों तक सभी तरह के सुरंगों का निर्माण किया गया था, जिसके आसपास भारी मात्रा में मलबा जमा हुआ था। जब यहां बारिश शुरू हुई, तो सारा मलबा नदी के पानी के साथ मिल गया जिससे इसकी मात्रा बहुत ज्यादा हो गई जो आपदा का कारण बना,” सिंह कहते हैं कि “मैंने यह दावा किया था कि बाढ़ आएगी, लेकिन मुझे यह बिल्कुल नहीं पता था कि यह इतनी भयावह होगी और इतने बड़े पैमाने पर जान माल के नुकसान का कारण बनेगा।”

केदारनाथ आपदा वास्तव में विकास के मॉडल पर सवाल उठाते हैं जो हमारे शहरों में चल रहे हैं, जो पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए कोई भी विचार नहीं करते हैं। ऐसे मॉडल केवल विनाश, विस्थापन, बाढ़ और सूखे का कारण बन सकते हैं, और कुछ नहीं। भविष्य में आपदाओं को कैसे टाला जा सकता है विषय पर, सिंह ने कहा कि महत्वपूर्ण बात यह सुनिश्चित करना कि बाढ़ के मैदानों में पर्याप्त वनस्पति हो और वहां कोई निर्माण नहीं किया जा रहा हो।

“उत्तराखंड सरकार को पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण के बीच तालमेल बिठाना होगा। इसके अलावा प्लास्टिक की मात्रा को प्रतिबंधित करना होगा जो पर्यटक उनके साथ ले आ रहे हैं। प्लास्टिक जो नदियों में फेंक दी जाती है उसकी मात्रा धीरे-धीरे काफी बढ़ जाती है।” सिंह का कहना है कि प्राकृतिक आपदाऐं आगे भी आयेंगी और इन को रोक पाना किसी के लिये मुमकिन नहीं है लेकिन अगर राज्य को इनसे कम से कम नुकसान के लिये तैयार करना है तो राजनीतिक इच्छा शक्ति दिकानी होगी। केवल और केवल प्राथमिकता पर्यावरण को बचाने पर रखनी होगी। जब तक सरकार और आम लोग ये नहीं करते तब तक उत्तराखंड को आपदा के लिहाज से एक टाइम बं मानना चाहिये।

मिलना भागवत से था और बनाया सरकारी कार्यक्रम

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क्या वाकई में मुख्यमंत्री का रुद्रपुर का दौरा सरकारी था या फिर महज औपचारिकता के लिए दौरा सरकारी बनाकर निसाना कहीं और सादना था? जी हां, सूत्रों की माने तो ये चर्चा आम है कि मुख्यमंत्री ने सरकारी कार्यक्रम बनाकर सरसंघ चालक मोहन भागवत से मिलने के लिए ही अपना कार्यक्रम बनाया था, लेकिन सरकारी संसाधनों का उपयोग कर महज संघ केकार्यक्रम में ना जाने की डचन के चलते पहले कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम का समय निर्धारित किया गया और फिर अधिकारियों के साथ समिक्षा बैठक की औपचारिकता भी रखी गयी, लेकिन सभी जगह समय इतना कम दिया कि सभी के समझ आ रहा था कि सीएम का रुद्रपुर दौरा आखिर क्यो था।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से मिलने के लिए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को जनता इंटर कालेज में करीब 20 मिनट इंतजार करना पड़ा। क्योंकि भागवत से मिलने का 2:15 का समय निर्धारित था तो कार्यकर्ता सम्मेलन से मुख्यमंत्री बिना खाना खाए ही दौड़ पड़े। जनता इंटर कालेज में उन्होंने 20 मिनट का समय अधिकारियों के साथ मंत्रणा कर गुजारा। इसके बाद करीब 25 मिनट उनकी अकेले में भागवत से वार्ता हुई। इस बीच उन्होंने प्रदेश के हालात पर भागवत से चर्चा की और दिशा-निर्देशन प्राप्त किया।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के चल रहे संघ शिक्षा वर्ग में हिस्सा लेने आए हैं। वह पिछले चार दिनों से जनता इंटर कालेज में ठहरे हैं। वह किसी से मुलाकात नहीं कर रहे हैं। बुधवार को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भटट को भी उनकी एक झलक पाने के लिए इंतजार करना पड़ा था। गुरुवार को सीएम का भागवत से मिलने का समय 2:15 बजे निर्धारित था। कार्यकर्ता सम्मेलन में मुख्यमंत्री को काफी समय लग गया। इस बीच उनकी नजर घड़ी की ओर गई तो उन्होंने भोजन करने से इंकार कर जनता इंटर कालेज की ओर रवाना हो गए। मुख्यमंत्री का काफिला इंटर कालेज के बाहर ही रुक गया। खुद मुख्यमंत्री वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं के साथ अंदर चले गए। भागवत से मुलाकात को उन्हें करीब 20 मिनट का इंतजार करना पड़ा। इसके बाद भागवत मिले और उनकी करीब 25 मिनट तक सीएम से बात हुई। सूत्रों की मानें तो भागवत ने मुख्यमंत्री से प्रदेश के हालात पर चर्चा की। सीएम उसके बाद लौट गए। इससे पहले उन्होंने संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात की।

सीएम आवास के फूलों की खुशबू पहंचेगी घर-घर

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देहरादून नारी निकेतन की दो मध्यप्रदेश की बालिकाओं को उनके परिवार से 9 वर्षों के बाद मिलवाया जाने की खुशी में दोनों बालिकाएं सीएम से मिली। इस मौक़े पर मुख्यमंत्री श्री रावत ने कहा कि नारी निकेतन की स्थिति में सुधार आ रहा है अौर कहा कि सीएम आवास मे उनसे मिलने के लिए आने वाले बहुत से लोग फूलों के बुके लेकर आते हैं, इन फूलों को नारी निकेतन भिजवाए जाने के निर्देश दिए गए हैं ताकि इनका उपयोग धूप, अगरबत्ती बनाने में किया जा सके।

नारी निकेतन की दो मध्यप्रदेश की बालिकाओं को उनके परिवार से 9 वर्षों के बाद मिलवाया गया।  दोनों बालिकाएं, रजनी व रेखा ने मुख्यमंत्री रावत से भेंट की। मुख्यमंत्री श्री रावत ने बालिकाओं के अपने घर वापिस लौटने पर खुशी जाहिर करते हुए उन्हें राज्य सरकार की ओर से 25-25 हजार रूपए की आर्थिक सहायता दिए जाने की बात कही। इस अवसर पर सचिव डॉ. भूपिंदर कौर औलख व बालिकाओं के परिजन भी उपस्थित थे।

शक के चलते पहले पत्नी को मारी गोली फिर खुद को

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पत्नी के नाजायज सम्बन्धों की गलतफहमी ने पति को दरिंदा बना दिया और जिसके साथ सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई थी उसी को मौत के घाट उतारते हुए खुद को भी मौत के हवाले कर दिया। गलतफहमियों से बिगडते रिश्ते और खत्म होते परिवार के संसार की कुछ ऐसी ही दास्तां सामने आयी है। उधमसिंहनगर जिले के गदरपुर में जहां पति ने पहले पत्नी को गोली मार दी और फिर खुद को भी गोली मारकर खुदकुशी कर ली। घटना के बाद से हडकम्प मचा हुआ है।आखिर क्या हुआ था जो पत्नी को मार कर पति ने खुद को गोली मारी।

पत्नी को गोली मारने के बाद युवक ने खुद को भी गोली मार ली। दोनों की मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई और शव का पंचनामा भर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। ग्राम मजरा सिला निवासी रेनू पत्नी हरस्वरूप अपने मायके ग्राम राम जीवनपुर नंबर तीन में आई हुई थी। आज प्रातः रेनू का पति हरस्वरूप पुत्र विक्रम सैनी अपने ससुराल पहुंच गया। बताया जा रहा है कि इस बीच रेनू और हरस्वरूप के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई। इसके चलते हरस्वरूप ने तमंचे से अपनी पत्नी और खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। गोली की आवाज सुनते ही लोगों का जमावड़ा घर पर लग गया।

घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई और जानकारी जुटाने का प्रयास किया। पुलिस ने दोनों शवों का पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। बताया जाता है कि हरस्वरूप ने अपनी पत्नी को गुरुवार प्रातः किसी अज्ञात व्यक्ति के साथ बाइक पर जाते देख लिया था। इसके चलते दोनों में काफी कहासुनी हुई थी। जिसके बाद रेनू अपने ससुराल से मायके पहुंच गई थी।

ममता बनी क्रूर और बेटी को फेंक दिया झाडियों में

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क्या मां की ममता क्रूर हो गयी या फिर बेटियों के नाम पर आज भी लोग बेटियों को बोझ समझ कर फेंक देते हैं?  बहरहाल कुछ भी हो मगर ऐसी ही ममता की मूरत ने क्रूरता की सारी सीमाएं पार कर दीं। उसने तीन दिन की नवजात को मरने के लिए झाड़ियों में फेंक दिया, लेकिन उसे नई जिंदगी मिल गई। बच्ची का एक निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। नवजात को सांस लेने में परेशानी हो रही है। एक-दो दिन में बच्ची के स्वस्थ होने की उम्मीद जताई जा रही है।

बुधवार रात एक होटल में काम करने वाला युवक बाजपुर रोड स्थित रेलवे क्रॉसिंग के पास झाडि़यों में शौच के लिए जा रहा था। इसी दौरान उसे बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी। इसकी सूचना उसने कोतवाली पुलिस को दी। सूचना पर पहुंची पुलिस ने बच्ची को एलडी भट्ट अस्पताल में भर्ती कराया। चिकित्सकों ने उसे हायर सेटर रेफर कर दिया। इसके बाद पुलिस ने बच्ची को रामनगर रोड स्थित एमपी मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया। जहां उसका इलाज किया जा रहा है।

बच्ची डेढ़ किलो वजन की है। चिकित्सकों ने बच्ची का नाम एंजिल रखा है। अस्पताल के निदेशक डा. संतोष श्रीवास्तव ने बताया कि बच्ची को सांस लेने में थोड़ी परेशानी हो रही है। इलाज किया जा रहा है। एक-दो दिन में सुधार हो जाएगा। खतरे की कोई बात नहीं है। बच्ची को गोद लेने के लिए कई फोन आ चुके हैं। बच्ची को कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किसी को गोद दिया जा सकता है। उनका कहना है कि बच्ची तीन दिन की है।

आपरेशन स्माइल के तहत आठ बच्चे मिले

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नेपाल का बालक कुंडा थाना क्षेत्र के ग्राम गोविंदपुर, काशीपुर में मिला। पुलिस ने एक जून से ऑपरेशन इस्माइल अभियान चला रखा है। इसके तहत अभी तक 8 बच्चे मिले चुके हैं। कुंडा पुलिस को ग्राम गोविंदपुर स्थित गुरुद्वारा के पास नौ साल का बालक मिला। पूछताछ में बालक ने अपना नाम जीवन, पुत्र राम सिंह बताया। बताया कि वह ट्रक में 8 जून को काशीपुर आया था और बुधवार रात एक वाहन में सो गया और यहां वाहन चालक ने उसे छोड़ दिया। वह कक्षा दो में पढ़ता है, बालक इससे ज्यादा नहीं बता पाया। कुमाऊं सेवा समिति की परियोजना निदेशक जया मिश्रा ने बताया कि चाइल्ड लाइन की टीम कुंडा थाने भेजी गई थी।

मिश्रा ने बताया कि नेपाल की माइटी नामक संस्था के साथ उनकी समिति का टाइअप है। जब माइटी से मोबाइल पर संपर्क किया गया तो नवीन ने बालक का जो पता बताया था, वह गलत पाया गया है। इससे मामला संदिग्ध लग रहा है, बाल कल्याण समिति के निर्देश पर चाइल्ड लाइन में बालक को रखा गया है। जब तक बच्चे का सही पता नहीं चल पाता है, तब तक यहां पर बच्चे को रखा जाएगा। लगता है कि घर में काम कराने के लिए बालक को नेपाल से लाया गया है। पूछताछ में भाषा की समस्या आ रही है। बच्चा हिंदी नहीं बोल पा रहा है, फिलहाल बच्चे का सही पता कराया जा रहा है।

डगर कठिन पर हौंसले की मिसाल है मल्लिका विर्दी

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मन में कुछ कर गुजरने की हसरत हो तो कोई भी डगर कठीन नहीं होती, जरुरत है तो सिर्फ दृड़ निश्चय करने की। कुछ ऐसे ही दृड़ निश्चय से पर्यावरण के प्रति संकल्प लेने वाली पंजाब की बेटी ने उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ के दुर्गम पहाडी क्षेत्रों को संवारने का बीड़ा उठाया और हरियाली से विमुख हो चुके वनों को फिर से हरा बनाने के लिए काम शुरु किया। साथ ही लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरुक करके आज वनों को हरियाली से लवरेज करने का श्रेय भी पंजाब कि इस बेटी को मिलता है। कौन है ये पंजाब कि बेटी और कैसे आया पहाडों को संवारने का ख्याल पढिये यंहा।

पहाड़ का पर्यावरण संवारने का बीड़ा पंजाब की बेटी व केरल की बहू मल्लिका विर्दी ने उठा रखा है। मनोरंजन के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने का उनका अनूठा प्रयास रंग ला रहा है। उनकी मुहिम से ग्रामीणों का लगाव जंगल के प्रति बढ़ने लगा है। नतीजा, क्षेत्र में वृक्षविहीन हो चुके कुछ स्थल अब घने जंगल में तब्दील हो गए हैं। मुनस्यारी में पिछले एक दशक में पर्यटकों की आवाजाही खासी बढ़ी है। इसी के साथ बढ़ता चला गया कंक्रीट का जंगल और घटती चली गई हरियाली। इसी दौर में पंजाब की बेटी मल्लिका विर्दी यहां पर्यटक के रूप में पहुंची। यहां की स्थिति देख उन्होंने मुनस्यारी से सटे सरमोली गांव को संवारने की जिम्मेदारी उठाई।

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इसी दौरान उनकी मुलाकात केरल निवासी पर्यावरण प्रेमी थियो से हुई। थियो के साथ शादी के बाद मल्लिका ने मुनस्यारी में ही घर बसा लिया। तब से वह लोगों को  जल-जंगल के प्रति जागरूक कर रही हैं। उन्होंने यहां के लोगों को होम स्टे के प्रति भी प्रेरित किया। आज मुनस्यारी में सौ से अधिक लोग होम स्टे के माध्यम से आत्मनिर्भर बन चुके हैं। होम स्टे पर्यटकों से गुलजार रहते हैं। इसकी परिणति यह हुई कि सरमोली के ग्रामीणों ने अपनी बेटी की तरह मल्लिका को सिर-आंखों पर बैठा लिया।

यही नहीं, उन्होंने मल्लिका को 2007 में गांव का सरपंच भी चुना। यहीं से शुरू हुई मल्लिका विर्दी की दूसरी पारी।  उन्होंने जंगल, वन्य जीव व पक्षियों के संरक्षण के लिए वन कौथिग (जंगल मेला ) शुरू  किया, जिसका पिछले 11 साल से मई में नियमित रूप से आयोजन हो रहा है। हर वर्ष कौथिग में विषय भी बदल जाते हैं और त्यौहार भी। कभी पक्षी त्यौहार तो कभी स्थानीय खानपान विषय होते हैं।  पर्यावरण को लोक प्रदर्शन के साथ जोड़कर उसे आकर्षक बनाया जाता है। गुजरे वर्ष तितलियों के संरक्षण के लिए तितली त्यौहार मनाया गया।

तीन ग्राम पंचायतों के लगभग दस गांवों के लोग वन कौथिग मनाते हैं। इस दौरान वह ग्राम पंचायत व वन विभाग की भूमि पर पौधे भी रोपते हैं।वसरपंच रहने के दौरान जब जंगल में श्रमदान से चल रहा कार्य संपन्न हुआ तो मल्लिका को मन में वन कौथिग के विचार ने जन्म लिया। इसके तहत ग्रामीणों से वार्ता कर प्रतिवर्ष वन कौथिग मनाने का निर्णय लिया गया। एक दशक के मध्य वन कौथिग की ऐसी धूम रही कि अब लोग एक माह पूर्व से ही इस मेले की तैयारियों में जुट जाते हैं।

कौन है मल्लिका
दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मल्लिका विर्दी ने प्रोफेसर-अध्यापक बनने का सपना छोड़कर पिथौरागढ़ जिले का रुख कर लिया और वहां सरपंच बनने के बाद उन्होंने महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ी तथा पहाड़ी समाज में जागरूकता फैलाई। उन्होंने इको टूरिज्म को बढ़ाने में स्थानीय लोगों को सहयोग दिया।

हरिद्वार में पुलिस ने जमीन खोद के निकाली शराब की पेटियां

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धर्मनगरी में शराब तस्करी का अजीबोगरीब मामला सामने आया है। यहां सरकारी अस्पताल में गड्ढे में शराब तस्करों ने शराब की पेटियां छिपाई हुई थी। इतना ही नहीं अस्पताल से सटे राजाजी नेशनल पार्क के जंगल से भी पुलिस ने लोहे का ट्रंक बरामद किया। दोनों जगह से पुलिस ने कुल 21 पेटी शराब बरामद की है। वहीं, मामले में अस्पताल कर्मियों की मिलीभगत से भी इन्कार नहीं किया जा रहा है।

हरिद्वार के नगर निगम क्षेत्र में शराब पर प्रतिबंध है। बावजूद इसके आए दिन शराब तस्करी के मामले शहर में सामने आ रहे हैं। शराब तस्करी के मामले ने पुलिस को भी हैरत में डाल दिया। पुलिस को किसी ने सूचना दी कि मेला अस्पताल और राजाजी नेशनल पार्क में तस्करों ने गड्ढे में शराब छुपाकर रखी है।

इस पर पुलिस ने दोनों स्थानों पर कार्रवाई करते हुए मेला अस्पताल के गटर में छुपा कर रखी गई शराब की पेटियां बरामद की। कोतवाली निरीक्षक चंद्रभान सिंह ने बताया कि इसके बाद राजाजी पार्क में भी जमीन के अंदर ट्रंक में छुपाई गई शराब की पेटियां बरामद की गई।

 

आपदा से बचाने के लिये सरकार करेगी गांवों को “रीलोकेट”

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उत्तराखंड सरकार ने आपदा के लिहाज से संवेदनशील गांवों को विस्थापिकत करने की तैयारी कर ली है। इस बारे में गुरुवार को मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिलाधिकारियों से बात की। इस प्राॅजेक्ट के पहले चरण में हर जिले से कुछ गांवों को चिह्नित किया गया है। इसके बाद इनके विस्थापन से जुड़ी प्रक्रिया शुरू की जायेगी। सरकार की इस कदम से करीब 400 ऐसे गांवों को विस्थापित करना है जो आपदा के लिहाज से अति संवेदनशील हैं और आपदा आने के समय में न सिर्फ वहां जान और माल का नुकसान ज्याद होने की संभावना है बल्कि दुर्गम इलाकों में होने के कारण वहां राहत और बचाव कामों में भी परेशानी हो सकती है।

इस प्रक्रिया में

  • 31 परिवारों वाले बागेशवर के 73 गांव
  • पिथौरागड़ के 21 गांव जिनमे 582 परिवार रहते हैं
  • 158 परिवार वाले नैनीताल के 3 गांव
  • 84 परिवार वाले अलमोड़ा के 3 गांव
  • 638 परिवार वाले उत्तरकाशी के 11 गांव
  • 507 परिवार वाले टिहरी के 8 गांव
  • 92 परिवार वाले रुद्रप्रयाग के 7 गांव
  • 888 परिवार वाले चमोली के 17 गांवों की पहचान की गई है।

इसके लिये एक डीटेलड प्राॅजेक्ट रिपोर्ट भी राज्य सरकार को दे दी गई है।इस प्राॅजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस काम में लागत तो ज्यादा आयेगी ही लेकिन साथ ही साथ इतनी बड़ी तादाद में लोगों को विस्थापित करना अपने आप में आसान काम नही होगा। मुआवजे की रकम तय करने के साथ साथ इन परिवारों के लिये नये आशियाने तलाशना भी सरकार के लिये आसान नहीं होगा। राज्य के मैदानी जिलों मे ंपहले से ही जमीन की कमी हैं और पहाड़ी इलाकों में वन विभाग आदि से हरी झंडी लेना आसान काम नहीं होगा।