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अधिकारी उत्तर प्रदेश सरकार से जानकारी हासिल करने के लिये करे आरटीआई का इस्तेमाल: सीएम

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मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तर प्रदेश के साथ परिसंपत्तियों के बंटवारे के अधिकारियों को पूरी तैयारी कर लेने की हिदायत दी है। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि परिसंपत्तियों के बारे में उत्तर प्रदेश से बात करते हुए अपने पक्ष को मजबूती के साथ रखा जाए, साथ ही जिन मामलों पर कोर्ट में कार्यवाही चल रही हैं, उन पर कोर्ट में भी अपने पक्ष को मजबूती के साथ रखा जाए। उन्होंने कहा कि हमें अपनी परिसंपत्तियों की विस्तृत जानकारी होनी चाहिए। जिनकी जानकारी हमारे पास नहीं है और यदि उत्तर प्रदेश से हमें जानकारी नहीं मिल पाती है, तो इसके लिए सूचना का अधिकार के अंतर्गत जानकारी मांगी जाए। 

गौरतलब है कि संपत्ति बंटवारे में मुख्य मामले हैं:

  • सिंचाई विभाग के अंतर्गत 1399 भवन उत्तर प्रदेश के पास है जिनमें से उत्तर प्रदेश को मात्र 420 की जरूरत है। इनमें से 997 भवन उत्तराखण्ड शासन को दिए जाने हैं।
  • हरिद्वार, उधमसिंहनगर और चंपावत में 5842 हेक्टेयर भूमि उत्तर प्रदेश के नियंत्रण में है जिनमें से 2557.78 हेक्टेयर रिक्त भूमि पर उत्तराखंड का हक बनता है।
  • कुंभ क्षेत्र की 697.5 हेक्टेयर भूमि उत्तर प्रदेश के नियंत्रणाधीन है, यह भूमि राज्य बनने के पूर्व से ही कुंभ मेला कार्य के लिये सुरक्षित की गई थी। इसका उपयोग अन्य किसी कार्य के लिए नहीं किया जा सकता हैइसलिये यह भूमि उत्तराखंड को मिलनी चाहिए।
  • हरिद्वार की 10 में से 4 नहरों एवं उधमसिंहनगर कि 33 में से 25 नहरों का रखरखाव उत्तराखण्ड को मिलना चाहिए।
  • टीएचडीसी भारत सरकार का उपक्रम होने के कारण एवं इसका पंजीकृत कार्यालय एवं प्रोजेक्ट उत्तराखण्ड की परिधि में होने के कारण इसकी 25 प्रतिशत हिस्सेदारी उत्तराखण्ड को मिलनी चाहिए।
  • 198 मेगावाॅट क्षमता वाले कालागढ़ जल विद्युत गृह पूर्ण रूप से उत्तराखंड की परिधि में स्थित है इसलिये इससे बनने वाली बिजली पर उत्तराखंड का हक है।

गौरतलब है कि राज्य बनने के बाद से ही दोनों राज्यों के बीच बंटवारे का मामला चलता आ रहा है। राज्य में बीजेपी औऱ कांग्रेस दोनो की ही सरकारें आ गई लेकिन इस पर कोई समाधान नहीं निकल सका। अब मुख्यमंत्री के लिये ये काम पूरा करना चुनौती भरा है क्योंकि दोनों राज्यों में बीजेपी की ही सरकार है। लेकिन संपत्ति बंटवारे के मामले में अधिकारियों की तैयारी और जानकारी पर पहले भी मुख्यमंत्री अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर चुके हैं। एसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में राज्य के अधिकारी अपना होमवर्क कितना पूरा करते हैं।

किसानी छोड़कर मजदूरी करने को मजबूर हुए उत्तराखंडी किसान

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साल 2000 में उत्तराखंड की स्थापना के बाद पहाड़ी जिलों से 2.26 लाख से अधिक किसानों ने पलायन कर लिया है।देश के विभिन्न शहरों में जीवित रहने के लिए “मजदूरों का काम” करने पर मजबूर यह किसान किसकी वजह से इस हद तक जाने को मजबूर हुए हैं।इसकी वजह है राज्य सरकार का रूढ़िवादी रुख, जो किसानों की आवश्यकताओं को अनदेखा कर रहा है।

अखिल भारतीय किसान महासाभा (एबीकेएम) के राज्य अध्यक्ष पुरुषोत्तम शर्मा ने बताया,’’ 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, 2,26,949 किसानों ने खेती छोड़ दी और अपने जन्मस्थानों से चले गए, जहां वे पीढ़ियों से रह रहे थे। प्रवासित किसानों को अपने परिवारों के अस्तित्व को बचाने के लिए विभिन्न शहरों में ‘’मैनुअल श्रमिकों’’ या दिहाड़ी मजदूरों का काम करना शुरु दिया है।परेशानियों की वजह से राज्य को छोड़कर अलग-अलग शहरों में रहने पर मजबूर हो गए हैं।उन्होंने कहा कि किसानों की स्थिति गंभीर है और सरकार द्वारा अज्ञानता के कारण और खराब हो रही है’’।

इसके अलावा, शर्मा ने कहा कि 11 पहाड़ी जिलों से जनगणना के आंकड़ों के अनुसार

  • अल्मोड़ा से 36,401 किसानों की संख्या सबसे अधिक है,इसके बाद
  • पौड़ी (35,654)
  • टिहरी (33,68 9)
  • पिथौरागढ़ (22, 9 36)
  • देहरादून (20,625)
  • चमोली (18,536)
  • नैनीताल 15,075)
  • उत्तरकाशी (11,710)
  • चंपावत (11,281)
  • रुद्रप्रयाग (10, 9 70) और
  • बागेश्वर (10,073)

हालांकि, दिसंबर 2016-जनवरी 2017 में एबीकेएम द्वारा किए गए सर्वेक्षण का हवाला देते हुए, शर्मा ने कहा, “पहाड़ों में केवल 20% कृषि भूमि पर खेती की जा रही है, जबकि बाकी 80% या तो बंजर हैं या कर्मशियल कामों के लिए बेचा जा रहा है।”

एबीकेएम के प्रमुख ने आरोप लगाया, “व्यापक किसानों के प्रवास के लिए प्राथमिक कारण पहाड़ी में कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए नीतियों की कमी है, जंगली जानवरों द्वारा क्षतिग्रस्त फसलों के बड़े झुंड हैं, और किसानों को पर्याप्त सब्सिडी नहीं मिलती। इसके अलावा, कठोर पहाड़ी इलाके और तेजी से अनियमित मौसम पैटर्न भी कई किसानों के दूर करने की वजह माना जाता है। “

उत्तराखंड रत्न समेत विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित वैज्ञानिक अनिल हाफिज का कहना है कि, “हालात डेटा से भी बदतर हैं, पर्यावरण संबंधी कारणों से सरकार की नीतियों से सब कुछ किसानों के खिलाफ है। सिस्टम ने हमारे किसानों को कर्ज के बोझ से दबा दिया है, जिसकी वजह से किसानों को अपने उत्पाद को कर्ज चुकाने के लिए कम कीमत पर बेचते हैं।”

पदमश्री विजेता अनिल प्रकाश जोशी ने कहा, “सरकार के पास किसानों के लिए एक संगठित नीति नहीं है। अगर हिमाचल में किसान जलवायु की स्थिति का लाभ ले सकते हैं, तो यहां ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है? सरकार को खेती और किसानों की भलाई के लिए गंभीरता से काम करना चाहिए।”

फेमिना मिस इंडिया मुकाबले में भिखरेंगे देवभूमि के रंग

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मिस इंडिया के ग्रैंड फिनाले में उत्तराखंड के रंग भी भिखरेंगे। इसमें चारधाम, बुग्याल और ऋषिकेश की झलक दिखाई देगी। फेमिना मिस इंडिया उत्तराखंड अनुकृति गुसाईं ने उत्तराखंड की तस्वीर लोगों तक पहुंचाने के लिये एक वीडियो बनाया है। 25 जून को मुंबई में होने वाले ग्रैंड फिनाले के दिन यह वीडियो दिखाया जाएगा।

फेमिना मिस इंडिया में इस बार हर प्रदेश की प्रतिभागी को अपने राज्य के पर्यटन ओर संस्कृति को प्रमोट करने के लिए एक वीडियो बनाना है। यह वीडियो ग्रैंड फिनाले के दिन दिखाया जाएगा।इसी कड़ी में अनुकृति ने भी एक वीडियो बनाया है। इस वीडियो में चारधाम, बुग्याल, बर्फ से ढकी पहाडि़य़ों को शामिल किया है।इसके साथ साथ राज्य के धार्मिक महत्व वाले श्थान जैसे कि रामझूला, ऋषिकेश, हरिद्वार, बद्रीकेदार आदि भी इस वीडियो का हिस्सा होंगे।

 

सरकारी अस्पताल के डाक्टर बने हैवान

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गर्भवती महिला एलडी भट्ट अस्पताल,काशीपुर मे डिलीवरी के लिए पहुंची तो महिला चिकित्सक ने बच्चा उल्टा होने की बात कहते हुए उसे भर्ती करने से इन्कार कर दिया। इस दौरान महिला तड़पती रही। इस बीच महिला ने अस्पताल परिसर की पार्किंग में बच्चे को जन्म दे दिया। चिकित्सक की लापरवाही से महिला के परिजनों में तीव्र आक्रोश देखने को मिला।

बाजपूर रोड स्थित, आलू फार्म निवासी गर्भवती सुशीला सुबह प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। सुशीला परिजनों के साथ सुबह सात बजे एलडी भट्ट अस्पताल डिलीवरी कराने पहुंची। आरोप है कि वहां मौजूद महिला चिकित्सक ने अल्ट्रासाउंड कराकर रिपोर्ट दिखाने को कहा। महिला ने जांच रिपोर्ट जब चिकित्सक को दिखाई तो चिकित्सक ने यह कहते हुए भर्ती लेने से मना कर दिया कि पेट में बच्चा उल्टा है। कहा बिना ऑपरेशन का बच्चा पैदा नहीं होगा। यदि बच्चा होगा भी तो जीवित नहीं रहेगा। इस पर सुशीला व उसके परिजन सकते में पड़ गए। चिकित्सक ने नर्स को यह हिदायत देकर आगे बढ़ गई कि यदि महिला ऑपरेशन कराने के लिए राजी होगी, तभी भर्ती करना। इस पर नर्स ने सुशीला को बाहर टहलने की बात कहकर यहां से चले जाने को कहा।

इस बीच सुशीला दर्ज से तड़पती रही और मायूस होकर परिजनों के साथ अस्पताल परिसर के बाहर चली गई। इस बीच महिला ने पार्किंग में बच्चे को जन्म दिया। नार्मल डिलीवरी के बाद जच्चा-बच्चा को महिला वार्ड में भर्ती कराया गया। अब जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। अस्पताल में इलाज कराने आए मरीज व तीमारदार महिला को पार्किंग में बच्चे को जन्म देने की सूचना पर हैरत में पड़ गए। इसे लेकर चिकित्सकों व अस्पताल प्रशासन पर मरीज व तीमारदार तरह-तरह के सवाल उठाने लगे। इस घटना के चलते अस्पताल परिसर में हड़कंप मचा हुआ था, मगर इसकी भनक अस्पताल के सीएमएस को नहीं लग सकी। जब इस मामले में सीएमएस से जानकारी चाही गई तो उन्होंने इस तरह की कोई जानकारी न होने की बात कही।

परीक्षा में अव्वल रहे छात्रों को मिला “गवर्नर्स आवार्ड”

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राज्यपाल डा. कृष्ण कान्त पाल ने सोमवार को 10 वीं और 12 वीं बोर्ड परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को ’गर्वनर्स अवार्ड’ 2017 से सम्मानित किया।  पूरे प्रदेश में परीक्षा परिणामों में सबसे अधिक सफलता, प्रतिशत अर्जित करने वाले श्रेष्ठ तीन राजकीय विद्यालयों को भी राज्यपाल ने नकद धनराशि प्रदान कर पुरस्कृत किया।

2017 बोर्ड परीक्षा परिणामों में सवार्धिक सफलता प्रतिशत में प्रथम स्थान पाने वाले राजकीय कन्या इण्टर काॅलेज पौखरी पौड़ी गढ़वाल को 50 हजार रूपये की धनराशि तथा द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर आने वाले राजकीय इण्टर काॅलेज रातिरकेटी बागेश्वर तथा राजकीय इण्टर काॅलेज अदरीयखाल पौड़ी गढ़वाल को क्रमशः तीस हजार, बीस हजार रूपये की धनराशि राज्यपाल ने पुरस्कार स्वरूप प्रदान की। 

राज्यपाल ने श्रेष्ठ प्रर्दशन करने वाले छात्रों एवं उनके गुरूजनों तथा अभिभावकों बधाई दी। राज्यपाल ने कहा “कि इस सम्मान की शुरूआत 2015 में किये जाने का उद्देश्य राज्य के छात्रों तथा विद्यालयों में बेहतर प्रदर्शन की भावना तथा सकारात्मक प्रतिस्पर्धा को शुरू करना था।”  उन्होेनें शिक्षा विभाग से कहा कि समीक्षा की जाये कि अवार्ड से पूर्व तथा बाद में छात्रों और विद्यालयों के प्रदर्शन में क्या परिवर्तन हुआ है।              

पुरस्कृत छात्रों को सम्बोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि “परीक्षा के बाद पड़ने वाले छुट्टियों में मौज-मस्ती करने के साथ ही छात्रों को अपने इस समय का सदुपयोग भी करना चाहिए। सभी छात्र बारहवीं के बाद अपने करियर का चुनाव करने में सतर्कता बरतें। दूसरे से प्रभावित होकर करियर का चुनाव न करें अपनी योग्यता व क्षमताओं के हिसाब से करियर का चुनाव करें।” 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी टाॅपर छात्रों उनके गुरूजनों तथा अभिभावकों को बधाई देते हुए कहा कि “गवर्नर्स अवार्ड की तर्ज पर इस वर्ष से बोर्ड परीक्षाओं में श्रेष्ठता सूची में आने वाले छात्रों को राज्य सरकार प्रति वर्ष लैपटाॅप देने की शुरूआत कर रही है।”

भारत पाकिस्तान का मैच छोड़, कौन कर रहा था शहर की सफ़ाई

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देहरादून के शिक्षित छात्र संगठन मेकिंग ए डिफ्फेरेंस बाय बीइंग दी डिफ्फेरेंस (मैड) ने इस रविवार फिर शहर साफ़ करने का जिम्मा उठाया। मैड सदस्यों ने इस बार प्रिंस चौक के पास सफाई अभियान चलाया।

शहरी विकास मंत्रालय ने 434 शहरों में दून 316 का स्थान दिया था और हम 29 राज्यों की राजधानियों में से 28 वें स्थान पर थे। ये निराशाजनक रैंकिंग सड़कों पर पड़े कचरे, खुली नालियों और सार्वजनिक शौचालयों की कमी के प्रत्यक्ष परिणाम हैं।

IMG-20170618-WA0052रविवार को शाम 4:00 बजे करीब 30 छात्र और छात्राएं अस्लेहॉल के पास एकत्रित हुए और फिर प्रिंस चौक के पास पहुंचे। वहां पूरी टीम को दो समूहों में बाट, साफ़ सफाई में जुटे। 2 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद, जब पूरा इलाका साफ़ हो गया था, तब मैड सदस्यों ने कूड़े को इकठ्ठा किया और कूड़ेदान में डाला।

मैड सदस्या श्रेया ने कहा, “जब पूरा शहर भारत पाकिस्तान फ़ाइनल का आनंद ले रहा था, तब हम शहर को साफ़ करने में व्यस्त थे।” अभिषेक ने कहा- “हालांकि मैं एक बड़ा क्रिकेट प्रशंसक हूं, मुझे इस सफाई अभियान के लिए आज का मैच छोड़ने का कोई अफसोस नहीं है क्योंकि हम यह अपने शहर, अपने देश के लिए यह कर रहे हैं।”

मैड 2011 से पर्यावण संरक्षण के लिए अभियान चलाता आ रहा है। इस अभियान में करन कपूर, शिप्रा, अभिषेक जाह्नवी, आदर्श, अनमोल, सौरभ डंडरियाल, राहुल गुरु, समीक्षा, आदि शामिल थे।

लाखों की लकड़ी पुलिस के हत्थे चड़ी

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बाजपुर चौकी की पुलिस ने एक पिकअप से खैर की लकड़ी के साथ एक आरोपी को पकड़ा है। आरोपी खैर के गिल्टों को आलू की बोरियों के नीचे छुपाकर ले जा रहे थे। साथ ही पुलिस ने एक आरोपी को पकड़ लिया, जबकि अन्य आरोपी फरार हो गए।

क्षेत्र में खैर की तस्करी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। बाजार में अच्छा मूल्य मिलने के चलते तस्कर अब वन क्षेत्र से खैर की लकड़ी की तस्करी कर रहे हैं। एक व्यक्ति ने कंट्रोल रूम मे सूचना देते हुए बताया तस्कर पिकअप में खैर के गिल्टे भरकर बेचने के लिए ले जा रहे हैं। इस पर पुलिस को सतर्क हो गई।

पुलिस ने चेकिंग अभियान शुरू कर दी। इसी बीच सुल्तानपुर पट्टी चौकी की पुलिस को वाहन संख्या (यूके18/सीए1494) आता दिखाई दिया। उसके चालक ने पुलिस को देखते ही वाहन की गति तेज कर दी। इस पर पुलिस ने घेराबंदी कर वाहन के साथ ही आरोपी चालक को दबोच लिया, जबकि अन्य लोग फरार होने में सफल रहे। तलाशी लेने पर वाहन में आलू की बोरियों के नीचे छिपा कर रखे गए खैर के गिल्टे बरामद हुए। वहीं मामले की जानकारी पुलिस ने वन विभाग को दी। वन विभाग की टीम ने पुलिस चौकी पहुंच कर वाहन अपनी सुपुर्दगी में ले लिया। विभागीय अधिकारियों ने जानकारी देते हुए बताया कि बरामद खैर के गिल्टों का वजन करीब 50 क्विंटल है, जिसकी अनुमानित कीमत ढाई लाख रुपये आंकी गई है।

चट्टानों सी हिम्मत की बदौलत भारतीय टीम में जगह बनाई उत्तराखंड के अनुज ने

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उत्तराखंड के खिलाड़ी अनुज सिंह ने अंतर्राष्ट्रीय कैनोइंग मुकाबले में भारत की नुमाइंदगी करने के लिये जगह बना ली है। 24 साल के अनुज 23 से 27 अगस्त के बीच चेक गणराज्य में होने वाली इस प्रतियोगिता में भारतीय टीम का हिस्सा होंगे और पैरा कैनोइंग मुकाबले में वो हिस्सा लेंगे। उत्तराखंड से 27 सदस्यीय भारतीय टीम का हिस्सा बनने वाले सिंह अकेले खिलाड़ी हैं।

इन खिलाड़ियों का चुनाव इंडियन क्याकिंग कैनोइंग एंड राफ्टिंग एसोसियेशन ने किया है। रुड़की के रहने वाले अनुज टीम में जगह पाने वाले 4 पैरा एथीलीटों में से एक हैं।इस मोके पर उत्तराखंड क्याकिंग कैनोइंग और राफ्टिंग एसोसियेशन की अध्यक्ष अलकनंदा अशोक ने कहा कि “अनुज ने जो कर दिखाया है वो राज्य भर के सभी खिलाड़ियों के लिये प्रेरणा बनेगा।” एसोसियेशन के सचिव और केदारनाथ के विधायक मनोज तिवारी का कहना है कि “अनुज काफी प्रतिभावान खिलाड़ी है और अपनी मेहनत औऱ लगन से स्थान हासिल कर के उसने राज्य का नाम रौशन किया है”

अनुज सिंह ने 6 साल पहले एक सड़क हादसे में अपना एक पैर गवां दिया था। लेकिन कुदरत की इस मार को अनुज ने अपनी मंजिल के रास्ते में नहीं आने दिया । कड़ी मेहनत लगन और आत्मविश्वास के बल पर अनुज ने ये मंजिल हासिल की है।
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अपनी इस कामयाबी पर अनुज कहते हैं कि “2011 में एक्सिडेंट के बाद मैंने सारी उम्मीदें छोड़ दी थी,लेकिन मेरे परिवार,दोस्त और एसोसिएशन के सपोर्ट से मैने फिर खेलना शुरु किया।” अनुज ने कहा कि “एसोसिएशन में सबसे ज्यादा सपोर्ट मुझे अलकनंदा मैम से मिला। उसके बाद मैं मेहनत करता रहा और आज इस उपलब्धि से मैं बहुत खुश हूं।” आपको बता दें कि अनुज 4 चैंम्पियनशिप में से 2 बार फाईनल तक गए हैं। अनुज से यह पूछने पर कि उन्हें किस तरह कि परेशानियों से गुज़रना पड़ा, उन्होंने बताया कि “कैनोइंग के लिए बोट की समस्या बड़ी है क्योंकि उसके लिए इंटरनेशनल बोट की जरुरत होती है पर उनकि मदद की हंस फाउंडेशन ने। और आज उनके पास कैनोइंग बोट है जिसमें वह प्रैक्टिस करते हैं।”
उत्तराखंड में वाॅटर स्पोर्ट के भविष्य के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि “पूरे देश में अगर वाॅटर र्स्पोट का कहीं भविष्य है तो वह है उत्तराखंड क्योंकि हमारे पास नदियां है। हमारे खिलाड़ियों को प्रैक्टिस करने के लिए रुड़की कैनाल में जाना पड़ता है जो उत्तर प्रदेश के दायरे में आता है। बस एक यही समस्या है क्योंकि उस कैनाल में खेल के लिये कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।”
अनुज की इस सफलता पर टीम न्यूजपोस्ट की तरफ से उन्हें ढेर सारी बधाईयां और आने वाले चैम्पियनशीप के लिए शुभकामनाएं।

दून में यहां मिलेगा पारंपरिक पहाड़ी खाना नये अंदाज़ में

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पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी यहीं के काम आए इससे अच्छा कुछ हो भी नहीं सकता। ऐसे ही कुछ लोग इस युक्ति को सच कर रहे हैं।यूं तो पलायन उत्तराखंड राज्य की बड़ी समस्या है लेकिन अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने बड़ी डिग्रियों के बाद भी पहाड़ को आगे बढ़ाने का सपना देखा और उसपर काम कर रहें हैं।

देहरादून में खाने के शौकिन लोग जरुर इसको पढ़ेगे। मसूरी डायवर्जन पर बनी ”पेसिफिक हिल्स” की बिल्डिंग अपने थीम बेस्ड आउटलेट के लिए जानी जाती है। इसी कड़ी में एक थीम बेस्ड आउटलेट है ”देसी चूल्हा”। जी हां नाम से ही देसी लगने वाला यह आउटलेट अपने खाने के जरिए आपको पहाड़ के स्वादिष्ट भोजन की याद दिला देगा। देसी चूल्हा के मालिक से कुछ खास बातचीत के अंश यहां पढ़ें।

सुरेंद्र अंथवाल

घंसाली टिहरी के पास बसे अंथवाल गांव के 28 साल के सुरेंद्र दत्त अंथवाल ने बिजनेस मैनेजमेंट यानि की एमबीए किया है। वह देसी चूल्हा के मालिक हैं। पेशे से एक बिजनेसमैन है और उनके शौक के बारे में पूछने पर सुरेंद्र ने बताया कि उन्हें बिजनेस करने के अलावा,कुछ नया करना,घूमना फिरना और हमेशा कुछ अलग करना पसंद है। एक बिजनेस बैकग्राउंड होने की वजह से सुरेंद्र हमेशा से एक पैसे वाला व्यापारी बनने की चाह रखते थे। लेकिन समय के साथ उन्होंने महसूस किया कि जिंदगी में पैसा होना सबकुछ नहीं होता बल्कि एक अच्छा सैटअप होना जरुरी है।कुछ ऐसा होना जिससे लोग आपको पहचाने और आपके काम की सराहना करें।

इस समय सुरेंद्र अपना सारा ध्यान अपने पसंदीदा रेस्टोरेंट देसी चूल्हा पर लगा कर रहें और इसके अलावा अपने दूसरे होटल और रेस्टोरेंट की देखरेख करते है। अपने सभी कामो में देसी चूल्हा उनके लिए खास है क्योंकि सुरेंद्र के मुताबिक कुछ ऐसा करना जो आपकी परंपरा और संस्कृति को जिवित करे उसका मज़ा ही अलग है।

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सुरेंद्र अपनी संस्कृति को दूर-दूर तक लोगों में पहुंचाना चाहते है और इसके लिए उन्होंने काम करना शुरु कर दिया है। भविष्य में देसी चूल्हा को लेकर उनके क्या प्लान है के बारे में पूछने पर उन्होंने बताया कि ”अब मैं देसी चूल्हा की फ्रेंचाइजी यानि की शाखाएं खोलने की सोच रहा हूं ”। उत्तराखंड के अलग-अलग शहरों जैसे कि नैनीताल, ऋषिकेश, हरिद्वार,श्रीनगर, और बहुत सी जगहें सुरेंद्र के दिमाग में है जहां देसी चूल्हा को खोला जा सकता है।उत्तराखंड तो केवल शुरुआत है वह इस काम को पूरे देश में भी फैलाना चाहते हैं। इसके अलावा सुरेंद्र ने बताया कि देसी चूल्हा को यूरोप में खोलने के लिए भी उनकी बात किसी से हो रही जैसे ही यह फाइनल होगा वह इसकी जानकारी देंगे।

सुरेंद्र से यह पूछने पर कि उन्होंने देसी चूल्हा रेस्टोरेंट ही क्यों चुना। उन्होंने बताया कि दो साल पहले जब उन्होंने अपने बड़े भाई का होटल और रेजार्ट का बिजनेस ज्वाइन किया तब उन्होंने सोचा कि हर राज्य का कुछ मशहूर खाना होता है।लेकिन हमारे राज्य में यह मशहूर खाना कहीं नहीं मिलता।आधे से ज्यादा आउटलेट पर चाइनिज,स्पेनिष,साउथ इंडियन और तरह तरह के फूड आइटम मिलते हैं। लेकिन उत्तराखंड में रहकर उत्तराखंडी खाना मिलना मुश्किल होता है।बस इसी सोच के साथ सुरेंद्र और उनके भाई ने मिलकर देसी चूल्हा को शुरु किया।आज देसी चूल्हा उत्तराखंड राज्य के विशेष खाने को लोगों के बीच लेकर आया है और लोग उसे पसंद कर रहें हैं।

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सुरेंद्र से यह पूछने पर कि आपको अपने काम में बारे में सबसे अच्छी चीज क्या लगती है। इसपर उनका जवाब था कि शायद आने वाले कुछ सालों में पहाड़ी व्यंजन का स्वाद लोगों को भूल जाता और लोग अलग-अलग तरह के खानों की आदत डाल चुके होते। लेकिन मेरे प्रयास और मेहनत से इस समय हर कोई पहाड़ी खाने के बारे में जान रहा है और यह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि है।बस यहीं करके मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।

सुऱेंद्र का कभी ना भूलने वाला वो पल है जब वह देसी चूल्हा के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे।उनके परिवार का सर्पोट उन्हें हमेशा मिला लेकिन उनके माता मिता को कहीं ना कहीं यह डर था कि खाने के मेन्यू में केवल पहाड़ी क्यूजिन रखना कहीं सुरेंद्र को भारी ना पड़े।इसके अलावा उस दौरान कुछ दुकान के मालिकों ने उन्हें यह कहकर दुकान देने से मना कर दिया कि पहाड़ी खाने का कोई भविष्य नहीं है उन्हें चाइनिज या किसी और तरह के खाने का आउटलेट शुरु करना चाहिए।

इन सबके बाद आज सुरेंद्र अपने फूड आउटलेट देसी चूल्हा से बहुत खुश है और इसे और जगहों पर शुरु करने की सोच रखते हैं।देसी चूल्हा ना केवल पहाड़ी लोगों के बीच लोकप्रिय है बल्कि दूसरे राज्य से आए लोग भी इसको उतना ही पसंद करते हैं।बातचीत के दौरान आई विजीटर सीमा ने बताया कि ”मैं लखनऊ की रहने वाली हूं और मुझे तो देसी चूल्हा नाम ही बहुत पसंद आया और जब मैनें यहां का कंडाली का साग,मंडूएं की रोटी,रायता,झोली,चावल खाया तो यह मुझे और ज्यादा पसंद आया। सीमा कहती हैं कि महीने में एक बार यहां पहाड़ी खाना खाने जरुर आती हूं”। ऐसे बहुत से लोग है जिन्हें उत्तराखड की संस्कृति के बारे में कम जानकारी है ऐसे में देसी चूल्हा पहाड़ के खाने के माध्यम से लोगों में अपनी परंपरा को बनाए रखने का एक सराहनीय प्रयास है।

टीम न्यूजपोस्ट की तरफ से सुरेंद्र अंथवाल को उनके आगे आने वाले प्रोजेक्ट के ढेर सारी शुभकामनाएं और देसी चूल्हा के लिए बधाईयां ।

फिल्मकारों की पसंद बनता जा रहा है उत्तराखंड

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उत्तराखंड अाखिरकार अपने प्राकृतिक खूबसूरती से फिल्मकारों को लुभाने में कामयाब होता दिख रहा है। इसके लिये अक्टूबर 2015 में बनी उत्तराखंड फिल्म नीति का बड़ा येगदान माना जायेगा। साल 2015 से अब तक राज्य में लगभग 62 फिल्म निर्माताओं द्वारा फीचर फिल्म, टी.वी.सीरियल, डाक्यूमेंट्री, वीडियो एलबम आदि की शूटिंग की अनुमति प्राप्त की गई है। इस कड़ी में बड़े बैनरों की भी कई फिल्मों की शूटिंग उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों में की गई है। उत्तराखण्ड फिल्म विकास परिषद के नोडल अधिकारी/उप निदेशक के.एस.चैहान ने न्यूजपोस्ट से बात करते हुए बताया कि “उत्तराखण्ड फिल्म नीति 2015 देश-विदेश के फिल्म निर्माताओं द्वारा काफी पसंद की जा रही है। अभी तक देश-विदेश के काफी जाने-माने फिल्म निर्माताओं द्वारा अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिये उत्तराखण्ड आये है।”

उत्तराखंड के अलग अलग लोकेशन पर अभी तक

  • अजय देवगन प्रोडक्शन की हिन्दी फिल्म ‘‘शिवाय’’
  • तिग्मांशु धूलिया निर्देशित ‘राग देश’
  • तेलगु फिल्म ‘‘ब्रहमोत्सवम’’
  • हिन्दी फिल्म ‘‘शुभ मंगल सावधान’’
  • सोनी टी.वी. पर प्रसारित सीरियल ‘‘बडे़ भैय्या की दुलहनिया
  • जी.टी.वी. पर प्रसारित धारावाहिक ‘‘पिया अलबेला’’
  • एम.टी.वी. पर प्रसारित होने वाला रियलिटी शो
  • उत्तराखण्ड की क्षेत्रीय बोली की फिल्म ‘गोपी-भिना, भुली ए भुली
  • बद्री द क्लाउड की शूटिंग राज्य में हुई है।

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चौहान के मुताबिक “लगभग 62 फिल्म निर्माताओं को शूटिंग के लिये परमीशन दी गई हैं। इससे राज्य को राजस्व मिलता है बल्कि फिल्म युनिट के यहां रहने के दौरान लोकल स्तर पर व्यवसाय और कमाई के मौके भी मिलते हैं”। हाल ही में मसूरी में जाॅन अब्रहाम ने अपने प्रोडक्शन हाउस के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘शांतिनाम’’ की शूटिंग पूरी की। इस फिल्म के निर्माता एवं मुख्य अभिनेता जाॅन अब्राहम तथा निर्देशक अभिषेक है। अभिनेता जाॅन अब्राहम ने उत्तराखण्ड में शूटिंग करी अौर उत्तराखण्ड के प्राकृतिक सौन्दर्य की सराहना की अौर कहां कि फिल्मों की शूटिंग के लिये यहां बेहतर माहौल है।

हांलाकि उत्तराखंड फिल्म शूटिंग के लिहाज से तेजी पकड़ चुका है लेकिन अभी भी सरकार की तरफ से ज्यादा से ज्यादा फिल्मकारों को आकर्षित करने के लिये सरकार को काफी बुनियादी कदम उठाने बाकी हैं। इनमें से कुछ हैं   राज्य में फिल्म शूटिंग के लिेये और सुविधाऐं बढ़ाना जिनमें राज्य में हवाई और रेल मार्ग से कन्कटिविटी बढ़ाना सबसे ज़रूरी रहेगा।