‘मल्लखम्भ’ से छात्र स्वयंसेवकों को बलिष्ठ बनाएगा संघ 

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देहरादून,  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्र भक्ति के साथ-साथ स्वयंसेवकों को अपने देश के पारंपरिक खेल और बच्चों की क्षमता को बढ़ावा देने के लिए भी कृत संकल्पित है। इसी के तहत उत्तराखण्ड में पांच दिवसीय ‘मल्लखम्भ’ शिविर में 175 स्वयंसेवकों ने भाग लेकर पसीना बहाया, इस शिविर का बुधवार को समापन हो गया।
आरएसएस के शरीरिक विभाग ने राज्य के गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में पांच अक्टूबर से आयोजित पांच दिवसीय मल्लखम्भ’ शिविर का आयोजन किया था। राज्य के गढ़वाल के छात्रों के लिए मलखम्भ वर्ग मंडुवाला देहरादून में आयोजित हुआ, जिसमें 95 बच्चे और कुमाऊं के नोजगे पब्लिक स्कूल खटीमा उधमसिंह नगर में 75 छात्रों के साथ आज इसका समापन हुआ।
इस प्रशिक्षण शिविर में आए बच्चे मलखम्भ खेल में अपनी रुचि दिखाते हुए इसकी बारीकियों को सीखा। कार्यक्रमों के दौरान मलखम्भ के छात्रों ने चुस्ती-फुर्ती व बेहतरीन तालमेल के साथ हैरत अंगेज प्रदर्शन किया। इस दौरान छात्रों ने कबड्‌डी व अन्य खेलों और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हुए मलखम्भ एवं योग की शानदार प्रस्तुति दी।
शिविर में केन्द्रीय अधिकारी हुए शामिल
शिविर में संघ के अखिल भारतीय अधिकारी डा. दिनेश भी छात्रों के साथ रह कर खेलों के प्रति हौसला अफजाई की। इसके साथ ही प्रांतीय व देहरादून के विभाग प्रचारक भगवती भी शिविर में रहकर बच्चों का उत्साहवर्धन किया।
बच्चों की बढ़ रही रुचि 
उत्तराखण्ड प्रांत के शरीरिक प्रमुख सुनील ने बताया कि पिछले दो साल से ‘मल्लखम्भ खेलों को बढ़ावा देने के लिए शिविर लगाए जा रहे है। इनके कर्तव्यों को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि इस खेल के प्रति बच्चों की रुचि बढ़ी है। साथ ही हर साल शिविर में छात्रों में की संख्या में इजाफा हो रही है। आगे भी इस खेल को बड़े पर आयोजित कराए जाएंगे। जिससे स्कूली छात्रों की क्षमता का अधिक से अधिक उत्थान किया जा सके। बताया कि शिविर में दस से 15 साल के आयु के छात्र को शामिल रहे। यह छात्र कक्षा 6 से आठ तक पढ़ने वाले हैं।
‘मलखम्भ’ क्या है। 
‘मलखम्भ दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘मल्ल’ (बलवान या योद्धा) तथा ‘खम्भ’ (खम्भा)। मलखम्ब भारत का एक पारम्परिक खेल है जिसमें खिलाड़ी लकड़ी के एक उर्ध्व खम्भे या रस्सी के उपर तरह-तरह के करतब दिखाते हैं। वस्तुतः इसमें प्रयुक्त खम्भ को ‘मल्लखम्भ’ ही कहा जाता है।
ऐसा है मलखम्भ का इतिहास
आधुनिक मलखंभ का इतिहास मराठा शासक बाजीराव पेशवा द्वितीय ने इन खेलों को शुरू कराया। इसका पहला लिखित प्रमाण 1135 ईसवी में लिखित मानसोल्लास किताब में मिलता है, जो सोमेश्वर चालुक्य ने लिखी थी। 1936 में जर्मनी में हिटलर के सामने जब इस खेल का डेमो हुआ तो उसने कहा था कि यही ऐसा खेल है, जिसमें शरीर के सभी अंगों का व्यायाम होता है। वैसे मलखम्भ के बारे में कहा जाता है कि ये सात हजार साल पुराना खेल है और इसका प्रमाण है कि जगन्नाथ पुरी के श्रीराम अखाड़े में सुपाड़ी के पेड़ का मलखम्भ अभी भी है। ये अलग बात है कि तब इस खेल को किसी और नाम से जाना जाता था।