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शो पीस बन कर रह गईं कल्प गंगा पर लगीं ट्राॅलियां

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वर्ष 2013 की आपदा के बाद क्षतिग्रस्त पुलों और मार्गों की स्थिति को देखते हुए सरकार ने गधेरों, नदियों पर आवाजाही के लिए आधा दर्जन ट्राॅली लगायी, मगर इन ट्राॅलियों की हालत उर्गम घाटी में जर्जर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह ट्राॅली जब से लगी है तब से शो पीस बन कर रह गई है। 2013 की आपदा में चमोली जिले की उर्गम घाटी में भी बहुत नुकसान हुआ। पुल पुलिया संपर्क मार्ग टूट गये थे। यहां बहने वाली कल्प गंगा पर लोनिवि ने कल्प गंगा से मंदिर तक जाने के लिए 25 लाख रुपये की लागत से ट्राॅली का निर्माण किया था।

ग्रामीण रघुवीर सिंह नेगी कहा है कि जब से यह ट्राॅली लगी है शो पीस बनकर रह गई। लाखों रुपया खर्च हो गया पर जिस प्रयोजन से ट्राॅली लगी वह प्रयोजन पूरा हुआ ही नहीं। अभी भी लोगों को फिसलन भरे रास्तों से मंदिर जाना होता है। नदी पर लकड़ी का एक पुल है जो नदी के बढ़ने पर कभी भी बह सकता है।

लोनिवि के अधिशासी अभियंता धन सिंह रावत बताया कि ट्राॅली संचालित हो रही है। हाल ही में हमारे उस क्षेत्र के अवर अभियंता इस ट्राॅली से इसपार से उस पार गये थे। यदि ग्रामीणों की कोई शिकायत है तो उसे भी देखा जायेगा। नदी स्थायी व्यवस्था के लिए विश्व बैंक द्वारा पुल का निर्माण किया जा रहा है।

उच्च शिक्षा : न सुविधा न संसाधन, कैसे सुधरेगी गुणवत्ता

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आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में उच्च शिक्षा की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। गुणवत्ता के लिहाज से हालात बेहद खराब हैं। बीते दिनों एक कार्यक्रम में उच्च शिक्षा मंत्री के बयान ने भी इस ओर इशारा किया। बीते कुछ वक्त में धड़ाधड़ संस्थान खोले गए, लेकिन इनमें सुविधाओं और मानव संसाधन को लेकर कोई गंभीरता नजर नहीं आती। ऐसे में बेहतर रिजल्ट और क्वॉलिटी एजुकेशन का सपना अभी भी दूर की कौड़ी नजर आता है।
राज्य गठन के बाद 17 साल में राज्य में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में पांच गुना इजाफा हुआ। राज्य में नामांकन (एनरोलमेंट) की स्थिति भी सुखद अहसास कराती है। उत्तराखंड में उच्च शिक्षा में नामांकन 3.10 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर केवल 1.90 प्रतिशत। एक करोड़ की आबादी वाले उत्तराखंड में आईआईटी, आईआईएम, आईआईपी, एनआईटी, एफआरआई समेत 28 बड़े उच्च शिक्षा संस्थान हैं। वहीं, निजी, सरकारी, अर्ध सरकारी समेत तमाम तरह के उच्च शिक्षा संस्थानों की कुल संख्या तकरीबन 465 है। राज्य गठन के वक्त यह आंकड़ा महज 90 था। यह तस्वीर का एक पहलू है, जो बेहद उजला नजर आता है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू काफी स्याह है।
राज्य में धड़ाधड़ संस्थान तो स्थापित किए गए, लेकिन इनमें गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया। स्थिति यह है कि 99 राजकीय महाविद्यालयों में 44 के पास भवन नहीं है और 20 प्रतिशत के पास जमीन। इनमें से 10 से ज्यादा महाविद्यालय ऐसे हैं, जिनमें 100 छात्र भी नहीं पढ़ रहे। वहीं, इन महाविद्यालयों पर सालाना खर्च एक से डेढ़ करोड़ रुपये आ रहा। ऐसे में प्रति छात्र एक से डेढ़ लाख रुपये सरकारी राशि खर्च किए जाने के बावजूद क्वॉलिटी एजुकेशन नहीं मिल पा रही। वहीं, राज्य के राजकीय महाविद्यालयों में स्वीकृत लगभग 1800 पदों में दो तिहाई खाली हैं। विश्वविद्यालयों के हालात इससे भी बदतर हैं। एकमात्र उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी के अलावा किसी भी यूनिवर्सिटी के पास स्थायी कुलसचिव तक नहीं है। अन्य पद भी या तो खाली हैं या जुगाड़ से भरे गए हैं।
सिर्फ दो संस्थानों को मिली जगह
राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन कराने वालों की तादाद भले ही बढ़ी है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसका खुलासा एनआईआरएफ ने किया है। बता दें कि यह भारत सरकार की एक ऐसी संस्था तो पूरे देश में शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता तय करती है। एनआईआरएफ की रैंकिंग फ्रेमवर्क में उत्तराखंड के सिर्फ दो संस्थान आईआईटी रुड़की और आईआईएम काशीपुर को छोड़कर कोई भी संस्थान टाॅप 100 में भी अपनी जगह नहीं पाया।
ऐसे हैं विश्वविद्यालयों के हालात
– श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के पास न अपना भवन और न ही पर्याप्त कार्मिक।
– कुमाऊं विश्वविद्यालय भी मानव संसाधन की कमी से अछूता नहीं।
– उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परिनियमावली ही अस्तित्व में नहीं आ पाई।
– एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय के पास भी न भवन है और न ही कार्मिक।
– आयुर्वेद विश्वविद्यालय संक्रमण काल से गुजर रहा।
– औद्यानिकी और संस्कृत विश्वविद्यालय भी जुगाड़ तंत्र से चल रहा
– दून विश्वविद्यालय में राजनीति हावी है जो शिक्षा व्यवस्था को गर्त में ले जा रहा है।
– उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय बेहद कम कार्मिकों के साथ छात्रों का भविष्य तय करने की ओर अग्रसर।
उच्च शिक्षा आंकड़ों के आईने में
संस्था-2000-2017
राजकीय महाविद्यालय-34-99
राज्य विश्वविद्यालय-03-10
बड़े उच्च शिक्षा संस्थान-06-28
निजी समेत कुल संस्थान-90-465
मौजूदा स्थिति
कुल महाविद्यालय-99
भवन विहीन-44
भूमि विहीन-19
शैक्षिक पद-1800 (लगभग)
रिक्त पद-684 विज्ञापित
अन्य रिक्त-600 (लगभग)
राज्य विश्वविद्यालय-10
स्थायी कुलसचिव-02 (एक प्रतिनियुक्ति पर राज्य से बाहर)
अन्य पद-लगभग 50 प्रतिशत पद खाली या जुगाड़ से भरे गए।
नामांकन की स्थिति (सितंबर 2014 तक)
उच्च शिक्षा में नामांकन- 3.10 लाख (राष्ट्रीय औसत से लगभग डेढ़ गुणा)
छात्राओं का नामांकन- 40 प्रतिशत
यूनिवर्सिटी के लिए भूमि का आवंटन हो गया है। बीते कुछ वक्त में काफी परेशानियां आई। अब जल्द ही स्थाई कैंपस का कार्य शुरू हो जाएगा। मानव संसाधन भी नहीं है। कम संसाधन में भी बेहतर का प्रयास जारी है। महज पांच स्थाई लोगों के साथ एक लाख छात्रों की परीक्षा कराई जा रही है।
-डॉ. यूएस रावत, वाइस चांसलर, श्रीदेव सुमन यूनिवर्सिटी उत्तराखंड

यूजीसी के मानकों पर फेल राज्य के उच्च शिक्षण संस्थान

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यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) अब हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज का रिपोर्ट कार्ड तैयार करेगी। इसके लिए संस्थानों के संसाधनों और सुविधाओं के आधार पर नंबर भी दिए जाएंगे। यह नंबर नैक एक्रिडिटेशन के ग्रेड, साफ-सफाई व अन्य मानकों के आधार पर तय किए जाएंगे. आयोग की ओर से संस्थानों को इसे लेकर निर्देश पहले ही जारी कर दिए गए हैं। लेकिन, प्रदेशभर के हायर एजुकेशन संस्थानों की बात की जाए तो आयोग के तमाम मानकों की परीक्षाओं में यहां के तकरीबन सभी संस्थान फेल साबित होंगे।
यूजीसी ने समय समय पर मानकों के अनुरूप संस्थानों सं सविधाओं और संसाधनों को लेकर जानकारी मांगता रहता है। इन्हीं बिंदुओं पर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज को जानकारी देनी होगी।
अयोग ने विभिन्न मानकों के आधार पर संस्थानों के लिए कुल सौ नंबर तय किए गए हैं। इसमें सबसे ज्यादा नंबर नैक एक्रिडिटेशन के लिए 20 नंबर तय किए गए हैं। इसके अलावा आयोग के नए नियम के अनुसार संस्थानों को अन्य सुविधाओं और संसाधनों के लिए भी नंबर दिए जाएंगे। अब जो कॉलेज इन नियमों के अंतर्गत खरा नहीं पाया जाएगा, उनको यूजीसी से प्रदान की जाने वाली फंडिंग से भी हाथ धोना पड़ेगा।
सुविधाओं और संसाधानों की बात करें तो राज्य की तमाम यूनिवर्सिटी और अन्य शिक्षण संस्थान अलग-अलग परेशानियां झेल रहे हैं। इनमें परेशानियों से हटकर सबसे बड़ी परेशानी छात्र-शिक्षक अनुपात है। तकरीबन सभी यूनिवर्सिटीज में छात्रों की संख्या में मुताबिक शिक्षक नहीं है। ऐसे में यूजीसी के मानक पूरा करना सभी यूनिवर्सिटी के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके अलावा वाई फाई कैंपस, स्मार्ट कैंपस आदि मामले में भी यूनिवर्सिटी और कॉलेज फेल साबित होंगे। उत्तराखंड तकनीकि विश्वविद्यालय में जहां वाई फाई कैंपस दूर की कौड़ी है तो वहीं श्री देव सुमन यूनिवर्सिटी के कैंपस का ही कुछ अता पता नहीं। ग्रांट के मामले में भी कई यूनिवर्सिटी पहले ही यूजीसी की फटकार खा चुकी हैं।
राज्य के सबसे बड़े कॉलेज डीएवी पीजी के की बात करें तो यहां तो सुविधाओं के नाम पर छात्राओं के लिए शौचालय तक नहीं हैं, जो हैं वह भी इस हाल में कि उसके बाहर से भी छात्राएं गुजरने से बचती हैं। इसके अलावा कक्षाओं के हालात भी बदतर हालात में हैं। यही वजह है कि विभिन्न छात्र संगठन अव्यवस्थाओं को लेकर आए दिन आंदोलनरत रहते है। ऐसे में यूजीसी के तय मानकों की परीक्षा से गुजरते हुए यह सभी संस्थान कैसे अपना रिपोर्ट कार्ड बेहतर करेंगे यह समझ आसान है।
इस आधार पर आयोग देता है नंबर
– यूनिवर्सिटी व कॉलेजेज को नैक का एक्रिडिटेशन।
– यूनिवर्सिटी और कॉलेज में साफ-सफाई की व्यवस्था।
– संस्थानों में छात्रों की संख्या, शिक्षकों की संख्या और योग्यता।
– संस्थानों में छात्राओं के लिए पीने के लिए आरओ वाटर की व्यवस्था व एटीएम सुविधा।
– यूनिवर्सिटी और कॉलेजेज में फ्री वाई-फाई फेसिलिटी।
– संस्थानों की दीवारों पर छात्रों को प्रेरित करने वाले संदेश की व्यवस्था।
डा. उदय सिंह रावत, वाइस चांसलर, देव सुमन यूनिवर्सिटी ने बताया कि शिक्षा और गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए आयोग ने यह व्यवस्था की है। नंबर हासिल करने के लिए मानकों के मुताबिक सभी पायदान पार करने होंगे। हमारे पास अभी यूनिवर्सिटी कैंपस ही नहीं है। सुविधाओं और संसाधन के मामले में जो संस्थान बेहतर होंगे उन्हीं को फंडिंग होगी।

कुमाऊं विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर हमला कर रहे अमेरिकी हैकर

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कुमाऊं विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अमेरिकी हैकर लगातार साइबर हमले कर रहे हैं। दो दिनों में 228 बार साइबर हमला कर वेबसाइट को क्षति पहुंचाने की कोशिश का खुलासा विश्वविद्यालय की तकनीकी टीम ने किया है। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन सकते में है। आशंका जताई गई है कि यह एडमिशन की ऑनलाइन प्रक्रिया का विरोध कर रहे लोगों की साजिश हो सकती है।

आइआइटी रुड़की के विशेषज्ञों की देखरेख में सॉफ्टवेयर तैयार कराने वाले डॉ. महेंद्र राणा ने सोमवार को कुलपति प्रो. डीके नौडियाल को सौंपी रिपोर्ट में बताया है कि एडमिशन वेबसाइट पर 19 जून को अमेरिका से 128 साइबर हमले किए गए थे। पहले दिन इसे किसी हैकर की शरारत मानकर मामले को नजरअंदाज किया गया, लेकिन सोमवार को फिर अमेरिका में बैठे हैकर ने सुबह से दोपहर तक वेबसाइट पर 100 बार हमला कर प्रोग्रामिंग को क्षति पहुंचाने की कोशिश की।

ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया का हो रहा विरोध: विवि प्रशासन ने पहली बार कुमाऊं विवि व संबद्ध परिसरों के लिए ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया शुरू कराई है। इसके लिए 15 जून को वेबसाइट लांच की गई थी। कुछ छात्र संगठन इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। चर्चा है कि विवि के कुछ लोग भी नहीं चाहते कि प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन हो। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पहाड़ के दुर्गम, दूरस्थ क्षेत्र जहां नेटवर्क की सुविधा नहीं है, वहां के छात्रों के लिए यह प्रणाली सिरदर्द है।

मामले में विधिक कार्रवाई भी की जाएगी: कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीके नौडियाल ने कहा कि विवि की वेबसाइट पर साइबर अटैक की जानकारी मिली है। सॉफ्टवेयर तैयार करने में पूरी सावधानी बरती गई है। दूरस्थ क्षेत्रों के महाविद्यालयों के प्राचार्यों से साइबर हमलों के चलते पेश आई दिक्कतों के बारे में जानकारी ली जा रही है। इस मामले में विधिक कार्रवाई भी की जाएगी। 4500 ने लिया ऑनलाइन पंजीकरण तमाम विरोध व वेबसाइट पर हैकरों के हमलों के बावजूद अब तक चार हजार पांच सौ छात्रों ने ऑनलाइन एडमिशन के लिए पंजीकरण करा लिया है।

उक्रांद में प्राण फूंकने की तैयारी

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प्रदेश के विधानसभा चुनाम में बुरी तरह से जनाधार खो चुके उत्तराखण्ड क्रांति दल में प्राण फूंकने के लिए एक बार फिर कवायद शुरू हो गई है। उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष दिवाकर भट्ट पार्टी के बड़े नेताओं के साथ मिलकर रणनीति पर काम कर रहे हैं। उक्रांद अपने आंदोलन की शुरुआत श्रीयंत्र टापू से करने की रणनीति बना रही है। राज्य आंदोलन के वक्त इसी स्थान से आंदोलन का रुख बदल गया था। उत्तराखंड क्रांति दल का अब केवल राज्य में नाम ही शेष है। कई बार टूट चुकी पार्टी एक बार फिर साथ खड़ी हुई है। केंद्रीय अध्यक्ष दिवाकर भट्ट पार्टी एक बार फिर दल को पुनर्जीवित करने के लिए ऑक्ससीजन तलाश रहे हैं। पार्टी के अंदर से आ रही खबरों की मानें तो दिवाकर भट्ट एक बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं। जिससे सरकार के साथ ही प्रदेश की जनता निसंदेह आश्चर्यचकित हो सकती है।

सोमवार को हुई पत्रकार वार्ता में दिवाकर भट्ट ने इसके संकेत तो दिए। लेकिन अपनी रणनीति बताने से परहेज किया। उन्होंने आगाह किया कि जिस तरह से उत्तराखंड आंदोलन के दौरान श्रीयंत्र घटना की किसी को भनक नहीं थी, लेकिन उस घटना ने राज्य के आंदोलन का रुख ही बदल दिया था उसी तरह अब उक्रांद फिर से राज्य की समस्याओं को लेकर आंदोलन खड़ी करने की तैयारी में है। राजधानी गैरसैंण, शराब बंदी, परिसंपत्ति बंटवारा, किसानों के ऋण माफ़ी और खनन में स्थानीय लोगों की भागेदारी जैसे कई मुद्दों को लेकर उक्रांद मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। सूत्रों की मानें तो जिलों के बाद केंद्रीय संगठन के पुनर्गठन होते ही गैरसैण से उक्रांद बिगुल फूंकने की तैयारी कर रहा है। ज़िलों की कार्यकारिणी गठन के बाद केंद्रीय संगठन बनते ही गैरसैंण में महामंथन या महारैली के साथ ही आंदोलन का आगाज हो सकता है।


पार्टी सूत्रों के अनुसार केंद्रीय नेतृत्व का गठन 25 जुलाई तक हो सकता है। पार्टी अध्यक्ष दिवाकर भट्ट ने राज्य को पांच लोकसभा क्षेत्रों में बांट कर पार्टी के बड़े नेताओं को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है। अल्मोड़ा की जिम्मेदारी काशी सिंह ऐरी, नैनीताल डॉ. नारायण सिंह जंतवाल, पौड़ी शक्ति शैल कपरुवाण, टिहरी त्रिवेंद्र पंवार तो हरिद्वार बीड़ी रतूड़ी संभालेंगे।

हिमाचल के मुख्यमंत्री ने सपरिवार बद्रीनाथ ​के किये दर्शन

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हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने सपरिवार मंगलवार को सुबह भगवान बद्रीनाथ के दर्शन कर पूजा-अर्चना किये। इस दौरान बद्री-केदार मंदिर समिति की ओर से मुख्यमंत्री को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया।
मंगलवार को मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह राज्य सरकार के हेलीकाॅप्टर से सुबह सवा दस बजे के करीब बद्रीनाथ पहुंचे। सीएम के साथ उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह सहित परिवार के पांच अन्य सदस्य थे। दर्शन के पश्चात सीएम अतिथि गृह पहुंच कर जलपान किया। हिमाचल से पहुंचे तीर्थयात्रियों ने अपने राज्य के मुख्यमंत्री और उनके परिवार जनों का स्वागत किया

अली अब्बास की अगली फिल्म में होंगे सलमान

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सलमान खान अपनी नई फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ के साथ जहां ईद की खुशियां मना रहे हैं, वहीं उनके नाम एक और नई फिल्म की खबर आई है। खबर ये है कि ‘सुल्तान’ के निर्देशक अली अब्बास जाफर के साथ सलमान की एक और फिल्म की योजना बन रही है, जिसका निर्माण सलमान के बड़े बहनोई अतुल अग्निहोत्री करेंगे।

अतुल इससे पहले सलमान की फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ के निर्माता रह चुके हैं। अली अब्बास जाफर के साथ सलमान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ इन दिनों निर्माणाधीन है। यशराज की फिल्म ‘एक था टाइगर’ की सीक्वल के तौर पर बन रही इस फिल्म में सलमान और कटरीना कैफ की जोड़ी को दोहराया जा रहा है।
अतुल अग्निहोत्री के प्रोडक्शन में बनने जा रही ये फिल्म भी ‘बॉडीगार्ड’ की तरह एक तेलुगू फिल्म का रीमेक बताया गया है, जिसमें सलमान के साथ कटरीना की जोड़ी ही काम करेगी। इसका संकेत अतुल ने देते हुए कहा है कि वे अपने निर्देशन में भी एक कहानी पर काम कर रहे हैं, जिसमें वे सलमान को कास्ट करना चाहते हैं, लेकिन ये फिल्म बाद में शुरू होगी।
अतुल ने खुद के फिल्म में काम करने की संभावना से मना किया है और कहा है कि वे सिर्फ प्रोडक्शन तक ही रहेंगे। इस बीच ‘दबंग-3’ को लेकर भी खबर आ रही है कि प्रभुदेवा ने इसका निर्देशन करने की पेशकश को मंजूर कर लिया है।
फिल्म ‘वॉन्टेड’ में सलमान को निर्देशित कर चुके प्रभुदेवा इसे भी अपनी एक तमिल फिल्म के रीमेक के तौर पर बनाएंगे और इस बार कहानी में कई बड़े बदलाव होंगे, जिनमें मक्खी (अरबाज) और रज्जो (सोनाक्षी सिन्हा) के किरदारों को नहीं रखा जाएगा। अरबाज फिल्म के निर्माता रहेंगे, जिन्होंने ‘दबंग-2’ का निर्देशन किया था।

विद्या बालन की ‘कहानी 2’ को लेकर कानूनी विवाद

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पिछले साल दिसम्बर में रिलीज हुई विद्या बालन की फिल्म ‘कहानी 2’ एक नए कानूनी विवाद में फंस गई है, हालांकि विद्या बालन का सीधे तौर पर इस विवाद के साथ कोई लेना-देना नहीं है। यह विवाद फिल्म के निर्माण से जुड़ी कंपनियों और इसके डिजिटल अधिकार पाने वाली कंपनी के सेरा सेरा के बीच बताया जाता है।

विद्या बालन और अर्जुन रामपाल की प्रमुख भूमिकाओं वाली इस सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म का निर्माण जयंती लाल गाड़ा की कंपनी पैन और फिल्म के निर्देशक सुजाय घोष की प्रोडक्शन कंपनी ने मिलकर किया था और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इसे रिलीज करने के अधिकार के सेरा सेरा को बेचे गए थे। के सेरा सेरा की ओर से कांपिटिशन कमिश्नर ऑफ इंडिया (सीसीआई) के यहां शिकायत दर्ज की गई कि ‘कहानी 2’ के निर्माता उनको फिल्म को डिजिटल फॉरमेट में रिलीज नहीं करने दे रहे हैं।

सीसीआई ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनते हुए अपने फैसले में के सेरा सेरा की दलीलों को रद्द करते हुए निर्माताओं के पक्ष में फैसला दिया। निर्माताओं की ओर से पेश दलील में कहा गया कि के सेरा सेरा के खिलाफ वायकॉम 18 की ओर से फिल्म ‘फोर्स 2’ को पाइरेटेड तरीके से डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखाने का केस चल रहा है।
इस केस का नतीजा आने तक उनके लिए के सेरा सेरा की मांग को मानना गैरकानूनी होगा। सीसीआई ने इस तर्क को मानते हुए के सेरा सेरा की दलीलों को खारिज कर दिया। अब सुना गया है कि के सेरा सेरा इस मामले को मुंबई हाईकोर्ट में ले जाने पर विचार कर रहा है।

किसान राम अवतार के परिवार को सीएम दी पांच लाख की सहायता

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उधमसिंह नगर जिले के खटीमा तहसील के ग्राम कंचनपुरी के किसान राम अवतार पुत्र राम प्रसाद ने बीते रविवार को आत्महत्या कर ली। मंगलवार को मुख्यमंत्री की ओर से किसान के परिवार को सांत्वना व मदद का भरोषा देने विधायक खटीमा पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व मे एक प्रतिनिधि मण्डल मृतक के गांव कंचनपुरी पहुंचा।
प्रतिनिधि मण्डल में विधायक खटीमा के साथ-साथ रूद्रपुर के विधायक राजकुमार ठुकराल, नानकमत्ता के विधायक प्रेम सिंह राणा आदि लोग उपस्थित थे। धामी ने कहा इस दुख की घड़ी में हम किसान परिवार के साथ है।इस दौरान विधायक ने स्व. रामअवतार की पत्नी से मुख्यमंत्री की दूरभाष पर बात कराई गई। मुख्यमंत्री ने मृतक परिवार को पांच लाख रूपये एवं विधायक पुष्कर सिंह धामी ने एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की।धामी ने कहा मृतक की विधवा को शीघ्र विधवा पेंशन स्वीकृत कराई जायेगी एवं तीनो विधायकों ने मृतक की पुत्रियों के विवाह एवं पुत्र के शिक्षा सम्बन्धी हर सहायता देने की भी बात कही।

बोलेने लगेंगी उत्तराखंड के उजडे़ हुए घरों की दीवारें

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उत्तराखंड के खाली हो चुके वीरान गांव अपनी दांस्तां खुद बयान करते हैं। खाली पड़े घर, बेतरतीब उग रही झाड़ियां, बंजर पड़े खेत ये सब कहानी बताते हैं अपने बाशिंदों की जो बेहतर जिंदगी की तलाश में पहाड़ों से पलायन कर शहरों की तरफ चले गये। ये उजड़े गांव सबूत है सालों से चली आ रही सरकारी उदासीनता और खोखले वादों की। हर चुनावों में जिस शिद्दत से नेता पलायन को चुनावी मुद्दा बनाते हैं उसी रफ्तार से चुनाव होते ही उसे भूल भी जाते हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने #selfiefrommyvillage नाम से ट्टवीटर पर कैंपेन भी शुरु किया। कदम तो उठाया लेकिन क्या ये कदम पलायन जैसी समस्या से निपटने के लिये सरकार द्वारा लिये जा रहे पहले कदमों में से होना चाहिये था?

वहीं राजनेताओं से अलग कुछ उत्तराखंडी पहाड़ों को अपनी खो रही रौनक लौटाने के लिये अपनी कोशिशों में लगे हुए हैं। ऐसे ही एक उत्तराखंडी हैं दीपक रमोला, पेंटर और स्किल ऐजूकेटर दीपक रमोला अपनी छोटी टीम के साथ उत्तराखंड के पहाड़ों में एक प्रोजेक्ट को अंजाम दे रहे हैं। पहाड़ के वीरान हो रहें गांवों की दीवारों पर पेंटिंग के जरिये कहानियां बना रहे हैं। इसके लिये दीपक ने टिहरी के विरान हो रहे सौर गांव को चुना, जिसमें कभी 62 परिवार रहतें थे अाज यहा सिर्फ 12 परिवार ही रह गये हैं।

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दीपक की कौर टीम में आठ सदस्य हैं जिनमें हेड आर्टिस्ट पूर्णिमा विश्व ख्याति प्राप्त कलाकार के साथ फ़ोटोग्राफ़र विभोर यादव अौर टाइपोग्रैफी आर्टिस्ट नितेश यादव टीम को बल देते हैं। दीपक इन 12 परिवारों के जीवन को पिछले डेढ़ महीनों से चरितार्थ करने मेें लगे हैं। वह बतातें हैं, ‘पलायन शुरु से ही चिंत्ता का विषय रहा है। सीरिया के रेफ्यूजियों के साथ काम कर के पिछले साल जब मैं वापस आया तो देखा कि उत्तराखंड में पलायन काफ़ी बढ़ी समस्या बन चुका है। मै इसके लिये कुछ ख़ास करना चाहता था। इसलिये हमारी टीम ने राज्य के ख़ाली हो चुके गाँवों मे बचे परिवारों से बात कर उनकी कहानियाँ संग्रह करनी शुरू की। हमारा मक़सद है पहाड़ छोड़ कर जा चुके लोगों के लिये उनकी विरासत को चित्रों के माध्यम से संजो के रखना। इसके साथ ही यहाँ रह कहे लोगों के लिये पर्यटन के माध्यम से रोज़गार के आयाम विकसित करना भी हैं।

अपने आर्ट के बारे में पूर्णिमा बताती हैं कि, “हर पेंटिंग अपनी अलग कहानी बयां करती है। ये तस्वीरें यहाँ के लोगों के जीवन, उनके संघर्ष, ग़म और ख़ुशियों को दर्शाती हैं अौर गाँव के लोगों को उन्हें यह से जोँङ कर रखने का प्रयास करती हैं।