21 वर्षों में प्रदेश ने काफी कुछ पाया और खोया भी

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उत्तराखंड

जिस राज्य की प्राप्ति के लिए तमाम लोगों ने अपना बलिदान दिया और सैकड़ों नहीं हजारों आंदोलनकारियों ने आंदोलन के माध्यम से उत्तराखंड को मूर्त रूप दिया है, आज वह प्रदेश अपना 21वां स्थापना दिवस मना रहा है। ऐसे हम सबके लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि राज्य स्थापना दिवस के इन 21 वर्षों में हमने क्या खोया और क्या पाया।

उत्तराखंड राज्य 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना था। बंटवारे के समय हम पर ढाई हजार करोड़ का कर्ज था जो अब बढ़कर 55 हजार करोड़ हो गया है। आर्थिक स्थिति यह है कि सरकार को 200 से 300 करोड़ रुपये ऋण बाजार से उठाना पड़ रहा है जिसका अब तक कोई समाधान नहीं मिला है। ऐसा नहीं है कि प्रदेश में विकास नहीं हुआ। वर्ष 2000 में स्थापित इस राज्य में अंतरिम सरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के नेतृत्व में बनी और 2002 में चयनित सरकार पंडित नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में आयी। अंतरिम सरकार भाजपा की और चयनित सरकार कांग्रेस की।

भाजपा के प्रधामनंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पृथक उत्तराखंड बनाया था। जनता ने भाजपा के स्थान पर कांग्रेस को चुना। इसे सुयोग कहेंगे कि पहली बार राष्ट्रीय छवि के पंडित नारायण दत्त तिवारी चयनित सरकार के मुख्यमंत्री बने। तिवारी सरकार में औद्योगिक विकास को नया उछाल मिला, लेकिन छूट समाप्त होने के बाद उद्योगों ने अपने कारोबार समेट लिए।

इन 21 सालों में जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर अप्रत्याशित रूप से विकास हुआ जिसका लाभ प्रदेश को मिल रहा है। टिहरी जल विद्युत परियोजना तत्कालीन मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के कार्यकाल में मूर्त रूप ले चुकी थी वह आज बड़ी परियोजना के रूप में काम कर रही है। कई अन्य विद्युत परियोजनाएं भी पूर्ण हो गई है जो प्रदेश के विकास में अपना योगदान दे रही है। पृथक उत्तराखंड राज्य बनने के बाद और पहले भी यहां प्राकृतिक आपदाओं की भरमार थी। 2021 की आपदा में पहली बार ऐसा हुआ है जब क्षति काफी कम हुई है अन्यथा हर बार भारी क्षति होती थी। 2013 की आपदा को लोग आज तक नहीं भूले हैं जिसमें हजारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।

राजनीतिक रूप से पुष्ट उत्तराखंड में 21 सालों में 70 विधानसभा वाले इस छोटे से राज्य में आया राम गया राम की परंपरा भी खूब पनपी। कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत के कार्यकाल में जो दल बदल का कार्य हुआ था उससे आज तक यह राज्य उबर नहीं पाया है। वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हरीश रावत के सरकार में 2 मंत्रियों समेत 9 विधायकों ने विधानसभा के भीतर ही दलबदल कर आजाद भारत के इतिहास की पहली अभूतपूर्व घटना बनी। पहली बार सुप्रीम कोर्ट को विधानसभा की कार्यशैली में हस्तक्षेप करना पड़ा।

उत्तराखंड में जहां महिलाओं की स्थति चिंताजनक बनी हुई थी वहीं उत्तराखंड सरकार ने घस्यारी योजना लाकर महिलाओं को बहुत बड़ी सुविधा दी है, साथ ही साथ ‘बेटी बढ़ाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान के तहत काफी हद तक बेटियों को शिक्षित किया गया। विकास का अंदाजा इससे ही लिया जा सकता है कि उत्तराखंड के पांच विशिष्टजनों को पद्म पुरसकार मिले हैं, इनमें हैस्को के डॉ. अनिल जोशी, प्लास्टि सर्जन डॉ. योगी एरन, पर्यावरणविद् कल्याण सिंह रावत, अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ. वीके एस संजय जैसे नाम शामिल है। यह इस प्रदेश की कला, संसकृति विलक्षणता का प्रतीक है।

इतना ही नहीं प्रदेश सरकार ने भी प्रदेश की कुछ विभूतियों को राज्य सम्मान से सम्मानित किया है। इन लोगों पंडित नारायण दत्त तिवारी को यह सम्मान मरणोपरांत यह सम्मान दिया जा रहा है जबकि साहित्यकार रस्किन बॉण्ड, पर्वतारोही बच्छेंद्रीपाल, गायक नरेन्द्र सिंह नेगी तथा पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी को पहली बार उत्तराखंड गौरव सम्मान पुरस्कार दिया जा रहा है जो अपने आप में इन विभूतियों के सम्मान का प्रतीक है। यह स्थिति पत्रकारिता में दिए जाने वाले राम प्रसाद बहुगुणा सम्मान की भी है जिसमें प्रदेश के बुजुर्ग, युवा और महिला पत्रकारों को सम्मानित किया जाता है जो अपने आप में प्रतिभा का सम्मान ही कहा जाएगा।

यह सच है कि पहाड़ी क्षेत्रों में पलायन राज्य का एक बड़ा कारण बन गया है जो अब तक की सरकारों के लिए बड़ी चुनौती रहा है। अब पलायन रोकने के लिए धामी सरकार विशेष योजनाएं ला रही है। निश्चित रूप से इसका लाभ प्रदेश को मिलेगा।