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उत्तराखंड से आने-जाने वाली कई ट्रेनों का रूट डायवर्ट

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मुजफ्फरनगर में शनिवार को कलिंग-उत्कल एक्सप्रेस दुर्घटना के बाद उत्तराखण्ड से आने-जाने वाली कई ट्रेनों के रूट को डायवर्ट किया गया है। जो ट्रेनें पहले दून-सहारनपुर-मेरठ होते हुए दिल्ली जाती थीं, उन्हें मेरठ की जगह शामली से निकाला जा रहा है। इनमें शनिवार शाम दून से गई शताब्दी एक्सप्रेस, रात को निकली नंदा देवी एक्सप्रेस को वाया शामली भेजा गया। रविवार सुबह दून से जाने वाली बांद्रा एक्सप्रेस और ओखा एक्सप्रेस को भी वाया शामली दिल्ली भेजा गया।

12055, नई दिल्ली-देहरादून जनशताब्दी एक्सप्रेस हापुड़ होकर मुरादाबाद के रास्ते आएगी।12205, नई दिल्ली-देहरादून नंदा देवी एक्सप्रेस वाया शामली-टपरी तथा 12018, देहरादून-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस वाया शामली होकर जाएगी, 19020, देहरादून-बांद्रा एक्सप्रेस वाया शामली-हजरत निजामुद्दीन,19032, हरिद्वार-अहमदाबाद योग एक्सप्रेस वाया शामली -दिल्ली शाहदरा होकर जाएगी।

“उड़ान” एक ऐसा स्कूल जो जरूरतमंद बच्चों के सपनों दे रहा है नई उड़ान

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कहते हैं शिक्षा हर बच्चे का अधिकार है लेकिन यह बात सरकारी स्कूलों की दीवारों पर लिखी हुई ही अच्छी लगती है लेकिन प्राथमिक शिक्षा के बाजारीकरण ने आज शिक्षा को सिर्फ एक विशेष वर्ग की पहुंच तक सीमित कर दिया है। निचले वर्ग के लिए सरकारी स्कूल की एक मात्र साधन रह गए हैं जिनकी दुर्दशा किसी से नहीं छुपी है, ऐसे में स्लम एरिया के बच्चों के लिए अंग्रेजी और कंप्यूटर कि शिक्षा के सपनों को साकार करने के लिए ऋषिकेश के युवा डॉक्टर राजे नेगी ने 2015 में 35 बच्चों के साथ ऋषिकेश मैं उड़ान स्कूल की कल्पना को साकार कर दिया हैं।

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स्लम एरिया के बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ बोली भाषा के स्कूल की शुरुआत की जिसमें ₹1 रोज या फिर 1 किलो रद्दी महीने में घरों से इकट्ठे कर बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया जाता है। डॉक्टर राजे नेगी के अनुसार, “उनके परिवार में शिक्षा का माहौल शुरु से रहा, एक सपना था एक ऐसा स्कूल खोलना जो अपनी विशेष तरह की शिक्षा के लिए जाना चाहिए और ऐसा स्कूल बने जो शिक्षा और उत्तराखंड की संस्कृति के साथ-साथ नई पीढ़ी को संस्कार भी दे सके।”

इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए ₹1रोजाना का या फिर 1 किलो रद्दी महीने भर की फीस के रूप में लिया जाता है, जो बच्चे पैसा नहीं दे सकते वह अख़बार की 1 किलो रद्दी स्कूल में जमा करा सकता है। समय-समय पर यहां उत्तराखंड की सेलिब्रिटी आकर बच्चों के साथ समय बिताती हैं और इनके शिक्षा में योगदान करती हैं। वही यहां पढ़ने वाले बच्चों को समय समय पर आने वाले देशी विदेशी अतिथियों के साथ समय बिताकर नई तरह की शिक्षा और संस्कृति का अनुभव सांझा करने का मौका मिलता है।

डॉक्टर नेगी का यह प्रयास है कि बच्चों को उत्तराखंड की बोली भाषा भी सिखाया जाए जिससे आगे चलने पर इन बच्चों को पहाड़ी संस्कृति से रूबरू होने का अनुभव मिलता रहे।

अल्पसंख्यक कल्याण आयोग ने दिए छात्रवृत्ति मामले में जांच के आदेश

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अल्पसंख्यक कल्याण आयोग ने साल 2012-13 के बाद से अब तक बांटी गई छात्रवृत्ति की जांच के आदेश दिए हैं। मामले में आयोग के अध्यक्ष नरेंद्रजीत सिंह बिंद्रा ने सभी जिलाधिकारियों को जांच कर रिपोर्ट भेजने को कहा है।

साल 2015 के बाद से छात्रवृत्ति आॅनलाइन माध्यम से वितरित होने लगी है। इससे पहले छात्रवृत्ति ऑफलाइन माध्यम से वितरित की जाती थी जिसके लिए स्कूलों की ओर से छात्रों की संख्या डिमांड अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को भेजी जाती थी। इसके बाद विभाग उसी के अनुरूप छात्रवृत्ति स्कूलों को आवंटित करने का कार्य करता था। इस अवधि में प्रतिवर्ष पहली से दसवीं कक्षा तक के करीब ढाई लाख बच्चों को छात्रवृत्ति बांटी जाती रही। साल 2015 के बाद छात्रवृत्ति की प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दी गई जिसके चलते अब आवेदनों की संख्या घटकर मात्र 26 हजार पर आ गई है।

घटी संख्या का लिया संज्ञान
स्कलों में आॅनलाइन माध्यम से छात्रवृत्ति देने की प्रक्रिया के बाद छात्रों की संख्या घट गई जिसके बाद अल्पसंख्यक कल्याण आयोग ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए हैं। आयोग को पूर्व में प्रदान की गई छात्रवृत्तियों में बड़े घोटाले की आशंका को देखते हुए यह निर्णय लिया गया। जांच का दूसरा पहलू कम छात्र संख्या के पीछे का कारण भी पता करना है। फिलहाल आयोग ने जिलाधिकारी व मुख्य शिक्षा अधिकारी के माध्यम से जांच कराए जाने का फैसला किया है।

अल्पसंख्यक छात्रों को 10वीं तक की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने को केंद्र और राज्य सरकार की ओर से उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। केंद्र सरकार की ओर से इन छात्रों को ‘अल्पसंख्यक भारत सरकार छात्रवृत्ति योजना’ तो राज्य सरकार की ओर से ‘अल्पसंख्यक राज्य सरकार छात्रवृत्ति योजना’ के तहत छात्रवृत्ति दी जाती है। दोनों छात्रवृत्तियों के लिए अब आॅनलाइन माध्यम से आवेदन करना होता है।

आॅनलाइन प्रणाली लागू होने के बाद अचानक आवेदकों में आई कमी को लेकर बाल अधिकार संरक्षण आयोग भी बेहद गंभीर हैं। मामले में बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को नोटिस जारी किया गया है। आयोग ने कहा कि छात्रवृत्ति की आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन होते ही छात्रों की संख्या ढाई लाख से घटकर 26 हजार कैसे रह गई। आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। 

तनजुन ला तक भारत का क्षेत्र : फोनिया

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उत्तर पूर्व में डोकलाम को लेकर भारत चीन के बीच तनातनी बढ़ रही है। वहीं, उत्तराखंड की सीमा पर भी चीनी सेना की दखल बढ़ रही है। बीते कुछ दिनों में चीनी सेना ने स्थानीय लोगों को धमकाने और भारतीय सीमा में प्रवेश कर अपने मंसूबे साफ किए हैं। उत्तराखंड में भारत-चीन सीमा रेखा को लेकर दोनों देश अपना-अपना दावा कर रहे हैं।

इसी बीच उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के पूर्व पर्यटन मंत्री और भारत तिब्बत व्यापार से जुडे़ पुराने व्यवसायी केदार सिंह फोनिया ने प्रमाणों के आधार पर सनसनी खेज खुलासा किया। उन्होंने कहा कि बडाहोती तो भारत का है ही। अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा बडाहोती से तीन किमी आगे तनजुन ला पर है। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति चा उन लाई की अदुरदर्शिता के कारण भारत के बडाहोती को नौ मेंस लैंड घोषित किया गया।
भारत-चीन सीमा पर चल रहे तनाव के बीच मीडिया से बातचीत में पूर्व भाजपा नेता व मंत्री रही केदार सिंह फोनिया ने बताया कि जब गढ़वाल का विभाजन हुआ तो एक हिस्सा टिहरी नरेश के आधिपत्य में गया और दूसरा ब्रिटिश सरकार के हिस्से में गया। 1814 में ब्रिटिश सरकार और तिब्बती दमाई लामा के बीच समझौता हुआ और गढ़वाल और तिब्बत की सीमा रेखा तनजुन ला घोषित की गई। 1948 व 50 के बीच में तिब्बत पर चीन ने अधिपत्य किया और चीन की सेना बाड़ाहोती के पास तक आ गई।
1956 में दोनों देशों की सेना बाड़ाहोती में काफी नजदीक पहुंच गई थी। जबकि, अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा तनजुन ला थी। चीन सीना सीमा रेखा को लांघते हुए बाडा़होती के पास तक आ गई थी। उन्होंने बताया कि उससे पहले बाड़ाहोती में पीएससी की कंपनी तैनात थी। कंपनी कमांडर पित्रसेन रतुडी थे जो सुभाष चंद्र बोस की सेना में रह चुके थे।
चीन के राष्ट्रपति चा उन लाई और भारत के प्रधानमंत्री नेहरू की अदुरदर्शिता के कारण बाडड़ाहोती में दोनों ओर की सेना तीन-तीन किमी पीछे हटी। जबकि, चीन की सीमा बाड़ाहोती से तीन किमी पीछे तनजुन ला थी, ऐसे में चीनी सेना को छह किलोमीटर पीछे जाना चाहिए था। लेकिन, भारतीय राजनीतिक अदूरदर्शिता के कारण ऐसा हुआ।
फोनिया ने कहा कि वे आजजादी से पहले खुद तनजुन ला के दुसरी ओर व्यापार के लिए जा चुके हैं। 90 वर्षीय फोनिया कहते हैं कि बडाहोती भारत का हिस्सा है। इतना ही तनजुन ला तक भारतीय जमीन है। मूल रूप से भारत और तिब्बत की लाइन आॅफ कंट्रोल तनजुन ला ही है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार को अपनी जमीन वापस लेनी चाहिए। चीन की मौजूदा रणनीति भी यह है कि नौ मैंस लैंड पर कब्जा किया जाए और इसके बाद भारतीय सीमा के आसपास हस्तक्षेप शुरू किया जाए। 

आईएमए कैडेट की इलाज के दौरान मौत

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करियप्पा बटालियन के नवीन क्षेत्री देहरादून स्थित इंडियन मिल्ट्री एकेडमी (आईएमए) में प्रशिक्षण ले रहे थे। अचानक तबियत खराब होने पर नवीन को अस्पताल ले जाया गया जहां उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

पुलिस के मुताबिक शानिवार की रात को आईएमए कैडेट नवीन क्षेत्री, जिला दार्जिलिंग, वेस्ट बंगाल की अचानक तबियत खराब हो गई। नवीन क्षेत्री की तबियत खराब होने पर उन्हें आर्मी अस्पताल में भर्ती कराया गया। यहां नवीन की तबियत और ज्यादा बिगड़ती देख उन्हें महंत इंद्रेश अस्पताल रेफर किया गया, जहां उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। लिस द्वारा आज दिनांक 20/08/17 को  मृतक का पंचायतनामा भर पोस्टमार्टम की कार्यवाही की गई।

अवैध शराब की तस्करी में 2 व्यक्ति गिरफ्तार

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वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक महोदया व पुलिस अधीक्षक ग्रामीण के निर्देशन व क्षेत्राधिकारी ऋषिकेश, प्रभारी निरीक्षक कोतवाली ऋषिकेश के नेतृत्व में ऋषिकेश क्षेत्र में अवैध रूप से नशीले पदार्थो एव शराब की तस्करी करने वालों के विरूद्ध अभियान चलाया गया।

अभियान के दौरान देर रात पुलिस टीम संदिग्ध व्यक्तियों/वाहनों की चैकिंग हेतु क्षेत्र में रवाना थे। चैकिंग के दौरान सूचना प्राप्त हुई कि गुर्ज्जर प्लाट गली नं. 9, में टीटू नाम का एक व्यक्ति अपने एक अन्य साथी के साथ शराब लेकर आये हैं व शराब को टीटू के मकान में छिपाने वाले हैं। पुलिस टीम द्वारा मौके पर जाकर देखा तो दो व्यक्ति गत्ते की खाकी पेटियों को उठाकर सड़क से मकान के गेट में रख रहे हैं। इस पर पुलिस टीम द्वारा एकदम से  राजकुमार उर्फ टीटू व राजू भटनागर को पकड़ लिया। पकड़े गये दोनो व्यक्तियों से पूछताछ की तो उन्होने बताया कि हम लोग इस शराब को ऋषिकेश बेचने के लिये लेकर आये थे। पकड़े गये अभियुक्तों के विरूद्ध आबकारी अधिनियम का अभियोग पंजीकृत किया गया, जिन्हे माननीय न्यायालय पेश किया जायेगा।

यह भी अवगत कराना है कि अभियुक्त राजू भटनागर वर्ष 2003 से लगातार ऋषिकेश तीर्थनगरी में अवैध रूप से शराब तस्करी कर रहा है, जिसके विरूद्ध कोतवाली ऋषिकेश में 56 मुकदमें पंजीकृत हैं। यह थाना ऋषिकेश का हिस्ट्रीशीटर भी है। अभियुक्त राजकुमार के विरूद्ध शराब तस्करी के 5 अभियोग पंजीकृत हैं। दोनो अभियुक्तों को पूर्व में गुण्डा अधिनियम के अन्तर्गत जिलाबदर भी किया गया है।

उल्लेखनीय है कि ऋषिकेश क्षेत्र में अवैध रूप से नशीले पदार्थो की तस्करी व बिक्री के विरूद्ध चलाये जा रहे अभियान के तहत अवैध शराब की तस्करी करने वाले व्यक्तियों के विरूद्ध 260 अभियोग पंजीकृत कर 262 अभियुक्तों को गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार अभियुक्तों के कब्जे 6232 पव्वे देशी शराब, 844 बोतल अंग्रेजी शराब, 48 केन बियर बरामद की गयी तथा 42 दो पहिया व चार पहिया वाहनों को सीज किया गया।

एनडीपीएस एक्ट के अन्तर्गत 24 अभियोगों में 24 अभियुक्तों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जिनके कब्जे से 5 किलो गांजा, 3 किलो 450 ग्राम चरस व 60 ग्राम स्मैक व भारी मात्रा में नशीले कैप्शूल, दवाईयां व इन्जैक्शन बरामद किये गये।

देवप्रयाग से ऋषिकेश जा रहा ट्रक नदी में गिरा, तीन की मौत दो घायल

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देवप्रयाग से ऋषिकेश जा रहा ट्रक UA 09-6016 व्यासी के समीप सड़क से नीचे लगभग 100 मी0 नदी में गिर कर दुर्घटनाग्रस्त हुआ। जिसमे चालक सहित 5 लोग सवार थे। मौके पर 3 मृतक, 2 घायल, घायल ऋषिकेश रेफर। मौके पर पुलिस टीम, खोज बचाव टीम, तहसीलदार पावकीदेवी। खोज बचाव कार्य जारी।

लोक भाषाओं के संरक्षण में ‘उड़ान’ से जगी उम्मीद

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उत्तराखंड राज्य निर्माण की मूल भावना में से एक स्थानीय बोली-भाषाओं का संरक्षण और संवर्द्धन भी था लेकिन अब तक जितनी भी सरकारें आई राज्य में बोली जाने वाली मुख्यत: तीन स्थानीय बोली-भाषा गढ़वाली, कुमाऊनी और जौनसारी के उत्थान के लिए कोई ठोस कदम नही उठा पाई । ऐसे में ऋषिकेश में एक निजी स्कूल उड़ान द्वारा अभिनव पहल शुरू किया गया है जिससे भाषा की समृद्धता के प्रति उम्मीद जगी है।

उत्तराखंड की प्रमुख भाषा गढ़वाली और कुमाऊनी विलुप्त होने की कगार पर है और ऐसे में वहीं, एक आशा की किरण ऋषिकेश के उड़ान स्कूल से जगी है। स्कूल में लोगों की सहायता से गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है । हिन्दी और अंग्रेजी के साथ ही उड़ान स्कूल में एक विषय के तौर पर गढ़वाली और कुमाऊनी भी सिखाई जाती है, जिसके फलस्वरुप यहां पढ़ने वाले बच्चों को फिर चाहे वो गढ़वाली हो या यूपी, बिहार, बंगाल के सभी को गढ़वाली बोली भाषा की समझ आने लगी है।

आशा की किरण उड़ान स्कूल में जरूर दिखती है लेकिन सरकारी प्रयासों के बिना लोकभाषाओं का संरक्षण संभव नहीं है, समय की मांग है कि गढ़वाली, कुमाऊनी जैसी लोकभाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।

उत्तराखंड में लम्बे समय से गढ़वाली और कुमाऊनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने और लोक भाषा एकेडमी के गठन की मांग होती रही है और राज्य में जौनसारी, बुक्सा, थरुआटी, भोटिया और राजी लोकभाषाएं बोलने वाले भी हैं, जिनकी संख्या अधिक नहीं है। राज्य में कुमाऊनी और गढ़वाली बोलने वालों की संख्या लगभग पच्चीस-पच्चीस लाख है, जबकि इन भाषाओं को समझने वालों की संख्या कहीं अधिक है, फिर भी सरकार की ओर से ऐसे कार्यो में अभी तक दिलचस्पी नही दिख रही है।

उड़ान स्कूल के संचालक डॉ. राजे नेगी ने बताया कि, “स्कूल में बच्चों को प्रार्थना भी गढ़वाली में करवाई जाती है और स्कूल का मकसद है कि नई पीढ़ी को लोकभाषा गढ़वाली और कुमाऊनी के प्रति रुची जगाना है।” 

मसूरी की 100 साल से भी पुरानी एतिहासिक जनमाष्टमी

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जनमाष्टमी, हिन्दुओं का मुख्य त्यौहार है, अौर पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में, खासकर पहाड़ों की रानी मसूरी में जनमाष्टमी की महत्ता अलग ही है। सनातन धर्म मंदिर समिति के अंर्तगत आने वाले राकेश अग्रवाल इस पुरानी परंपरा को अाज भी जीवित रख रहे हैं।टीम न्यूज़पोस्ट से हुई खास बातचीत में राकेश ने बताया कि, “पहले गढ़वाल में केवल मसूरी और इंडो-चाईना बार्डर पर भगवान कृष्ण की डोली जनमाष्टमी पर निकाली जाती थी, अाज 100 साल से ऊपर हो चुके हैं और यह परंपरा मसूरी में चली आ रही है।

जनमाष्टमी का जूलुस हर साल, जनमाष्टमी के बाद आने वाले रविवार को मनाया जाता है। मसूरी के आसपास के गांव जैसे कि क्यारकुली, भट्टा को बलराम और कृष्ण भगवान से जोड़ कर देखा जाता है, इन गांवों के सभी लोग 2-3 दिन तक शहर में हो रहे मेले में अपनी पारंपरिक पोशाक में आकर इस दिन का इंतजार करते थे।

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भगवान कृष्ण की डोली ठीक 1:30 बजे सनातन धर्म मंदिर, लैंडोर बाजार के प्रांगण से निकल कर पूरे शहर में अपने भक्तों के बीच घूम कर, रात 8 बजे मंदिर वापस आती है। लगभग एक दर्जन झांकी जिनमें छोटे-छोटे बच्चें कृष्ण-राधा की तरह तैयार होकर झांकियों के साथ आने वाली गाड़ियों के उपर बैठते हैं। इस दिन के लिए उत्तराखंड संस्कृति विभाग भी अपनी दो झांकियां यहां भेजता हैं।

हजारों की संख्या में लोग मसूरी की सकरी गलियों में इकठ्ठा होकर भगवान कृष्ण की झांकी में फूलों की बारिश करते हैं और आर्शीवाद ग्रहण करते हैं। यह जूलुस मसूरी के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन चुका है जिसे आने वाली पीढ़ियां अभी जुड़ नहीं रही हैं, राकेश जी कहते हैं कि, “हम परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं, आगे आने वाली पीढ़ी को अलग ही चुनौतिय़ों और चिंताओं से गुजरना है।”

लेकिन अाज भी सब खोया नहीं है, अाने वाली पीढ़ी में बहुत से जुजहारू यूवा है जैसे कि निखिल ⁠⁠⁠⁠⁠अग्रवाल जिनका मानना है कि, “हम अपने बड़ों से सीख रहे हैं, और हमेशा कोशिश यह रहती है कि हम इस परंपरा को आगे लेकर जाए और पिछली पीढ़ी से भी अच्छा करें।

जागेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति गठन को लेकर प्रशासन भी असमंजस में

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एक ओर राजनैतिक दलों के सदस्य, जागेश्वर मंदिर,अल्मोड़ा के प्रबंधन समिति  के पदों पर कब्जा जमाने को बेताब हैं। दूसरी ओर अंतिम सूची तैयार करने में प्रशासन के पसीने छूटे हुए हैं। प्रबंधन समिति का गठन आला अधिकारियों के लिए गले की फांस बना हुआ है। इसी का नतीजा है कि एक माह बीतने के बावजूद अधिकारी सूची को राज्यपाल तक नहीं पहुँचा पाए हैं।

दरअसल, जागेश्वर प्रबंधन समिति का कार्यकाल बीते जून में ही खत्म हो गया था। लिहाजा तत्कालीन डीएम सविन बंसल ने बीते 28 मई को कमेटी गठन की विज्ञप्ति जारी कर दी थी। आवेदन के लिए भाजपा नेताओं का जमावड़ा लग गया था। जिसमे प्रदेश से लेकर मंडल स्तर के भाजपाइयों ने आवेदन किये थे। इस मामले ने मीडया में खूब सुर्खियां बटोरी थी। मामला संज्ञान में आते ही डीएम ने मामले की जांच आनन-फानन में एलआईयू को शौप दी थी। एलआईयू जांच में छह भाजपाई और दो कांग्रेसियों द्वारा कमेटी में पद के लिये आवेदन की पुष्टि हुई थी। लिहाजा डीएम ने पूरी प्रक्रिया को  निरस्त कर दिया था। इससे प्रदेश की राजनीति में भी भूचाल आ गया था।

इसके बाद एक जुलाई को प्रशासन की ओर से दोबारा विज्ञप्ति जारी की गई थी। सूत्रों के मुताबिक पहली मर्तबा राजनैतिक कारणों से जिन नेताओं का आवेदन निरस्त किया गया था, उन्होंने दोबारा आवेदन कर दिए थे। वह नेता पद हथियाने को एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।20 जुलाई को आवेदन की अंतिम तिथि रखी गई थी। इस बार प्रबन्धक पद के लिए 16 जबकि उपाध्यक्ष पद कब लिए चार आवेदन सामने आए हैं। सूत्रों के मुताबिक पार्टी से जुड़े नेताओं के नाम आगे बढ़ाने के लिए अधिकारियों पर जबर्दस्त प्रेसर पड़ रहा है। यदि प्रशासन छह नेताओं के नाम आगे फारवर्ड करता है तो छह वास्तविक दावेदार बाहर हो जाते हैं। ऐसे हालात में बड़ा बवाल होने की भी पूरी आशंका अधिकारी जता रहे हैं। लिहाजा वह अब भी असमंजस में पड़े हुए।
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एलआईयू रिपोर्ट और विज्ञप्ति बन रही है फ़ांस
पिछले डीएम ने आवेदन पत्रों की जांच एलआईयू से कराई थी। तब एलआईयू ने जो रिपार्ट डीएम को सौंपी थी उनमे सभी अयोग्य आवेदकों के नाम, राजनीतिक पद, नेताओं से सम्बंध और राजनैतिक बैकग्राउंड का पूरा जिक्र किया है। इसके अलावा तत्कालीन डीएम ने अखबारों में दूसरी बार जो विज्ञप्ति जारी की है उसमें एलआईयू की रिपोर्ट का साफ-साफ हवाला देते हुए सात आवेदकों के राजनीति से जुड़े होने के कारण आवेदन निरस्त करने का जिक्र किया है। ऐसे हालात में तमाम दबावों के बाद भी अधिकारी अपनी कलम नहीं फसाना चाहते हैं।

कोर्ट जाने की भी तैयारियां पूरी
सूत्रों के मुताबिक वास्तविक दावेदार प्रसाशन के हर मूवमेंट पर नजर रखे हुए हैं। उन दावेदारों का मानना है कि प्रशासन योग्य लोगों की पैरवी करे। राजनैतिक व्यक्ति के चयन होने पर योग्य दावेदारों ने मामले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की ठानी हैं। बाकायदा उन्होंने तमाम साक्ष्य भी एकत्र कर लिए हैं।

जिले के कुछ नेता दे रहे दखल
सूत्रों के मुताबिक बीते चुनाव में सहयोग के एवज में जिले के  नेता अपने कार्यकर्ताओं को मंदिर कमेटी में बिठाने को आमादा हैं। ये नेता नियम विरूद्ध तरीके से अपने कार्यकर्ताओं को पद दिलाने के लिए सत्ता की हनक अधिकारियों पर गांठ रहे हैं। इससे लोगों में खासा आक्रोश भी व्याप्त है। सूत्रों के मुताबिक मंदिर में दखल दे रहे नेताओं की शिकायत उसी पार्टी के कुछ नेता राष्टीय स्तर के दो शीर्ष नेताओं तक पहुंचा चुके हैं। आने वाले दिनों में ऐसे नेताओं के खिलाफ पार्टी स्तर पर  कार्रवाई की सम्भावना भी जताई जा रही है। इलाके के युवा भी ऐसी भृष्ट सोच रखने वाले नेताओं को चुनाव में सबक सिखाने का मन बना चुके हैं।