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पलायन एक चिंतन: भराड्सर ताल

दिनांक-10-10-2017

गांव की सुबह चिड़ियों की पहली चहचाहट के साथ ही खुल गयी। लेकिन रात के सफर की थकान और इस ठंड में गर्म बिस्तर के मोह के कारण हम उस घर की चहल-पहल को नजर अंदाज कर नींद की हल्की-फुल्की झपकीयों का आनंद लेते रहे। सुबह की चाय ने हमारा ये आलस्य दूर कर दिया। चाय की चुस्की के साथ मेरे साथी भवन के अंदर की काष्ठ कला को अभिभूत होकर देखते रहे, लेकिन मेरे लिये ये सब नया नहीं था, क्यों की रौंतेली रंवाई के इस खूबसूरत परिवेश में पला-बढ़ा हूँ।

कमरे से बाहर निकलते ही सामने विशाल पहाड़ और उस पर घने जंगल को चिरती टेड़ी-मेड़ी पतली से पगडंडी जो नीचे गहरी खाई में बहती सुपीन नदी की तरफ जाती है। गहरी खाई में बहती नदी को देख कर लगा की कल रात अंधेरे में हमने काफी लंबा सफर तय किया। हमारे साथी गाँव के अदभुत और बेजोड़ काष्ठ कला के भव्य मकानों और उसके आस-पास फैली प्राकृतिक छटाओं के साथ ग्रामीणों की स्थानीय वेषभूषा की फोटो अपने कैमरे में कैद करने में मशगूल थे। जिस घर में हम रूके थे वहां शौचालय की पक्की व्यवस्था थी जिसके लिये मैंने प्रधानमंत्री जी के प्रति शौच करते हुऐ कृतज्ञता भी प्रकट करी।

घर की रसोई में बड़े जोर-शोर से ग्राम प्रधान प्रहलाद रावत की पत्नी और परिवार की अन्य महिलायें हमारे लिये सुबह का नाश्ता तथा लंच पैक तैयार कर रहे थे। प्रधान जी गाँव से आगे के सफर के लिये खच्चर और पोटर की व्यवस्था पर लगे थे। बाहर आंगन में हमाम पर पानी गर्म था जो इस इलाके में लगभग हर घर में होता है जिसमें लकड़ी जलाकर पानी गर्म किया जाता है। जो एक तरह का पहाड़ी गीजर है। इसमें जितनी मात्रा में ठंडा पानी डालो ये उतनी मात्रा में गर्म पानी बाहर देता है। सभी मेहमानों ने गर्म पानी से आवश्यकता अनुसार अपनी देह को सफर के लिये तरो ताजा किया।

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सुबह की गुनगुनी धूप में बाहर छजे पर पहाड़ी जखिया के तुड़के में बनी स्वादिष्ट मैगी के साथ गर्मा-गर्म चाय ने ऊर्जा का नया संचार किया। विदाई से पूर्व प्रधान प्रहलाद भाई ने हमें स्थानीय हिमांचली टोपी के सम्मान से नवाजा तथा दल की एक मात्र महिला सदस्य तनु जोशी को प्रधान जी की अध्यापिका पत्नी ने शाल भेंट कर सम्मानित किया। आतिथ्य संस्कार के इन भावुक छणों से हम अभिभूत थे। रैकचा गाँव और ग्राम प्रधान के इस अपनेपन के हम आजीवन आभारी रहेंगे।

ठाकुर रतन भाई के नेतृत्व में हमने रैकचा गाँव से सटे फिताडी गाँव के ग्राम देवता सोमेश्वर महाराज के मंदिर से यात्रा का प्रारंभ किया। यहां के हर मंदिर की छत पर लकड़ी से बना मुनाल और बकरी इस हिमालयी समाज के ऐतिहासिक पहलू को दर्शाता था। मंदिर में लकड़ी के मुख्य द्वार पर हर दौर के सिक्के और नाग तथा हाथी घोड़े के अनेक भित्ति चित्र खुदे होने से हम मंदिर की पौराणिकता को समझ आती है। जो लगभग यहां के हर प्राचीन मंदिर में देखने को मिलता है। महासू मंदिर के उल्ट यहाँ के अधिकांश मंदिर तीन गर्भ गृह की जगह एक ही गृभ गृह के कम ऊंचाई वाले मंदिर थे।

अंततोगत्वा हम लंबे समय से ठप पड़ी सड़क पर सिधे-सिधे रैकचा से कासला गाँव के लिये चल पड़े जो यहाँ से लगभग दो-ढाई किलोमीटर की दूरी के सिधे-सपाट रास्ते पर था। सड़क के इर्द-गिर्द लाल केदार-मारछा की खेती हमें अभिभूत कर रही थी। पीठ पर घास का बोझा लादी ग्रामीण महिलाऐं इस पर्वतीय राज्य की अन्य ग्रामीण महिलाओं के जस के तस हालातों का प्रतिनिधित्व कर रही थी। मेरे कालेज के साथी जयमोहन राणा, रोजी राणा, रैकचा के प्रधान प्रहलाद रावत, राजपाल रावत, प्रहलाद पंवार, दिनेश सिंह,जुनैल सिंह,और हमारा गाइड सुरेन्द्र चार खच्चरों पर हमारा समान लाद कर काफिले में साथ हो लिये।

कासला गाँव पंहुच कर हमने मंदिर प्रांगण में बच्चों को पढ़ा रही आंगनवाड़ी कार्यकत्री और ग्रामीणों से चाय पीते हुऐ स्थानीय समस्याओं पर बातचीत करी। हमारे साथ स्थानीय एसडीएम की उपस्थिति की पूर्व खबर और सर-बडियार की हमारी यात्रा के पुराने किस्सों और अनुभवों के कारण यहाँ के विद्यालय चाक चौबंद दिखाये दे रहे थे।

कासला से राला गाँव की ऊंची पगडंडी पर बढ़ते हुऐ नदी की ठीक उस पार ऊंची पहाड़ी के ढालदार मैदान पर एक बहुत बड़ा गाँव लिवाडी दिखाई दिया जो इस क्षेत्र की पंचगाई पट्टी का सबसे आखिरी गाँव था। गाँव के लिये एक ऊंची चट्टान पर सड़क काटता हुआ एक जेसीबी भी नजर आया। जिसे देखकर ऐसा महसूस हो रहा था मानो 15 अगस्त सन 1947 को यह जेसीबी सड़क काटने के लिये दिल्ली से निकला हो इसे लिवाडी आते-आते 70 साल लग गये हों। ये असल में सिर्फ एक जेसीबी ही नही हमारी सरकारों की कछुवा चाल का जीता-जागता उदाहरण था। जिसे देख कर हम खुशी जाहिर करें या अफसोस यह कह पाना बड़ा मुश्किल था। इस गाँव में मेरा दोस्त नरेन्द्र परमार अभी हाल में ही शिक्षक के रूप में तैनात हुआ है। गाँव की विकटता और जिस बदहाल संचार व्यवस्था का जिक्र उसने कुछ दिन पहले मुझसे किया था वो मैं भली-भांति समझ पा रहा था।

कासला से लगभग 2 किलोमीटर तक पशुओं के सूखे गोबर से भरे और उन पर मंडराते काले किट-पतंगो से भरी पगडंडी पार कर हम जब राला गाँव पंहुचे तो पानी की एक पाइप लाइन से बहते बेतहाशा शितल जल से हमने अपनी तीस बुझाई। गाँव के बिच से गुजरते हुऐ हम गाँव वालों की निगाहों के सवालों से रूबरू हुऐ। जो शायद हम से हमारा गंतव्य पूछ रहे थे। लेकिन हमारे पथ की दिशा उन्हें हमारे भराड्सर की यात्रा का बोध कर रही थी।

राला गाँव के स्कूल पंहुच कर बेहद अनुशासन पूर्वक बच्चों द्वारा “गुड मार्निग सर” के सामूहिक अभिवादन से अभिभूत होना पड़ा। पिछे छूटा जब भी कोई साथी आता तो बच्चे ऐसे ही बार-बार खड़े होकर सबका अभिवादन करते। स्कूल का भवन सर-बडियार की अपेक्षा बेहद अच्छी हालात में था। बगोरी-हर्षिल के एक नौजवान अध्यापक भी तन्मयता से बच्चों को पढ़ा रहे थे। स्कूल की भोजन माता सभी आगुंतकों के लिये कुर्सी ला रही थी। आंगन साफ सुथरा वा आस पास की तरतीब से कटी झाड़ीयां बता रही थी की ये सिर्फ हमें दिखाने के लिये किया गया ड्रामा नहीं अपितु वास्तव में स्कूल प्रबंधन बेहतर अध्यापकों के हाथ में था। जो हमारे लिये काफी सूकून देय एहसास था।

बाकी साथियों को पिछे छोड़ हम कमजोर चाल वाले यात्री अजय कुकरेती, तनु जोशी और मैंने चाय का मोह त्याग सामने खड़ी चढाई के लक्ष्य को समय से पूरा करने का निर्णय लिया। खट्टी-मीठी टाफी को चूसते हुऐ हम ने जैसे ही उस ऊंचे रास्ते को पार किया तो सामने एक और ऊंची पगडंडी का कठिन सफर मुंह उठाये खड़ा था। हमने थोड़ा मखमली घास पर सुस्ताते हुऐ थकान को मिटाया और बाकी सभी साथियों का इंतजार करने लगे। धिरे-धिरे खच्चर वालों के साथ हमारे सभी साथी पंहुच गये। जिनमें स्थानीय साथियों और मनमोहन असवाल, रतन भाई, सौरभ और गणेश काला की रफ्तार सबसे तेज थी। वे सबसे देर में निकलते और सबसे पहले पंहुच जाते। जबकि मुकेश बहुगुणा ,दलबीर रावत, पिंटू धस्माना और नेत्रपाल यादव बेहद संतुलित चाल से चल रहे थे।

थोड़ा सुस्ताने और तंबाकू-पानी के बाद हम फिर ऊंचे पहाड़ों के इस खुशनुमा सफर पर बढ़ चले। समय रहते हमें अपने आज के पड़ाव देववासा तक पंहुचना था। हालांकि गाँव वालों का मानना था की आज हम किसी भी सूरत में देववासा नहीं पंहुच पायेंगे। फिर भी हम हिम्मत रखते हुऐ चल पड़े। दोपहर पार हो चुकी थी बेहद भूख लगने के बावजूद भी रतन भाई की डांट के डर से मैं भोजन करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।

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अब सबसे आगे चलने का मोर्चा मैंने संभाल रखा था लेकिन जल्दी ही स्थानीय सहयात्रीयों और मनमोहन असवाल हमें पिछे छोड़ते हुऐ आगे निकल पड़े। एक लंबी खड़ी चढाई को पार कर रतन असवाल ने सबको भोजन करने की सलाह दी तो मेरी जान में जान आ गयी। मैने अपने लंच पैक को खोला तो प्रधान प्रहलाद रावत ने चार पूरी और मिक्स सब्जी का एक बेहतरीन बंच तैयार कर रखा था। जिसे मैंने एक विदेशी शैलानी की भांति एक साथ बरगर की तरह खाना शुरू किया। एक लंच पैक एक्स्ट्रा था वो प्रधान जी के कहने पर मैने अपने खच्चर वाले सहयोगी और उसके साथी को दे दिया। इसी तरह हम सब ने बांट कर भोजन किया और बोतल में भरे ठंडे पानी से अपनी प्यास बुझाई।

लगभग चार बजे भोजन से तृप्त होने के बाद हम आगे बढ़े तो बुग्याल और पेड़ों का खूबसूरत साझा जंगल देखने को मिला। अब चलते-चलते बेतहाशा थकान से हम ढिले पढ़ने लगे। इसलिए वस्तु स्थिति का भांपते हुऐ ठाकुर रतन असवाल ने इस “सुराल” के जंगल में ही एक जगह पानी के नजदीक रात्री विश्राम करने का फैसला लिया।

खच्चरों से सामान उतारा गया और फटाफट उपयुक्त जगह पर टेंट खड़े किये गये। हमारे खच्चर वाले ने जब खच्चर की पीठ से प्लान उतारा तो बेहद आत्मीयता से खच्चर की पीठ को सहलाने लगा। दोनों के बेहद भावात्मक लगाव को देख लगा की पशु और पशु स्वामी के बीच के ये रिश्ता आज का नहीं सदियों पुराना है। एक दूसरे के प्रति समर्पण का यह भाव मुझे अंदर तक प्रभावित कर गया। खच्चर वाले से बातचीत कर जान-पहचान बढ़ी तो पता चला वो फिताडी गाँव का किर्तम सिंह है जिसे मैंने प्यार से मामटी बोलना शुरू किया जो गढ़वाल के भैजी और कुमाऊँ के दाज्यू के समान आत्मीयता भरा संबोधन है। किर्तम मामटी भराड़सर के देवता का अनन्य भक्त था जिस कारण उसे नीजी हांथों से तैयार भोजन को ही खाने की बंदिशे थी। जब उसका खाना बनता तो हम सब में से किसी को भी उसके चूल्हे को छूने तक की इजाजत ना थी।

खैर मुकेश बहुगुणा के नीजी टेंट को महिला आरक्षण के तहत अलग से तनु को समर्पित कर हम एक टैंट में तीन लोग काबिज हो गये। टेंट से उचित दूरी पर जंगल से लकड़ी इक्कठा कर भट्टा जलाया गया। खिचड़ी के साथ फिताडी से जयमोहन द्वारा लायी गयी बकरे की एक रान को छोटे-छोटे टुकड़े में भून कर सिग्नेचर की वाइन के साथ परोसा गया। मैं और तनु तथा अजय कुकरेती भाई शरीफ और सज्जन शाकाहारी प्राणी की भांती खिचड़ी खा कर ही संतोष पूर्वक सो गये।

जहर लेकर एसडीएम कार्यालय पहुंचा किसान

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जसपुर- राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण की जद में आ रही भूमि से गुस्साया किसान सल्फास लेकर एसडीएम कार्यालय पहुंच गया। इससे तहसील प्रशासन में हड़कंप मच गया। किसान ने यहां एसडीएम के समक्ष अपनी बात रखकर चेतावनी दी कि यदि जबरन उसकी भूमि को एनएच चौड़ीकरण में शामिल किया गया तो वह आत्मदाह कर लेगा। इस पर एसडीएम ने उसे एनएच के नियम से अवगत कराकर संतुष्ट करने का प्रयास किया।

ग्राम जगतपुर पट्टी निवासी गुरदयाल सिंह पुत्र हजारा सिंह की तीन एकड़ भूमि एनएच चौड़ीकरण की जद में आ रही है। जिसमें 58 वृक्ष आम व तीन वृक्ष कागजी नीबू तथा दो-दो वृक्ष आंवला व नाशपाती समेत फलदार बाग है। इसी बाग की फसल से वह अपने परिवार का भरण पोषण करता है। यही वजह है कि किसान इस भूमि को एनएच चौड़ीकरण में नही देना चाहता है। इसके लिए उसने प्रधानमंत्री समेत राजमार्ग मंत्रालय, मुख्यमंत्री तथा एनएच के उच्चाधिकारियों तक को पत्र भेजा है। बुधवार को किसान पत्रों की रिपोर्ट जानने के लिए सल्फास लेकर एसडीएम कार्यालय पहुंचा। यहा उसने एसडीएम दयानंद सरस्वती से वार्ता कर चेतावनी दी कि यदि जबरन उसकी भूमि को एनएच चौड़ीकरण में शामिल किया गया तो वह आत्मदाह कर लेगा। जिसकी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। किसान का आरोप है कि कुछ भूमाफिया उसकी भूमि को जबरन एनएच चौड़करण में शामिल कराना चाहते हैं। ऐसा न करने पर उन्होने जान से मारने की धमकी भी दी है।

दयानंद सरस्वती, एसडीएम ने बताया कि किसान के प्रार्थना पत्र को एनएच के अधिकारियों को भेजा गया है। अग्रिम कार्रवाई उनके द्वारा ही होगी।

मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाने की चेतावनी

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द्वाराहाट। दूनागिरि मंदिर में समझौते के अनुरूप अभी तक प्रशासन की टीम तैनात नही किए जाने को लेकर लोगों में रोष है। संघर्ष समिति ने प्रशासन पर गुमराह करने का आरोप लगाते हुए 28 अक्टूबर को द्वाराहाट आगमन पर मुख्यमंत्री को काले झंडे दिखाने की चेतावनी दी।

दूनागिरि मंदिर से निजी ट्रस्ट को हटा वहां प्रशासनिक नियंत्रण वाली समिति को व्यवस्था सौंपे जाने की मांग को लेकर लोग लंबे समय से आंदोलनरत हैं। इसी क्रम में 21 सितंबर को आंदोलन शुरू हुआ था। इसके बाद 11 अक्टूबर को अपर जिलाधिकारी और विधायक की मध्यस्थता में समझौता हुआ था कि 12 अक्टूबर से मंदिर की व्यवस्था प्रशासनिक टीम को सौंपी जाएगी। साथ ही 15 दिन के भीतर मंदिर की पूरी व्यवस्था चाक चौबंद कर दिए जाने का लिखित आश्वासन दिया गया, लेकिन 15 दिन बीत जाने के बावजूद अभी तक मंदिर में राजस्व विभाग का हस्तक्षेप नही हो पाया है। इस कारण लोगों में रोष व्याप्त है। इसी मामले में दूनागिरि मंदिर सेवार्थ सयुंक्त संघर्ष समिति ने बैठक में प्रशासन पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया। कहा कि प्रशासन जनभावनाओं की अनदेखी कर रहा है। समिति ने चेतावनी दी कि यदि समझौते के अनुरूप तत्काल कार्रवाई नही की गई तो जनता के साथ मुख्यमंत्री के कार्यक्रम का विरोध कर काले झंडे दिखाए जाएंगे। इसके बाद पुनः आंदोलन किया जाएगा। इस मौके पर संघर्ष समिति अध्यक्ष विनोद भट्ट, हेम रावत, वनोद जोशी, डा डीपी चौधरी, भीम सिंह, विपिन चंद्र, नीरू आर्या, जगदीश भट्ट, महेंद्र मैनाली, हरिओम कांडपाल, महेश त्रिपाठी, हरीश कांडपाल, जीवन सिंह आदि मौजूद रहे।

हरियाणा ने जीता नार्थ जोन ब्लाइंड क्रिकेट टूर्नामेंट

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देहरादून। नार्थ जोन ब्लाइंड क्रिकेट प्रतियोगिता के फाइनल मुकाबले में हरियाणा की टीम ने उत्तर प्रदेश को हराते हुए खिताब पर कब्जा जमा लिया है। शानदार शतकीय पारी खेलने पर हरियाणा के रामबीर सिंह को मैन ऑफ द मैच चुना गया।

स्पोर्ट्स कॉलेज में चल रही प्रतियोगिता में गुरुवार को फाइनल मुकाबला हरियाणा व उत्तर प्रदेश के बीच खेला गया। उत्तर प्रदेश ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी करने का फैसला लिया। बल्लेबाजी करने उतरी हरियाणा की टीम 35 ओवर में 333 रन का स्कोर खड़ा कर आल आउट हो गई। टीम की ओर से रामबीर सिंह ने 77 गेंद में 117 रन की शतकीय व कप्तान दीपक मलिक ने 61 रन की शानदार अद्र्धशतकीय पारी खेली।
उत्तर प्रदेश की ओर से अच्छी गेंदबाजी करते हुए विनीत ने चार विकेट हासिल किए। जवाब में बल्लेबाजी करने उतरी उत्तर प्रदेश की टीम हरियाणा के गेंदबाजों के आगे लड़खड़ा गई और पूरी टीम 14.1 ओवर में 77 रन पर आल आउट हो गई। टीम की ओर से फैसल ने सर्वाधिक 20 रन बनाए। कार्यक्रम में बी-वन वर्ग में उत्तर प्रदेश के शौकत अली, बी-टू में दिल्ली के गौरव व बी-थ्री वर्ग में हरियाणा के दीपक मलिक को मैन ऑफ द सीरीज का पुरस्कार दिया गया। इस मौके पर मुख्य अतिथि के रुप में पहुंचे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट ने विजेता व उप विजेता टीम को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।

गोदाम में लगी आग, लाखों का नुकसान

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रामनगर-ग्राम चिलकिया में सुबह चावल के गोदाम में आग लग गई। डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद फायर कर्मियों ने आग पर काबू पाया। चिलकिया में जगदीश राइस मिल के नाम से चावल का गोदाम है। सुबह चार बजे चौकीदार ने गोदाम के भीतर से धुआं उठता देखा। उसने पहले मालिक जगदीश और फिर फायर कर्मियों को सूचना दी।

फायर कर्मियों ने मौके पर पहुंचकर ताले तोड़कर आग को बुझाने का प्रयास किया। आग फैलती देख दूसरा वाहन भी मौके पर बुलाया गया। इसके बाद आग को बुझाया जा सका। आग लगने से चावल के कट्टे और बारदाना जल गया। अग्निशमन अधिकारी किशोर उपाध्याय ने बताया कि आग लगने से करीब 7 लाख रुपये कीमत के चावल का नुकसान हुआ है।

पिंडर घाटी की पहाडियों पर फहराया तिरंगा

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अल्मोड़ा- रॉक लिजर्ड सोसायटी के 2 सदस्यीय दल ने पिंडर घाटी की पहाड़ी बल्ज्यूरी पर फतह पाने में सफलता हासिल की है। सात दिन के इस अभियान के बाद दल के सदस्यों ने इस पर्वत पर तिरंगा फहराकर साहसिक पर्यटन की अनूठी मिशाल भी पेश की है।

इस पर्वतारोही दल को बीते 7 अक्टूबर को जिला विकास अधिकारी मो. असलम और जिला कार्यक्रम अधिकारी पीएस बृजवाल ने हरी झंडी दिखाकर अल्मोड़ा से रवाना किया था। जिसके बाद इस दल ने बागेश्वर के खरकिया नामक स्थान से अपनी पैदल यात्रा शुरू की। दल के दोनों सदस्यों ने पिंडारी ग्लेशियर पर अपना बेस कैंप बनाया और 42 सौ मीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद दूसरा कैंप स्थापित किया। दूसरे कैंप से बर्फीली चढ़ाई पार कर दोनों सदस्यों ने 5922 मीटर की ऊंचाई वाले पर्वत पर तिरंगा फहराने में सफलता हासिल की। दल ने एल्पाइन स्टाइल में 7 दिन के रिकार्ड समय में बिना किसी मदद के यह अभियान पूरा किया। अभियान के दौरान दल ने मार्ग में पढ़ने वाले खाती, बाछम, द्वाली गांवों में सफाई अभियान चलाकर लोगों को सफाई के प्रति जागरूक भी किया। दल में शामिल पर्वतारोही विनोद भट्ट और दीपेश नेगी ने बताया कि रॉक लिजर्ड संस्था साहसिक खेलों को बढ़ावा देने वाली भारतीय पर्वतारोहण संस्थान दिल्ली से संबंद्ध एकमात्र संस्था है।

सर्बियाई दूतावास में दिखाई जायेंगी ‘देवभूमि’

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मशहूर सर्बियाई निर्देशक गोरान पस्काविच की फिल्म ‘देवभूमि’ ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कामयाबी की कहानियां लिखी हैं। ये फिल्म उत्तराखंड और इससे जुड़ी मानयताअों पर आधारित है, इस पिल्म में मुख्य भूमिका में विक्टर बैनर्जी हैं। अगले साल भारत-सर्बिया के संबंधों के 70 साल मनाने के लिये इस फिल्म की स्क्रीनिंग दिल्ली में सर्बिया दूतावास में की जायेगी।

इसके बाद इस फिल्म की स्क्रीनिंग मार्च 2018 में मसूरी में होने वाले ‘माऊंटन राइटर्स फेस्टिवल’ में होगी। फिल्म के कलाकार विक्टर बैनर्जी कहते हैं कि, “मैं इस स्निंक्रीनिंग को लेकर खासा उत्साहित हूं क्योंकि ये पहला मौकै होगा कि जिन लोगों और जिनकी जिंदगियों पर ये फिल्म बनी है वो इसे देख पायेंगे।” इसके बाद ये फिल्म केदार कैंप साइट, चमोली में भी दिखाई जायेगी।

हिंदी, इंग्लिश और गढ़वाली में बनी इस पिल्म की ज्यादातर शूटिंग गढ़वाल की खूबसूरत वादियों मे हुी है। ये फिल्म उत्तराखंड के एक साधारण से पहाड़ी गांव पर आधारित है और पहाड़ों के मुद्दों खासतौर पर जात-पात और लिंग भेद-भाव जैसे ज्वलंत मसलों को छूती है। 

प्रोफेसर डी.आर पुरोहित जो फिल्म यूनिट के साथ रिर्सचर और स्क्रीप्ट कन्सलटेंट के तौर पर काम किया और शूटिंग के दौरान देवल, त्यूणी, जागधार, गुप्तकाशी के सुरीटोटा गांवों में यूनिट के साथ रहें, अाज महसूस करते है कि, “अगर केवल राज्य सरकार ने उत्तराखंड की खूबसबरती को नजरअंदाज़ ना किया होता और फिल्मों के माध्यम से गढ़वाल पहाड़ो की असली खुबसूरती को लोगों के सामने लाये होते जैसे कि गोरान एस्काविच ने ‘देवभूमी’ में दिखाया है, तो आज उत्तराखंड पर्यटन अलग ही ऊंचाईयों पर होता।”  

स्विजरलेंड की मशीनों से ऊंन की बढ़ेगी गुणवत्ता

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पिथौरागढ़- ऊन की गुणवत्ता को बढाने और भेड पालकों को उचीत लाभ मिल सके इसके लिए पहली बार प्रशासन ने नई पहल शुरु की है, जिसके लिेए स्विजरलेंड से खास मशीने मंगाई गयी है, जो ना केवल बहतर तरीके से ऊन निकालेंगी बल्कि ऊन की गुणवत्ता को भी बढायेंगी।

माइग्रेशन पर घाटियों की ओर आने वाली हिमालयी भेड़ों की ऊन इस बार स्विटजरलैंड से मंगाई गई मशीनों से उतारी जाएगी। इसके लिए दो मशीनें जिले में पहुंच चुकी है। विदेशी मशीन से ऊन की गुणवत्ता बेहतर होगी और भेड़ पालकों को बाजार में इसका अच्छा दाम भी मिलेगा।

उत्तराखंड के तीन सीमांत जनपद पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और चमोली में सदियों से भेड़ पालन होता रहा है। हजारों परिवार भेड़ों का ऊन निकालकर अपनी आजीविका चलाते हैं। इसी ऊन से सीमांत का दन कालीन उद्योग संचालित होता है। तीनों जिलों के भेड़ पालक पिछले कुछ वर्षों तक हाथ से ही ऊन उतारने का काम करते थे, लेकिन इस प्रक्रिया से ऊन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और सीमांत का ऊन देश के अन्य हिस्सों में उत्पादित होने ऊन से पिछड़ रहा था। इससे ऊन उत्पादन सिमटने लगा था। इसे देखते हुए पशुपालन विभाग ने दो वर्ष पूर्व प्रयोग के लिए आस्ट्रेलिया से ऊन उतारने की मशीनें मंगाई थी। आकार में बड़ी इन मशीनों को पिथौरागढ़ जिले के बारापट्टा और पांगू भेड़ पालन फार्म में स्थापित किया गया था। भेड़ पालक अपनी भेड़ों का फार्म में लाकर ऊन उतार रहे थे, लेकिन मशीनें एक ही स्थान पर स्थापित होने के कारण दूर-दूर फैले गांवों में रहने वाले भेड़ पालकों का इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था।

पशुपालन विभाग ने इस समस्या का हल निकालने के लिए दुनिया भर में मशीन तैयार करने वाले देशों से सम्पर्क किया और स्विटजरलैंड में बनने वाली मशीनों को उपयुक्त पाया। मशीन चयन करने वाली तकनीकी समिति के सदस्य उपमुख्य पशुपालन अधिकारी डॉ.पंकज जोशी ने बताया कि स्विटजरलैंड की मशीनें पूर्व में आस्ट्रेलिया से मंगाई गई मशीनों से आकार में छोटी और सस्ती हैं। मशीनें जिले में पहुंच चुकी हैं। इस बार भेड़ पालक अपने क्षेत्र में ही इन मशीनों से ऊन निकाल सकेंगे।

सूर्य देव को दिया गया पहला अर्ध्य,दूर-दूर से छठ मनाने ऋषिकेश पहुचे श्रद्धालु

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फोटोः कृष्णा रावत

ऋषिकेश। ऋषिकेश में पुर्वान्चालियो के पर्व छठ की की रौनक देखने लायक है, इस पर्व को मानाने के लीये उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्वांचली बड़ी संख्या में ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पहुँचे और छठ पूजा को बड़े हर्षो उल्लास के साथ मनाया। ऋषिकेश के त्रिवणी घाट में इस पर्व को लेकर काफी रौनक देखने को मिली श्रद्धालुयों ने डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया।

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ऋषिकेश उत्तराखंड का मिनी पूर्वांचल कहा जाता है यहाँ गंगा के तट पर छट की रोनक देखने लायक होती है, हर साल की तरह ऋषिकेश के त्रिवेणी के संगम पर सूर्य को पहला अर्ध्य देने के लिए श्रद्धालु जुटे, देश भर के अलग अलग राज्यों से श्रद्धालु छठ पूजा के लिए ऋषिकेश के गंगा घाटों पर पहुचे और गंगा के तटों पर पंडाल बनाके पूजा-अर्चना की और डूबता सूरज को अर्ध्य दिया। इस मौके पर हजारों की सख्या में श्रद्धालुओं ने गंगा में आस्था की डुपकी भी लगाई।छठ पर्व को उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ मानते है, इस पर्व को मानाने के लिए बड़ी संख्या में लोग माँ गंगा के आशीर्वाद के साथ सूर्य देव को अर्क देने ऋषिकेश पहुँचे। इस बार छठ पर्व में पिछले सालों के मुकाबले काफी रौनक देखने को मिली, देशी के साथ साथ विदेशी मेहमान भी इस मौके पर नाचते गाते दिखे।

हर बार ऋषिकेश में छठ पर्व को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है, पुर्वान्चालियो के इस पर्व को मानाने के लिए देशी-विदेसी श्रद्धालु छठ मैया को प्र्शन करने यहाँ आते है।

 

गणेश सैली की किताब से मसूरी में हुआ मोदी का स्वागत

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पहली बार मसूरी आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत मसूरी ने कुछ अलग अंदाज़ में किया। दो दिनों के दौरे पर मसूरी पहुंचने पर मोदी को मशहूर लेखक गणेश सैली की किताब भेट की गई। पीएम के स्वागत के लिए मसूरी हैलीपैड पर पहुंचे दस लोगों में मसूरी के पूर्व मेयर ओ.पी उनियाल भी थे। अतिथियों के स्वागत में फूल देने की परंपरा को तोड़ते हुए उनियाल ने पीएम का स्वागत करते हुए उन्हें लेखक गणेश सैली की किताब “मसूरी मेडली” भेंट की। इस मौके पर उनियाल ने कहा कि प्रधानमंत्री पहले भी स्वागत में फूल देने की जगह किताब देने की पैरवी करते रहे हैं। मैने पीएम की इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्हें गणेश सैली की किताब भेंट की।

यह किताब कैंब्रिज बुक डिपो से ली गई और यह साल 2010 में नियोगी बुक्स नेे मसूरी मेडलीः टेल्स ऑफ इस्टर ईयर के नाम से प्रकाशित की थी। मसूरी मेडली में पहाड़ों की रानी मसूरी के इतिहास औऱ मौजूदा समय के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह किताब बहुत ही ज्ञानवर्धक है,जिसमें पहाड़ो की रानी से जुड़ी घटनाएं जीवंत होती है। इस किताब में मसूरी के स्कैंडल, इतिहास,और खास बाते हैं जिसके साथ रंग-बिरंगी तस्वीरें सभी शब्दों को और भी प्रभावशाली बना देती हैं।
इस अवसर पर गणेश सैली ने कहा कि, “मुझे यह सुनकर बहुत खुशी हुई है कि मसूरी के बारे में पीएम को मेरी किताब से जानकारी मिलेगी। इस किताब को लिखने में लगभग 5 साल लगे और किताब में छपी तस्वीरें लगभग 40 साल पुरानी।” सैली ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि “यह किताब किसी ना किसी तरीके से मसूरी को एक स्मार्ट हिल स्टेशन बनाने में मददगार साबित हुई और शायद आगे भी होगी।”

गौरतलब है कि खुद पीएम भी कई बार अाधिकारिक स्वागत समारहों में फूलों की बजाय किताब जैसी चीजें देने की बात कहते रहे हैं। ऐसे में मसूरी ने पीएम का स्वागत करने के लिये उन्ही की सलाह पर अमल कर के एक नई मिसाल पेश की है।