दीवाली के एक महीने बाद पहाड़ो में मनाई जाती है “बुग्वाल” दीवाली

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जब सारी दुनिया क्रिसमस की तैयारियों में जुटी होती है,तब उत्तराखंड के जौनसार के पहाड़ों में और गढ़वाल के जौनपुर में, एक दिवाली मनाी जाती है। जी हां ये जानकार शायद आपको यकीन नही होगा लेकिन दिवाली के ठीक एक महीने बाद मनाई जाने वाी इस दिवाली को यहां के लोग इसे बुग्वाल, बग्वाली कहते हैं और बहुत धूमधाम से मनाते हैं।

जौनपुर के कैम्प्टी गांव जिसमें तकरीबन एक हजार परिवार हैं उन 700 गांवों मे से है जो जौनसार और जौनपुर बेल्ट में फैला हुआ है। यहां के लोग इस दिवाली को मनाते हैं जिसें वहां की भाषा में बुग्वाल/बग्वाली कहतें हैं। यहां मनाये जाने वाला ये चार-पाँच दिन का उत्सव महिलाओं के दिल के बहुत करीब है और इसकी खास जगह है इनकी जिंदगी में, क्योंकि उनके लिए यह एक सलाना उत्सव होता है जिसमें वो पुरी ठाठ-बाट से हिस्सा लेती हैं। प्यारो देवी जो कि क्यारी गांव से है कहती हैं कि “इस त्योहार का हमारे दिल में खास स्थान है, हम सब अपने गांव-घर वापस आते हैं ताकि अपने परिवार के साथ थोड़ा समय बिता सके, हम गाने बजाने के साथ ऩृत्य भी करते हैं और लोगों से मिलते जुलते हैं। हम बेसब्री से बुग्वाल का इंतज़ार करते हैं।”

जबकि सारी महिलाएं उन सभी कामें में व्यस्त होती हैं जो उन्हें सबसे अच्छे से आता है, वो तरह तरह के पकवान बनाती हैं और उनको गांवों में बांटती हैं। खुले आसमान के नीचे आदमियों का जत्था कतार बना कर घर के बाहर खड़ा होकर ढोल बजाता है और साथ में गाता भी है।समय के साथ साथ सालों पुरानी इस परंपरा का प्रचलन भी बदल रहा है। पहाड़ों से हो रहा पलायन इसका एक बड़ा कारण है। गांव के बड़े-बूढों के लिए इस त्योहार के मायने बदल गए हैं, टिकाराम बदरी कहते हैं कि “यहां का युवा वर्ग पहाड़ों को छोड़कर आस-पास के शहरों में लुभावनी नौकरी के लिए बस गए हैं, जिसमें से बहुत तो त्योहारें में भी वापस नहीं आते” वो बताते हैं कि जब हम जवान थे यहां बहुत कुछ होता था जैसे कि पंडाल लगते थे, रोशनी होती थी लेकिन धीरे-धीरे हमारी परंपरा अपनी पहचान खो रही है।

 यह त्योहार लगभग 45 दिन तक चलता है। मान्यता ये है कि ये त्योहार योद्धा माधो सिंह भंडारी की वीरता के उत्सव के रूप में मनाया जाता है, भंडारी वो योध्दा हैं जिन्होने गढ़वाल और तिब्बत की सीमाओं को सील किया था यही सीमा को आज की मैक मोहन लाइन के रूप में भी जाना जाता है। लेकिन समय बदल रहा और बड़े-बूढ़ों को यह डर है कि कहीं उनका गांव भी इस परंपरा को भूल ना जाए।