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गोदाम में लगी आग, लाखों का नुकसान

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रामनगर-ग्राम चिलकिया में सुबह चावल के गोदाम में आग लग गई। डेढ़ घंटे की मशक्कत के बाद फायर कर्मियों ने आग पर काबू पाया। चिलकिया में जगदीश राइस मिल के नाम से चावल का गोदाम है। सुबह चार बजे चौकीदार ने गोदाम के भीतर से धुआं उठता देखा। उसने पहले मालिक जगदीश और फिर फायर कर्मियों को सूचना दी।

फायर कर्मियों ने मौके पर पहुंचकर ताले तोड़कर आग को बुझाने का प्रयास किया। आग फैलती देख दूसरा वाहन भी मौके पर बुलाया गया। इसके बाद आग को बुझाया जा सका। आग लगने से चावल के कट्टे और बारदाना जल गया। अग्निशमन अधिकारी किशोर उपाध्याय ने बताया कि आग लगने से करीब 7 लाख रुपये कीमत के चावल का नुकसान हुआ है।

पिंडर घाटी की पहाडियों पर फहराया तिरंगा

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अल्मोड़ा- रॉक लिजर्ड सोसायटी के 2 सदस्यीय दल ने पिंडर घाटी की पहाड़ी बल्ज्यूरी पर फतह पाने में सफलता हासिल की है। सात दिन के इस अभियान के बाद दल के सदस्यों ने इस पर्वत पर तिरंगा फहराकर साहसिक पर्यटन की अनूठी मिशाल भी पेश की है।

इस पर्वतारोही दल को बीते 7 अक्टूबर को जिला विकास अधिकारी मो. असलम और जिला कार्यक्रम अधिकारी पीएस बृजवाल ने हरी झंडी दिखाकर अल्मोड़ा से रवाना किया था। जिसके बाद इस दल ने बागेश्वर के खरकिया नामक स्थान से अपनी पैदल यात्रा शुरू की। दल के दोनों सदस्यों ने पिंडारी ग्लेशियर पर अपना बेस कैंप बनाया और 42 सौ मीटर की चढ़ाई चढ़ने के बाद दूसरा कैंप स्थापित किया। दूसरे कैंप से बर्फीली चढ़ाई पार कर दोनों सदस्यों ने 5922 मीटर की ऊंचाई वाले पर्वत पर तिरंगा फहराने में सफलता हासिल की। दल ने एल्पाइन स्टाइल में 7 दिन के रिकार्ड समय में बिना किसी मदद के यह अभियान पूरा किया। अभियान के दौरान दल ने मार्ग में पढ़ने वाले खाती, बाछम, द्वाली गांवों में सफाई अभियान चलाकर लोगों को सफाई के प्रति जागरूक भी किया। दल में शामिल पर्वतारोही विनोद भट्ट और दीपेश नेगी ने बताया कि रॉक लिजर्ड संस्था साहसिक खेलों को बढ़ावा देने वाली भारतीय पर्वतारोहण संस्थान दिल्ली से संबंद्ध एकमात्र संस्था है।

सर्बियाई दूतावास में दिखाई जायेंगी ‘देवभूमि’

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मशहूर सर्बियाई निर्देशक गोरान पस्काविच की फिल्म ‘देवभूमि’ ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कामयाबी की कहानियां लिखी हैं। ये फिल्म उत्तराखंड और इससे जुड़ी मानयताअों पर आधारित है, इस पिल्म में मुख्य भूमिका में विक्टर बैनर्जी हैं। अगले साल भारत-सर्बिया के संबंधों के 70 साल मनाने के लिये इस फिल्म की स्क्रीनिंग दिल्ली में सर्बिया दूतावास में की जायेगी।

इसके बाद इस फिल्म की स्क्रीनिंग मार्च 2018 में मसूरी में होने वाले ‘माऊंटन राइटर्स फेस्टिवल’ में होगी। फिल्म के कलाकार विक्टर बैनर्जी कहते हैं कि, “मैं इस स्निंक्रीनिंग को लेकर खासा उत्साहित हूं क्योंकि ये पहला मौकै होगा कि जिन लोगों और जिनकी जिंदगियों पर ये फिल्म बनी है वो इसे देख पायेंगे।” इसके बाद ये फिल्म केदार कैंप साइट, चमोली में भी दिखाई जायेगी।

हिंदी, इंग्लिश और गढ़वाली में बनी इस पिल्म की ज्यादातर शूटिंग गढ़वाल की खूबसूरत वादियों मे हुी है। ये फिल्म उत्तराखंड के एक साधारण से पहाड़ी गांव पर आधारित है और पहाड़ों के मुद्दों खासतौर पर जात-पात और लिंग भेद-भाव जैसे ज्वलंत मसलों को छूती है। 

प्रोफेसर डी.आर पुरोहित जो फिल्म यूनिट के साथ रिर्सचर और स्क्रीप्ट कन्सलटेंट के तौर पर काम किया और शूटिंग के दौरान देवल, त्यूणी, जागधार, गुप्तकाशी के सुरीटोटा गांवों में यूनिट के साथ रहें, अाज महसूस करते है कि, “अगर केवल राज्य सरकार ने उत्तराखंड की खूबसबरती को नजरअंदाज़ ना किया होता और फिल्मों के माध्यम से गढ़वाल पहाड़ो की असली खुबसूरती को लोगों के सामने लाये होते जैसे कि गोरान एस्काविच ने ‘देवभूमी’ में दिखाया है, तो आज उत्तराखंड पर्यटन अलग ही ऊंचाईयों पर होता।”  

स्विजरलेंड की मशीनों से ऊंन की बढ़ेगी गुणवत्ता

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पिथौरागढ़- ऊन की गुणवत्ता को बढाने और भेड पालकों को उचीत लाभ मिल सके इसके लिए पहली बार प्रशासन ने नई पहल शुरु की है, जिसके लिेए स्विजरलेंड से खास मशीने मंगाई गयी है, जो ना केवल बहतर तरीके से ऊन निकालेंगी बल्कि ऊन की गुणवत्ता को भी बढायेंगी।

माइग्रेशन पर घाटियों की ओर आने वाली हिमालयी भेड़ों की ऊन इस बार स्विटजरलैंड से मंगाई गई मशीनों से उतारी जाएगी। इसके लिए दो मशीनें जिले में पहुंच चुकी है। विदेशी मशीन से ऊन की गुणवत्ता बेहतर होगी और भेड़ पालकों को बाजार में इसका अच्छा दाम भी मिलेगा।

उत्तराखंड के तीन सीमांत जनपद पिथौरागढ़, उत्तरकाशी और चमोली में सदियों से भेड़ पालन होता रहा है। हजारों परिवार भेड़ों का ऊन निकालकर अपनी आजीविका चलाते हैं। इसी ऊन से सीमांत का दन कालीन उद्योग संचालित होता है। तीनों जिलों के भेड़ पालक पिछले कुछ वर्षों तक हाथ से ही ऊन उतारने का काम करते थे, लेकिन इस प्रक्रिया से ऊन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी और सीमांत का ऊन देश के अन्य हिस्सों में उत्पादित होने ऊन से पिछड़ रहा था। इससे ऊन उत्पादन सिमटने लगा था। इसे देखते हुए पशुपालन विभाग ने दो वर्ष पूर्व प्रयोग के लिए आस्ट्रेलिया से ऊन उतारने की मशीनें मंगाई थी। आकार में बड़ी इन मशीनों को पिथौरागढ़ जिले के बारापट्टा और पांगू भेड़ पालन फार्म में स्थापित किया गया था। भेड़ पालक अपनी भेड़ों का फार्म में लाकर ऊन उतार रहे थे, लेकिन मशीनें एक ही स्थान पर स्थापित होने के कारण दूर-दूर फैले गांवों में रहने वाले भेड़ पालकों का इसका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था।

पशुपालन विभाग ने इस समस्या का हल निकालने के लिए दुनिया भर में मशीन तैयार करने वाले देशों से सम्पर्क किया और स्विटजरलैंड में बनने वाली मशीनों को उपयुक्त पाया। मशीन चयन करने वाली तकनीकी समिति के सदस्य उपमुख्य पशुपालन अधिकारी डॉ.पंकज जोशी ने बताया कि स्विटजरलैंड की मशीनें पूर्व में आस्ट्रेलिया से मंगाई गई मशीनों से आकार में छोटी और सस्ती हैं। मशीनें जिले में पहुंच चुकी हैं। इस बार भेड़ पालक अपने क्षेत्र में ही इन मशीनों से ऊन निकाल सकेंगे।

सूर्य देव को दिया गया पहला अर्ध्य,दूर-दूर से छठ मनाने ऋषिकेश पहुचे श्रद्धालु

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फोटोः कृष्णा रावत

ऋषिकेश। ऋषिकेश में पुर्वान्चालियो के पर्व छठ की की रौनक देखने लायक है, इस पर्व को मानाने के लीये उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के पूर्वांचली बड़ी संख्या में ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पहुँचे और छठ पूजा को बड़े हर्षो उल्लास के साथ मनाया। ऋषिकेश के त्रिवणी घाट में इस पर्व को लेकर काफी रौनक देखने को मिली श्रद्धालुयों ने डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया।

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ऋषिकेश उत्तराखंड का मिनी पूर्वांचल कहा जाता है यहाँ गंगा के तट पर छट की रोनक देखने लायक होती है, हर साल की तरह ऋषिकेश के त्रिवेणी के संगम पर सूर्य को पहला अर्ध्य देने के लिए श्रद्धालु जुटे, देश भर के अलग अलग राज्यों से श्रद्धालु छठ पूजा के लिए ऋषिकेश के गंगा घाटों पर पहुचे और गंगा के तटों पर पंडाल बनाके पूजा-अर्चना की और डूबता सूरज को अर्ध्य दिया। इस मौके पर हजारों की सख्या में श्रद्धालुओं ने गंगा में आस्था की डुपकी भी लगाई।छठ पर्व को उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ मानते है, इस पर्व को मानाने के लिए बड़ी संख्या में लोग माँ गंगा के आशीर्वाद के साथ सूर्य देव को अर्क देने ऋषिकेश पहुँचे। इस बार छठ पर्व में पिछले सालों के मुकाबले काफी रौनक देखने को मिली, देशी के साथ साथ विदेशी मेहमान भी इस मौके पर नाचते गाते दिखे।

हर बार ऋषिकेश में छठ पर्व को बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है, पुर्वान्चालियो के इस पर्व को मानाने के लिए देशी-विदेसी श्रद्धालु छठ मैया को प्र्शन करने यहाँ आते है।

 

गणेश सैली की किताब से मसूरी में हुआ मोदी का स्वागत

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पहली बार मसूरी आये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वागत मसूरी ने कुछ अलग अंदाज़ में किया। दो दिनों के दौरे पर मसूरी पहुंचने पर मोदी को मशहूर लेखक गणेश सैली की किताब भेट की गई। पीएम के स्वागत के लिए मसूरी हैलीपैड पर पहुंचे दस लोगों में मसूरी के पूर्व मेयर ओ.पी उनियाल भी थे। अतिथियों के स्वागत में फूल देने की परंपरा को तोड़ते हुए उनियाल ने पीएम का स्वागत करते हुए उन्हें लेखक गणेश सैली की किताब “मसूरी मेडली” भेंट की। इस मौके पर उनियाल ने कहा कि प्रधानमंत्री पहले भी स्वागत में फूल देने की जगह किताब देने की पैरवी करते रहे हैं। मैने पीएम की इसी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उन्हें गणेश सैली की किताब भेंट की।

यह किताब कैंब्रिज बुक डिपो से ली गई और यह साल 2010 में नियोगी बुक्स नेे मसूरी मेडलीः टेल्स ऑफ इस्टर ईयर के नाम से प्रकाशित की थी। मसूरी मेडली में पहाड़ों की रानी मसूरी के इतिहास औऱ मौजूदा समय के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह किताब बहुत ही ज्ञानवर्धक है,जिसमें पहाड़ो की रानी से जुड़ी घटनाएं जीवंत होती है। इस किताब में मसूरी के स्कैंडल, इतिहास,और खास बाते हैं जिसके साथ रंग-बिरंगी तस्वीरें सभी शब्दों को और भी प्रभावशाली बना देती हैं।
इस अवसर पर गणेश सैली ने कहा कि, “मुझे यह सुनकर बहुत खुशी हुई है कि मसूरी के बारे में पीएम को मेरी किताब से जानकारी मिलेगी। इस किताब को लिखने में लगभग 5 साल लगे और किताब में छपी तस्वीरें लगभग 40 साल पुरानी।” सैली ने कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि “यह किताब किसी ना किसी तरीके से मसूरी को एक स्मार्ट हिल स्टेशन बनाने में मददगार साबित हुई और शायद आगे भी होगी।”

गौरतलब है कि खुद पीएम भी कई बार अाधिकारिक स्वागत समारहों में फूलों की बजाय किताब जैसी चीजें देने की बात कहते रहे हैं। ऐसे में मसूरी ने पीएम का स्वागत करने के लिये उन्ही की सलाह पर अमल कर के एक नई मिसाल पेश की है।

उत्तराखंड के मशहूर चित्रकार बी मोहन नेगी का निधन

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पौड़ी। पहाड़ के पैरोकार, साहित्यकार, चित्रकार, व्यंग्यकार  बी. मोहन नेगी का निधन हो गया है। वह करीब 65 साल के थे। वह काफी दिनों से बीमार चल  रहे थे।

मूलरूप से पुण्डोरी गांव पट्टी मनियारस्यूं निवासी नेगी का जन्म देहरादून में हुआ था। वह कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उपचार के दौरान उन्होंने कैलाश हॉस्पिटल देहरादून में अंतिम सांस ली।

बालपन से ही उनका रुझान चित्रकला में था। उन्होंने 70के दशक से कविता पोस्टर में रंग भरना शुरू किया। जो उनकी आखिरी सांस तक चलता रहा। कवि चंद्र कुंवर बर्त्वाल की कविताओं पर उन्होंने सबसे ज्यादा 100कविता पोस्टर रचे। उनके चित्र दिल्ली, मुंबई, सहित कई स्थानों पर प्रदर्शित भी किए गए।

दिल्ली दूरदर्शन ने उनके भोजपत्र पर चित्रकला पर फेश इन द क्राउन नाम से प्रसारित किया। उन्हें चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए हिमगिरी सम्मान, चंद्र कुंवर बर्त्वाल सम्मान सहित अनेक सम्मानो से विभूषित किया गया।

कपिल देव के लिए लंदन पंहुचे रणबीर

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एक तरफ रणबीर सिंह संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती में सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के खूंखार रोल में परदे पर आने की तैयारियां कर रहे हैं, तो दूसरी ओर, रणबीर सिंह अपनी अगली फिल्म के लिए कपिलदेव बनने की तैयारियां शुरु कर रहे हैं।

‘बजरंगी भाईजान’ और ‘ट्यूबलाइट’ के बाद निर्देशक कबीर खान 1983 में क्रिकेट का विश्वकप जीतकर इतिहास रचने वाली भारतीय टीम पर फिल्म बनाने जा रहे हैं, तो रणबीर सिंह इस फिल्म में 1983 की विश्व विजेता टीम के कप्तान कपिल का रोल करने जा रहे हैं और इस रोल की तैयारियों के लिए वे लंदन पंहुच चुके हैं।

मिली जानकारी के अनुसार, लंदन में 15 दिनों तक रणबीर एक कैंप में शामिल होंगे, जहां उनको कपिल और कबीर खान के साथ रहने का मौका मिलेगा। लंदन में ही फिल्म का पहला शेड्यूल होगा, जिससे पहले रणबीर सिंह कपिल की गेंदबाजी के लिए ट्रेनिंग लेंगे। अभी तक ये तय नहीं है कि इस फिल्म की शूटिंग कब से शुरु होगी।

सूत्रों का कहना है कि पहला शेड्यूल दिसंबर के दूसरे सप्ताह में हो सकता है। कपिल के रोल में रणबीर के अलावा टीम के दूसरे खिलाड़ियों के रोल में अभी किसी और कलाकार के नाम की घोषणा नहीं हुई है। कबीर खान का कहना है कि अभी कास्टिंग नहीं की गई है।

छठ पर ठेकुआ की परंपरा सदियों से निभाई जा रही है

ऋषिकेश,  सूर्य की उपासना का पर्व छठ पूर्वांचल से होते हुए उत्तराखंड में भी अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। बड़ी संख्या में यहां रह रहे पूर्वांचली छठ पर अपनी परंपराओं को बखूबी से निभाते हैं, सदियों से हर घर में ठेकुआ बनाया जाता है जो छठ का मुख्य प्रसाद होता है। उत्तराखंड में भी छठ की धूम बनी हुई है, मिनी पूर्वांचल के नाम से जाने वाला ऋषिकेश छठ के रंग में रंग चुका है, 36 घंटे के इस निर्जल उपवास में परंपरा का पूरा निर्वाह किया जाता है।

महिलाएं घर पर शुद्धता के साथ सदियों से चली आ रही ठेकुआ बनाने की परंपरा को निभाती आ रही है जो इस पर्व का मुख्य पकवान होता है और प्रसाद के रूप में इस को बांटा जाता है। शुद्धता और साफ सफाई से पूजा के लिए पूर्वांचली घर में महिलाएं गुड़, घी और गेहूं के आटे से घर में ठेकुआ बनाती है जो देखने में और खाने में अत्यंत ही स्वादिष्ट होता है। व्रत के तीसरे दिन जब उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

उसके पश्चात महिलाएं प्रसाद के रूप में ठेकुआ ग्रहण करती है और इस को बांटा जाता है। खाने में कुरकुरा और खस्ता ठेकुआ हर किसी का मन मोह लेता है। छठ का उपवास सबसे कठिन उपवास माना जाता है जिसमें महिलाएं 36 घंटे उपवास पर रहकर अपनी आस्था को परंपरा के साथ निभाती है।

 

40 दिन बाद भी लापता महंत मोहनदास का कोई सुराग नहीं

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हरिद्वार। स्वामी दीप्तानंद अवधूत आश्रम में महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद महाराज की अध्यक्षता में बैठक हुई। बैठक में स्वामी कृष्णानंद महाराज ने कहा कि लापता कोठारी महंत मोहनदास का 40 दिन बाद भी पता न लगना आश्चर्यजनक घटना है। जबकि, लापता महंत मोहनदास को ढूंढने के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने एड़ी चोटी का जोर लगा लिया, मगर फिर भी पुलिस प्रशासन इस मामले में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई।

स्वामी कृष्णानंद ने कहा कि आज अचानक पुलिस प्रशासन की नींद टूटी तो पुलिस के आला अधिकारियों ने पंचायती बड़ा अखाड़ा उदासीन की तरफ रुख करके कुछ संत महंतों से पूछताछ की। ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन इस मामले की गंभीरता को लेकर सजग हो चुकी है। वहीं हरिद्वार का संत समाज महंत मोहनदास को लेकर अभी भी चिन्तित दिखाई दे रहा है।
40 दिन बीत जाने के बाद भी जब पुलिस के हाथ खाली हैं तो फिर लापता महंत मोहनदास का पता कैसे चलेगा। लापता महंत मोहनदास के बारे में ना ही योगी सरकार कुछ कर पाई और ना ही भोपाल का पुलिस प्रशासन इस मामले में कुछ कर पाई। स्वामी कृष्णानंद महाराज ने कहा कि आखिर महंत मोहनदास को जमीन निगल गई या आसमान जिसका 40 दिन बाद भी अभी तक कोई सुराग न लगा। इस अवसर पर स्वामी प्रकाशानंद, स्वामी स्वरूप ब्रह्मचारी, महंत गोपालदास, म.म. महंत जसमेरदास महंत ब्रह्मानंद, महंत सुखदेवानंद, महंत साधनानंद सहित कई संत महंतों ने लापता महंत मोहनदास के अभी तक ना मिलने पर चिन्ता जताई।