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पहाड की लाईफ लाईन पर संकट

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जीवनदायिनी कौशकी, यानि कोसी नदी का अपना ही जीवन संकट में है। हालात इतने विकट हो चुके हैं कि उच्च पर्वतीय इलाकों में अच्छी खासी बारिश के बावजूद कोसी बेदम सी है। योजनाकारों की चूक तथा शोध वैज्ञानिकों के राय सुझाव पर अमल नहीं करने का ही नतीजा है कि कभी सदावाहिनी का जलप्रवाह भविष्य की भयावह तस्वीर पेश कर रहा। ग्रीष्म ऋतु में कोसी का जलप्रवाह न्यून स्तर यानी 50 लीटर प्रति सेकेंड पहुंच गया है। जबकि न्यूनतम प्रवाह किसी दौर में 1000 से भी अधिक रहा। इससे चिंतित शोध वैज्ञानिक कोसी नदी पुनर्जनन प्राधिकरण की पुरजोर वकालत करने लगे हैं।

पहाड़ की लाइफ लाइन कोसी संकटग्रस्त नदियों की सूची में शामिल हो गई है। लगभग 50 साल पहले तक सदावाहिनी नदियों की कुल लंबाई तब 225.6 किमी थी। मगर कालांतर में नदियों के पुनर्जनन को ठोस कदम नहीं उठाए जाने से ये सभी सूख कर मौसमी नदियों में बदल गई हैं। नतीजा, वर्तमान में लंबाई घटकर महज 41.5 किमी रह गई है। मौजूदा हालात इतने बिगड़ा चुके हैं कि कोसी का जलप्रवाह ग्रीष्म ऋतु में 50 लीटर प्रति सेकेंड जा पहुंचा है। चिंता इसलिए भी कि जून में अच्छी खासी वर्षा के बावजूद यह आंकड़ा मात्र 150 लीटर प्रति सेकेंड है, जो बेहद खतरनाक संकेत हैं।

कोसी का उद्गम कौसानी की उच्च पहाडि़यों पर उत्तर-पश्चिम में भाटकोट (भरतकोट) स्थित ‘धार पानी धार’ है। यहां से कभी कोसी की 22 सहायक नदियां निकलती थी। इनमें कौशल्या गंगा, देवगाढ़, रुद्रगंगा व पिनाथ आदि मुख्य हैं जो चनौदा (सोमेश्वर) में मिलकर कोसी के रूप में रामनगर (नैनीताल) को तर करती है। मगर अब अंतिम सांस गिन रही।

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वर्ष 1992 से कोसी बचाने के लिए शोध में जुटे निदेशक नेचुरल रिसोर्सेज डाटा मैनेजमेंट सिस्टम इन उत्तराखंड (कुमाऊं विवि) एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. जीवन सिंह रावत कहते हैं, करीब 25 वर्ष पूर्व कोसी जलागम का न्यूनतम जल प्रवाह 790 लीटर प्रति सेकेंड था। तब प्रो. रावत ने साल दर साल सूखती जा रही कोसी के पुनर्जनन को कार्ययोजना बनाई। अब जाकर जिला प्रशासन, उद्यान, सिंचाई आदि विभागों ने दिलचस्पी दिखाई है। इसी आधार पर प्रो. रावत ने कोसी पुनर्जनन के लिए ‘हेडवॉटर यांत्रिक एवं जैविक ट्रीटमेंट’ प्रोजेक्ट को बीते दिनों अल्मोड़ा पहुंचे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को रूबरू कराया। गैरहिमानी कोसी की बदहाली से संबंधित प्रस्तुति भी दी। साथ ही उन्होंने कोसी नदी पुनर्जनन प्राधिकरण गठित करने का सुझाव भी दिया।

वैज्ञानिक एसएसजे परिसर अल्मोड़ा प्रो. जेएस रावत ने बताया कि कोसी में चेकडैम बनाने से कोई लाभ नहीं। कोसी के पुनर्जनन को उद्गम स्थल से ऊपर रिचार्ज जोन पर जैविक व यांत्रिक उपाय करने होंगे। समय रहते शिखर पर ही चाल-खाल व पोखर बनाने होंगे, तो ही मानसून का वर्षाजल भूगर्भीय जलभंडार तक स्टोर किया जा सकेगा। कोसी नदी के गिरते जलप्रवाह को हल्के में लेना घातक साबित होगा। इसीलिए कोसी को बचाने की जवाबदेही तय करने को पुनर्जनन प्राधिकरण की सख्त जरूरत है। आगे पृथक मंत्रालय की भी जरूरत पड़ेगी।

अब लाइव देख सकेंगे हरकी पौड़ी की ”गंगा आरती”

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हरकी पैड़ी पर विश्वस्तरीय व्यवस्थाएं और उसके सौंदर्यीकरण की नए सिरे से योजना बनाई जा रही है। इसके तहत एलईडी के जरिये अन्य गंगा घाटों पर नित्य होने वाली गंगा आरती का प्रसारण होगा। नगर निगम सीमा क्षेत्र में रेलवे स्टेशन तक ध्वनि विस्तारक यंत्रों से प्रसारण भी किया जाएगा। हरकी पैड़ी पर गंगाद्वार बनाया जाएगा।

दिव्यांगों के लिए अलग व्यवस्था होने के साथ-साथ आने व जाने की भी अलग व्यवस्था किए जाने की तैयारी है। हरिद्वार सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक श्रीगंगा सभा के साथ मिलकर इस योजना को अमलीजामा पहनाएंगे।

इसके लिए धन की व्यवस्था केंद्र और राज्य की विभिन्न योजनाओं और निजी सहयोग से की जाएगी। हरकी पैड़ी पर विश्वस्तरीय यात्री सुविधाओं संग उसे कचरामुक्त बनाने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

श्रीगंगा सभा के समाज कल्याण मंत्री आशुतोष शर्मा ने बताया कि पिछले दिनों निशंक ने हरिद्वार में मोदी फेस्ट का उद्घाटन करने के बाद इस संदर्भ में श्रीगंगा सभा के पदाधिकारियों के साथ इस पर चर्चा की थी।

देश में दूसरा सबसे लोकप्रिय खेल बना कबड्डी

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प्रो कबड्डी लीग क्रिकेट के बाद देश में टीवी पर देखा जाने वाला दूसरा सबसे लोकप्रिय खेल बन गया है। क्रिकेट और कबड्डी के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो आईपीएल में आठ टीमों ने अपने 10 सत्र में लगभग 60 मैच खेले, जबकि प्रो कबड्डी के पिछले सत्र में आठ टीमों ने 65 मैच खेले थे।

इस बार टूर्नामेंट जुलाई से अक्टूबर तक 13 सप्ताह चलेगा जिसमें 12 टीमें 130 से ज्यादा मैच खेलेंगी। पिछले चौथे सत्र में आठ टीमें थीं और पांच सप्ताह तक 65 मैच खेले गये थे। इस बार टूर्नामेंट में तमिलनाडु, गुजरात, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से चार नयी टीमों को जोड़ा गया है।

प्रो कबड्डी लीग के आयोजकों ने दर्शक क्षमता और प्रायोजकों को लेकर कुछ आंकड़े भी जारी किये हैं। टूर्नामेंट के दूसरे सत्र में जहां लीग के पास नौ प्रायोजक थे, वहीं पांचवें सत्र में उसके प्रायोजकों की संख्या बढ़कर 24 पहुंच गयी है जो आईपीएल की बराबरी करती है।

 पिछले साल हुई महिला कबड्डी लीग की टीवी पर दर्शक क्षमता 2016 के यूरो कप फुटबॉल से कहीं अधिक थी। इसके अलावा गत वर्ष अहमदाबाद में हुये कबड्डी विश्वकप को 11 करोड़ 40 लाख लोगों ने टीवी पर देखा था जिससे यह देश का दूसरा सबसे बड़ा खेल बन गया है।

फीफा अंडर-17 विश्व कप मैच मुंबई की जगह दिल्ली में

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अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (एआईएफएफ) फीफा अंडर-17 विश्व कप मैच मुंबई से हटाकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कराने को तैयार है।

एआईएफएफ शुरू में चाहता था कि भारत के घरेलू मैचों की मेजबानी मुंबई करे लेकिन बाद में उसने खेल मंत्रालय के दबाव के कारण फीफा से इन मैचों को दिल्ली में आयोजित करने को कहा। खेल मंत्रालय को लगता है कि राजधानी में घरेलू टीम के मैचों का आयोजन किया जाए।

यह पूछने पर कि क्या उसने भारत के राउंड रोबिन मैच मुंबई से दिल्ली कराने को अंतिम रूप दे दिया है तो फीफा के टूर्नामेंट प्रमुख जैमी यार्जा ने कहा कि हम टूर्नामेंट के लिए सबसे फायदेमंद फैसलों पर काम कर रहे हैं। हम भारत सरकार के आग्रह को बड़ी गंभीरता से ले रहे हैं क्योंकि फीफा अंडर-17 विश्व कप के आयोजन में वह हमारी मुख्य साझीदार है।

बतौर मेजबान भारत को ग्रुप ए में रखा जायेगा और 4 टीम के ग्रुप में नंबर एक “ए1” टीम होगी। ग्रुप ए के मैचों की मेजबानी नवी मुंबई को करनी थी लेकिन एआईएफएफ के आग्रह का मतलब है कि दिल्ली अब इन मैचों की मेजबानी कर सकती है जबकि नवी मुंबई को ग्रुप बी मैच पर ही संतोष करना होगा।

एक जुलाई से केंद्रीय कर्मचारियों की बल्ले-बल्ले

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मॉनसून दस्तक देने वाली है और खुशियों की बौछार में भींगने के लिए सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों को एक अनुपम सौगात दी है। अब लगभग 47 लाख सरकारी कर्मचारियों को बढ़ा हुआ भत्ता 1 जुलाई से मिलने लगेगा।सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले भत्ते में सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के आधार पर बदलाव के प्रस्ताव को मंज़ूरी मिलने से सरकार पर कुल 30,748 करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ेगा।
उल्लेखनीय है कि सातवें वेतन आयोग से पहले केंद्रीय कर्मचारी 196 किस्म के अलाउंसेस के हकदार थे, लेकिन सातवें वेतन आयोग ने कई अलाउंसेस को समाप्त कर दिया या फिर उन्हें मिला दिया था, जिसके बाद केवल 55 अलाउंस बाकी रह गए थे। कर्मचारियों को कई अलाउंस समाप्त होने का मलाल था।
सरकार ने वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी, 2016 से लागू करने का ऐलान किया था, लेकिन वेतन आयोग की कई सिफारिशों के बाद केंद्रीय कर्मचारियों ने कई मुद्दों पर अपनी आपत्ति जताई थी। इन मुद्दों में अलाउंसेस को लेकर विवाद भी था। भत्तों के साथ कई मुद्दों पर असहमति होने की वजह से यह सिफारिशें पूरी तरह से लागू नहीं हो पाईं थीं।

परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर जुलाई में बैठक

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उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर जुलाई में दोनों प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों की बैठक होगी। इस बैठक में राज्य गठन के बाद से ही परिसंपत्ति बंटवारे के लंबित मुद्दों के सुलझने के आसार है। हालांकि अभी इस बैठक की तिथि तय नहीं है लेकिन इससे पहले एक जुलाई को दोनों प्रदेशों के मुख्यसचिवों के बीच बैठक होनी प्रस्तावित है। इस बैठक में 18 से अधिक विभागों की परिसंपत्ति व देनदारी पर चर्चा की जाएगी।

उत्तराखंड के अलग राज के बाद से ही परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर विवाद चल रहा है। दरअसल, उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग कर नया राज्य बनाया गया तो यहां की प्रशासनिक और आर्थिक व्यवस्था को चलाने के लिए दोनों के बीच परिसंपत्तियों का बंटवारा हुआ। इस बंटवारे के बाद भी उत्तराखंड के कई विभागों को उनकी पूरी परिसंपत्ति नहीं मिल पाई। इसका कारण दोनों प्रदेशों के बीच विवाद रहा। यहां तक कि कुछ मामले न्यायालय में भी विचाराधीन हैं। प्रदेश में आने वाली कई सरकारों ने इस दिशा में पहल की, लेकिन बात बहुत आगे नहीं बढ़ पाई।

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद अब इस दिशा में सकारात्मक पहल हुई है। इससे दोनों राज्यों के बीच वर्षो से लंबित परिसंपत्तियों के बंटवारे को लेकर चल रहे विवाद के समाधान की उम्मीद भी जगी है। दरअसल, मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के कुछ समय बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत उत्तर प्रदेश गए और वहां के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से मुलाकात की। दोनों के बीच परिसंपत्ति बंटवारे में आ रही दिक्कतों के समाधान को लेकर एक बैठक भी हुई। उसके बाद इस दिशा में सकारात्मक कदम भी उठे। हाल ही में उत्तर प्रदेश ने 33 नहरों व कुछ सरकारी कार्यालयों से अपना कब्जा छोड़ दिया है।

दोनों प्रदेशों के मुख्य सचिवों और फिर मुख्यमंत्रियों के बीच होने वाली बैठक को देखते हुए शासन में इन दिनों तेजी से काम चल रहा है। मुख्य सचिव एस रामस्वामी स्वयं विभागों के साथ एक दौर की बैठक कर चुके हैं। अब सभी विभागों को विवादित परिसंपित्तयों पर अपना पूरा होमवर्क कर दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया है, ताकि बैठक में विवादित बिंदुओं पर प्रदेश सरकार की ओर से पुरजोर पैरवी की जा सके।

विधवा पेंशन लेने को काट रहे दफ्तरों के चक्कर

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गरीब लोगों की आर्थिक रूप से सहायता प्रदान करने के लिए शुरू की गई योजनाओं का लाभ लेने के लिए उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। इसी तरह के मामले में ब्रहमपुरी व लोहियानगर की तीन महिलाएं सरकारी व्यवस्था से पीड़ित हैं। स्थिति यह है कि ये महिलाएं विधवा एवं वृद्धावस्था पेंशन के लिए महीनों से चक्कर काट रही हैं, लेकिन अब तक इनकी पेंशन शुरू नहीं हो पाई हैं। सिर्फ ये तीन ही नहीं, बल्कि दून में फिलहाल ऐसे दो सौ से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जो पेंशन के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। ब्रहमपुरी निवासी महेश्वरी देवी ने वृद्धावस्था पेंशन के लिए 15 जनवरी 2016 को आवेदन किया। आवेदन फार्म पर उन्होंने पटवारी, कानूनगो व तहसीलदार से रिपोर्ट भी लगवाई, लेकिन अब तक एसडीएम कार्यालय से आवेदन सत्यापित नहीं हुआ है। इस कारण उनकी पेंशन नहीं लग पाई है।
ऐसे ही लोहियानगर निवासी सुनीता देवी ने विधवा पेंशन के लिए पांच अक्टूबर 2016 को आवेदन किया, लेकिन इस फार्म पर भी एसडीएम के हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। महिला ने बताया कि नियमानुसार परिवार की आय चार हजार रुपये तक होनी चाहिए और उनके पास वर्तमान आय इतनी ही है, बावजूद इसके उनकी पेंशन नहीं लग पाई है। इसके अलावा ब्रहमपुरी क्षेत्र निवासी बीना देवी भी आवेदन फार्म लेकर पिछले छह महीने से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है, लेकिन अब तक उनके हाथ सिर्फ मायूसी के और कुछ नहीं लगा।
जिला समाज कल्याण अधिकारी अनुराघ शंखधर ने कहा कि पेंशन के लिए कुछ औपचारिकताएं जरूरी होती है। जैसे ही आवेदक उक्त औपचारिकताओं को पूरा कर आवेदन लाएंगे, वैसे ही उनकी पेंशन लगा दी जाएगी।

प्रदेशभर के स्कूलों का समय बदला

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स्कूलों में ग्रीष्मकालीन अवकाश के बाद नए सत्र की तैयारी शुरू हो गई है। शिक्षा विभाग ने भी अपनी ओर से कार्य आरंभ कर दिया है। इसी क्रम में बुधवार को शिक्षा विभाग के अधिकारियों की समीक्षा बैठक आयोजित हुई। बैठक में प्रदेश के प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में बच्चों के आवागमन में सुविधा को देखते हुए समय बदले जाने का निर्णय लिया गया।

बुधवार को शिक्षा निदेशालय में शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों की समीक्षा बैठक आयोजित की गई। जिसमें स्कूलों के संचालन व नए सत्र से जुड़े तैयारियों आदि पर विचार विमर्श किया गया। इस दौरान स्कूलों के संचालन समय में बदलाव किए जाने के प्रस्ताव भी रखे गए। जिसके बाद छात्र—छात्राओं की सहूलियत को देखते हुए समय को बदलने का निर्णय लिया गया। विभाग ने ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन सत्र के लिए अलग-अलग समय निर्धारित किया है। निदेशक प्राथमिक शिक्षा आरके कुंवर ने बताया कि बैठक में समय को लेकर बातचीत की गई। स्कूलों को एक जुलाई से विभाग द्वारा निर्धारित किए गए नए समय अनुसार ही कक्षाओं का संचालन करना होगा।
उन्होंने बताया कि प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को ग्रीष्मकालीन सत्र में सुबह आठ बजे से एक बजे तक और शीत कालीन सत्र में सुबह साढ़े नौ बजे से साढ़े तीन बजे तक कक्षाएं संचालित करनी होंगी। उन्होंने बताया कि इसे लेकर सभी जिलों के शिक्षा अधिकारियों को निर्देश भेजे जा चुके हैं। एक जुलाई से सभी स्कूलों को निर्देशों का पालन करना होगा।

उत्तराखंड के मंत्री अधिकारी पहुंचेंगे आप के घर

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अब जिला और तहसील स्तर पर जनता को सुशासन का अहसास कराया जाएगा। जिलों में हर महीने के पहले मंगलवार को तहसील दिवस आयोजित किए जाएंगे। जिलाधिकारी हर सोमवार को दो घंटे अपने कार्यालय में अनिवार्य रूप से जन समस्याओं की सुनवाई करेंगे। राज्य मंत्रिमंडल ने इन फैसलों के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तोहफा दिया। उन्हें पोती और नातिन की शादी के लिए दी जाने वाली धनराशि चार हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये की गई है।

मंत्रिमंडल की बैठक में सुशासन को केंद्र में रखकर कई फैसलों पर मुहर लगाई गई।मुख्यमंत्री के पास राज्य स्तर के बजाए जिलों और तहसील स्तर की समस्याएं भी पहुंच रही हैं। इसे देखते हुए तहसील स्तर पर जनता की समस्याओं के निराकरण की व्यवस्था करने का निर्णय हुआ। अब जिलों के प्रभारी मंत्रियों को प्रत्येक डेढ़ महीने में एक बार अनिवार्य रूप से संबंधित जिलों में डेरा डालना होगा। इससे जिला स्तरों पर नई योजनाओं का खाका खींचने, उनके क्रियान्वयन और उसे लेकर जनता के फीडबैक पर खुद प्रभारी मंत्री बारीकी से नजर रख सकेंगे।

सात जिलाधिकारियों को अब हर सोमवार को सुबह दस बजे से दोपहर 12 बजे तक अपने कार्यालयों में जन समस्याओं का निराकरण करना होगा। इस व्यवस्था को भी अनिवार्य किया गया है।

उच्च व चिकित्सा शिक्षा की तर्ज पर आयुष शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष की गई है। महिलाओं को पाबंदी के साथ रियायत बढ़ाई गई है। महिलाओं को 20 लाख के बजाए अब 25 लाख तक अचल संपत्ति की खरीद पर स्टांप शुल्क में 25 फीसद की छूट मिलेगी, लेकिन ये छूट जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही अनुमन्य होगी।

कैबिनेट के प्रमुख फैसले:

-स्वतंत्रता सेनानियों को तोहफा, पोती-नातिन की शादी को 50 हजार रुपये

-सुशासन का अहसास निचले स्तर पर कराने को हर माह पहले मंगलवार को तहसील दिवस

-प्रभारी मंत्री हर डेढ़ माह में जिलों में अनिवार्य रूप से डालेंगे डेरा

-डीएम प्रत्येक सोमवार सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक करेंगे जन समस्याओं का निराकरण

-आयुर्वेदिक शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष

-महिलाओं को 25 लाख तक अचल संपत्ति खरीद पर स्टांप ड्यूटी में छूट, जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही रियायत

बेरोजगारों की राजधानी बन रहा देहरादून

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केंद्र सरकार लगातार बेरोजगारी मिटाने के लिए स्टार्टअप इंडिया जैसी तमाम योजनाओं का आगाज किया गया।प्रदेश स्तर पर सरकारों ने रोजगार को लेकर वादे तो किए, लेकिन उन्हें अंजाम तक नहीं पहुंचाया। यही कारण है कि आज प्रदेश की राजधानी बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भरी पड़ी है। आलम यह है कि बीते दस सालों में प्रदेश में बेरोजगारों की फौज दोगुनी हो गई।

सरकारों के तमाम वादों की पोल एक आरटीआई के तहत मिली सूचना ने खोल कर रख दी। हालत ये है कि पिछले दस सालों में राज्य में बेरोजगारों की संख्या दोगुनी हो गई। राजधानी की बात करें तो यहां बेरोजगारों की संख्या राज्य में सबसे ज्यादा है। ये सारे आंकड़े आरटीआई के जरिये मांगी गई जानकारी से सामने आए हैं। डायरेक्टोरेट ऑफ ट्रेनिंग एंड एम्पॉयमेंट के मुताबिक अप्रैल 2017 तक राज्य में बेरोजगारों की संख्या 09 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। ये संख्या 9.23 लाख है। जबकि वो बेरोजगार अलग हैं, जिन्होंने एम्पॉयमेंट एक्सचेंज में अपना नाम दर्ज ही नहीं करा रखा है। अगर ऐसे युवाओं को भी बेरोजगारों की सूची में जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा कहीं अधिक हो जाएगा।
बेरोजगारी का आलम यह है कि हर साल संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। यह हम नहीं कह रहे, आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। हालांकि साल 2008 के मुकाबले साल 2009 में बोरोजगारों की संख्या में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई। लेकिन, इसके बाद बेरोजगारी के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। 2008 में राज्य में बेरोजगारों की संख्या 4.89 लाख थी जो 2009 में थोड़ी सी घटकर 4.88 लाख हो गई थी, लेकिन इसके बाद ये संख्या साल दर साल बढ़ती ही चली गई।
आंकड़ों की नजर में बेरोजगार
जिलेवार बेरोजगार
जिले-संख्या
देहरादून- 1,89,708
नैनीताल-99,660
ऊधमसिंह नगर-91,738
हरिद्वार-82,157
टिहरी-75,681
पिथौरागढ़-72,649
अल्मोड़ा-72,215
पौड़ी-64,890
चमोली- 48,119
उत्तरकाशी- 40,839
बागेश्वर-32,560
रुद्रप्रयाग- 27,491
चंपावत-25,658
वर्षवार बेरोजगारों के आंकड़े
वर्ष- संख्या (अप्रैल तक)
2008- 4,89,744
2009-4,88,789
2010-5,65,559
2011- 6,61,642
2012- 7,04,398
2013-7,51,024
2014- 8,62,279
2015-9,22,066
2016- 9,26,308
2017- 9,23,000