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देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

देश का किसान संकट में है क्योंकि किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और अब तो कर्ज के दबाव में इहलीला स्वत: समाप्त कर कर्ज से मुक्ति लेना चाहता है। सरकार किसी दल की हो, बार बार कर्ज माफी का ढोंगकरतथा कथित बुद्धिजीवियों की नजरों में उसे कामचोर बना देती है। हाल के वर्षो की याद करें तो 2009 में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ढोल पीटकर किसान को कर्ज माफी घोषित की। महाराष्ट्र का विदर्भ अंचल लगातार सूखा की चपेट में था और केन्द्र सरकार ने किसानों के घावों पर मरहम लगाने का काम तो किया लेकिन हकीकत इस बात से मेल नहीं खाती कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की इस राजनीतिक उदारता से किसानों को कोई लाभ पहुंचा। रोग बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।

हाल में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब ने भी कर्ज माफी की घोषणा की और अमल भी हो रहा है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने कर्ज माफी का कदम उठाया है। लेकिन कर्ज के दबाव में मौत का सिलसिला थमा नहीं है। इससे लगता है कि सरकारें इस मर्म को समझ नहीं पा रही है कि किसान की आवश्यकता आर्थिक सशक्तिकरण के उपाय किए जाने की है और यह तभी संभव है जब किसान के कृषि उत्पाद की कीमत इस प्रकार निर्धारित हो कि किसान का सशक्तिकरण हो। कृषि की बढ़ती लागत और कृषि उत्पाद के फिसलते मूल्यों ने किसान को संकट में डाला है। उसके खर्च काटकर उसे दो पैसे मिलने से आगामी फसल में निवेश के लिए किसान की बरकत होगी। इससे किसान की क्षमता बढ़ेगी, उसे दूसरों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आयेगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन ने वर्षों पहले यही सुझाव दिया था।
मध्यप्रदेश सरकार ने इस दिशा में कुछ ठोस पहल आरंभ की है। फलस्वरूप प्रदेश में कृषि उत्पाद मूल्य और कृषि उत्पाद विपणन आयोग बनाया जा रहा है। उद्देश्य सही दिशा में सोच प्रदर्शित करता है। इसके नतीजों पर कहना जल्दबाजी होगी लेकिन आयोग का गठन सामयिक और प्रासंगिक है, इसमें शायद ही दो राय हो। इसके अलावा खेती के लिए कर्ज जीरो प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने फसलों के समर्थन मूल्य की गारंटी दी है। यहां तक कि मानसून के संकेत मिलने के बाद भी प्याज, दलहन की खरीद जारी रखी है।
आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आजादी के संघर्ष के दौरान किसान की समस्याओं को लेकर संग्राम शुरू हुआ। आजादी के संघर्ष का किसान ध्वजवाहक बना। चंपारन और वारदोली आंदोलन ने देश की जनता को स्वाधीनता के प्रति जागरूक किया लेकिन जो दल आज किसानपरस्ती के ढोंग में कर्ज माफी की बात करते हैं, उन्होंने किसानों के सशक्तिकरण आंदोलन के समर्थन से मुंह मोड़ लिया था। उन्होंने जमीदारों का साथ दिया। अबबत्ता किसान के संघर्ष का विरोध नहीं किया क्योंकि किसानों का वोट बैंक उनकी ओर झुक चुका था। किसानों की लड़ाई में कंधा लगाने वाले जेपी, लोहिया, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी, नरेन्द्र देव, अशोक मेहता, किशोरी प्रसन्न सिंह, गंगाशरण सिंह, पं. रामनंदन मिश्र जैसे समाजवादी नेता शामिल रहे।
इन्होंने संचार माध्यमों के जरिए खूब समर्थन दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने तो किसानों के समर्थन में संदेश दिया लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की बदकिस्मती थी कि तब राजनेताओं के सामने सवाल था कि वे किसान और जागीदार, जमीदार के बीच एक का चुनाव करें ? किसे समर्थन दिया जाए? कांग्रेस की प्राथमिकता सूची से किसान बाहर हो गया। किसान की नाराजगी के डर से कांग्रेस ने किसान का विरोध नहीं किया लेकिन समर्थन से पीछे हट गयी। आजादी के बाद भी किसानों का संघर्ष जारी रहा लेकिन छितरा छितरा रहा। इसका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह और देवीलाल ने संभाला। शरद जोशी और शरद पवार ने भी किसानों का साथ दिया। महेन्द्र सिह टिकैत भी जुझारू नेता हुए लेकिन उनकी आवाज दिल्ली के इर्द गिर्द सुनी गयी।
किसानों के समर्थन में आज कुछ नेता सामने आए हैं लेकिन उनकी मौजूदगी परिस्थितिजन्य है। किसानों की आवाज बुलंद करने में दुर्भाग्य से ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी आवाज में वजन हो और देशव्यापी स्वीकार्यता हो। इसलिए तात्कालिक लाभ के लिए राजनेता कर्ज माफी की बात उठाकर मानों किसान के लिए राजनीतिक नजराना दिलाना चाहते है क्योंकि सरकारों ने बार-बार कर्ज माफी का ढिंढोरा पीटा लेकिन किसान कर्ज माफी के बावजूद कर्ज से मुक्ति नहीं पा सका। इसका कारण खोजने की आज जितनी प्रासंगिकता है, उतनी कभी नहीं रही। किसान खेती की लागत बढऩे से परेशान है, उपर से उसे फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है। न तो खाद्य प्रसंस्करण किसानों का उद्योग बन पाया है और न उसे आर्थिक सशक्तिकरण के लिए माली खुराक के बारे में सोचा गया है। फसल आने पर मूल्य गिरना फितरत बन चुकी है क्योंकि किसान भंडारण सुविधा के अभाव में तत्काल माल बेचता है। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा आवश्यक है। अपमानजनक है कि किसान को मिलने वाली कर्ज माफी ने समाज में किसान की प्रतिष्ठा कम की है। किसान को कामचोर तक कहा गया है। लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया कि इस कर्ज ग्रस्तता की जड़ कहां है।
किसान का दुर्भाग्य तो आजादी के बाद ही शुरू हो गया जब सरकारों की नजरों में उद्योग तो चढ़ गया और कृषि दोयम दर्जे की हो गयी। किसान न्यूनतम सुविधाओं पर अपने सांस्कृतिक परंपरागत कृत्य से जूझता रहा। किसान को अन्नदाता कहकर उसका भावनात्मक शोषण किया गया। एक तरफ खेती घाटे का व्यवसाय बनती गयी दूसरी तरफ सरकार को कृषि उपज का मूल्य बढ़ न जाए, यह चिंता बनी रही। किसान सरकार की नजरों में गौण हो गया। किसान पूरी तरह प्रकृति के सहारे हो गया। अतिवृष्टि, सूखा, ओला जैसे संकट आते गए। सरकारों ने संकट की जड़ तक जाने के बजाए थोड़ी बहुत राहत देकर किसानपरस्ती की भरपूर सियासत कर उसे वोट बैंक समझ लिया। न तो किसान को अपनी फसल का मूल्य पाने का अधिकार मिला और न किसान की गिरती माली सेहत के प्रति सरकार ने गौर किया। ऐसे में दुबला और दो अषाड़ की कहावत तो तब सिद्ध हुई जब 1966-67 में हरित क्रांति का झंडा बुलंद हुआ।
सरकार ने कृषि उत्पादन में इजाफा करने के लिए आह्वान किया लेकिन किसानी की बढ़ती लागत पर कतई गौर नहीं किया। कृषि से जुड़ा व्यापार खाद बीज पौध संरक्षण का कारोबार मल्टीनेशनल्स के हाथ में बंधक बन गया।इनका पूरा ध्यान वार्षिक लाभ कमाने पर केन्द्रित हो गया। किसान इस कारोबार की भूल भूलैया में ऐसा फंसा कि किसान के उसके कर्ज का घोड़ा बेलगाम हो गया। सहकारिता आंदोलन ने इसका जिक्र किया। नेताओं ने फ्रिक की, लेकिन राहत कहीं नजर नहीं आयी। किसानों पर कर्ज का बोझ, कार्पोरेट का मुनाफा बढ़ा। कार्पोरेट को सरकार ने सुविधा दी। उनका कर्ज भी माफ हुआ लेकिन किसान ने उत्पाद की मूल्य वृद्धि सरकार के राडार पर नहीं आयी। किसानी के अर्थशास्त्र को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समझा। किसानों के समर्थन में आंदोलन, लेव्ही विरोध जैसे अभियान चले। लेकिन सही उपचार का समय बहुत विलंब से आया। देश में राजनीतिक परिवर्तन से किसान के अनुकूल हवा के झौंके महसूस किए जा रहे हैं।
किसान की समस्या की असल जड़ की ओर नरेन्द्र मोदी सरकार की निगाह गयी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय गोकुल योजना, नीली क्रांति मूल्य स्थिरीकरण योजना, बाजार हस्तक्षेप योजना, ई विपणन मंच, कृषि उपज मंडियों को जोडऩे का काम शुरू हुआ है। किसानों को कर्ज सुविधा आसान और सस्ती हुई है। ब्याज 18 से चार प्रतिशत और बाद में मध्यप्रदेश में जीरो प्रतिशत हुआ है। किसान को जमीन का स्वाइल हेल्थकार्ड देकर लागत घटाने का उपक्रम आरंभ हुआ। वास्तव में आवश्यकता किसान को फसल का उचित मूल्य दिलाने, किसानी की लागत कम करने की है। इसी बीच मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि उत्पाद मूल्य और विपणन आयोग के गठन का जतन किया है। समय बतायेगा कि किसानों को माफिक दवा मिलने से कर्ज मुक्ति का मार्ग स्वयं खुलेगा। किसानों को दरकार कर्ज मुक्ति की ही है, कर्ज माफी की नहीं। नरेन्द्र मोदी सरकार का 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का संकल्प और तानाबाना भी कसौटी पर होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कठिन डगर पर मोदी सरकार ने कदम बढ़ाया है। नीति सही है। दिशा भी सही है।

स्पीकर आवास पर कांग्रेस का धरना

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राजकीय चिकित्सालय में नौ चिकित्सकों के तबादले होने के बाद यहां अन्य कोई चिकित्सक नहीं भेजा गया है। इस मुद्दे पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष व क्षेत्रीय विधायक प्रेमचंद अग्रवाल के आवास के समीप सांकेतिक धरना दिया। शासन द्वारा एक सप्ताह पूर्व बड़े पैमाने पर चिकित्सकों के तबादले कर दिए गए हैं। राजकीय चिकित्सालय ऋषिकेश से विभिन्न रोगों के विशेषज्ञ चिकित्सकों सहित नौ चिकित्सकों के तबादले कर दिए गए हैं। उनके स्थान पर किसी भी चिकित्सक को नहीं भेजा गया है गढ़वाल मंडल के प्रवेश द्वार पर स्थित इस चिकित्सालय में नरेंद्र नगर, यमकेश्वर और ग्रामीण क्षेत्र के लोग निर्भर रहते हैं।
चार धाम यात्रा चल रही है, शीघ्र ही कांवड़ यात्रा भी शुरू हो जाएगी। जिला कांग्रेस कमेटी द्वारा इस मामले में धरना प्रदर्शन का ऐलान किया गया था। कांग्रेस के जिलाध्यक्ष जयेंद्र रमोला के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष व क्षेत्रीय विधायक प्रेमचंद अग्रवाल की आवास के समीप सांकेतिक धरना दिया। सुरक्षा को देखते हुए यहां पुलिस बल तैनात किया गया है।
धरना देने वालों में नगर अध्यक्ष विनय सारस्वत, कार्यकारी अध्यक्ष शिव मोहन मिश्रा, मधु जोशी,विमला रावत, वीरेंद्र सजवाण, अरविंद जैन, मनोहरलाल चावला, विनोद चौहान, राजेश व्यास ,अब्दुल रहमान आदि शामिल हुए।

घर में घुसा मगरमच्छ, 10 घंटे बाद आई विभाग की टीम

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सोमवार की देर रात अलावलपुर गांव में एक विशालकाय मगरमच्छ ग्रामीण के घर में घुस गया। आधी रात के करीब लघुशंका के लिए उठे मकान मालिक की नजर उस पर पड़ी तो उसके होश उड़ गए। ग्रामीणों ने इसकी जानकारी वन विभाग को दी, लेकिन रात में वन विभाग के किसी कर्मचारी ने गांव में जाने की जहमत नहीं उठाई।

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हरिद्वार के तटीय इलाकों में बरसात शुरू होते ही जलीय जंतुओं का आबादी में घुसने का सिलसिला शुरू हो गया है। सोमवार की रात में लक्सर कोतवाली क्षेत्र के अलावलपुर गांव निवासी नरेंद्र के घर में एक विशालकाय मगरमच्छ घुस आया। आधी रात के लगभग नरेंद्र लघुशंका के लिए उठा तो चारपाई के पास पड़े विशालकाय मगरमच्छ को देखकर उसके होश उड़ गए। उसने भागकर जान बचाई और शोर मचाया। शोर शराबा सुनकर घर में सो रहे अन्य लोग व आस पड़ोस के ग्रामीण भी मौके पर आ गए। मौके पर ग्रामीणों ने लाठी-डंडों से हांका लगाकर मगरमच्छ को खदेड़ने की कोशिश की तो वह ग्रामीणों की पर झपट पड़ा।

इस बीच मगरमच्छ ने घर के एक पालतू कुत्ते पर भी हमला बोल दिया। नरेंद्र ने इसकी जानकारी वन विभाग के अधिकारियों को दी। ग्रामीणों के मुताबिक पूरी रात मगरमच्छ उनके घर में ही घुसा रहा, लेकिन वन विभाग के किसी भी अधिकारी ने रात में पहुंचकर मगरमच्छ को काबू करने की जहमत नहीं उठाई। इसके चलते ग्रामीण रातभर खौफ के साए में रहे। मंगलवार सुबह वन विभाग की टीम गांव पहुंच कर ग्रामीणों के साथ मिलकर मगरमच्छ पर काबू पाया।

वन क्षेत्राधिकारी दिगंबर भारती का कहना है कि विभाग के कर्मचारी की मौत हो जाने के कारण विभाग के सभी अधिकारी व कर्मचारी उसके अंतिम संस्कार के लिए गए थे।इसकी वजह से टीम को गांव में पहुंचने में समय लगा है। मंगलवार सुबह गांव पहुंचकर मगरमच्छ को पकड़कर सुरक्षित जल क्षेत्र गंगा नदी में छोड़ दिया गया है।

शो पीस बन कर रह गईं कल्प गंगा पर लगीं ट्राॅलियां

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वर्ष 2013 की आपदा के बाद क्षतिग्रस्त पुलों और मार्गों की स्थिति को देखते हुए सरकार ने गधेरों, नदियों पर आवाजाही के लिए आधा दर्जन ट्राॅली लगायी, मगर इन ट्राॅलियों की हालत उर्गम घाटी में जर्जर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह ट्राॅली जब से लगी है तब से शो पीस बन कर रह गई है। 2013 की आपदा में चमोली जिले की उर्गम घाटी में भी बहुत नुकसान हुआ। पुल पुलिया संपर्क मार्ग टूट गये थे। यहां बहने वाली कल्प गंगा पर लोनिवि ने कल्प गंगा से मंदिर तक जाने के लिए 25 लाख रुपये की लागत से ट्राॅली का निर्माण किया था।

ग्रामीण रघुवीर सिंह नेगी कहा है कि जब से यह ट्राॅली लगी है शो पीस बनकर रह गई। लाखों रुपया खर्च हो गया पर जिस प्रयोजन से ट्राॅली लगी वह प्रयोजन पूरा हुआ ही नहीं। अभी भी लोगों को फिसलन भरे रास्तों से मंदिर जाना होता है। नदी पर लकड़ी का एक पुल है जो नदी के बढ़ने पर कभी भी बह सकता है।

लोनिवि के अधिशासी अभियंता धन सिंह रावत बताया कि ट्राॅली संचालित हो रही है। हाल ही में हमारे उस क्षेत्र के अवर अभियंता इस ट्राॅली से इसपार से उस पार गये थे। यदि ग्रामीणों की कोई शिकायत है तो उसे भी देखा जायेगा। नदी स्थायी व्यवस्था के लिए विश्व बैंक द्वारा पुल का निर्माण किया जा रहा है।

उच्च शिक्षा : न सुविधा न संसाधन, कैसे सुधरेगी गुणवत्ता

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आंकड़ों पर गौर करें तो राज्य में उच्च शिक्षा की तस्वीर बेहद अच्छी नजर आती है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। गुणवत्ता के लिहाज से हालात बेहद खराब हैं। बीते दिनों एक कार्यक्रम में उच्च शिक्षा मंत्री के बयान ने भी इस ओर इशारा किया। बीते कुछ वक्त में धड़ाधड़ संस्थान खोले गए, लेकिन इनमें सुविधाओं और मानव संसाधन को लेकर कोई गंभीरता नजर नहीं आती। ऐसे में बेहतर रिजल्ट और क्वॉलिटी एजुकेशन का सपना अभी भी दूर की कौड़ी नजर आता है।
राज्य गठन के बाद 17 साल में राज्य में उच्च शिक्षण संस्थानों की संख्या में पांच गुना इजाफा हुआ। राज्य में नामांकन (एनरोलमेंट) की स्थिति भी सुखद अहसास कराती है। उत्तराखंड में उच्च शिक्षा में नामांकन 3.10 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर केवल 1.90 प्रतिशत। एक करोड़ की आबादी वाले उत्तराखंड में आईआईटी, आईआईएम, आईआईपी, एनआईटी, एफआरआई समेत 28 बड़े उच्च शिक्षा संस्थान हैं। वहीं, निजी, सरकारी, अर्ध सरकारी समेत तमाम तरह के उच्च शिक्षा संस्थानों की कुल संख्या तकरीबन 465 है। राज्य गठन के वक्त यह आंकड़ा महज 90 था। यह तस्वीर का एक पहलू है, जो बेहद उजला नजर आता है, लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू काफी स्याह है।
राज्य में धड़ाधड़ संस्थान तो स्थापित किए गए, लेकिन इनमें गुणवत्ता का ध्यान नहीं रखा गया। स्थिति यह है कि 99 राजकीय महाविद्यालयों में 44 के पास भवन नहीं है और 20 प्रतिशत के पास जमीन। इनमें से 10 से ज्यादा महाविद्यालय ऐसे हैं, जिनमें 100 छात्र भी नहीं पढ़ रहे। वहीं, इन महाविद्यालयों पर सालाना खर्च एक से डेढ़ करोड़ रुपये आ रहा। ऐसे में प्रति छात्र एक से डेढ़ लाख रुपये सरकारी राशि खर्च किए जाने के बावजूद क्वॉलिटी एजुकेशन नहीं मिल पा रही। वहीं, राज्य के राजकीय महाविद्यालयों में स्वीकृत लगभग 1800 पदों में दो तिहाई खाली हैं। विश्वविद्यालयों के हालात इससे भी बदतर हैं। एकमात्र उत्तराखंड संस्कृत यूनिवर्सिटी के अलावा किसी भी यूनिवर्सिटी के पास स्थायी कुलसचिव तक नहीं है। अन्य पद भी या तो खाली हैं या जुगाड़ से भरे गए हैं।
सिर्फ दो संस्थानों को मिली जगह
राज्य के उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन कराने वालों की तादाद भले ही बढ़ी है लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हुआ है। इसका खुलासा एनआईआरएफ ने किया है। बता दें कि यह भारत सरकार की एक ऐसी संस्था तो पूरे देश में शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता तय करती है। एनआईआरएफ की रैंकिंग फ्रेमवर्क में उत्तराखंड के सिर्फ दो संस्थान आईआईटी रुड़की और आईआईएम काशीपुर को छोड़कर कोई भी संस्थान टाॅप 100 में भी अपनी जगह नहीं पाया।
ऐसे हैं विश्वविद्यालयों के हालात
– श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के पास न अपना भवन और न ही पर्याप्त कार्मिक।
– कुमाऊं विश्वविद्यालय भी मानव संसाधन की कमी से अछूता नहीं।
– उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परिनियमावली ही अस्तित्व में नहीं आ पाई।
– एचएनबी चिकित्सा शिक्षा विश्वविद्यालय के पास भी न भवन है और न ही कार्मिक।
– आयुर्वेद विश्वविद्यालय संक्रमण काल से गुजर रहा।
– औद्यानिकी और संस्कृत विश्वविद्यालय भी जुगाड़ तंत्र से चल रहा
– दून विश्वविद्यालय में राजनीति हावी है जो शिक्षा व्यवस्था को गर्त में ले जा रहा है।
– उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय बेहद कम कार्मिकों के साथ छात्रों का भविष्य तय करने की ओर अग्रसर।
उच्च शिक्षा आंकड़ों के आईने में
संस्था-2000-2017
राजकीय महाविद्यालय-34-99
राज्य विश्वविद्यालय-03-10
बड़े उच्च शिक्षा संस्थान-06-28
निजी समेत कुल संस्थान-90-465
मौजूदा स्थिति
कुल महाविद्यालय-99
भवन विहीन-44
भूमि विहीन-19
शैक्षिक पद-1800 (लगभग)
रिक्त पद-684 विज्ञापित
अन्य रिक्त-600 (लगभग)
राज्य विश्वविद्यालय-10
स्थायी कुलसचिव-02 (एक प्रतिनियुक्ति पर राज्य से बाहर)
अन्य पद-लगभग 50 प्रतिशत पद खाली या जुगाड़ से भरे गए।
नामांकन की स्थिति (सितंबर 2014 तक)
उच्च शिक्षा में नामांकन- 3.10 लाख (राष्ट्रीय औसत से लगभग डेढ़ गुणा)
छात्राओं का नामांकन- 40 प्रतिशत
यूनिवर्सिटी के लिए भूमि का आवंटन हो गया है। बीते कुछ वक्त में काफी परेशानियां आई। अब जल्द ही स्थाई कैंपस का कार्य शुरू हो जाएगा। मानव संसाधन भी नहीं है। कम संसाधन में भी बेहतर का प्रयास जारी है। महज पांच स्थाई लोगों के साथ एक लाख छात्रों की परीक्षा कराई जा रही है।
-डॉ. यूएस रावत, वाइस चांसलर, श्रीदेव सुमन यूनिवर्सिटी उत्तराखंड

यूजीसी के मानकों पर फेल राज्य के उच्च शिक्षण संस्थान

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यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) अब हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज का रिपोर्ट कार्ड तैयार करेगी। इसके लिए संस्थानों के संसाधनों और सुविधाओं के आधार पर नंबर भी दिए जाएंगे। यह नंबर नैक एक्रिडिटेशन के ग्रेड, साफ-सफाई व अन्य मानकों के आधार पर तय किए जाएंगे. आयोग की ओर से संस्थानों को इसे लेकर निर्देश पहले ही जारी कर दिए गए हैं। लेकिन, प्रदेशभर के हायर एजुकेशन संस्थानों की बात की जाए तो आयोग के तमाम मानकों की परीक्षाओं में यहां के तकरीबन सभी संस्थान फेल साबित होंगे।
यूजीसी ने समय समय पर मानकों के अनुरूप संस्थानों सं सविधाओं और संसाधनों को लेकर जानकारी मांगता रहता है। इन्हीं बिंदुओं पर यूनिवर्सिटीज और कॉलेज को जानकारी देनी होगी।
अयोग ने विभिन्न मानकों के आधार पर संस्थानों के लिए कुल सौ नंबर तय किए गए हैं। इसमें सबसे ज्यादा नंबर नैक एक्रिडिटेशन के लिए 20 नंबर तय किए गए हैं। इसके अलावा आयोग के नए नियम के अनुसार संस्थानों को अन्य सुविधाओं और संसाधनों के लिए भी नंबर दिए जाएंगे। अब जो कॉलेज इन नियमों के अंतर्गत खरा नहीं पाया जाएगा, उनको यूजीसी से प्रदान की जाने वाली फंडिंग से भी हाथ धोना पड़ेगा।
सुविधाओं और संसाधानों की बात करें तो राज्य की तमाम यूनिवर्सिटी और अन्य शिक्षण संस्थान अलग-अलग परेशानियां झेल रहे हैं। इनमें परेशानियों से हटकर सबसे बड़ी परेशानी छात्र-शिक्षक अनुपात है। तकरीबन सभी यूनिवर्सिटीज में छात्रों की संख्या में मुताबिक शिक्षक नहीं है। ऐसे में यूजीसी के मानक पूरा करना सभी यूनिवर्सिटी के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। इसके अलावा वाई फाई कैंपस, स्मार्ट कैंपस आदि मामले में भी यूनिवर्सिटी और कॉलेज फेल साबित होंगे। उत्तराखंड तकनीकि विश्वविद्यालय में जहां वाई फाई कैंपस दूर की कौड़ी है तो वहीं श्री देव सुमन यूनिवर्सिटी के कैंपस का ही कुछ अता पता नहीं। ग्रांट के मामले में भी कई यूनिवर्सिटी पहले ही यूजीसी की फटकार खा चुकी हैं।
राज्य के सबसे बड़े कॉलेज डीएवी पीजी के की बात करें तो यहां तो सुविधाओं के नाम पर छात्राओं के लिए शौचालय तक नहीं हैं, जो हैं वह भी इस हाल में कि उसके बाहर से भी छात्राएं गुजरने से बचती हैं। इसके अलावा कक्षाओं के हालात भी बदतर हालात में हैं। यही वजह है कि विभिन्न छात्र संगठन अव्यवस्थाओं को लेकर आए दिन आंदोलनरत रहते है। ऐसे में यूजीसी के तय मानकों की परीक्षा से गुजरते हुए यह सभी संस्थान कैसे अपना रिपोर्ट कार्ड बेहतर करेंगे यह समझ आसान है।
इस आधार पर आयोग देता है नंबर
– यूनिवर्सिटी व कॉलेजेज को नैक का एक्रिडिटेशन।
– यूनिवर्सिटी और कॉलेज में साफ-सफाई की व्यवस्था।
– संस्थानों में छात्रों की संख्या, शिक्षकों की संख्या और योग्यता।
– संस्थानों में छात्राओं के लिए पीने के लिए आरओ वाटर की व्यवस्था व एटीएम सुविधा।
– यूनिवर्सिटी और कॉलेजेज में फ्री वाई-फाई फेसिलिटी।
– संस्थानों की दीवारों पर छात्रों को प्रेरित करने वाले संदेश की व्यवस्था।
डा. उदय सिंह रावत, वाइस चांसलर, देव सुमन यूनिवर्सिटी ने बताया कि शिक्षा और गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए आयोग ने यह व्यवस्था की है। नंबर हासिल करने के लिए मानकों के मुताबिक सभी पायदान पार करने होंगे। हमारे पास अभी यूनिवर्सिटी कैंपस ही नहीं है। सुविधाओं और संसाधन के मामले में जो संस्थान बेहतर होंगे उन्हीं को फंडिंग होगी।

कुमाऊं विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर हमला कर रहे अमेरिकी हैकर

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कुमाऊं विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर अमेरिकी हैकर लगातार साइबर हमले कर रहे हैं। दो दिनों में 228 बार साइबर हमला कर वेबसाइट को क्षति पहुंचाने की कोशिश का खुलासा विश्वविद्यालय की तकनीकी टीम ने किया है। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन सकते में है। आशंका जताई गई है कि यह एडमिशन की ऑनलाइन प्रक्रिया का विरोध कर रहे लोगों की साजिश हो सकती है।

आइआइटी रुड़की के विशेषज्ञों की देखरेख में सॉफ्टवेयर तैयार कराने वाले डॉ. महेंद्र राणा ने सोमवार को कुलपति प्रो. डीके नौडियाल को सौंपी रिपोर्ट में बताया है कि एडमिशन वेबसाइट पर 19 जून को अमेरिका से 128 साइबर हमले किए गए थे। पहले दिन इसे किसी हैकर की शरारत मानकर मामले को नजरअंदाज किया गया, लेकिन सोमवार को फिर अमेरिका में बैठे हैकर ने सुबह से दोपहर तक वेबसाइट पर 100 बार हमला कर प्रोग्रामिंग को क्षति पहुंचाने की कोशिश की।

ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया का हो रहा विरोध: विवि प्रशासन ने पहली बार कुमाऊं विवि व संबद्ध परिसरों के लिए ऑनलाइन प्रवेश प्रक्रिया शुरू कराई है। इसके लिए 15 जून को वेबसाइट लांच की गई थी। कुछ छात्र संगठन इस प्रक्रिया का विरोध कर रहे हैं। चर्चा है कि विवि के कुछ लोग भी नहीं चाहते कि प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन हो। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि पहाड़ के दुर्गम, दूरस्थ क्षेत्र जहां नेटवर्क की सुविधा नहीं है, वहां के छात्रों के लिए यह प्रणाली सिरदर्द है।

मामले में विधिक कार्रवाई भी की जाएगी: कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डीके नौडियाल ने कहा कि विवि की वेबसाइट पर साइबर अटैक की जानकारी मिली है। सॉफ्टवेयर तैयार करने में पूरी सावधानी बरती गई है। दूरस्थ क्षेत्रों के महाविद्यालयों के प्राचार्यों से साइबर हमलों के चलते पेश आई दिक्कतों के बारे में जानकारी ली जा रही है। इस मामले में विधिक कार्रवाई भी की जाएगी। 4500 ने लिया ऑनलाइन पंजीकरण तमाम विरोध व वेबसाइट पर हैकरों के हमलों के बावजूद अब तक चार हजार पांच सौ छात्रों ने ऑनलाइन एडमिशन के लिए पंजीकरण करा लिया है।

उक्रांद में प्राण फूंकने की तैयारी

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प्रदेश के विधानसभा चुनाम में बुरी तरह से जनाधार खो चुके उत्तराखण्ड क्रांति दल में प्राण फूंकने के लिए एक बार फिर कवायद शुरू हो गई है। उत्तराखंड क्रांति दल के केंद्रीय अध्यक्ष दिवाकर भट्ट पार्टी के बड़े नेताओं के साथ मिलकर रणनीति पर काम कर रहे हैं। उक्रांद अपने आंदोलन की शुरुआत श्रीयंत्र टापू से करने की रणनीति बना रही है। राज्य आंदोलन के वक्त इसी स्थान से आंदोलन का रुख बदल गया था। उत्तराखंड क्रांति दल का अब केवल राज्य में नाम ही शेष है। कई बार टूट चुकी पार्टी एक बार फिर साथ खड़ी हुई है। केंद्रीय अध्यक्ष दिवाकर भट्ट पार्टी एक बार फिर दल को पुनर्जीवित करने के लिए ऑक्ससीजन तलाश रहे हैं। पार्टी के अंदर से आ रही खबरों की मानें तो दिवाकर भट्ट एक बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं। जिससे सरकार के साथ ही प्रदेश की जनता निसंदेह आश्चर्यचकित हो सकती है।

सोमवार को हुई पत्रकार वार्ता में दिवाकर भट्ट ने इसके संकेत तो दिए। लेकिन अपनी रणनीति बताने से परहेज किया। उन्होंने आगाह किया कि जिस तरह से उत्तराखंड आंदोलन के दौरान श्रीयंत्र घटना की किसी को भनक नहीं थी, लेकिन उस घटना ने राज्य के आंदोलन का रुख ही बदल दिया था उसी तरह अब उक्रांद फिर से राज्य की समस्याओं को लेकर आंदोलन खड़ी करने की तैयारी में है। राजधानी गैरसैंण, शराब बंदी, परिसंपत्ति बंटवारा, किसानों के ऋण माफ़ी और खनन में स्थानीय लोगों की भागेदारी जैसे कई मुद्दों को लेकर उक्रांद मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। सूत्रों की मानें तो जिलों के बाद केंद्रीय संगठन के पुनर्गठन होते ही गैरसैण से उक्रांद बिगुल फूंकने की तैयारी कर रहा है। ज़िलों की कार्यकारिणी गठन के बाद केंद्रीय संगठन बनते ही गैरसैंण में महामंथन या महारैली के साथ ही आंदोलन का आगाज हो सकता है।


पार्टी सूत्रों के अनुसार केंद्रीय नेतृत्व का गठन 25 जुलाई तक हो सकता है। पार्टी अध्यक्ष दिवाकर भट्ट ने राज्य को पांच लोकसभा क्षेत्रों में बांट कर पार्टी के बड़े नेताओं को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है। अल्मोड़ा की जिम्मेदारी काशी सिंह ऐरी, नैनीताल डॉ. नारायण सिंह जंतवाल, पौड़ी शक्ति शैल कपरुवाण, टिहरी त्रिवेंद्र पंवार तो हरिद्वार बीड़ी रतूड़ी संभालेंगे।

हिमाचल के मुख्यमंत्री ने सपरिवार बद्रीनाथ ​के किये दर्शन

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हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने सपरिवार मंगलवार को सुबह भगवान बद्रीनाथ के दर्शन कर पूजा-अर्चना किये। इस दौरान बद्री-केदार मंदिर समिति की ओर से मुख्यमंत्री को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया।
मंगलवार को मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह राज्य सरकार के हेलीकाॅप्टर से सुबह सवा दस बजे के करीब बद्रीनाथ पहुंचे। सीएम के साथ उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह सहित परिवार के पांच अन्य सदस्य थे। दर्शन के पश्चात सीएम अतिथि गृह पहुंच कर जलपान किया। हिमाचल से पहुंचे तीर्थयात्रियों ने अपने राज्य के मुख्यमंत्री और उनके परिवार जनों का स्वागत किया

अली अब्बास की अगली फिल्म में होंगे सलमान

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सलमान खान अपनी नई फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ के साथ जहां ईद की खुशियां मना रहे हैं, वहीं उनके नाम एक और नई फिल्म की खबर आई है। खबर ये है कि ‘सुल्तान’ के निर्देशक अली अब्बास जाफर के साथ सलमान की एक और फिल्म की योजना बन रही है, जिसका निर्माण सलमान के बड़े बहनोई अतुल अग्निहोत्री करेंगे।

अतुल इससे पहले सलमान की फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ के निर्माता रह चुके हैं। अली अब्बास जाफर के साथ सलमान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा है’ इन दिनों निर्माणाधीन है। यशराज की फिल्म ‘एक था टाइगर’ की सीक्वल के तौर पर बन रही इस फिल्म में सलमान और कटरीना कैफ की जोड़ी को दोहराया जा रहा है।
अतुल अग्निहोत्री के प्रोडक्शन में बनने जा रही ये फिल्म भी ‘बॉडीगार्ड’ की तरह एक तेलुगू फिल्म का रीमेक बताया गया है, जिसमें सलमान के साथ कटरीना की जोड़ी ही काम करेगी। इसका संकेत अतुल ने देते हुए कहा है कि वे अपने निर्देशन में भी एक कहानी पर काम कर रहे हैं, जिसमें वे सलमान को कास्ट करना चाहते हैं, लेकिन ये फिल्म बाद में शुरू होगी।
अतुल ने खुद के फिल्म में काम करने की संभावना से मना किया है और कहा है कि वे सिर्फ प्रोडक्शन तक ही रहेंगे। इस बीच ‘दबंग-3’ को लेकर भी खबर आ रही है कि प्रभुदेवा ने इसका निर्देशन करने की पेशकश को मंजूर कर लिया है।
फिल्म ‘वॉन्टेड’ में सलमान को निर्देशित कर चुके प्रभुदेवा इसे भी अपनी एक तमिल फिल्म के रीमेक के तौर पर बनाएंगे और इस बार कहानी में कई बड़े बदलाव होंगे, जिनमें मक्खी (अरबाज) और रज्जो (सोनाक्षी सिन्हा) के किरदारों को नहीं रखा जाएगा। अरबाज फिल्म के निर्माता रहेंगे, जिन्होंने ‘दबंग-2’ का निर्देशन किया था।