Page 723

कुंभ में स्थाई निर्माणों पर रहेगा जोर : कौशिक

0

हरिद्वार में 2021 में प्रस्तावित महाकुंभ के लिए सरकार ने मशक्कत शुरू कर दी है। शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने अधिकारियों को कुंभ के लिए विस्तृव प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि 15 दिन के अंदर प्रस्ताव तैयार करें। साथ ही उन्होंने कहा कि कुंभ के लिए होने वाली निर्माणों में स्थाई प्रवृत्ति के निर्माण पर जोर रखा जाए।

मंगलवार को राजीव गांधी काॅम्पलेक्स सभागार में कौशिक ने नगर विकास को लेकर बैठक की। बैठक में उन्होंने अधिकारियों को 2021 कुंभ के लिए रोडमैप तैयार करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि स्थाई निर्माण पर फोस रख प्रस्ताव तैयार किए जाएं। साथ ही भीड़ प्रबंधन के लिए 2021 तक लक्सर-बिजनौर रिंग रोड को भी तैयार किया जाए। नगर विकास मंत्री ने हरिद्वार में 2021 तक आईएसबीटी के लिए स्थान चिह्नित करने, क्षमता और लागत का प्रस्ताव तैयार करने, लोक निर्माण विभाग, पेयजल, सिंचाई, विद्युत विभाग के सचिवों को तैयारियों के लिए पत्र लिखने के निर्देश भी दिए।
उन्होंने कहा कि ये सभी प्रस्ताव आने के बाद 2021 कुंभ पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में बैठक होगी। उन्होंने बताया क हरिद्वार कुंभ क्षेत्र में 100 करोड़ रुपये तक के कार्य पर्यटन विभाग, सौन्दर्यीकरण एवं पार्किंग क्षेत्र में करेगा। उन्होंने ने अधिकारियों से कहा कि 2021 कुंभ के लिए वर्तमान और पूर्व में रहे मेलाधिकारियों की एक समिति गठित की जाए। इस समिति के सुझाव कार्यों के संपादन में अहम साबित होंगे।
देहरादून की सूरत संवारने के लिए शुरू की गई कवायद का रंग नजर आने लगा है। कौशिक का कहना है कि इस मुहिम को किसी भी कीमत पर रोका नहीं जाएगा। बैठक के दौरान उन्होंने सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण अभियान की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि सभी अधिकारी एकजुट होकर कार्य करें। यह सभी का शहर है और सभी को इसका लाभ मिलेगा। उन्होंने कहा कि जो भी दोबारा अतिक्रमण करें, उसके विरुद्ध सख्ती से पेश आएं। पुनः अतिक्रमण करने वालों का चालान करे और मुकदमा दर्ज कराएं।
उन्होंने कहा कि शहर में विद्युत पोल हटाएं जाएं और विद्युत तारों को अन्डरग्राउण्ड किया जाए। बैठक में सचिव पीडब्लूडी अमित नेगी आदि मौजूद रहे।

इंडो-नेपाल सीमा हुई सील

0

नेपाल में होने वाले स्थानीय निकाय चुनाव के दृष्टिगत भारत-नेपाल सीमा तीन दिनों के लिए सील कर दी गई है। पिथौरागढ़ जिले में पांच झूला पुलों व चंपावत जिले में शारदा बैराज बैरियर को बंद कर दिया गया है। साथ ही सीमाओं को सील कर सुरक्षा कड़ी कर दी गई।

पिथौरागढ़ जिले में भारत और नेपाल के मध्य सीमा रेखा बनाने वाली काली नदी पर बने पांच झूला पुल सीता पुल, धारचूला, बलुवाकोट , जौलजीवी और झूलाघाट हैं। जिसमें सीता पुल उच्च हिमालय में गब्र्यांग के पास है। शेष चार पुलों से प्रतिदिन हजारों की संख्या में दोनों देशों के लोग आवाजाही करते हैं। धारचूला, जौलजीवी और झूलाघाट के झूला पुल दिन भर व्यस्त रहते हैं। नेपाल के लोग खरीदारी के लिए भारत आते हैं। नेपाल के कुछ सीमावर्ती गांवों का बाजार भी भारत का जौलजीवी बाजार है। इसके अलावा नेपाल के विद्यार्थी पढऩे के लिए भारत आते हैं। नेपाल में 28 जून तक निकाय के चुनाव के चलते नेपाल प्रशासन ने भारतीय प्रशासन और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) से तीन दिन पुल बंद करने का अनुरोध किया था।

इसे देखते हुए सभी पुल आवाजाही के लिए बंद कर दिए गए हैं। इसी तरह चंपावत में शारदा बैराज से होकर नेपाल का मोटर मार्ग भी बंद कर दिया गया है। अब 29 जून की सुबह ही दोनों देशों के बीच आवाजाही शुरू हो सकेगी।

लोक कला पर आधारित पेंटिंग ने मोह लिया सबको

0

सोर कलाकार कल्याण समिति ने शहर को सजाने-संवारने का बीड़ा उठाया है। मंगलवार को समिति की तीन दिवसीय अखिल भारतीय भित्तिचित्रण कार्यशाला शुरू हुई। कार्यशाला के तहत बाहर से आए चित्रकारों द्वारा शहर की दीवारों पर कुमाऊं के त्योहार, लोक कला पर आधारित आकर्षक पेंटिंग बनाई जा रही है।

हमारी संस्कृति, हमारी पहचान कार्यक्रम के तहत मंगलवार कार्यक्रम की शुरुआत घंटाकरण में की गई। समिति के ललित मोहन कापड़ी व हरीश चंद्र गहतोड़ी ने बताया कि शहर की दीवारों को सजाने के लिए देश के सुप्रसिद्ध चित्रकार मुज्जफ्फरनगर से प्रवीण सैनी, मेरठ से संतोष साहनी व मूर्तिकार प्रदीप सैनी पहुंचे हैं। इसके अलावा हल्द्वानी से जगदीश पांडेय, बुलंदशहर से हरीश चंद्र गहतोड़ी द्वारा सहयोग प्रदान किया जा रहा है। नगर के व्यवसायियों द्वारा भी रंग, ब्रश की निश्शुल्क व्यवस्था की गई है। अगले दो दिन चित्रकारों द्वारा देव सिंह मैदान, विकास भवन के सामने की दीवारों पर चित्रकारी की जाएगी। कार्यक्रम को सफल बनाने में गोविंद बिष्ट, ज्योति प्रकाश पुनेठा आदि जुटे हुए हैं।

राज्य में बनेगी साइंस सिटी : सीएम

0

मंगलवार को ‘विज्ञान धाम’ यू काॅस्ट झाझरा प्रेमनगर में आयोजित ‘उत्तराखण्ड में जलवायु परिवर्तन के खतरों की दिशा में लचीलेपन के लिए अभ्यास और नीति के साथ विज्ञान को जोड़ने’ विषयक कार्यशाला में सूबे के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने हिस्सा लिया। सीएम ने इस दौरान घोषणा करते हुए कहा कि राज्य में ’साइंस सिटी’ विकसित की जायेगी। शीघ्र ही हिमालयी राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा केन्द्रीय मंत्रियों का एक सम्मेलन देहरादून में आयोजित किया जायेगा। राज्य में ’ग्रीन रोड’ निर्माण की दिशा में शीघ्र ही प्रभावी पहल की जाएगी।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने जलवायु परिवर्तन पर आयोजित कार्यशाला का दीप प्रज्जवलित कर शुभारम्भ किया। कार्यशाला में उपस्थित वैज्ञानिक तथा छात्रों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि निश्चित रूप से हम जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विश्व के भविष्य के संबंध में चिन्तित है। ’’जलवायु परिवर्तन’’ चर-अचर से संबंधित है। यह भी सत्य है कि वैश्विक उत्सर्जन के संदर्भ में भारत सबसे कम उत्सर्जन करने वाले देशों में है। परन्तु जलवायु परिवर्तन का सबसे पहले प्रभाव हिमालयी क्षेत्रों पर पड़ेगा।
जलवायु परिवर्तन का विषय आते ही हमें सबसे पहले ’केदार आपदा’ याद आती है। सभी क्षेत्र, कृषि, वानिकी, समुद्रतल, जलस्तर, मौसम आदि जलवायु परिवर्तन से प्रभावित है। जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती बन चुका है। जलवायु परिवर्तन में विकसित राष्ट्रों ने सबसे अधिक योगदान दिया है। इसमें अमेरिका की विशेष भूमिका रही है। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मजबूत कदम उठाए तथा आठ बिन्दुओं वाला मिशन आरम्भ किया। जहां एक और जलवायु परिवर्तन से हमारा कृषि उत्पादन कम हो रहा है। ग्लेशियरों के त्रीवता से पिघलने से समुद्री क्षेत्रों के जलमग्न होने का खतरा बढ़ा है। वहीं दूसरी ओर जनसंख्या बढ़ने से भी जलवायु पर दुष्प्रभाव बढ़ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रन्थों में भी वृक्षारोपण को पुण्य तथा लाभकारी माना गया है। हमारे जनजातिय व वनवासी समुदाय परम्परागत रूप से वनों का संरक्षण करते है। हमें जनजातियों से प्रेरणा लेनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय पर मात्र सरकार पर ही निर्भर नही रहा जा सकता। इस दिशा में जनता की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। वनाग्नि जैसी घटनाओं को रोकने के लिए जनता की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। हमें पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए मात्र सरकार पर निर्भरता के स्थान पर आत्म प्रयासों व जन सक्रियता पर बल देना होगा। इस दिशा में सोच को बदलना होगा। हमें अपनी समस्याओं को अपने स्तर से सुलझने के प्रयास करने होंगे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ’’ग्रीन रोड’’ कम कीमत तथा बचत के साथ पर्यावरण संरक्षण के साथ पर्यावरण संरक्षण हेतु कारगर पहल है। निश्चित रूप से उत्तराखण्ड में इसका क्रियान्वयन किया जायेगा। प्रधानमंत्री द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्रों, सौर, जल, न्यूक्लियर आदि सभी की क्षमता विकास के लिए लक्ष्य निर्धारित कर दिए गए है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र ने इस अवसर पर कार्यशाला के संदर्भ में दो पुस्तिकाओं का विमोचन किया। मुख्यमंत्री को चूरानिर्मित अंगवस्त्र तथा केदारनाथ का स्मृति चिन्ह् भेंट किया गया।
इस अवसर पर विधायक सुरेन्द्र सिंह नेगी, विनोद कण्डारी, वैज्ञानिक राजेन्द्र डोभाल, एसपी सिंह, पीपी ध्यानी आदि उपस्थित रहे।

मीरा कुमार ने सोशल मीडिया से की प्रचार की शुरूआत

0

राष्ट्रपति चुनाव की विपक्ष की संयुक्त उम्मीदवार और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपने प्रचार की शुरूआत से सोशल मीडिया से कर दी है। हालांकि वो बुधवार पूर्वाह्ल ग्यारह बजे संसद भवन में अपना नामांकन पत्र दाखिल करेंगी तथा 30 जून राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आश्रम साबरमती से अपने प्रचार अभियान की शुरूआत करेंगी ।

इससे पहले मीरा कुमार ने ट्विटर और फेसबुक पर अपना अकाउंट खोल लिया है। मौजूदा दौर में ‘बिहार की बेटी’ की उपमा से अलंकृत मीरा कुमार ईद के मौके पर अपना अकाउंट खोलते हुए सबसे पहले ईद की मुबारकबाद दी।
24 घंटे के अंदर ही उनके समर्थकों के लाइक और कमेंट्स भी आने लगे हैं। मीरा कुमार ने अपने ट्विटर एकाउंट पर दिये अपने परिचय में लिखा है राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष, 5 बार की सांसद रह चुकी। वहीं, उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर परिचय में लिखा है- @MeiraKumarOfficial। दोनों अकाउंट में उन्होंने अपने समर्थकों से उन्हें फॉलो करने के लिए कहा है।
अकाउंट खोलने के 24 घंटे के अंदर ही मीरा कुमार के फेसबुक पेज को 439 लोगों ने उन्हें फॉलो करना शुरू कर दिया है। साथ ही 423 लोगों ने पेज को लाइक किया है। मीरा कुमार ने अपनी तीन तस्वीरें भी पोस्ट की हैं। वहीं, उनके ट्विटर अकाउंट पर उन्होंने मात्र तीन ट्वीट किये हैं। उनके तीन ट्वीट पर ही उनके फॉलोअरों की संख्या 2601 हो गयी है।
मीरा कुमार सोशल मीडिया में काफी सक्रिय दिख रही हैं। उन्होंने 27 जून, 2017, दिन मंगलवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फेंस करने की जानकारी भी ट्वीट और फेसबुक के जरिये भी दी थी। जिसमें उन्होंने खुद के ऊपर लगाये जा रहे तमाम आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए यह भी कहा कि यह उनकी छवि धूमिल करने की कोशिश है ।

देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

देश का किसान संकट में है क्योंकि किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और अब तो कर्ज के दबाव में इहलीला स्वत: समाप्त कर कर्ज से मुक्ति लेना चाहता है। सरकार किसी दल की हो, बार बार कर्ज माफी का ढोंगकरतथा कथित बुद्धिजीवियों की नजरों में उसे कामचोर बना देती है। हाल के वर्षो की याद करें तो 2009 में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ढोल पीटकर किसान को कर्ज माफी घोषित की। महाराष्ट्र का विदर्भ अंचल लगातार सूखा की चपेट में था और केन्द्र सरकार ने किसानों के घावों पर मरहम लगाने का काम तो किया लेकिन हकीकत इस बात से मेल नहीं खाती कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की इस राजनीतिक उदारता से किसानों को कोई लाभ पहुंचा। रोग बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।

हाल में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब ने भी कर्ज माफी की घोषणा की और अमल भी हो रहा है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने कर्ज माफी का कदम उठाया है। लेकिन कर्ज के दबाव में मौत का सिलसिला थमा नहीं है। इससे लगता है कि सरकारें इस मर्म को समझ नहीं पा रही है कि किसान की आवश्यकता आर्थिक सशक्तिकरण के उपाय किए जाने की है और यह तभी संभव है जब किसान के कृषि उत्पाद की कीमत इस प्रकार निर्धारित हो कि किसान का सशक्तिकरण हो। कृषि की बढ़ती लागत और कृषि उत्पाद के फिसलते मूल्यों ने किसान को संकट में डाला है। उसके खर्च काटकर उसे दो पैसे मिलने से आगामी फसल में निवेश के लिए किसान की बरकत होगी। इससे किसान की क्षमता बढ़ेगी, उसे दूसरों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आयेगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन ने वर्षों पहले यही सुझाव दिया था।
मध्यप्रदेश सरकार ने इस दिशा में कुछ ठोस पहल आरंभ की है। फलस्वरूप प्रदेश में कृषि उत्पाद मूल्य और कृषि उत्पाद विपणन आयोग बनाया जा रहा है। उद्देश्य सही दिशा में सोच प्रदर्शित करता है। इसके नतीजों पर कहना जल्दबाजी होगी लेकिन आयोग का गठन सामयिक और प्रासंगिक है, इसमें शायद ही दो राय हो। इसके अलावा खेती के लिए कर्ज जीरो प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने फसलों के समर्थन मूल्य की गारंटी दी है। यहां तक कि मानसून के संकेत मिलने के बाद भी प्याज, दलहन की खरीद जारी रखी है।
आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आजादी के संघर्ष के दौरान किसान की समस्याओं को लेकर संग्राम शुरू हुआ। आजादी के संघर्ष का किसान ध्वजवाहक बना। चंपारन और वारदोली आंदोलन ने देश की जनता को स्वाधीनता के प्रति जागरूक किया लेकिन जो दल आज किसानपरस्ती के ढोंग में कर्ज माफी की बात करते हैं, उन्होंने किसानों के सशक्तिकरण आंदोलन के समर्थन से मुंह मोड़ लिया था। उन्होंने जमीदारों का साथ दिया। अबबत्ता किसान के संघर्ष का विरोध नहीं किया क्योंकि किसानों का वोट बैंक उनकी ओर झुक चुका था। किसानों की लड़ाई में कंधा लगाने वाले जेपी, लोहिया, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी, नरेन्द्र देव, अशोक मेहता, किशोरी प्रसन्न सिंह, गंगाशरण सिंह, पं. रामनंदन मिश्र जैसे समाजवादी नेता शामिल रहे।
इन्होंने संचार माध्यमों के जरिए खूब समर्थन दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने तो किसानों के समर्थन में संदेश दिया लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की बदकिस्मती थी कि तब राजनेताओं के सामने सवाल था कि वे किसान और जागीदार, जमीदार के बीच एक का चुनाव करें ? किसे समर्थन दिया जाए? कांग्रेस की प्राथमिकता सूची से किसान बाहर हो गया। किसान की नाराजगी के डर से कांग्रेस ने किसान का विरोध नहीं किया लेकिन समर्थन से पीछे हट गयी। आजादी के बाद भी किसानों का संघर्ष जारी रहा लेकिन छितरा छितरा रहा। इसका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह और देवीलाल ने संभाला। शरद जोशी और शरद पवार ने भी किसानों का साथ दिया। महेन्द्र सिह टिकैत भी जुझारू नेता हुए लेकिन उनकी आवाज दिल्ली के इर्द गिर्द सुनी गयी।
किसानों के समर्थन में आज कुछ नेता सामने आए हैं लेकिन उनकी मौजूदगी परिस्थितिजन्य है। किसानों की आवाज बुलंद करने में दुर्भाग्य से ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी आवाज में वजन हो और देशव्यापी स्वीकार्यता हो। इसलिए तात्कालिक लाभ के लिए राजनेता कर्ज माफी की बात उठाकर मानों किसान के लिए राजनीतिक नजराना दिलाना चाहते है क्योंकि सरकारों ने बार-बार कर्ज माफी का ढिंढोरा पीटा लेकिन किसान कर्ज माफी के बावजूद कर्ज से मुक्ति नहीं पा सका। इसका कारण खोजने की आज जितनी प्रासंगिकता है, उतनी कभी नहीं रही। किसान खेती की लागत बढऩे से परेशान है, उपर से उसे फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है। न तो खाद्य प्रसंस्करण किसानों का उद्योग बन पाया है और न उसे आर्थिक सशक्तिकरण के लिए माली खुराक के बारे में सोचा गया है। फसल आने पर मूल्य गिरना फितरत बन चुकी है क्योंकि किसान भंडारण सुविधा के अभाव में तत्काल माल बेचता है। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा आवश्यक है। अपमानजनक है कि किसान को मिलने वाली कर्ज माफी ने समाज में किसान की प्रतिष्ठा कम की है। किसान को कामचोर तक कहा गया है। लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया कि इस कर्ज ग्रस्तता की जड़ कहां है।
किसान का दुर्भाग्य तो आजादी के बाद ही शुरू हो गया जब सरकारों की नजरों में उद्योग तो चढ़ गया और कृषि दोयम दर्जे की हो गयी। किसान न्यूनतम सुविधाओं पर अपने सांस्कृतिक परंपरागत कृत्य से जूझता रहा। किसान को अन्नदाता कहकर उसका भावनात्मक शोषण किया गया। एक तरफ खेती घाटे का व्यवसाय बनती गयी दूसरी तरफ सरकार को कृषि उपज का मूल्य बढ़ न जाए, यह चिंता बनी रही। किसान सरकार की नजरों में गौण हो गया। किसान पूरी तरह प्रकृति के सहारे हो गया। अतिवृष्टि, सूखा, ओला जैसे संकट आते गए। सरकारों ने संकट की जड़ तक जाने के बजाए थोड़ी बहुत राहत देकर किसानपरस्ती की भरपूर सियासत कर उसे वोट बैंक समझ लिया। न तो किसान को अपनी फसल का मूल्य पाने का अधिकार मिला और न किसान की गिरती माली सेहत के प्रति सरकार ने गौर किया। ऐसे में दुबला और दो अषाड़ की कहावत तो तब सिद्ध हुई जब 1966-67 में हरित क्रांति का झंडा बुलंद हुआ।
सरकार ने कृषि उत्पादन में इजाफा करने के लिए आह्वान किया लेकिन किसानी की बढ़ती लागत पर कतई गौर नहीं किया। कृषि से जुड़ा व्यापार खाद बीज पौध संरक्षण का कारोबार मल्टीनेशनल्स के हाथ में बंधक बन गया।इनका पूरा ध्यान वार्षिक लाभ कमाने पर केन्द्रित हो गया। किसान इस कारोबार की भूल भूलैया में ऐसा फंसा कि किसान के उसके कर्ज का घोड़ा बेलगाम हो गया। सहकारिता आंदोलन ने इसका जिक्र किया। नेताओं ने फ्रिक की, लेकिन राहत कहीं नजर नहीं आयी। किसानों पर कर्ज का बोझ, कार्पोरेट का मुनाफा बढ़ा। कार्पोरेट को सरकार ने सुविधा दी। उनका कर्ज भी माफ हुआ लेकिन किसान ने उत्पाद की मूल्य वृद्धि सरकार के राडार पर नहीं आयी। किसानी के अर्थशास्त्र को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समझा। किसानों के समर्थन में आंदोलन, लेव्ही विरोध जैसे अभियान चले। लेकिन सही उपचार का समय बहुत विलंब से आया। देश में राजनीतिक परिवर्तन से किसान के अनुकूल हवा के झौंके महसूस किए जा रहे हैं।
किसान की समस्या की असल जड़ की ओर नरेन्द्र मोदी सरकार की निगाह गयी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय गोकुल योजना, नीली क्रांति मूल्य स्थिरीकरण योजना, बाजार हस्तक्षेप योजना, ई विपणन मंच, कृषि उपज मंडियों को जोडऩे का काम शुरू हुआ है। किसानों को कर्ज सुविधा आसान और सस्ती हुई है। ब्याज 18 से चार प्रतिशत और बाद में मध्यप्रदेश में जीरो प्रतिशत हुआ है। किसान को जमीन का स्वाइल हेल्थकार्ड देकर लागत घटाने का उपक्रम आरंभ हुआ। वास्तव में आवश्यकता किसान को फसल का उचित मूल्य दिलाने, किसानी की लागत कम करने की है। इसी बीच मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि उत्पाद मूल्य और विपणन आयोग के गठन का जतन किया है। समय बतायेगा कि किसानों को माफिक दवा मिलने से कर्ज मुक्ति का मार्ग स्वयं खुलेगा। किसानों को दरकार कर्ज मुक्ति की ही है, कर्ज माफी की नहीं। नरेन्द्र मोदी सरकार का 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का संकल्प और तानाबाना भी कसौटी पर होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कठिन डगर पर मोदी सरकार ने कदम बढ़ाया है। नीति सही है। दिशा भी सही है।

स्पीकर आवास पर कांग्रेस का धरना

0

राजकीय चिकित्सालय में नौ चिकित्सकों के तबादले होने के बाद यहां अन्य कोई चिकित्सक नहीं भेजा गया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष व क्षेत्रीय विधायक प्रेमचंद अग्रवाल के आवास के समीप सांकेतिक धरना दिया। शासन द्वारा एक सप्ताह पूर्व बड़े पैमाने पर चिकित्सकों के तबादले कर दिए गए हैं। राजकीय चिकित्सालय ऋषिकेश से विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ चिकित्सकों सहित नौ चिकित्सकों के तबादले कर दिए गए हैं। उनके स्थान पर किसी भी चिकित्सक को नहीं भेजा गया है गढ़वाल मंडल के प्रवेश द्वार पर स्थित इस चिकित्सालय में नरेंद्र नगर, यमकेश्वर और ग्रामीण क्षेत्र के लोग निर्भर रहते हैं।
चार धाम यात्रा चल रही है, शीघ्र ही कांवड़ यात्रा भी शुरू हो जाएगी। जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा इस मामले में धरना प्रदर्शन का ऐलान किया गया था। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष जयेंद्र रमोला के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष व क्षेत्रीय विधायक प्रेमचंद अग्रवाल की आवास के समीप सांकेतिक धरना दिया। सुरक्षा को देखते हुए यहां पुलिस बल तैनात किया गया है।
धरना देने वालों में नगर अध्यक्ष विनय सारस्वत, कार्यकारी अध्यक्ष शिव मोहन मिश्रा, मधु जोशी,विमला रावत, वीरेंद्र सजवाण, अरविंद जैन, मनोहरलाल चावला, विनोद चौहान, राजेश व्यास ,अब्दुल रहमान आदि शामिल हुए।

घर में घुसा मगरमच्छ, 10 घंटे बाद आई विभाग की टीम

0

सोमवार की देर रात अलावलपुर गांव में एक विशालकाय मगरमच्छ ग्रामीण के घर में घुस गया। आधी रात के करीब लघुशंका के लिए उठे मकान मालिक की नजर उस पर पड़ी तो उसके होश उड़ गए। ग्रामीणों ने इसकी जानकारी वन विभाग को दी, लेकिन रात में वन विभाग के किसी कर्मचारी ने गांव में जाने की जहमत नहीं उठाई।

crocodilehri

हरिद्वार के तटीय इलाकों में बरसात शुरू होते ही जलीय जंतुओं का आबादी में घुसने का सिलसिला शुरू हो गया है। सोमवार की रात में लक्सर कोतवाली क्षेत्र के अलावलपुर गांव निवासी नरेंद्र के घर में एक विशालकाय मगरमच्छ घुस आया। आधी रात के लगभग नरेंद्र लघुशंका के लिए उठा तो चारपाई के पास पड़े विशालकाय मगरमच्छ को देखकर उसके होश उड़ गए। उसने भागकर जान बचाई और शोर मचाया। शोर शराबा सुनकर घर में सो रहे अन्य लोग व आस पड़ोस के ग्रामीण भी मौके पर आ गए। मौके पर ग्रामीणों ने लाठी-डंडों से हांका लगाकर मगरमच्छ को खदेड़ने की कोशिश की तो वह ग्रामीणों की पर झपट पड़ा।

इस बीच मगरमच्छ ने घर के एक पालतू कुत्ते पर भी हमला बोल दिया। नरेंद्र ने इसकी जानकारी वन विभाग के अधिकारियों को दी। ग्रामीणों के मुताबिक पूरी रात मगरमच्छ उनके घर में ही घुसा रहा, लेकिन वन विभाग के किसी भी अधिकारी ने रात में पहुंचकर मगरमच्छ को काबू करने की जहमत नहीं उठाई। इसके चलते ग्रामीण रातभर खौफ के साए में रहे। मंगलवार सुबह वन विभाग की टीम गांव पहुंच कर ग्रामीणों के साथ मिलकर मगरमच्छ पर काबू पाया।

वन क्षेत्राधिकारी दिगंबर भारती का कहना है कि विभाग के कर्मचारी की मौत हो जाने के कारण विभाग के सभी अधिकारी व कर्मचारी उसके अंतिम संस्कार के लिए गए थे।इसकी वजह से टीम को गांव में पहुंचने में समय लगा है। मंगलवार सुबह गांव पहुंचकर मगरमच्छ को पकड़कर सुरक्षित जल क्षेत्र गंगा नदी में छोड़ दिया गया है।

शो पीस बन कर रह गईं कल्प गंगा पर लगीं ट्राॅलियां

0

वर्ष 2013 की आपदा के बाद क्षतिग्रस्त पुलों और मार्गों की स्थिति को देखते हुए सरकार ने गधेरों, नदियों पर आवाजाही के लिए आधा दर्जन ट्राॅली लगायी, मगर इन ट्राॅलियों की हालत उर्गम घाटी में जर्जर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह ट्राॅली जब से लगी है तब से शो पीस बन कर रह गई है। 2013 की आपदा में चमोली जिले की उर्गम घाटी में भी बहुत नुकसान हुआ। पुल पुलिया संपर्क मार्ग टूट गये थे। यहां बहने वाली कल्प गंगा पर लोनिवि ने कल्प गंगा से मंदिर तक जाने के लिए 25 लाख रुपये की लागत से ट्राॅली का निर्माण किया था।

ग्रामीण रघुवीर सिंह नेगी कहा है कि जब से यह ट्राॅली लगी है शो पीस बनकर रह गई। लाखों रुपया खर्च हो गया पर जिस प्रयोजन से ट्राॅली लगी वह प्रयोजन पूरा हुआ ही नहीं। अभी भी लोगों को फिसलन भरे रास्तों से मंदिर जाना होता है। नदी पर लकड़ी का एक पुल है जो नदी के बढ़ने पर कभी भी बह सकता है।

लोनिवि के अधिशासी अभियंता धन सिंह रावत बताया कि ट्राॅली संचालित हो रही है। हाल ही में हमारे उस क्षेत्र के अवर अभियंता इस ट्राॅली से इसपार से उस पार गये थे। यदि ग्रामीणों की कोई शिकायत है तो उसे भी देखा जायेगा। नदी स्थायी व्यवस्था के लिए विश्व बैंक द्वारा पुल का निर्माण किया जा रहा है।

उच्च शिक्षा : न सुविधा न संसाधन, कैसे सुधरेगी गुणवत्ता

0

आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में उच्च शिक्षा की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। गुणवत्ता के लिहाज से हालात बेहद खराब हैं। बीते दिनों एक कार्यक्रम में उच्च शिक्षा मंत्री के बयान ने भी इस ओर इशारा किया। बीते कुछ वक्त में धड़ाधड़ संस्थान खोले गए, लेकिन इनमें सुविधाओं और मानव संसाधन को लेकर कोई गंभीरता नजर नहीं आती। ऐसे में बेहतर रिजल्ट और क्वॉलिटी एजुकेशन का सपना अभी भी दूर की कौड़ी नजर आता है।
राज्य गठन के बाद 17 साल में राज्य में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में पांच गुना इजाफा हुआ। राज्य में नामांकन (एनरोलमेंट) की स्थिति भी सुखद अहसास कराती है। उत्तराखंड में उच्च शिक्षा में नामांकन 3.10 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर केवल 1.90 प्रतिशत। एक करोड़ की आबादी वाले उत्तराखंड में आईआईटी, आईआईएम, आईआईपी, एनआईटी, एफआरआई समेत 28 बड़े उच्च शिक्षा संस्थान हैं। वहीं, निजी, सरकारी, अर्ध सरकारी समेत तमाम तरह के उच्च शिक्षा संस्थानों की कुल संख्या तकरीबन 465 है। राज्य गठन के वक्त यह आंकड़ा महज 90 था। यह तस्वीर का एक पहलू है, जो बेहद उजला नजर आता है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू काफी स्याह है।
राज्य में धड़ाधड़ संस्थान तो स्थापित किए गए, लेकिन इनमें गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया। स्थिति यह है कि 99 राजकीय महाविद्यालयों में 44 के पास भवन नहीं है और 20 प्रतिशत के पास जमीन। इनमें से 10 से ज्यादा महाविद्यालय ऐसे हैं, जिनमें 100 छात्र भी नहीं पढ़ रहे। वहीं, इन महाविद्यालयों पर सालाना खर्च एक से डेढ़ करोड़ रुपये आ रहा। ऐसे में प्रति छात्र एक से डेढ़ लाख रुपये सरकारी राशि खर्च किए जाने के बावजूद क्वॉलिटी एजुकेशन नहीं मिल पा रही। वहीं, राज्य के राजकीय महाविद्यालयों में स्वीकृत लगभग 1800 पदों में दो तिहाई खाली हैं। विश्वविद्यालयों के हालात इससे भी बदतर हैं। एकमात्र उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी के अलावा किसी भी यूनिवर्सिटी के पास स्थायी कुलसचिव तक नहीं है। अन्य पद भी या तो खाली हैं या जुगाड़ से भरे गए हैं।
सिर्फ दो संस्थानों को मिली जगह
राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन कराने वालों की तादाद भले ही बढ़ी है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसका खुलासा एनआईआरएफ ने किया है। बता दें कि यह भारत सरकार की एक ऐसी संस्था तो पूरे देश में शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता तय करती है। एनआईआरएफ की रैंकिंग फ्रेमवर्क में उत्तराखंड के सिर्फ दो संस्थान आईआईटी रुड़की और आईआईएम काशीपुर को छोड़कर कोई भी संस्थान टाॅप 100 में भी अपनी जगह नहीं पाया।
ऐसे हैं विश्वविद्यालयों के हालात
– श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के पास न अपना भवन और न ही पर्याप्त कार्मिक।
– कुमाऊं विश्वविद्यालय भी मानव संसाधन की कमी से अछूता नहीं।
– उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परिनियमावली ही अस्तित्व में नहीं आ पाई।
– एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय के पास भी न भवन है और न ही कार्मिक।
– आयुर्वेद विश्वविद्यालय संक्रमण काल से गुजर रहा।
– औद्यानिकी और संस्कृत विश्वविद्यालय भी जुगाड़ तंत्र से चल रहा
– दून विश्वविद्यालय में राजनीति हावी है जो शिक्षा व्यवस्था को गर्त में ले जा रहा है।
– उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय बेहद कम कार्मिकों के साथ छात्रों का भविष्य तय करने की ओर अग्रसर।
उच्च शिक्षा आंकड़ों के आईने में
संस्था-2000-2017
राजकीय महाविद्यालय-34-99
राज्य विश्वविद्यालय-03-10
बड़े उच्च शिक्षा संस्थान-06-28
निजी समेत कुल संस्थान-90-465
मौजूदा स्थिति
कुल महाविद्यालय-99
भवन विहीन-44
भूमि विहीन-19
शैक्षिक पद-1800 (लगभग)
रिक्त पद-684 विज्ञापित
अन्य रिक्त-600 (लगभग)
राज्य विश्वविद्यालय-10
स्थायी कुलसचिव-02 (एक प्रतिनियुक्ति पर राज्य से बाहर)
अन्य पद-लगभग 50 प्रतिशत पद खाली या जुगाड़ से भरे गए।
नामांकन की स्थिति (सितंबर 2014 तक)
उच्च शिक्षा में नामांकन- 3.10 लाख (राष्ट्रीय औसत से लगभग डेढ़ गुणा)
छात्राओं का नामांकन- 40 प्रतिशत
यूनिवर्सिटी के लिए भूमि का आवंटन हो गया है। बीते कुछ वक्त में काफी परेशानियां आई। अब जल्द ही स्थाई कैंपस का कार्य शुरू हो जाएगा। मानव संसाधन भी नहीं है। कम संसाधन में भी बेहतर का प्रयास जारी है। महज पांच स्थाई लोगों के साथ एक लाख छात्रों की परीक्षा कराई जा रही है।
-डॉ. यूएस रावत, वाइस चांसलर, श्रीदेव सुमन यूनिवर्सिटी उत्तराखंड