भारतीय ज्ञान परंपरा में योग एक अद्भुत अनुभव है। योग भारतीय ज्ञान का एक ऐसा वरदान है, जिससे मनुष्य की चेतना को वैश्विक चेतना से जुड़ने का अवसर मिलता है। वह स्वयं को जानता है और अपने परिवेश के साथ एकाकार होता है। विश्व योग दिवस, 21 जून के बहाने भारत को विश्व से जुड़ने और अपनी एक पहचान का मौका मिला है। दुनिया के तमाम देश जब योग के बहाने भारत के साथ जुड़ते हैं तो उन्हें भारतबोध होता है, वे एक ऐसी संस्कृति के प्रति आकर्षित होते हैं जो वैश्विक शांति और सद्भाव की प्रचारक है।
योग दरअसल भारत की शान है, योग करते हुए हम सिर्फ स्वास्थ्य का विचार नहीं करते बल्कि मन का भी विचार करते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व योग दिवस को मान्यता देकर भारत के एक अद्भुत ज्ञान का लोकव्यापीकरण और अंतराष्ट्रीयकरण करने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसके लिए 21 जून का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इस दिन सबसे बड़ा दिन होता है। योग कोई धार्मिक कर्मकाण्ड नहीं है। यह मन और जीवन को स्वस्थ रखने का विज्ञान है। यह पूर्णतः वैज्ञानिक पद्धति है, जिससे व्यक्ति की जीवंतता बनी रहती है। भारत सरकार के प्रयासों के चलते योग अब एक जनांदोलन बन गया है। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री और आयुष मंत्रालय को इसका श्रेय देना चाहिए कि उन्होंने निजी प्रयासों से आगे आकर इसे शासकीय तौर पर स्वीकृति दिलाने का काम किया। यह बहुत सुंदर बात है कि देश में योग ने एक चेतना पैदा की है और वैश्विक स्तर पर भारत को स्थापित करने का काम किया है।
भारत बना योगगुरूः
योग को अंतराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बाद पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। भारत के योग शिक्षकों की पूरी दुनिया में मान्यता बढ़ी है। भारतीय मूल के योग शिक्षकों या भारत में प्रशिक्षित योग शिक्षकों को लोग अधिक भरोसे से देखते हैं। इस बहाने भारत के योगाचार्यों को एक विस्तृत आकाश मिला है और वे अपनी प्रतिभा से वैश्विक स्तर पर अपना स्थान बना रहे हैं। प्रधानमंत्री की रुचि के नाते भारत के दूतावास और विदेश मंत्रालय भी अपने स्तर पर इस गतिविधि को प्रोत्साहित कर रहे हैं। पाठ्यक्रमों में स्थान मिलने के बाद योग की अकादमिक उपस्थिति भी बन रही है। योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन जैसे विषय आज हमारे समाज में सम्मान से देखे जा रहे हैं। दुनिया को अच्छे-योग्य-चरित्रवान योग शिक्षक उपलब्ध कराना हमारी जिम्मेदारी है। यह दायित्वबोध हमें काम के अवसर तो देगा ही, भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक पटल पर स्थापित करेगा। गत वर्ष वैश्विक योग दिवस पर दुनिया भर के देशों में योग के आयोजन हुए। इन आयोजनों में तमाम मुस्लिम देश भी शामिल थे। दुबई के बुर्ज खलीफा में स्वयं योगगुरू बाबा रामदेव ने 10 हजार महिलाओं को योग करवाया। इस अवसर पर उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि योग का कोई पंथ नहीं है। यह 100 प्रतिशत पंथनिरपेक्ष अभ्यास है। उनका कहना था कि यह जीवन पद्धति है।
मन की बात में पहल की सराहनाः
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 जून,2015 को आकाशवाणी पर ‘मन की बात’ कार्यक्रम के तहत देशवासियों को संबोधित करते हुए अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की चर्चा की थी। तब उन्होंने कहा कि लाखों लोगों ने यादगार चित्र भेजे और उसे मैंने रीट्वीट भी किए। योग दिवस मेरे मन को आंदोलित कर गया। प्रधानमंत्री मोदी का कहना था कि पूरी दुनिया ने योग को अपनाया। यह भारत के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि योगाभ्यास का सूरज दुनिया में कहीं नहीं ढलता। योग ने पूरी दुनिया को जोड़ा। फ्रांस व अमेरिका से लेकर अफ्रीकी व मध्यपूर्व के देशों में योग करते लोगों को देखना अविस्मरणीय क्षण था। उन्होंने टाइम्स स्क्वायर से लेकर सियाचिन और दक्षिण चीन सागर में सैनिकों द्वारा योगाभ्यास कार्यक्रम में शामिल होने की सराहना की। पीएम मोदी ने कहा कि आइटी प्रोफेशनल्स योग शिक्षकों का एक डाटाबेस तैयार करें। हम इनका उपयोग दुनिया भर में कर सकते हैं।
विश्वशांति और योग की उपयोगिताः
दुनिया में मनुष्य आज बहुत अशांत है। उसके मन में शांति नहीं है। इसलिए सर्वत्र हिंसा, आतंकवाद और अशांति का वातावरण है। ऐसे कठिन समय में योग का अनुगमन और अभ्यास विश्वशांति का कारण बन सकता है। मनुष्य का अगर अपने मन पर नियंत्रण हो, उसे चेतना के तल पर शांति अनुभव हो तो दुनिया में हो रहे तमाम टकराव टाले जा सकते हैं। वैसे भी कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन- मस्तिष्क निवास करता है। योग जहां आपके तन को शक्ति देता है, वहीं जब आप प्राणायाम की ओर बढ़ते हैं तो वह आपके मन का भी समाधान करता है। मन की शांति के लिए आपको जंगलों में जाने की जरूरत नहीं है। योग आपको आपके आवास पर ही अद्भुत शांति का अनुभव देता है।
एकाग्र मन और संतुलित सांसें दरअसल बहुत कुछ साध लेती हैं। योग दिवस के बहाने यह अवसर एक उत्सव में बदल गया है। योग दिवस के मौके पर हर साल कुछ रिकार्ड बन रहे हैं। गत वर्ष फरीदाबाद में बाबा रामदेव के कार्यक्रम में एक लाख से ज्यादा लोगों ने एक साथ योग करके गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में नाम दर्ज करवाया है। इसकी घोषणा कार्यक्रम में मंच से डॉ. मनीष बिश्नोई ने की। वहीं पतंजलि के 408 लोगों ने एक साथ पांच सेकेंड तक शीर्षासन कर पुराने रिकॉर्ड को तोड़ा है। इससे पहले यह रिकॉर्ड सिटीजन लैंड के नाम था जहां 265 लोगों ने एक साथ 5 सेकेंड तक शीर्षासन किया था। इस प्रकार की घटनाएं बताती हैं कि योग को लेकर देश में उत्साह का वातावरण है। हर आयु वर्ग के लोग अब इस गतिविधि में हिस्सा ले रहे हैं। देश के संत समाज और योगियों ने इस अद्भुत ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए सार्थक प्रयत्न किए हैं। इसके लोकव्यापीकरण में बाबा रामदेव सबसे चमकदार नाम हैं। उनके अलावा भी विधिध धाराओं से जुड़े संत और धर्मगुरू भी इस विद्या को प्रचारित और प्रोत्साहित करने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इसी तरह देश भर के सामाजिक संगठन,विद्यालय और राज्य सरकारें भी इस गतिविधि को प्रोत्साहित कर रही हैं। समाज की समवेत अभिरूचि से यह अभियान एक आंदोलन में बदल गया है, इसमें दो राय नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तन-मन और आत्मा को साधने वाला, बदलने वाला, स्वस्थ रखने वाला यह अभियान जनअभियान बने। गांव-गांव तक फैलै और स्वस्थ-सुंदर भारत वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका में दिखे।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
योग से जुड़ रही है दुनिया
शिक्षा क्षेत्र में व्यापक बदलाव की तैयारी में सरकार: धन सिंह रावत
उच्च शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. धन सिंह रावत ने हल्द्वानी में कहां है कि सरकार उच्च शिक्षा में सेमेस्टर प्रणाली समाप्त करने की दिशा में अध्ययन कर रही है। इस प्रणाली के लागू होने के बाद से छात्र-छात्राओं के समय व धन की बर्बादी हो रही है। वर्तमान में शिक्षा सत्र भी इससे काफी गड़बड़ा गया है। मध्य प्रदेश सरकार ने सेमेस्टर व्यवस्था खत्म कर दी है। नए सत्र से राज्य में भी पूर्व की व्यवस्था लागू कर ली जाएगी।
निजी बीएड कॉलेज संचालकों के साथ बैठक में उन्होंने कहा कि छात्र-छात्राएं एक साथ एक ही वर्ष में दो-दो जगह प्रवेश ले लेते हैं। इसको भी सख्ती से समाप्त करने पर विचार किया जा रहा है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के मेघावी छात्रों की कोचिंग के लिए प्रदेश सरकार द्वारा पहली बार बजट मे 80 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही प्रदेश के सभी कॉलेजों में सभी वर्ग के लगभग 100 छात्रों को निश्शुल्क शिक्षा दी जाएगी। डॉ. रावत ने कहा कि प्रदेश में 172 निजी बीएड कॉलेज संचालित हैं। इसमें से 42 कॉलेज कुमाऊं मंडल में हैं। संचालकों को प्रतिदिन कॉलेज में राष्ट्रगान व राष्ट्रगीत का आयोजन करना होगा। सभी को अपने यहा डिजिटल पुस्तकालय एवं आधुनिकतम शौचालयों की स्थापना करनी होगी। उच्च शिक्षा के विकास के लिए निजी बीएड कॉलेजों को अहम भूमिका निभानी होगी।
इन कॉलेजों की समस्याओं के निस्तारण व शिकायतों के लिए भी एक कमेटी बना दी गई है। इसमें दो-दो लोग बीएड कॉलेज व विवि से होंगे और एक उच्च शिक्षा से। बीएड कॉलेजों को सरकार पूरा संरक्षण देगी और समन्वय के साथ कार्य करेगी। बैठक में विधायक नवीन दुम्का, उच्चशिक्षा निदेशक बीसी मेलकानी, कुमाऊं विवि के रजिस्ट्रार डीसी पांडे, उपनिदेशक कमल पांडेय, सहायक निदेशक डॉ. अनुराग अग्रवाल बीएड कॉलेज संचालक मौजूद थे।
एक माह का कटेगा वेतन
हल्द्वानी -बीएड कॉलेजों की मान्यता एक वर्ष से तीन वर्ष के लिए किए जाने की मांग पर उच्च शिक्षा राज्य मंत्री ने संचालकों को आश्वस्त किया। कहा कि इसके लिए प्रस्ताव रखा जाएगा। साथ ही मान्यता या अन्य मामलों से संबंधित फाइलें भी अब सचिवालय स्तर पर नहीं रुकेंगी। यदि सचिवालय के किसी भी अधिकारी द्वारा फाइल एक माह से अधिक समय तक अनावश्यक रूप से रोकी गई तो संबंधित का एक माह का वेतन काटा जाएगा। सचिवालय में यह आदेश जारी भी करा दिया गया है।
समान होगी फीस
डॉ. धन सिंह ने कहा कि बीएड कॉलेजो में फीस में एकरूपता लाने का प्रयास किया जाएगा। छात्र-छात्राओं से साल में चार किस्तों में फीस जमा कराई जाएगी। एक निर्धन छात्र को प्रत्येक विद्यालय निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था करेगा। बीएड कॉलेजों में फीस में एकरूपता लाने तथा फीस के निर्धारण के लिए भी समिति का गठन किया जा रहा है।
माणा में ज्ञान कुंभ
उच्च शिक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि प्रदेश में पाच ज्ञान कुंभ आयोजित किए जाएंगे। इनमें प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों को बुलाया जाएगा। उनके अनुभव व मार्गदर्शन उच्च शिक्षा नीति को और प्रभावी बनाया जाएगा। पहला ज्ञान कुंभ सुदूरवर्ती माणा में आयोजित किया जा रहा है।
इच्छा के मुताबिक कॉलेज
बैठक मे बीएड कॉलेज एसोशिएसन के अध्यक्ष दीपक बल्यूटिया तथा उपाध्यक्ष तरूण बंसल ने कॉलेज में ऑनलाइन काउंसलिंग, फीस की एकरूपता, उच्च शिक्षा का पोर्टल अपडेट करने आदि के सुझाव रखे। इस पर डॉ. धन सिंह ने स्पष्ट किया कि सभी कॉलेजों में पारदर्शिता के लिहाज से ऑनलाइन काउंसलिंग होगी। छात्र-छात्राओं को उनकी पसंद के हिसाब से ही कॉलेज आवंटित होगा।
हर्बल प्रदेश बनाने का टूट रहा सपना
उत्तराखंड को जड़ी बूटी प्रदेश बनाने की कवायद अब ठंडी पड़ती जा रही है। राज्य गठन से पहले उच्च हिमालयी क्षेत्रों जैसे पिथौरागढ़ में पैदा हो रही आधा दर्जन जड़ी बूटियां खतरे की जद में आ गई हैं। जंगलों में स्वत: पैदा होने वाली जड़ी बूटियों को तस्कर खत्म कर रहे हैं। नाप भूमि पर हो रही छोटी-मोटी कवायद से ही जड़ी बूटियों का अस्तित्व बचा हुआ है।
यूं तो प्रदेश के पहाड़ी और मैदानी जिलों में जड़ी बूटी पैदा होती हैं, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में पैदा होने वाली जड़ी बूटी किसी अन्य क्षेत्र में तैयार नहीं हो सकती है। करीब दस हजार से अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में पैदा होने वाली इन जड़ी बूटियों के लिए हिमपात के साथ ही मौसम में ठंडक जरुरी है। राज्य गठन से पहले उच्च हिमालयी क्षेत्र में अच्छी खासी बसासत थी। इन गांवों में रहने वाले लोग तमाम बहुमूल्य जड़ी बूटी पैदा करते थे, लेकिन राज्य गठन के बाद जिस तेजी से पलायन बढ़ा है, इससे उच्च हिमालयी क्षेत्र के कई गांव खाली हो गए है और इसका सीधा असर जड़ी बूटी उत्पादन पर पड़ा है। दूसरा बड़ा कारण उच्च हिमालयी क्षेत्र के बुग्यालों में लगनी वाली आग भी है। पिछले दस वर्षो से जिले के बुग्याल आग की चपेट में आ रहे हैं। आग लगने के पीछे शिकारियों की सक्रियता को भी एक बड़ा कारण माना जाता है। बुग्यालों में आग से भी जड़ी बूटी का उत्पादन सिकुड़ रहा है। दस वर्ष पूर्व तक वन विभाग उच्च हिमालयी क्षेत्र की इन जड़ी बूटियों की निकासी के लिए अनुमति पत्र (रमन्ना)जारी करता था, लेकिन खतरे में आई इन जड़ी बूटियों के विदोहन के लिए अब अनुमति नहीं दी जाती है। इन जड़ी बूटियों को रेड बुक में शामिल कर लिया गया है।
रेड बुक में शामिल जड़ी बूटियां
- अतीस
- कूटी
- सालम पंजा
- जटामासी
- अतिवसा
- गरूड़ पंजा
चार-चार विभाग फिर भी नहीं बदली तस्वीर
पिथौरागढ़: प्रदेश सरकारों ने जड़ी बूटी उत्पादन के लिए तमाम दावे किए। भेषज विकास इकाई, जड़ी-बूटी शोध संस्थान गोपेश्वर, सगंध पौध केंद्र सेलाकुई और वन विभाग जड़ी बूटी उत्पादन को कार्य करते हैं, इसके बावजूद खतरे में आई उच्च हिमालयी क्षेत्र की जड़ी बूटियों को बचाने के लिए कोई ठोस पहल नहीं हो पा रही है।
कम ऊंचाई वाले इलाकों में पैदा होने वाली जड़ी बूटी
- तेजपत्ता
- बड़ी इलाइची
- सतावर
- अश्वगंधा
- सर्पगंधा
- मुसली
- काली हल्दी
कम ऊंचाई वाले इलाकों में जड़ी बूटी का उत्पादन बढ़ रहा है। तमाम काश्तकार तेजपत्ता और बड़ी इलाइची का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं, लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र की जड़ी बूटियों का उत्पादन बढ़ाने के लिए पलायन रोकने के साथ ही बुग्यालों को आग से बचाने के इंतजाम करने होंगे।
आइये इतिहास के वो पन्ने पलटे जिन्होने विश्व को भारतीय योग से रूबरू कराया
विश्व भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र महर्षि महेश योगी का चौरासी कुटिया का आश्रम उत्तराखंड में एक ऐसी धरोहर है।विदेशीयो की जुबान पर ऋषिकेश के बीटल्स आश्रम का नाम एक आम बात है, यही वो जगह है जिसने पुरे विश्व को भारतीय योग से परिचित कराया। पश्चिम योग की धरा से रूबरू होकर इसको आत्मसाध कर आज यूएनओ ने भारतीय योग को जरुरी मानकर, 21 जून को इंटर नेशनल योगा डे के रूप में मान्यता दी, इसका श्रेय भी ऋषिकेश को जाता है।

भावातीत योग धयानम के गुरु महर्षि महेश योगी ने भारतीय योग को विदेशियो से रूबरू करवाया और ऋषिकेश के गंगा तट पर 60 के दशक में एक प्राचीन और वैज्ञानिक पद्धति की मिसाल का एक नगर बसाया। शकराचार्य नगर, जिसमे गोल गुम्बदाकार, 84 कुटिया का निर्माण किया जो आज भी अपनी अद्भुत कारीगरी का अनूठा मेल है। दीवाने इसकी एक झलक पाने के लिए आज भी सात समंदर पार से ऋषिकेश में स्थित चौरासी कुटिया का रुख करते है और ध्यान करते है। अब राजा जी टाईगर रिजर्व पार्क 30 साल बाद विश्व भर के योग प्रेमियों के लिये महर्षि महेश योगी के आश्रम को खोलने दिया है
60 और 70 के दशक में मशहूर बैंड बीटल ने ऋषिकेश का रुख किया, ये वो समय था जब पश्चिम को भारतीय योग और आध्यात्म के बारे में पता चला, विदेशी जानकार बताते है कि यही जो समय था जब ईस्ट मीट वेस्ट का मिलन हुआ था। बीटल्स कि देखा देखि विदेशी भी भारत का रुख करने लगे और यहाँ से भारतीय योग पूरी दुनिया में तेज़ी से फैलने लगा। विदेशियो में आज भी इस आश्रम को देखने का बड़ा क्रेज है और बताते है जब वे 80 के दौर में आये थे तब से आज तक यहाँ का आध्यात्मिक वातावरण की बात ही कुछ और थी जो आज भी वैसे ही है कल-कल गंगा और नेचर नयी ऊर्जा का संचार करती है।
60 के दशक में जहा पूरा विश्व बीटल्स के पीछे भाग रहा था और बीटल्स ऋषिकेश के गंगा के तट पर महर्षि महेश योगी के आश्रम में नयी धुनों को तैयार रहे थे यही वो समय जब ईस्ट मीट वेस्ट की धूम विश्व में मच गयी और बड़ी संख्या में विदेशी ऋषिकेश का रुख करने लगे और भारतीय योग दुनिया के सर चढ़ कर बोलने लगा
योग दिवस में शामिल होने के लिए स्विजरलैंड की नताली पहुंचीं पिथौरागढ़
अंतराष्ट्रीय योग दिवस मनाने के लिए स्विजरलैंड की 35 वर्षीय नताली ईजो पिथौरागढ़ पहुंच कर योगा का अभ्यास किया। नताली स्विजरलैंड के लोजान शहर की रहने वाली हैं। वे योग से प्रभावित होकर योगा दिवस में भाग लेना चाहती है। योग दिवस पर आयोजित नगरपालिका सभागार में लोगों को योग का प्रशिक्षण देंगी। नताली का कहना है उनके जीवन में योग का बहुत महत्व है। योग का ही देन है कि जीवन आज खुशहाल है। इसलिये उन्हें भारत में रहना अच्छा लगता है।
नताली 20 साल की उम्र में स्लिप डिस्क की बीमीरी से ग्रसित हो गई थी और उन्होंने इस परेशानी से निजात पाने के लिए काफी इलाज कराया लेकिन कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने नियमित योग किया और बीमारी ठीक हो गई। इसके बाद वह ऋषिकेश आ गई और डॉक्टर विनोद कुमार से योग की शिक्षा हासिल की।
जरूरत 12वीं पास की, लाइन में बीटेक-एमटेक
दून के शनुल शर्मा बीटेक पास हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई जगह नौकरी की तलाश की, लेकिन काबिलियत के अनुरुप नौकरी नहीं मिली। बेरोजगारी के कारण अब उन्हें अपने शिक्षा क्षेत्र तो छोड़ों किसी भी क्षेत्र में नौकरी की तलाश है। इसी तलाश को पूरा करने के लिए शनुल सोमवार को क्षेत्रीय सेवायोजन कार्यालय में पल्स इंटरनेशनल दून कंपनी की ओर से मार्केटिंग विभाग में निकली रिक्तियां पर आयोजित साक्षात्कार में भाग लेने पहुंचे, जिसके लिए न्यूनतम शिक्षा सिर्फ 12वीं पास रखी गई थी। सिर्फ शनुल ही नहीं, सैंकड़ों ऐसे युवा यहां साक्षात्कार देने पहुंचे थे ।
स्नातक पास थे या फिर परास्नातक।
पल्स इंटरनेशनल कंपनी की ओर से मार्केटिंग कार्य के लिए मैनेजर, असिस्टेंट मैनेजर व ब्रांच मैनेजर के लिए 50 पदों पर इंटरव्यू लिए गए। इसके लिए वेतन साढ़े आठ से दस हजार रुपये प्रतिमाह तय किया गया। अब आवेदकों की प्रोफाइल पर गौर करें तो इंटरव्यू देने वाले 152 आवेदकों में मात्र 37 युवा ऐसे थे जो 12वीं पास थे। जबकि, 59 आवेदकों ने स्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली है। सात एमबीए करने के बाद बेरोजगार हैं, दो आवेदक बीटेक, एक एमटेक करने के बाद यहां इंटरव्यू देने पहुंचे। जबकि, 46 आवेदकों ने परास्नातक की पढ़ाई पूरी कर ली है।
13 युवाओं को मिली नौकरी
सेवायोजन कार्यालय में आयोजित रोजगार मेले में 13 बेरोजगार युवाओं को मार्केटिंग क्षेत्र में नौकरी मिली है। चयनित युवाओं को प्रतिमाह दस हजार रुपये मासिक वेतन प्रदान किया जाएगा। कुल प्राप्त अंकों की प्रतिशत और अनुभव के आधार पर 22 युवाओं का चयन किया गया। इसमें मात्र 13 युवा ही ग्रुप डिस्कशन और साक्षात्कार में सफलता पा सके। इस दौरान चार युवाओं को मैनेजर व नौ का सहायक मैनेजर के पद पर किया गया। क्षेत्रीय सेवायोजन अधिकारी अजय सिंह ने बताया कि जो अभ्यर्थी सफल नहीं हो पाए हैं उन्हें अगले रोजगार मेले में कंपनी अवसर देगी।
नैनी झील के गिरते जल स्तर के कारण और उपाय के लिए राज्यपाल ने बुलाया सेमिनार

बागेश्वर के किसान का बेटा साइकिल यात्रा पर विश्व रिकार्ड बनाने निकला
बागेश्वर के गरुर शहर से 18 वर्षीय साइकिल चालक प्रदीप राणा, की आँखें विश्व रिकॉर्ड पर हैं। देहरादून में ग्राफिक एरा में बीएससी (आईटी) के छात्र राणा, अपने दो पहियों पर पूरे देश में 20,000 किलोमीटर तक कवर करने की योजना बना रहे है। ऐसा करने से, वह महाराष्ट्र के संतोष होली द्वारा बनाए रिकार्ड को तोड़ने की योजना बना रहे है, जो पूरे देश में 15,222 किलोमीटर पर साइकिल चला चुके है।
नौजवान ने 23 मई को अपनी यात्रा शुरू की और असम से गोगामुख पहुंच गया। 3,000 किमी की दूरी तय करते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, असम और अरुणाचल प्रदेश का दायरा पूरा कर लिया है।अब वह नागालैंड, मेघालय और उड़ीसा की यात्रा करेंगे और दक्षिण की ओर कन्याकुमारी जाएंगे। राणा तब महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और जम्मू और कश्मीर के पास जाएंगे।
राणा ने बताया, “मेरा लक्ष्य गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करना है।” “इस यात्रा को कवर करने में 5 से 6 महीने लगेंगे। मैं मैदानी क्षेत्रों में लगभग 140 किलोमीटर प्रति दिन और पहाड़ी इलाकों में लगभग 90 किमी की साइकलिंग कर रहा हूं।” राणा ने कहा कि इस यात्रा के दौरान वह लोगों को जीवन के विभिन्न पहलुओं को जान रहे हैं और रास्ते में अनूठे अनुभव भी कर रहे हैं। राणा ने कहा, “मैं ट्रक के ढाबों, युवा क्लबों, अजनबियों और परिचित लोगों के घरों में रह रहा हूं। मैं भी एक छोटा तम्बू रखता हूं जहां मैं सोता हूं”।
पिछले साल राणा ने काठमांडू में साइकिल चलाई थी। उन्होंने कहा, “काठमांडू की यात्रा ने मुझे पूरे भारत में यात्रा करने को प्रोत्साहित किया।” राणा ने कहा कि यह उनके पिता किशन, एक किसान हैं, जिन्होंने इसे अपने सपनों को पूरा करना संभव बना दिया है। राणा ने कहा, “मेरे पिता ने जमीन का एक टुकड़ा बेच दिया, ताकि मुझे यात्रा करने के लिए कुछ पैसे मिल सके।”
किशन राणा ने कहा, “मेरा मानना है कि हर माता-पिता को अपने बच्चों के सपनों का समर्थन करना चाहिए। मेरे बच्चे का सपना बड़ा जरुर है, पर मैं उसके सपने के लिए जो कुछ भी कर सकता हूं।”
बाघों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर न हों शेयर: एनटीसीए
सोशल मीडिया और खासतौर पर फेसबुक और वाॅट्स एप्प पर बाघों की तस्वीरों के लगातार वाइरल होने पर नेशनल टाइगर कंनसर्वेशन एथोरिटी (एनटीसीए) ने आपत्ति जताई है। पिछले कुछ सालों में बाघों की तस्वीरों को सोशल साइट्स पर शेयर करने का चलन बढ़ा है। इस पर ध्यान देते हुए बाघों की सुरक्षा के लिये काम कर रही सर्वोच्च संस्थान एनटीसीए ने देशभर के सभी चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डनों को पत्र लिखकर अपने इलाकों में खासतौर पर अपने स्टाफ को इस तरह की तस्वीरों को शेयर करने से मना करने को कहा है।पत्र में एनटीसीए ने कहा है कि इस पिछले कुछ समय से बाघों की जंगलों में तस्वीरें और कैमरा ट्रेप में कैद तस्वीरें सोशल मीडिया में शेयर करती देखी गई हैं। ये बाघों की सुरक्षा के लिये हानिकारक है क्योंकि इनसे शिकारियों को बाघों की लोकेशन का अंदाजा लग सकता है।
एनटीसीए के इस कदम से वाइलड लाइफ से जुड़े जानकार भी सहमत हैं। उत्तराखंड के पूर्व चीफ वाइलड लाइफ वाॅर्डन श्रीकांत चंदोला कहते हैं कि “तस्वीरों के जरिये बागों की निशानदेही करना शिकारियों के लिये आसान हो जाता है। एनटीसीए की एडवाइसरी सही दिशा में है।” साथ ही चंदोला ये भई कहते हैं कि “इस तरह की पहल के साथ साथ ये भी जरूरी है कि शिकार रोकने के लिये और तकनीक का इस्तेमाल किया जाये। जैसे कि ड्रोन की मदद से निगरानी रखना और साथ ही जमीन पर गश्त करने के लिये और कर्मियों की तैनाती की जाये”
बाघों के संरक्षण और बचाव को लिये लंबे समय से काम चल रहा है। इस काम में सोशल मीडिया ने भी लोगों को जागरूक करने में बड़ी भूमिका निभाई है।। लेकिन अब उन्हीं बाघों को बचाने के लिये सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का एनटीसीए का फैसला सही हो सकता है मगर इतना तय है कि सही मायनों में बाघों को बचाने के लिये अबी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
किसान मुद्दे पर किशोर उपाध्याय लड़ेंगे अकेले
लगता है कांग्रेस में ‘एकला-चलो’ का रिवाज बन गया है। पार्टी सिम्बॉल और संगठन को दरकिनार कर वरिष्ठ नेता अपने दम पर मैदान मारना चाहते हैं। इस प्रक्रिया की शुरूआत हरीश रावत से हुई थी, चाहे गैरसैंण के मुद्दे पर धरना प्रदर्शन हो या फिर मध्यप्रदेश में किसानों पर हुई गोलीबारी के खिलाफ हरिद्वार में अनशन, हरीश रावत अकेले नजर आये। अब यही काम किशोर उपाध्याय कर रहे हैं, पिथौरागढ़ में किसान की खुदकुशी के खिलाफ मुखर हुए पार्टी के पूर्व अध्यक्ष इस लड़ाई को अकेले लड़ना चाहते हैं। संगठन और पार्टी नेतृत्व को दरकिनार कर वह चाहते हैं कि अपने बलबूते इस लड़ाई को लड़ा जाए और पीड़ित परिवार को इंसाफ दिलाया जाए। पूर्व अध्यक्ष को यह पता नहीं कि उनके इस प्रयास से संगठन को कितना नुकसान होगा।
कांग्रेस में एक बार फिर अंदरूनी कलह सामने आई है। वैसे तो कांग्रेस के पास अभी खोने को कुछ नहीं है और ऐसे समय में दल में बिखराव कांग्रेस को सफाए की तरफ ले जा सकता है। प्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन के बाद पार्टी में बिखराव की स्थिति नजर आने लगी है। अभी हाल ही में प्रदेश उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट के नेम प्लेट हटाने के मुददे को भी हवा देने की कोशिश की गई थी और अब किशोर उपाध्याय के बयान ने पार्टी को असहज कर दिया है।
कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने किसान आंदोलन के संबंध में पत्रकारों से बातचीत करने के लिए कांग्रेस भवन की जगह सुभाष रोड़ स्थित एक रेस्टोरेंट को चुना। उनसे जब इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने साफ़ कहा कि किसानों का मुद्दा किसी एक दल या वर्ग का नहीं है, इसलिए किसानों के आंदोलन पर मैं कांग्रेस का बिल्ला नहीं लगाना चाहता। जब मैं कांग्रेस के बारे में बात करूंगा तो निश्चित रूप से कांग्रेस भवन में बात करूंगा । उनके इस बयान से साफ़ है की उपाध्याय अपना आंदोलन कांग्रेस के साथ नहीं लड़ना चाहते। सवाल यह है कि जिस किसान को लेकर कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व इतना मुखर है और संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मध्यप्रदेश में धरना प्रदर्शन पर बैठ रहे हैं उसी संगठन का प्रदेश अध्यक्ष रहा एक शख्स यह कहता है कि किसानों की लड़ाई वह पार्टी के सिम्बॉल पर नहीं लड़ना चाहता है। किशोर उपाध्याय के इस विचार को क्या कहेंगे आप? इसका मतलब तो यही हुआ कि किशोर सिर्फ और सिर्फ अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं, उनके लिए संगठन के मायने कुछ नही है।




























































