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उत्तराखंड के मंत्री अधिकारी पहुंचेंगे आप के घर

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अब जिला और तहसील स्तर पर जनता को सुशासन का अहसास कराया जाएगा। जिलों में हर महीने के पहले मंगलवार को तहसील दिवस आयोजित किए जाएंगे। जिलाधिकारी हर सोमवार को दो घंटे अपने कार्यालय में अनिवार्य रूप से जन समस्याओं की सुनवाई करेंगे। राज्य मंत्रिमंडल ने इन फैसलों के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को तोहफा दिया। उन्हें पोती और नातिन की शादी के लिए दी जाने वाली धनराशि चार हजार रुपये से बढ़ाकर 50 हजार रुपये की गई है।

मंत्रिमंडल की बैठक में सुशासन को केंद्र में रखकर कई फैसलों पर मुहर लगाई गई।मुख्यमंत्री के पास राज्य स्तर के बजाए जिलों और तहसील स्तर की समस्याएं भी पहुंच रही हैं। इसे देखते हुए तहसील स्तर पर जनता की समस्याओं के निराकरण की व्यवस्था करने का निर्णय हुआ। अब जिलों के प्रभारी मंत्रियों को प्रत्येक डेढ़ महीने में एक बार अनिवार्य रूप से संबंधित जिलों में डेरा डालना होगा। इससे जिला स्तरों पर नई योजनाओं का खाका खींचने, उनके क्रियान्वयन और उसे लेकर जनता के फीडबैक पर खुद प्रभारी मंत्री बारीकी से नजर रख सकेंगे।

सात जिलाधिकारियों को अब हर सोमवार को सुबह दस बजे से दोपहर 12 बजे तक अपने कार्यालयों में जन समस्याओं का निराकरण करना होगा। इस व्यवस्था को भी अनिवार्य किया गया है।

उच्च व चिकित्सा शिक्षा की तर्ज पर आयुष शिक्षा में कार्यरत शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष की गई है। महिलाओं को पाबंदी के साथ रियायत बढ़ाई गई है। महिलाओं को 20 लाख के बजाए अब 25 लाख तक अचल संपत्ति की खरीद पर स्टांप शुल्क में 25 फीसद की छूट मिलेगी, लेकिन ये छूट जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही अनुमन्य होगी।

कैबिनेट के प्रमुख फैसले:

-स्वतंत्रता सेनानियों को तोहफा, पोती-नातिन की शादी को 50 हजार रुपये

-सुशासन का अहसास निचले स्तर पर कराने को हर माह पहले मंगलवार को तहसील दिवस

-प्रभारी मंत्री हर डेढ़ माह में जिलों में अनिवार्य रूप से डालेंगे डेरा

-डीएम प्रत्येक सोमवार सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक करेंगे जन समस्याओं का निराकरण

-आयुर्वेदिक शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु सीमा 60 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष

-महिलाओं को 25 लाख तक अचल संपत्ति खरीद पर स्टांप ड्यूटी में छूट, जीवनकाल में सिर्फ दो बार ही रियायत

बेरोजगारों की राजधानी बन रहा देहरादून

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केंद्र सरकार लगातार बेरोजगारी मिटाने के लिए स्टार्टअप इंडिया जैसी तमाम योजनाओं का आगाज किया गया।प्रदेश स्तर पर सरकारों ने रोजगार को लेकर वादे तो किए, लेकिन उन्हें अंजाम तक नहीं पहुंचाया। यही कारण है कि आज प्रदेश की राजधानी बेरोजगार युवाओं की भीड़ से भरी पड़ी है। आलम यह है कि बीते दस सालों में प्रदेश में बेरोजगारों की फौज दोगुनी हो गई।

सरकारों के तमाम वादों की पोल एक आरटीआई के तहत मिली सूचना ने खोल कर रख दी। हालत ये है कि पिछले दस सालों में राज्य में बेरोजगारों की संख्या दोगुनी हो गई। राजधानी की बात करें तो यहां बेरोजगारों की संख्या राज्य में सबसे ज्यादा है। ये सारे आंकड़े आरटीआई के जरिये मांगी गई जानकारी से सामने आए हैं। डायरेक्टोरेट ऑफ ट्रेनिंग एंड एम्पॉयमेंट के मुताबिक अप्रैल 2017 तक राज्य में बेरोजगारों की संख्या 09 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी है। ये संख्या 9.23 लाख है। जबकि वो बेरोजगार अलग हैं, जिन्होंने एम्पॉयमेंट एक्सचेंज में अपना नाम दर्ज ही नहीं करा रखा है। अगर ऐसे युवाओं को भी बेरोजगारों की सूची में जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा कहीं अधिक हो जाएगा।
बेरोजगारी का आलम यह है कि हर साल संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। यह हम नहीं कह रहे, आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। हालांकि साल 2008 के मुकाबले साल 2009 में बोरोजगारों की संख्या में मामूली गिरावट भी दर्ज की गई। लेकिन, इसके बाद बेरोजगारी के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं। 2008 में राज्य में बेरोजगारों की संख्या 4.89 लाख थी जो 2009 में थोड़ी सी घटकर 4.88 लाख हो गई थी, लेकिन इसके बाद ये संख्या साल दर साल बढ़ती ही चली गई।
आंकड़ों की नजर में बेरोजगार
जिलेवार बेरोजगार
जिले-संख्या
देहरादून- 1,89,708
नैनीताल-99,660
ऊधमसिंह नगर-91,738
हरिद्वार-82,157
टिहरी-75,681
पिथौरागढ़-72,649
अल्मोड़ा-72,215
पौड़ी-64,890
चमोली- 48,119
उत्तरकाशी- 40,839
बागेश्वर-32,560
रुद्रप्रयाग- 27,491
चंपावत-25,658
वर्षवार बेरोजगारों के आंकड़े
वर्ष- संख्या (अप्रैल तक)
2008- 4,89,744
2009-4,88,789
2010-5,65,559
2011- 6,61,642
2012- 7,04,398
2013-7,51,024
2014- 8,62,279
2015-9,22,066
2016- 9,26,308
2017- 9,23,000

उत्तराखंड में बनेगा 803 एकड़ में ग्रीन इंडस्ट्रियल जोन

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उत्तराखंड सरकार को उघमसिंह नगर जिले में केंद्र सरकार की तरफ से 803 एकड़ जमीन मिलने वाली है। इस जमीन का इस्तेमाल तराई के इलाके में औद्योगिक इकाईयों के विकास के लिये किया जायेगा। राज्य सरकार को ये जमीन केंद्र सरकार की पीएसयू नेपा के जरिये मिलेगी। कुछ दिन पहले राज्य में औद्योगिक इकाईयों के विकास के लिये बनी सिडकुल औऱ नेपा के बीच इस के बाबत एक समझौते पर मंजूरी हुई है।

इस समझौते के मुताबिक नेपा अगले एक महीने के अंदर सिडकुल को ये जमीन ट्रास्फर करेगी। इसके लिये सिडकुल 96.67 करोड़ रकम अदा करेगा। नेपा का मुखालय मध्यप्रदेश के बुर्हानपुर में है और काशीपुर के हेमपुर में यह जमीन का मालिकाना हक उसके पास है। इस जमीन पर दशकों ये नेपानगर की पेपर मिल के लिये रिजर्व स्टाॅक के लिये खेती होती थी। मौजूदा समय में आधी जमीन पर यूक्लिपटस के पेड़ हैं।

इस बारे में बताते हुए सिडकुल के एमडी आर राजेश कुमार ने कहा कि “केंद्र सरकार से औद्योगिक विकास के लिये मदद के लिये राज्य के पास जमीन होना जरूरी होता है। इसमें ये जमीन मददगार रहेगी। इस जमीन को तराई क्षेत्र में ग्रीन इंडस्ट्रियल जोन बनाने में इस्तेमाल किया जायेगा।”

हांलाकि ये सब कम से कम एक महीने बाद होगा जब नेपा से जमीन सिडकुल को मिलेगी। इसके बाद यहां तमाम तरह की स्टडी की जायेंगी ताकी केंद्र और राज्य सरकार के नियमों का पालन किया जा सके।

बोलेरो राइका पौंटी के पास खाई में गिरी, छह की मौत

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उत्तराखंड के बडकोट से मोल्डा गाँव जा रही बोलेरो वाहन अनियंत्रित होकर राइका पौंटी के पास खाई में गिरा, जिसमें 6 ग्रामीणों की मौत हो गई है। एक बच्चा लापता बताया जा रहा है। मृतकों में तीन ग्रामीण मोल्डा गाँव के हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार बुधवार की देर शाम बडकोट से मोल्डा गाँव जा रहा बोलेरो वाहन राइका पौंटी के पास अनियंत्रित हुई तथा 200 मीटर गहरी खाई गिरी। जिसमें चार लोग की मौके ही मौत हुई है। जबकि दो की मौत अस्पताल ले जाते समय हुई। घटना में एक बच्चा लापता बताया जा रहा है। मृतकों में चालक सरदार सिंह चौहान पुत्र फुलक सिंह (47) निवासी मोल्डा नौगांव, लोकेन्द्र सिंह चौहान (18) पुत्र सरद सिंह निवासी मोल्डा , शूरवीर सिंह (60) निवासी डांडा गांव ,जगत सिंह (40) पुत्र तेग सिंह निवासी मोल्डा की मौत हुई। दो की अभी शिनाख्त नहीं हो पाई है। जिन दो लोगों की शिनाख्त नहीं हुई है वे दिल्ली के बताए जा रहे हैं तथा ये अपने रिश्तेदारों के घर मोल्डा जा रहे थे।

राजधानी में भारी बारिश से लोगों के घरों में भरा पानी

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राजधानी में भारी बारिश अब स्थानीय लोगों के लिए परेशानी का सबब बनने लगी है। विभागीय अनदेखी के चलते आम लोगों को न सिर्फ जलभराव का सामना करना पड़ रहा है बल्कि सड़कों पर गड्ढे और भारी जलभराव के चलते घरों में भी घुसने लगा है। घरों में पानी आने से लोगों के बीच खासा आक्रोश है।

मौसम विभाग ने बीते रोज राजधानी में अगले 48 घंटे तक भारी बारिश की चेतावनी दी थी। मंगलवार देर रात से ही बारिश शुरू हो गई। बुधवार को भी लगातार बारिश का सिलसिला जारी रहा। जिसके बाद राजधानी में नालों और विभागीय तैयारियों की पोल खुल गई। आलम यह रहा के कई इलाकों में निकासी न होने के कारण जलभराव होने से घरों तक में पानी घुस गया।

देर रात अचानक हुई तेज बारिश के बाद नेमी रोड से पूरण बस्ती में को होता हुआ रिस्पना नदी का पानी कई घरों में घुस गया जिससे कई घरों का घरेलु सामान तक बर्बाद हो गया। बारिश के चलते संजय कॉलोनी के लगभग एक दर्जन से अधिक परिवार इससे प्रभावित हुए। लोगो का कहना था कि विभागीय लापरवाही के चलते ऐसा हुआ है। जिसके चलते स्थानीय लोगों के बीच भारी आक्रोश देखने को मिला।

जानकारी मिलने पर मौके पर पहुंचे पूर्व विधायक राजकुमार ने तत्काल जिलाधिकारी और तहसीलदार को अवगत कराने के साथ नगर निगम के अधिकारियों से बात की। उन्होंने विभाग की टीम को मौके पर बुलाकर मुआयना कराया। साथ ही क्षेत्र में सफाई अभियान चलाया। 

वर्षा ने गर्मी से दी लोगों को राहत, धान की फसल चौपट

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बुधवार की प्रातः से ऋषिकेश सहित आसपास के क्षेत्रों में हो रही झमाझम वर्षा से जहां पिछले कई दिनों से पड़ रही चिलचिलाती गर्मी से लोगों को राहत मिली है| वहीं वर्षा ने किसानों की लगी धान की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है।

पिछले कई दिनों से चिलचिलाती धूप के कारण गर्मी से लोगों में काफी अकुलाहट पैदा हो गई थी लेकिन बुधवार को हुई झमाझम मूसलाधार वर्षा के कारण लोगों ने गर्मी से राहत की सांस ली| आम जनजीवन भी प्रभावित हो गया है जिसके कारण ऋषिकेश, बद्रीनाथ मार्ग पर निर्गुंडी के पास हुए भूस्खलन से जहां मार्ग दो घंटे तक अवरुद्ध रहा वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की धान की फसल पानी में पूरी तरह डूब जाने से खराब हो गई|

सॉन्ग नदी के किनारे वर्षा का पानी कई घरों में घुस गया जिससे घरों का सामान खराब हो गया है| तहसील प्रशासन ने घरों में घुसा पानी का आंकलन कर शीघ्र पीड़ितों को राहत देने का आश्वासन दिया है| वर्षा के कारण तापमान में भी काफी गिरावट देखी जा रही है| तहसीलदार रेखा आर्य ने बताया कि वर्षा से होने वाले नुकसान को देखते हुए प्रशासन पूरी तरह अलर्ट है और आपदा राहत दल को भी सचेत करने के निर्देश दिए गए हैं।

प्राचार्य पद के लिए यूजीसी नेट पास करना अनिवार्य

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शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े संस्थान में प्राचार्य पद पर आसीन होने का सपना रखने वालों को यूजीसी की राष्ट्रीयता पात्रता परीक्षा (नेट) परीक्षा पास करनी ही होगी। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने रेगुलेशन 2014 में परिवर्तन कर प्राचार्य पद के लिए यूजीसी नेट को अनिवार्य कर दिया है।

बीते कुछ वक्त में संस्थानों की शिक्षा प्रणाली का स्तर और गुणवत्ता में गिरावट का प्रमुख कारण उन संस्थानों में प्रशिक्षित शिक्षकों और प्राचार्य पदों पर अनुभवी व्यक्ति का अभाव होना है। इसी को देखते हुए एनसीटीई ने अधिसूचना जारी कर प्राचार्य पद पर नियुक्ति के लिए एक नई शर्त जोड़ी हैं जिससे शिक्षा महाविद्यालयों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। नए मापदंड के मुताबिक अब प्राचार्य बनने के लिए पीएचडी व शिक्षा में पांच साल के अनुभव के साथ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास करना अनिवार्य है। परिष्द ने न्यूनतम मानक को ध्यान में रखते हुए साल 2009 के अनुसार पीएचडी उपाधि ग्रहण करने वालों को इस शर्त से छूट की बात भी कही है।

एनसीटीई ने प्राचार्य पद में नियुक्ति के लिए एक ओर जहां यूजीसी नेट को अनिवार्य किया है वहीं आठ साल के अनुभव को घटाकर पांच साल कर दिया है। उत्तराखंड की बात करें तो पूरे प्रदेश में कॉलेजों में प्राचार्य पद खाली पड़े हैं। कई संस्थानों का जिम्मा प्रभारी प्राचार्य संभाल रहे हैं। नए नियम से गुणवतता में सुधार तो होगा ही साथ ही नई पीढ़ी के अनुभवी और योग्य शिक्षकोंं को बेहतर विकल्प भी मिलेंगे।

एसोसिएशन आॅफ सेल्फ फाइनेंस इंस्टीट्यूट्स के अध्यक्ष सुनील अग्रवाल का कहना है कि परिष्द का यह फैसला शिक्षा की बुणवत्ता केा बढ़ाने का कार्य करेगा। उन्होंने बताया कि बीएड संस्थानों की बात की जाए तो फिलहाल प्रदेश में 110 प्राइवेट, 16 सेल्फ फाइनेंस सरकारी संस्थान और तकरीबन 12 सरकारी बीएड संस्थान हैं। इसके अलावा उच्च शिक्षा के 450 संस्थान होने के बाद भी गुणवत्ता के मानकों पर प्रदेश फेल हो रहा था। यह नियम सभी संस्थानों पर लागू होने से वहां योग्य और अनुभवी शिक्षक और प्राचार्य छात्रों का मार्गदर्शन करने का कार्य करेंगे। उन्होंने बताया कि प्राचार्य नियुक्ति को लेकर यूजीसी नेट को अनिवार्य करना अच्छी पहल है।

इसपर दून यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. वीके जैन का कहना है कि ‘प्रदेश के अधिकांश संस्थाओं में प्राचार्य के पद रिक्त हैं। पीएचडी की अनिवार्यता के कारण दिक्कत होती थी, अब नेट के चलते रास्ता कठिन भी होगा। लेकिन, इसके दूसरे पहलू पर गौर करें तो इससे शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक असर भी दिखाई देंगे।’

पुरानी रंजीश में खूनी संघर्ष

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पुरानी रंजिश को लेकर ईद पर बरहैनी, बाजपुर में जमकर बवाल हुआ। कहासुनी के बाद मौसेरे भाइयों में जमकर लाठी-डंडे चलने लगे। मारपीट में दो सगे भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। जिनकी हालत अब भी नाजुक बनी हुई है। इधर, बीचबचाव कर रहे मौसा के चोटें आई हैं। इसके चलते ईद की खुशियां मना रहे परिवारों में मातम छा गया।

मोहल्ला रोशनी वाली जारत दढि़याल रामपुर के पीरबक्श कैंसर पीड़ित है। बताया जाता है कि नई सड़क, बरहैनी निवासी जलील के मौसा भूरा ने बरहैनी में किसी वैद्य से दवा दिलाने की बात कहकर उसे बुलाया था। इस पर जलील अपने छोटे भाई आसिम के साथ बरहैनी पहुंचा। जलील की अपने मौसेरे भाइयों शाकिर, ताहिर अौर भूरा से पुरानी रंजिश चल रही थी। आरोप है कि जैसे ही जलील व आसिम भूरा के घर पहुंचे तो उनकी सामना शाकिर व अन्य भाइयों से हो गया। इस बीच दोनों के बीच कहासुनी होने लगी। देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट शुरू हो गई। मारपीट में जलील व आसिम गंभीर रूप से घायल हो गए। जबकि बीचबचाव कर रहे भूरा के भी चोटें आई हैं। घटना से मौके पर अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। सूचना के बाद पहुंची पुलिस ने घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जहां से प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने गंभीर हालत में दोनों को हायर सेंटर रेफर कर दिया। दोनों की हालत काफी नाजुक है।

बताया जाता है कि घटना में गंभीर रूप से घायल दोनों भाई (जलील व आसिम) करीब आधा घंटे तक मौके पर ही पड़े तड़पते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें अस्पताल नहीं पहुंचाया। सूचना पर पहुंची पुलिस ने एक पिकअप के माध्यम से घायलों को सीएचसी पहुंचाया। घटना के चलते पुलिस प्रशासन पूरी तरह से सतर्क हो गया है। जानकारी के बाद दढि़याल, रामपुर से घायल जलील व आसिम के अन्य परिजनों के बाजपुर आने की जानकारी मिलने तथा उनके द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई को अंजाम दिए जाने की आशंका के चलते मौके पर एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

बताया जा रहा है कि भूरा ने लगभग 16 वर्ष पूर्व अपनी पुत्री गुलशन जहां की शादी जलील के छोटे भाई जमील के साथ की थी। उसने अपनी संपति पुत्रों को बांटने के उपरांत एक आवासीय भूमि (जिसमें भूरा वर्तमान में रह रहा है) को विवाहित बेटी गुलशन जहां व गुलशन जहां के पास रह रही अपने 10 वर्षीय दूसरी बेटी को दिए जाने की बात कही थी जिसके चलते भूरा के पुत्र शाकिर, ताहिर, जलील के परिजनों से रंजिश रखने लगे तथा अपने पिता भूरा से इसी बात को लेकर उनकी कई बार कहासुनी भी हो चुकी है। भूरा ने बताया कि लगभग एक माह पूर्व उसने शाकिर पर जान से मारने की धमकी देते हुए पुलिस चौकी में तहरीर भी दी थी, परंतु इस मामले में अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

नैनीताल का वो गांव जो बारिश के दिनों में बन जाता है ”कालापानी”

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प्रशासनिक नक्शों में उत्तराखंड के नैनीताल जिले के लालकुआं-बिंदुखट्टा इलाके में स्थित एक छोटा सा गांव है, रावत नगर खुरीयाखट्टा जो केवल एक निशान के रूप में पंजीकृत है। कुछ पत्रकारों ने 1984 में बाढ़ के दौरान हेलीकाप्टर से गांव को देखा था और इसे ‘श्रीलंका’ कहा था। उन्होंने करीब 45 हेक्टेयर में फैले एक गांव को देखा जो तीन तरफ से पानी और एक तरफ से जंगल से घिरा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे हिंद महासागर में स्थित द्वीप राष्ट्र है।

इस गांव के निवासी अपने छोटे से गांव को ‘कालापानी’ के नाम से बुलाते हैं जहां ब्रिटिश अपने राजनीतिक कैदियों को बंदी बना कर रखते थे। मॉनसून के करीब तीन महीनों के लिए, यह  गांव शेष सभ्यता से कट जाता है। नदी गुवालय के पानी का स्तर बढ़ने से यह एक द्वीप में बदल जाता है। गांव को बाहर की दुनिया में जोड़ने के लिए कोई पुल नहीं है। लालबुओं नगर पंचायत के अध्यक्ष, राम बाबू मिश्रा कहते हैं कि पुल का निर्माण करने का भी कोई प्रस्ताव नहीं है। पहाड़ी राज्य के सबसे लोकप्रिय पर्यटन शहर की परिधि में स्थित इस गांव में बिजली की आपूर्ति भी नहीं है। मिश्रा कहते है कि स्थानीय भाजपा विधायक नवीन दुमका गांव में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के मुद्दे पर विचार कर रहे है।

गांव के 120 मतों को शायद राजनीतिक दलों के लिए बहुत ज्यादा मायने नहीं हैं। इस बात क पता इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले चार दशकों में पुरानी सरकारें मुख्य भूमि के साथ समझौता करने में विफल रही हैं।

1979 में जंगल भूमि का एक हिस्सा काटने के बाद लोग यहां बसने लगे थे। अब निपटाने के बाद कुल 42 परिवारों की कुल जनसंख्या 175 सदस्य है। यहां के निवासी कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं। उन्होंने एक कोआपरेटिव का भी गठन किया है जो गांव में उत्पादित दूध को एकत्र करता है और उसे लालकुआ में सप्लाई करता है। लेकिन यह केवल नौ महीने के दौरान ही है, मानसून के दौरान, स्थानीय लोगों द्वारा खपत के बाद भी अधिकांश दूध बेकार हो जाता है।

इस मौसम में पहली बार बारिश के साथ, ग्रामीणों ने अगले तीन महीनों के लिए तैयारी शुरू कर दी है। केदार सिंह दासौनी जो इस “द्वीप” पर एक एकड़ जमीन की देखभाल करते हैं कहते हैं कि, ‘रूद्रपुर और पंतनगर स्थित कारखानों में गांव के दो या तीन लोग काम करते हैं।हालांकि, वे भी मानसून के महीनों में काम छोड़ देते हैं और गांव में आकर रहने लगते हैं।’ दासूनी कहते हैं कि, ‘एक बार मानसून खत्म होने पर, वे फिर से रोजगार की तलाश में निकल जाते हैं।’

किसान कहते हैं कि मानसून के दौरान यह गांव उनके लिए ‘कालापनी’ में बदल जाता हैं। “हम बाहर नहीं जा सकते हैं और हमारे जीवन में केवल खाना पकाने और इसे हमारे घरों में इत्मीनान से खाने के लिए मजबूर हो जाते है। हम रोशनी के लिए केरोसीन लैंपों पर निर्भर रहना पड़ता हैं।

गांव के दूग्ध सहकारी समिति के प्रमुख रमेश सिंह राणा याद करते हुए कहते हैं कि 12 साल पहले उनके बेटे के साथ एक खतरनाक घटना हुई थी। वह बताते हैं कि, ‘मानसून के दौरान मैं बीमार हो गया था और मेरा बेटा मेरे लिए दवाएं लाना चाहता था इसलिए उसने नदी पार करने की कोशिश की थी। पानी के तेज बहाव से उसे डूबते देख लोगों ने पानी से बचाया।’ तब से उसने अपने परिवार के सदस्यों को उन तीन महीनों के दौरान बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी है। जैसे-जैसे गांववाले फिर से बुरे वक्त के लिए तैयार हो रहे थे, जिला प्रशासन ने वही किया जो हर साल किया जाता है। जिला मजिस्ट्रेट, नैनीताल, दीपेंद्र चौधरी कुछ दिन पहले गांव में गए और ग्रामीणों को राशन और केरोसीन सौंप दिया ताकि वह अगले तीन महीनों तक अपना काम चला सकें। । डीएम ने गांव का भी सर्वेक्षण किया और एक ऐसे स्थान को चिन्हित किया, जहां आपातकाल के दौरान में हेलीकॉप्टर को उतारा जा सके।

ग्रामीणों ने अपनी स्थिति के लिए राजनीतिक उदासीनता को दोषी ठहराया। लालकुआं के राज्य कांग्रेस समिति की सदस्य बीना जोशी कहती हैं कि, ‘गांव में पुल का निर्माण करने के लिए राज्य सरकार के साथ कई ज्ञापन प्रस्तुत किए हैं, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है।’ वह यह भी दावा करती है कि एक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव लंबित है।

उत्तराखंड के अस्तित्व के 17 वर्षों में आजकल सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी ने यह दावा किया है कि वह ग्रामीणों की समस्याओं को हल करने के लिए काम कर रहे हैं। नैनीताल के भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी का दावा है कि वह निवासियों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए “श्रीलंका टापु” में एक सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं, ‘हम गांव में एक पुल बनाने की संभावना तलाश रहे हैं लेकिन इतने लंबे समय तक (करीब 500 मीटर की दूरी) के साथ एक पुल बनाना तकनीकी रूप से आसान नहीं होगा। हालांकि, हम संभावनाओं को देख रहे हैं ताकि लोग भविष्य में पीड़ित ना हों।’

आपदा के बाद” विधवाओं के गांव” के नाम से मशहूर हुआ यह गांव

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देअलीभंगीराम रुद्रप्रयाग जिले का वैसे तो एक आम गांव है, लेकिन इस गांव को लोग अब ‘विधवाओं के गांव’ के नाम से जानते है। 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी में इस गांव के 54 पुरुषों की मौत हुई थी, जिनमें से 32 विवाहित थे।28 साल की रचना शुक्ला अपनी जिंदगी अकेले ही खामोशी से जी रही हैं। रचना की जिंदगी गांव की उन 31 विधवाओं जैसी ही है जिनके पति केदारनाथ त्रासदी में गुजर गए।

इस त्रासदी के 4 साल बाद भी इनमें से ज्यादातर महिलाएं अपनी जिंदगी अकेले ही जी रही हैं। ज्यादातर महिलाओं के पति मंदिर में पुजारी का काम करते थे, इनमें से कुछ की उम्र बहुत कम है, लेकिन फिर भी दुबारा शादी कर नई जिंदगी शुरू करने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं। रचना शुक्ला ने हालांकि अपने लिए अलग रास्ता चुना और वह अब देहरादून में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। रचना कहती हैं, ‘कई ऐसी विधवाएं हैं जो फिर से शादी करना चाहती हैं, लेकिन सामाजिक बंधनों के कारण यह कह नहीं सकतीं।’

इन महिलाओं से बात करने में एक बात सामने आती है कि इन महिलाओं की दुबारा शादी से इस गांव में रह रहे उनके परिवार की सुरक्षा पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘कई सामाजिक संस्थाएं गांव में विधवाओं की जिंदगी संवारने का काम कर रहे हैं। आर्थिक सहायता के साथ जरूरी है कि सामाजिक मानसिकता में भी बदलाव आए। हमारे गांव के लोग विधवाओं के फिर से शादी करने का सख्त विरोध करते हैं।’

दो बच्चों की मां 31 साल की रजनी देवी की भी ऐसी ही राय है। उन्होंने कहा, ‘कुछ लड़कियों के पति की मौत बहुत कम उम्र में हो गई और पहले पति से कोई संतान भी नहीं है। ऐसी लड़कियों को फिर से शादी करने की अनुमति होनी चाहिए ताकि वह अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू कर सकें। उनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है और यह बहुत क्रूर तरीका है कि किसी को जबरन सारी जिंदगी अकेले बिताना पड़े।’

गांव में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और जीविका के लिए पुजारी का काम करते हैं। वेद प्रकाश गांव के प्रधान हैं और उनका कहना है कि उच्च वर्ण को लेकर कई सारे सामाजिक बंधन होते हैं। इस वजह से विधवाओं को फिर से शादी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, ‘हमारे क्षेत्र में आज तक एक भी ऐसी घटना नहीं हुई है जिसमें किसी विधवा की फिर से शादी हुई हो।’