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पुरानी रंजीश में खूनी संघर्ष

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पुरानी रंजिश को लेकर ईद पर बरहैनी, बाजपुर में जमकर बवाल हुआ। कहासुनी के बाद मौसेरे भाइयों में जमकर लाठी-डंडे चलने लगे। मारपीट में दो सगे भाई गंभीर रूप से घायल हो गए। जिनकी हालत अब भी नाजुक बनी हुई है। इधर, बीचबचाव कर रहे मौसा के चोटें आई हैं। इसके चलते ईद की खुशियां मना रहे परिवारों में मातम छा गया।

मोहल्ला रोशनी वाली जारत दढि़याल रामपुर के पीरबक्श कैंसर पीड़ित है। बताया जाता है कि नई सड़क, बरहैनी निवासी जलील के मौसा भूरा ने बरहैनी में किसी वैद्य से दवा दिलाने की बात कहकर उसे बुलाया था। इस पर जलील अपने छोटे भाई आसिम के साथ बरहैनी पहुंचा। जलील की अपने मौसेरे भाइयों शाकिर, ताहिर अौर भूरा से पुरानी रंजिश चल रही थी। आरोप है कि जैसे ही जलील व आसिम भूरा के घर पहुंचे तो उनकी सामना शाकिर व अन्य भाइयों से हो गया। इस बीच दोनों के बीच कहासुनी होने लगी। देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट शुरू हो गई। मारपीट में जलील व आसिम गंभीर रूप से घायल हो गए। जबकि बीचबचाव कर रहे भूरा के भी चोटें आई हैं। घटना से मौके पर अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। सूचना के बाद पहुंची पुलिस ने घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया जहां से प्राथमिक उपचार के बाद चिकित्सकों ने गंभीर हालत में दोनों को हायर सेंटर रेफर कर दिया। दोनों की हालत काफी नाजुक है।

बताया जाता है कि घटना में गंभीर रूप से घायल दोनों भाई (जलील व आसिम) करीब आधा घंटे तक मौके पर ही पड़े तड़पते रहे, लेकिन किसी ने उन्हें अस्पताल नहीं पहुंचाया। सूचना पर पहुंची पुलिस ने एक पिकअप के माध्यम से घायलों को सीएचसी पहुंचाया। घटना के चलते पुलिस प्रशासन पूरी तरह से सतर्क हो गया है। जानकारी के बाद दढि़याल, रामपुर से घायल जलील व आसिम के अन्य परिजनों के बाजपुर आने की जानकारी मिलने तथा उनके द्वारा किसी प्रकार की कार्रवाई को अंजाम दिए जाने की आशंका के चलते मौके पर एहतियातन पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

बताया जा रहा है कि भूरा ने लगभग 16 वर्ष पूर्व अपनी पुत्री गुलशन जहां की शादी जलील के छोटे भाई जमील के साथ की थी। उसने अपनी संपति पुत्रों को बांटने के उपरांत एक आवासीय भूमि (जिसमें भूरा वर्तमान में रह रहा है) को विवाहित बेटी गुलशन जहां व गुलशन जहां के पास रह रही अपने 10 वर्षीय दूसरी बेटी को दिए जाने की बात कही थी जिसके चलते भूरा के पुत्र शाकिर, ताहिर, जलील के परिजनों से रंजिश रखने लगे तथा अपने पिता भूरा से इसी बात को लेकर उनकी कई बार कहासुनी भी हो चुकी है। भूरा ने बताया कि लगभग एक माह पूर्व उसने शाकिर पर जान से मारने की धमकी देते हुए पुलिस चौकी में तहरीर भी दी थी, परंतु इस मामले में अभी कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

नैनीताल का वो गांव जो बारिश के दिनों में बन जाता है ”कालापानी”

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प्रशासनिक नक्शों में उत्तराखंड के नैनीताल जिले के लालकुआं-बिंदुखट्टा इलाके में स्थित एक छोटा सा गांव है, रावत नगर खुरीयाखट्टा जो केवल एक निशान के रूप में पंजीकृत है। कुछ पत्रकारों ने 1984 में बाढ़ के दौरान हेलीकाप्टर से गांव को देखा था और इसे ‘श्रीलंका’ कहा था। उन्होंने करीब 45 हेक्टेयर में फैले एक गांव को देखा जो तीन तरफ से पानी और एक तरफ से जंगल से घिरा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे हिंद महासागर में स्थित द्वीप राष्ट्र है।

इस गांव के निवासी अपने छोटे से गांव को ‘कालापानी’ के नाम से बुलाते हैं जहां ब्रिटिश अपने राजनीतिक कैदियों को बंदी बना कर रखते थे। मॉनसून के करीब तीन महीनों के लिए, यह  गांव शेष सभ्यता से कट जाता है। नदी गुवालय के पानी का स्तर बढ़ने से यह एक द्वीप में बदल जाता है। गांव को बाहर की दुनिया में जोड़ने के लिए कोई पुल नहीं है। लालबुओं नगर पंचायत के अध्यक्ष, राम बाबू मिश्रा कहते हैं कि पुल का निर्माण करने का भी कोई प्रस्ताव नहीं है। पहाड़ी राज्य के सबसे लोकप्रिय पर्यटन शहर की परिधि में स्थित इस गांव में बिजली की आपूर्ति भी नहीं है। मिश्रा कहते है कि स्थानीय भाजपा विधायक नवीन दुमका गांव में सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने के मुद्दे पर विचार कर रहे है।

गांव के 120 मतों को शायद राजनीतिक दलों के लिए बहुत ज्यादा मायने नहीं हैं। इस बात क पता इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले चार दशकों में पुरानी सरकारें मुख्य भूमि के साथ समझौता करने में विफल रही हैं।

1979 में जंगल भूमि का एक हिस्सा काटने के बाद लोग यहां बसने लगे थे। अब निपटाने के बाद कुल 42 परिवारों की कुल जनसंख्या 175 सदस्य है। यहां के निवासी कृषि और पशुपालन पर निर्भर हैं। उन्होंने एक कोआपरेटिव का भी गठन किया है जो गांव में उत्पादित दूध को एकत्र करता है और उसे लालकुआ में सप्लाई करता है। लेकिन यह केवल नौ महीने के दौरान ही है, मानसून के दौरान, स्थानीय लोगों द्वारा खपत के बाद भी अधिकांश दूध बेकार हो जाता है।

इस मौसम में पहली बार बारिश के साथ, ग्रामीणों ने अगले तीन महीनों के लिए तैयारी शुरू कर दी है। केदार सिंह दासौनी जो इस “द्वीप” पर एक एकड़ जमीन की देखभाल करते हैं कहते हैं कि, ‘रूद्रपुर और पंतनगर स्थित कारखानों में गांव के दो या तीन लोग काम करते हैं।हालांकि, वे भी मानसून के महीनों में काम छोड़ देते हैं और गांव में आकर रहने लगते हैं।’ दासूनी कहते हैं कि, ‘एक बार मानसून खत्म होने पर, वे फिर से रोजगार की तलाश में निकल जाते हैं।’

किसान कहते हैं कि मानसून के दौरान यह गांव उनके लिए ‘कालापनी’ में बदल जाता हैं। “हम बाहर नहीं जा सकते हैं और हमारे जीवन में केवल खाना पकाने और इसे हमारे घरों में इत्मीनान से खाने के लिए मजबूर हो जाते है। हम रोशनी के लिए केरोसीन लैंपों पर निर्भर रहना पड़ता हैं।

गांव के दूग्ध सहकारी समिति के प्रमुख रमेश सिंह राणा याद करते हुए कहते हैं कि 12 साल पहले उनके बेटे के साथ एक खतरनाक घटना हुई थी। वह बताते हैं कि, ‘मानसून के दौरान मैं बीमार हो गया था और मेरा बेटा मेरे लिए दवाएं लाना चाहता था इसलिए उसने नदी पार करने की कोशिश की थी। पानी के तेज बहाव से उसे डूबते देख लोगों ने पानी से बचाया।’ तब से उसने अपने परिवार के सदस्यों को उन तीन महीनों के दौरान बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी है। जैसे-जैसे गांववाले फिर से बुरे वक्त के लिए तैयार हो रहे थे, जिला प्रशासन ने वही किया जो हर साल किया जाता है। जिला मजिस्ट्रेट, नैनीताल, दीपेंद्र चौधरी कुछ दिन पहले गांव में गए और ग्रामीणों को राशन और केरोसीन सौंप दिया ताकि वह अगले तीन महीनों तक अपना काम चला सकें। । डीएम ने गांव का भी सर्वेक्षण किया और एक ऐसे स्थान को चिन्हित किया, जहां आपातकाल के दौरान में हेलीकॉप्टर को उतारा जा सके।

ग्रामीणों ने अपनी स्थिति के लिए राजनीतिक उदासीनता को दोषी ठहराया। लालकुआं के राज्य कांग्रेस समिति की सदस्य बीना जोशी कहती हैं कि, ‘गांव में पुल का निर्माण करने के लिए राज्य सरकार के साथ कई ज्ञापन प्रस्तुत किए हैं, लेकिन कुछ भी नहीं हुआ है।’ वह यह भी दावा करती है कि एक सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव लंबित है।

उत्तराखंड के अस्तित्व के 17 वर्षों में आजकल सत्तारूढ़ भाजपा पार्टी ने यह दावा किया है कि वह ग्रामीणों की समस्याओं को हल करने के लिए काम कर रहे हैं। नैनीताल के भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी का दावा है कि वह निवासियों को बिजली उपलब्ध कराने के लिए “श्रीलंका टापु” में एक सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं, ‘हम गांव में एक पुल बनाने की संभावना तलाश रहे हैं लेकिन इतने लंबे समय तक (करीब 500 मीटर की दूरी) के साथ एक पुल बनाना तकनीकी रूप से आसान नहीं होगा। हालांकि, हम संभावनाओं को देख रहे हैं ताकि लोग भविष्य में पीड़ित ना हों।’

आपदा के बाद” विधवाओं के गांव” के नाम से मशहूर हुआ यह गांव

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देअलीभंगीराम रुद्रप्रयाग जिले का वैसे तो एक आम गांव है, लेकिन इस गांव को लोग अब ‘विधवाओं के गांव’ के नाम से जानते है। 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी में इस गांव के 54 पुरुषों की मौत हुई थी, जिनमें से 32 विवाहित थे।28 साल की रचना शुक्ला अपनी जिंदगी अकेले ही खामोशी से जी रही हैं। रचना की जिंदगी गांव की उन 31 विधवाओं जैसी ही है जिनके पति केदारनाथ त्रासदी में गुजर गए।

इस त्रासदी के 4 साल बाद भी इनमें से ज्यादातर महिलाएं अपनी जिंदगी अकेले ही जी रही हैं। ज्यादातर महिलाओं के पति मंदिर में पुजारी का काम करते थे, इनमें से कुछ की उम्र बहुत कम है, लेकिन फिर भी दुबारा शादी कर नई जिंदगी शुरू करने के बारे में सोच भी नहीं सकतीं। रचना शुक्ला ने हालांकि अपने लिए अलग रास्ता चुना और वह अब देहरादून में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। रचना कहती हैं, ‘कई ऐसी विधवाएं हैं जो फिर से शादी करना चाहती हैं, लेकिन सामाजिक बंधनों के कारण यह कह नहीं सकतीं।’

इन महिलाओं से बात करने में एक बात सामने आती है कि इन महिलाओं की दुबारा शादी से इस गांव में रह रहे उनके परिवार की सुरक्षा पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘कई सामाजिक संस्थाएं गांव में विधवाओं की जिंदगी संवारने का काम कर रहे हैं। आर्थिक सहायता के साथ जरूरी है कि सामाजिक मानसिकता में भी बदलाव आए। हमारे गांव के लोग विधवाओं के फिर से शादी करने का सख्त विरोध करते हैं।’

दो बच्चों की मां 31 साल की रजनी देवी की भी ऐसी ही राय है। उन्होंने कहा, ‘कुछ लड़कियों के पति की मौत बहुत कम उम्र में हो गई और पहले पति से कोई संतान भी नहीं है। ऐसी लड़कियों को फिर से शादी करने की अनुमति होनी चाहिए ताकि वह अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू कर सकें। उनके सामने पूरी जिंदगी पड़ी है और यह बहुत क्रूर तरीका है कि किसी को जबरन सारी जिंदगी अकेले बिताना पड़े।’

गांव में ज्यादातर लोग ब्राह्मण हैं और जीविका के लिए पुजारी का काम करते हैं। वेद प्रकाश गांव के प्रधान हैं और उनका कहना है कि उच्च वर्ण को लेकर कई सारे सामाजिक बंधन होते हैं। इस वजह से विधवाओं को फिर से शादी करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, ‘हमारे क्षेत्र में आज तक एक भी ऐसी घटना नहीं हुई है जिसमें किसी विधवा की फिर से शादी हुई हो।’

लापता बच्चे की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं मां बाप

ऋषिकेश में लगातार अपराधिक घटनाएं बढ़ने लगी है। कुछ सालों से देखने में आया है कि अपराधियों की नजर छोटे बच्चों पर टिकी हुई है जिसके चलते तीर्थनगरी से लगातार बच्चे गायब हो रहे हैं, तो वहीँ पुलिस हाथ पर हाथ रख कर बैठी रहती है, ताउम्र माँ- बाप बच्चों की तलाश में दर दर की ठोकर खाते रहते है, उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलते हैं।

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हर मां-बाप का सपना होता है कि उनका बच्चा बुढ़ापे में उनकी लाठी बनेगा और उसके भविष्य के लिए कई योजनाएं बनाते हैं, लेकिन ऐसे मां-बाप का क्या जो ताउम्र अपने बच्चों की तलाश में एक उम्मीद बांधे बैठे रहते हैं। ऐसी ही घटना ऋषिकेश के सुदामा मार्ग में रहने वाले जगेंद्र के परिवार के साथ गुजरी, जिसका 10 वर्षीय बेटा हार्दिक घर के बाहर से खेलते हुए 3 जून को लापता हो गया,गजेंदर ने  इसकी गुहार विधानसभा स्पीकर ,नगर पालिका अध्यक्ष और पुलिस प्रशासन के पास बार-बार लगाए लेकिन 25 दिन बीतने के बाद भी गजेंद्र को बेटे के लिए सिर्फ आश्वासन मिले।

एक छोटी फैक्ट्री में काम करने वाली हार्दिक की मां का रो रो कर बुरा हाल है ,उनका कहना है कि यदि किसी अमीर का बेटा शहर से गायब होता तो बाजार बंद हो जाता, पुलिस अलर्ट हो जाती लेकिन हम गरीबों की सुनने वाला कोई नहीं है। सिर्फ यह आश्वासन मिल रहा है कि भगवान पर भरोसा रखो, लेकिन आज 25 दिन होने के बाद भी जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं की जा रही है। तीर्थ नगरी ऋषिकेश में चार धाम यात्रा चल रहा है जिसके चलते देश भर से श्रद्धालु यहा पहुंच रहे हैं ऐसे में उठाईगिरी और बच्चा चोर गिरोह भी सक्रिय है जिस पर प्रशासन काबू नहीं पा रहा है, ऐसे में बच्चे चोरी की बढ़ती घटनाएं पुलिस प्रशासन पर सवालिया निशान लगाती है.

 

अाज भी मनाया जाता है ऐतिहासिक मौण मेला

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देवभूमी उत्तराखंड अपने रीति रिवाजों और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, आज भी यहां कई ऐसी परंपराएं जिंदा हैं, जैसे कि मौण मेला, जहां मछलियों का सामूहिक शिकार किया जाता है। इसमें हजारों की तादाद में लोग अगलाड़ नदी में मछलियां पकड़ने का ऐतिहासिक त्योहार मनाते है। टिमरू के तने की छाल को सुखाकर तैयार किए गए महीन चूर्ण को मौण कहते हैं। इसे पानी में डालकर मछलियों को बेहोश करने में प्रयोग किया जाता है। मौण के लिए दो महीने पहले से ही ग्रामीण टिमरू के तनों को काटकर इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं, मेले से कुछ दिन पहले तनों को आग में हल्का भूनकर इसकी छाल को ओखली या घराटों में बारीक पाउडर तैयार किया जाता है।

राजशाही से चली आ रही है परंपरा ये मेला टिहरी रियासत के राजा नरेंद्र शाह ने स्वयं अगलाड़ नदी में पहुंचकर शुरु किया था। उस समय मेले के आयोजन की तिथि और स्थान रियासत के राजा तय करते थे।अाज यह मेला पूरे जोर शोर से बारिश के बावजूद मनाया गया, भारी तादाद में ग्रामीणों ने मछली पकड़ने के लिए जाल, फटियाड़ा, कुंडियाला आदि उपकरणों का प्रयोग किया अौर मेले मे शिरकत ली।

साल दर साल नौजवान युवक बढ़-चढ़ कर इस समाप्त होती परंपरा में भारी संख्या में भाग ले रहे हैं जिसे देख बूढ़ी हो रही पीढ़ी को एक आशा की किरण दिखाई देती है कि पीढ़ीयों से चला आ रहा मौन मेला अपनी अस्तित्व नहीं खोऐगा।

सेंसर बोर्ड से श्रीदेवी की फिल्म ‘मॉम’ को हरी झंडी

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अगले महीने सात जुलाई को रिलीज होने जा रही श्रीदेवी की फिल्म ‘मॉम’ को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिल गई है।

खबरों के मुताबिक, सेंसर बोर्ड से इस फिल्म को बिना किसी कांट-छांट के यू/ए सार्टिफिकेट के साथ पास कर दिया गया है। इंग्लिश-विंग्लिश के पांच साल बाद हिंदी फिल्म के परदे पर लौट रही श्रीदेवी की ये फिल्म मां-बेटी के रिश्तों पर आधारित है। फिल्म में श्रीदेवी के साथ-साथ अक्षय खन्ना और नवाजुद्दीन प्रमुख भूमिकाओं में हैं। रवि उदयार फिल्म के निर्देशक हैं, जिनकी ये पहली फिल्म है। बोनी कपूर ने फिल्म का निर्माण किया है और एआर रहमान ने संगीत दिया है। श्रीदेवी इस फिल्म में एक टीनेज बेटी की मां के रोल में है। कहानी के मुताबिक, समाज के दरिंदे उनकी बेटी के साथ ऐसी हरकतें करते हैं कि उनको सजा दिलाने के लिए एक मां का संघर्ष शुरू होता है और गुनाहगारों को भयावह अंजाम तक ले जाने में सफल होती है।

हिन्दी-पंजाबी और मराठी सीख रही हैं नरगिस फाखरी

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काफी दिनों से फिल्मी खबरों से दूर ग्लैमर स्टार नरगिस फाखरी इन दिनों मराठी भाषा सीखने की कोशिश कर रही हैं। मराठी के अलावा वे हिन्दी और पंजाबी भाषाएं सीखने की कोशिश भी कर रही हैं। ये सब वे इसलिए कर रही है, क्योंकि जल्दी ही नरगिस फाखरी सिंगर बनने जा रही हैं और बतौर सिंगर उनकी एलबम के गीतों में मराठी और पंजाबी भाषा के गाने भी हैं।

इसके अलावा हिन्दी में भी गाने हैं। बताया जाता है कि इंडो कैनेडियन सहयोग से लॉन्च होने जा रही अपनी म्यूजिक एलबम को बहुभाषी बनाने के लिए नरगिस इन भाषाओं की बारीकियों पर काम कर रही हैं। नरगिस का कहना है कि बिना भाषा सीखे उनका गायन परफेक्ट नहीं होगा। इसके लिए उन्होंने इन भाषाओं के जानकारों से अमेरिका में ट्यूशन लेना शुरू किया है।
जहां तक उनके बॉलीवुड करियर की बात है, तो ‘हाउसफुल 3’ के बाद उनको कोई और फिल्म नहीं मिली है। मुंबई में नरगिस की फिल्मों से ज्यादा चर्चा उनके उदय चोपड़ा के साथ कथित अफेयर को लेकर रही है। उदय चोपड़ा भी इन दिनों अमेरिका में ही रह रहे हैं और कहा जा रहा है कि वे ही नरगिस का सिंगर बनने का सपना पूरा करने के लिए सब कुछ कर रहे हैं। अपने रिश्तों को लेकर नरगिस और उदय चोपड़ा मीडिया के साथ आंख मिचौली जैसा खेल खेलते आए हैं।

आईटी क्षेत्र में उत्तराखंड को पेरिस में सम्मान

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पेरिस (फ्रांस) में आयोजित सेकेंड ग्लोबल स्किल डेवलपमेंट मीट में उत्तराखण्ड राज्य को कौशल विकास के क्षेत्र में सूचना प्रौद्योगिकी के अभिनव उपयोग के लिए उत्कृष्टता पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
19 से 23 जून तक पेरिस में आयोजित इस सम्मेलन में उत्तराखण्ड सरकार की ओर से वित्त एवं पेयजल मंत्री प्रकाश पंत तथा उत्तराखण्ड कौशल विकास समिति के परियोजना निदेशक डाॅ पंकज कुमार पाण्डेय ने हिस्सा लिया।
फ्रांस में स्थित भारतीय दूतावास में यह पुरस्कार प्राप्त करते हुए पंत ने दूतावास में सभी सदस्यों तथा विभिन्न एजेंसियों से आये हुए उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के समक्ष उत्तराखण्ड में कौशल विकास के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रमों पर अपने विचार रखे।
वित्त मंत्री ने कहा कि पर्यटन, ब्यूटी एण्ड वेलनेस, कृषि, स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं अन्य सेक्टरों में राज्य के युवाओं को उच्च कोटी का प्रशिक्षण प्रदान कर रोजगार से जोड़ने की नई पहल की जा रही है। उन्होंने कहा कि कौशल विकास योजना के अन्तर्गत शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण उत्तराखण्ड में चलाये जा रहे हैं। विशेष रूप से उत्तराखण्ड के सीमान्त क्षेत्रों में रोजगार सृजन हेतु कौशल विकास योजना का बहुत महत्व है। राज्य के औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को औद्योगिक सेक्टर से सीधे जोड़ा जा रहा है। उद्योगों की मांग के अनुरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम डिजाइन किये जा रहे हैं।
इस सम्मेलन में परियोजना निदेशक डाॅ. पाण्डेय ने राज्य के कौशल विकास समिति के कार्यक्रमों को अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत कर सराहना प्राप्त की। उन्होंने अपने प्रस्तुतिकरण में उक्त सेक्टरों से सम्बन्धित उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ बिजनेस मिटिंग भी की और यह भी बताया कि उत्तराखण्ड में युवाओं को रोजगार प्रदान करने के लिये अन्तर्राष्ट्रीय भाषाओं का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

मानसून की आहट, आठ कंपनियों ने बंद की हेली सेवा

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केदारनाथ धाम में यात्रियों को सेवा प्रदान कर रही 13 हेली कंपनियों में से आठ हेली कंपनियों ने मानसून की दस्तक के साथ ही सेवाएं बंद कर दी हैं। अब पांच हेली कंपनियां ही केदारनाथ के लिए सेवाएं दे रही हैं। मानसून आते ही ये कंपनियां भी अपनी सेवाएं बंद कर देंगी। इसके बाद केदारनाथ के लिए सितंबर में ही हेली सेवाएं आरंभ की जाएंगी।

केदारनाथ के लिए इस बार 13 हवाई कंपनियों को केदारघाटी से उड़ान भरने की अनुमति सरकार ने दी थी। मई व जून के मध्य तक ढाई हजार से अधिक यात्री रोजाना हेलीकॉप्टर से केदारनाथ पहुंच रहे थे, लेकिन अब बारिश के चलते यात्रियों की संख्या में खासी कमी आ गई है। आमतौर पर जून के अंतिम सप्ताह तक ही केदारनाथ के लिए हेली सेवाएं संचालित होती हैं। इसके बाद बरसात का मौसम होने के कारण धाम के लिए उड़ान संभव नहीं हो पाती। हेली सेवाओं के सहायक नोडल अधिकारी केएस. पंवार ने बताया कि बारिश के मद्देनजर यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आई है, इसलिए आठ हेली कंपनियां लौट गई हैं।

त्रिवेंद्र ने मानी मोदी की “मन की बात”, बुके की जगह किताब से होगा अतिथियों का स्वागत

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मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि उत्तराखंड आगमन पर अतिथियों का स्वागत बुके के स्थान पर पुस्तक भेंट करके किया जाए। बीते रविवार को प्रसारित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम से प्रेरित होकर मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र ने यह निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि अतिथियों के स्वागत में भेंट की जाने वाली पुस्तकें उत्तराखंड की ऐतिहासिक, भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जानकारी से सम्बन्धित होंगी। पुस्तक ‘सदा सुफल हनुमान’ भी अतिथियों को स्वागत के समय भेंट की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने सोमवार को राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी रामनाथ कोविंद को उनके देहरादून आगमन पर बुके के स्थान पर पुस्तक भेंट कर स्वागत करके इस परम्परा का आरम्भ किया।