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महिला चीता पुलिस ने बुजुर्ग को सकुशल घर पहुंचाया

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थाना बसंत बिहार की महिला चीता को सूचना मिली कि एक व्यक्ति जोकि पैरालाइज है एवं चलने फिरने मे असमर्थ थे राज विहार पर बैठे हुए है। इस सूचना पर महिला चीता द्वारा उस स्थान पर पहुंचकर पूछा गया तो वह अपना घर का पता भूल गए थे।

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महिला चीता ने ड़ी मुश्किल से उनके घर का पता किया तो पता चला की उनका नाम युसूफ खान है, जोकि संजय कॉलोनी मुस्लिम बस्ती, डालनवाला में रहते है।

महिला चीता ने ऑटो बुक करके बुजुर्ग व्यक्ति को उनके घर सकुशल पहुंचाया, आस पास के लोगों ने चीता पुलिस के कार्य की भूरी भूरी प्रशंसा की गई।

भूमि पर कब्जा पाने के लिए दर-दर भटक रहा बुजुर्ग

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चमोली जिले के घाट विकासखंड के मोठा गांव के बुजुर्ग भूमि पर कब्जा पाने के लिए राजस्व अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। अधिकारी छह माह से उन्हें आश्वासन देकर टरका रहे हैं। अब ग्रामीण ने जिलाधिकारी से मदद की गुहार लगाई है।

विकासखंड घाट का सुदूरवर्ती गांव मोठा गांव के 76 वर्षीय कुंवर सिंह विगत छह माह से अपने खेत को प्राप्त करने के लिए विभागों के चक्कर काट रहा है। इस दौरान गेहूं की बुआई हो रही है, काश्तकार का कहना है कि अगर खेत उसे मिले तो वह गेहूं बोए। परंतु प्रशासन के अधिकारियों की लापरवाही के कारण वह खेतों में गेहूं तक नहीं बो पा रहा है।

मोठा गांव निवासी कुंवर सिह ने अब जिलाधिकारी से मदद की गुहार लगाई है। कुंवर सिंह का कहना है कि वर्ष 1979 में पिता ने मोठा गांव के कृपाल सिंह से 60 नाली भूमि खरीदी थी। उस पर वह उसका परिवार लगातार खेती करता आ रहा था। कुछ समय पूर्व खेतों में बुआई नहीं की तो गांव के अवतार सिंह व शराद सिंह ने बुआई कर दी। अब उन्हें खेत की जरूरत थी तो नहीं दे रहे हैं। हटाने के लिए अधिकारियों की गुहार लगाई गई।

पूर्व में जिलाधिकारी ने मामले में पटवारी गंडासू को मौके पर जाकर तस्दीक करने के निर्देश दिए गए थे। परंतु आज तक मौके की तस्दीक के लिए पटवारी तक नहीं पहुंचा है। वह काश्तकारी के जरिये ही परिवार का पालन पोषण करता है। खेत से कब्जा न हटने के कारण उसके सामने रोजी रोटी का संकट भी गहरा गया है। ग्रामीण का कहना है कि जल्द प्रशासन की ओर से कार्रवाई नहीं की जाती है तो वह न्यायालय की शरण में जाएंगे।

शराब के साथ तीन लोग गिरफ्तार

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पुलिस को अवैध शराब की तस्करी के विरोध में चलाये जा रहे अभियान में सफलता मिली है। हरियाणा से लायी जा रही अवैध 96 बोतल अंग्रेजी शराब व बीयर की 24 केन के साथ तीन लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर वाहन भी सीज कर दिया है।

पुलिस अधीक्षक तृप्ति भट्ट के अनुसार, पुलिस को जानकारी मिली थी कि चमोली जिले के आदिबद्री क्षेत्र में अवैध शराब लायी जा रही है। पुलिस ने वाहनों की चेकिंग में एक कार रोकी तो उसमें सवार तीन लोग हड़बड़ा गये। इनके पास से 98 बोलत अंग्रेजी शराब व 24 केन बीयर की बरामद हुई। आरोपियों में विकास सिंधु, दीपक पांचाल व प्रदीप देशवाल शामिल हैं। इन तीनों के विरुद्ध आबकारी अधिनियम के तहत मामला पंजीकृत कर लिया गया है।

पुलिस के अुनसार, आरोपियों का पहले से अपराधिक इतिहास रहा है। ये पहले भी यहां पर अवैध शराब का धंधा करते थे।

संदिग्ध परिस्थितियों में गोली लगने से प्रोपर्टी डीलर की मौत

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हरिद्वार, शहर कोतवाली क्षेत्रान्तर्गत उत्तरी हरिद्वार इलाके में संदिग्ध परिस्थितियों में हरियाणा के एक प्रॉपर्टी डीलर की उसी की लाइसेंसी रिवाल्वर से गोली लगने से मौत हो गई। मृतक अपने तीन साथियों के साथ हरिद्वार आया था। प्रॉपर्टी डीलर अनिल कुमारअपने साथी रणवीर, प्रदीप और दिनेश के साथ हरिद्वार आया था। अनिल यहां उत्तरी हरिद्वार के सुखधाम आश्रम में अपने मित्रों के साथ ठहरा था। बताते है कि देर रात सन्दिग्ध परिस्थितियों में अनिल के लाइसेंसी रिवाल्वर से गोली चल गई। गोली अनिल के पेट में जा लगी। लहुलुहान हालत में अनिल को कनखल के एक अस्पताल में उपचार के लिए लाया गया। जहां अनिल कुमार की मौत हो गई।

पुलिस पूछताछ में प्रॉपर्टी डीलर के साथियों ने बताया कि अनिल के हाथ से रिवाल्वर छूटकर गिरने पर खुद ही गोली चल गई। सूचना मिलते ही पुलिस अस्पताल पहुंची और शव को कब्जे में ले लिया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय भिजवाया। पुलिस ने रिवाल्वर भी कब्जे में ले लिया है। सूचना पर झज्जर से अनिल के परिजन भी हरिद्वार पहुंच गए हैं। एसपी क्राइम प्रकाश आर्या ने बताया कि पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। पुलिस मामले कि तफ्तीश शुरू कर दी है।

 

पर्यटन स्थल गुच्चु पानी में प्लास्टिक वर्जित

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राजधानी देहरादून के पर्यटन स्थल गुच्चु पानी में अब पानी की बोतल, कुरकुरे, लेज, बिस्कुट एवं अन्य खाद्य सामग्री के उन पैकेटों को ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है जिसमें प्लास्टिक का रैपर लगा होगा। यह निर्देश मंगलवार को देर शाम जिलाधिकारी एस.ए मुरूगेशन ने कैम्प कार्यालय में गुच्चु पानी पर्यटन स्थल डीएमसी की बैठक दिए। बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये।
गुच्चुपानी पर्यटन स्थल पर गेट के भीतर कोई पर्यटक प्लास्टिक के रैपर वाली कोई भी खाद्य सामग्री मुख्य गेट से अन्दर ले जा रहा है तो उस खाद्य सामग्री के प्लास्टिक रैपर पर 10 रुपये का स्टीकर लगाया जायेगा। वह 10 रूपये पर्यटक को तब लौटाया जायेगा जब वह वापस आते समय रैपर गेट पर जमा करायेगा।

वर्तमान में यह व्यवस्था पर्यटन स्थल के अन्दर के नौ दुकानों, कैन्टीन तथा मुख्य गेट पर लागू की गयी है। जिलाधिकारी ने इस व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालन के लिए पीआरडी के माध्यम से दो जवान रखने के निर्देश पर्यटन विभाग को दिये है। जिलाधिकारी ने स्वजल परियोजना के माध्यम से पर्यटन स्थल पर 15 जैविक एवं अजैविक कूड़ेदान लगाने तथा कूड़े के निस्तारण के लिए लगभग 5 लाख की लागत से सेरीगेसन सेन्टर बनेगा, जिससे खाद भी बनाई जायेगी।

जिलाधिकारी ने निर्देश दिये कि सांय पांच बजे के बाद पर्यटन स्थल पर अनाधिकृत प्रवेश प्रतिबन्धित रहेगा, अनाधिकृत प्रवेश रोकने के लिए पर्यटन पर स्थल जाली लगाने के निर्देश दिये, जिससे सांय पांच बजे के बाद पर्यटन स्थल पर कोई अनाधिकृत प्रवेश न कर पाये। जिलाधिकारी ने पर्यटन स्थल पर साफ-सफाई के सौन्दर्यीकरण, कैन्टीन के सामने पार्क का विकास तथा गेट पर चैकीदार की व्यवस्था करने के निर्देश दिये।

सोलहवां पार उदास उत्तराखंड

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प्रदूषण की मार से कराह रहे देश को अपने पहाड़ों, नदियों, जंगलों और हिमनदों से पुरसुकून बनाने के बावजूद उत्तराखंड खुद ठंडी उदासी की चादर में लिपटा हुआ है। उत्तराखंड को अलग राज्य बने सोलह साल पूरे हो गए मगर यहां के मूल निवासियों में इसका कोई उत्साह ही नहीं है। अलबत्ता राज्योत्सव का सरकारी तामझाम और प्रभु वर्ग में उत्सव का उल्लास जाहिर है कि ठाठें मार रहा है। फिर भी लड़कर हासिल किए गए अपने ही राज्य में पहाड़ी जनता आज बेरौनक है। पलायन थमने के बजाए इन 16 साल में जहां दुगुनी गति से हो रहा है वहीं प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती विभीषिका पहाड़ियों का जीवन दिन ब दिन अधिक दुरूह बना रही है। उनके भीतर राज्य के किषोर हो जाने का न कोई उल्लास है और न ही अपना भविश्य सुधरने की कोई उम्मीद।
साल 2000 के नवंबर महीने में अलग राज्य बने उत्तरांचल ने पिछले 16 साल में हालांकि आंकड़ों में तो अच्छी-खासी तरक्की की है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा राज्य में कुल 53487 पंजीकृत उद्योगों का है। राज्य गठन के समय उत्तराखंड क्षेत्र में महज 14,163 पंजीकृत उद्यम थे। चालू माली साल के बजट के अनुसार इन उद्योगों में कुल 11221 करोड़ रूपए मूल्य का पूंजी निवेश हो रखा है। सोलह साल पहले कुल निवेशित पूंजी 700.29 करोड़ रूपए ही थी। इतने सारे नए उद्योग लगने के बावजूद ताज्जुब यह है कि राज्य की 60 फीसद जनता अंत्योदय अन्न योजना में गरीबों को मिलने वाले राशन से जीवनयापन को मजबूर है। जबकि इतने सारे उद्योग लगने के बाद तो राज्य में सारे गरीबों-बेरोजगारों को कमाई का हिल्ला आसानी से मिल जाना चाहिए था!
विडंबना यह है कि रोजगार की तलाश में पहाड़ियों के पलायन का आंकड़ा बढ़कर दुगुना हो गया है। पिछले 16 साल में बनी पांच सरकारों के तमाम जुबानी जमा-खर्च के बावजूद न तो पलायन रूका और न ही खांटी पहाड़ियों की जिंदगी आसान और सुरक्षित हुई। रही-सही कसर उनकी आजीविका के एकमात्र साधन खेती का रकबा 70,000 हेक्टेयर घट कर सात लाख हेक्टेयर रह जाने ने पूरी कर दी। जाहिर है कि यह जमीन उन मगरमच्छों के पेट में हजम हो गई जो उसे किसानों से कौड़ियों के मोल खरीद कर सोने के भाव बेच रहे हैं।

गौरतलब है कि उत्तराखंड का भौगोलिक क्षेत्रफल यूं तो 53.48 लाख हेक्टेयर है मगर इसमें से मात्र 28.50 प्रतिशत क्षेत्र ही मानवीय गतिविधियों के लिए उपलब्ध है। बाकी 71.05 प्रतिशत भूभाग में जंगल फैले हुए हैं जिनकी जमीन के अतिक्रमण पर कानूनन रोक है। इसीलिए राज्य में जमीन बेशकीमती है। इसी वजह से राज्य की अधिकतर दौलत देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर जैसे अपेक्षाकृत मैदानी जिलों में सिमटती जा रही है। ज्यादातर कारोबार भी इन्हीं संपन्न जिलों में ठिठक जाने से सरकार को राजस्व की मोटी कमाई यहीं से हो रही है। लिहाजा आबादी की बसाहट और विकास की दौड़ में भी यही जिले अव्वल हैं। बाकी प्रदेष को इनका नाका पूरने के बाद बची-खुची रकम से ही गुजारा करना पड़ रहा है।
औद्योगिकरण की तरह ही उत्तराखंड में बाल विकास योजनाओं की संख्या भी कई गुना बढ़कर 105 हो गई है। इनके तहत सरकारी आंकड़ों के अनुसार 14,947 आंगनबाड़ी और दूरदराज इलाकों में 5120 लघु आंगनबाड़ी चल रही हैं। इसके बावजूद बाल मृत्यु दर बेकाबू है। राज्य में जनाना-मर्दाना स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की संख्या भी बढ़कर कुल 35014 हो गई है। फिर भी पहाड़ों में जचगी के दौरान जच्चा का जीवन बचा पाना कठिन चुनौती है।
गंगा और यमुना नदियों को अपने 43.70 प्रतिषत भूभाग में संजो कर उत्तराखंड देश के करोड़ों किसानों के खेतों, कारखानों और घरों की प्यास बुझाता है। औसतन 35 करोड़ आबादी का जीवन इन दोनों नदियों पर निर्भर है। ये जहां से गुजरी इन्होंने किसानों-कारोबारियों और पंडों को मालामाल कर दिया। फिर भी इनसे जुड़ी बेशुमार प्राकृतिक आपदाओं की निरंतर मार झेलने वाले पहाड्यिों का कोई पुरसा हाल नहीं है। आश्चर्य यह है कि पर्यटन और बिजली घरों से कमाई बढ़ाने के बुनियादी ढांचे में अरबों रूपए फूंकने को तैयार केंद्र और राज्य की सरकार इन पीड़ितों की सुरक्षा अथवा आजीविका के भरोसेमंद इंतजाम के प्रति से आंखें मूंदे बैठी हैं।
राजनीति ने राज्य में भ्रश्टाचार की जड़ें और गहरी कर दीं। फर्क सिर्फ इतना है कि उत्तर प्रदेश के राज में मैदानी सरकारी अमला, पहाड़ियों के प्रति हिकारत जता कर अपनी जेबें भरता था। अब उत्तराखंड नामकरण के बाद पहाड़ी ही अपने हिमबंधुओं का गला काट रहे हैं। इस तरह पिछले सोलह साल में बड़ी आशा और विश्वास से हासिल किए गए कुदरती ताजगी से भरपूर इस राज्य में दो उत्तराखंड बन गए हैं।
एक उत्तराखंड वो है जिसमें सरकारी नौकरी, ठेकेदारी, नेतागीरी, पर्यटन, बिजलीघर निर्माण, बेशकीमती जमीन की दलाली, औद्योगिकरण और सेना को सप्लाई से मालामाल करीब बीस फीसद जनता है। दूसरा उत्तराखंड वो है जिसमें दिन-रात कुदरती बाधाओं से जूझते, क्यारीदार खेतों में पसीना बहाते, बोझा ढोते, कारखानों में डबल पारी में सिंगल मजदूरी के लिए खटते, दो जून की रोटी की अनिश्चितता में दुबले और बच्चों को पढ़ा-लिखा कर पहाड़ की बेगारी से आजाद कराने को आतुर मां-बाप और उनके बेबस परिवार हैं। (जारी)

17 साल, 8 मुख्यमंत्री और विकास की राह देखता उत्तराखंड

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उत्तराखंड आज अपना 17वां जन्मदिन मना रहा है। पहाड़ी राज्य की कल्पना से बने उत्तराखंड को 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाके को काट कर बनाया गया था। राज्य बनाने के लिये एक लंबा और कड़ा संघर्ष उत्तराखंड के लोगों को करना पड़ा। आज राज्य स्थापना दिवस के मौके पर राज्यभर में 13 ज़िलों में तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित किये गये। मौजूदी बीजेपी सरकार और मुख्यमंत्री भी इस मौके को राज्य के लिये अपने विज़न को समझाने में लगे हैं। फिर चाहे दिल्ली में हो रहे कार्यक्रम हो या देहरादून में बंद कमरों के अंदर आयोजित किया गया रैबर।

राज्य बनाने की लड़ाई की अनन्य कहानियों में रामपुर तिराहा गोलीकांड के साथ-साथ मसूरी में हुए गोली कांड की भी अहम भूमिका रही। 2 सितंबर 1994 को अलग राज्य की मांग करते हुए मसूरी शहर में हुए गोली कांड में 6 लोगों ने अपनी जान गवांई थी। इन्ही शहीदों को याद करते हुए मसूरी प्रेस क्लब ने शहीद स्थल पर एक सकार्यक्रम का आयोजन भी किया।

इस घटना में अपने पिता को खो चुके नरोत्तम सिंह का कहना है कि, “जिस मकसद से अलग पहाड़ी राज्य के लिये लड़ाई की गई थी वो मकसद कहीं खो सा गया है। वो कहते हैं कि “हांलाकि एक लंबा समय बीत चुका है राज्य बने लेकिन, राज्य ने अभी भी कुछ खास हासिल नहीं किया है। जबतक विकास राज्यभर के गांवों में नहीं पहुंचता है तबतक सही मायने में अलग राज्य के लिये अपनी प्राणों की आहूति देने वालों को श्रद्धांजलि नही मिलेगी।”

“पिछले 17 सालों में उत्तराखंड ने किसी और राज्य की ही तरह सैंकड़ों तरह के वादे और इरादों का राजनीतिक मंचन देखा है, तमाम तरह के राजनीतिक उठा पठक का गवाह बना है, 2013 में केदारनाथ आपदा जैसी परेशानियों का दर्द सहा है। लेकिन इन सबके बीच पहाड़ के आम आदमी के विकास की बात हकीकत से काफी दूर रह गई है,” कहना है लेखक गणेश सैली का जोकि   उत्तराखंड की लड़ाई का एक अभिन्न अंग रहे है।

कालाधान जमा करने वाले खातों पर आयकर की नजर

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देहरादून। नोटबंदी के दौरान खातों में कालाधान जमा करने वालों पर अब आयकर का शिकंजा कसने वाला है। विभाग अब तमाम ऐसे संदिग्ध खातों को शॉटलिस्ट करने का काम कर रहा है। विभाग ने तकरीबन 3500 खाताधरकों को नोटिस जारी किया है।


आयकर के रडार पर हजारों खाते
मंगलवार को हर तरह की रिटर्न फाइल करने की अंतिम तिथि (खातों के अनिवार्य ऑडिट के दायरे वाले लोग या कंपनी) समाप्त होने के बाद आयकर विभाग सक्रिय हो गया है। अब तक ऐसे लोगों या कंपनी के पास यह तर्क था कि उनके पास रिटर्न फाइल करने का समय है और वह रिटर्न में बता देंगे कि जमा हुई राशि का जरिया क्या है। नोटबंदी में सामान्य से अधिक राशि जमा करने वाले लोगों या कंपनी को आयकर विभाग ने 3500 से अधिक नोटिस जारी किए हैं। इनमें से बड़ी संख्या में वह खाताधारक भी शामिल हैं, जिनके रिटर्न फाइल करने की तिथि मंगलवार को समाप्त हो गई है।
नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर मुख्य आयकर आयुक्त प्रमोद कुमार गुप्ता ने मीडिया से बातचीत के दौरान यह तथ्य सामने रखे। उन्होंने कहा कि विभाग अभी तक कुल 3500 नोटिस जारी कर चुका है। इनमें 2500 के करीब ऐसे नोटिस हैं, जिनके खातों में 10 लाख रुपये तक जमा कराए गए। जबकि कुछ खातों में 50 लाख या एक करोड़ रुपये से अधिक की राशि भी जमा कराई गई। जो नोटिस आयकर विभाग ने जारी किए हैं, उनमें से 60 फीसद के ही जवाब आए हैं। शेष ने नोटिस का किसी तरह का जवाब नहीं दिया। जिनका जवाब आया भी है, उनमें से अधिकतर लोगों ने यही हवाला दिया कि जब रिटर्न फाइल करेंगे, तब रकम का स्रोत बता देंगे। लेकिन अब मंगलवार के बाद किसी भी तरह का रिटर्न फाइल नहीं किया जाना है। जिसके बाद एक सप्ताह में विभाग ऐसे खातों की जांच शुरू कर देगा। खातों में कितना कालाधन जमा किया गया, उसका पता लगाने के लिए संबंधित के पिछले सालों की आय व अन्य पड़ताल की जाएगी। जरूरत पड़ी तो विभाग छापेमारी करने से भी पीछे नहीं हटेगा।

स्कीम में 225 करोड़ रुपये कालाधन घोषित
आयकर विभाग ने पूर्व में जो इनकम डिक्लेरेशन स्कीम (आईडीएस) व प्रधानमंत्री जनकल्याण योजना (पीएमजीकेवाई) चलाई थी, उसमें करीब 500 लोगों ने 225 करोड़ रुपये कालाधन घोषित किया। मुख्य आयकर आयुक्त गुप्ता ने बताया कि इसमें 195 करोड़ रुपये आईडीएस व 30 करोड़ रुपये कालाधन पीएमजीकेवाई में घोषित किया गया।

2000 अधिक रिटर्न फाइल
नोटबंदी के दौरान खातों में रकम जमा करने को लेकर आयकर विभाग ने जो नोटिस जारी किए थे, उसका असर रिटर्न फाइलिंग की बढ़ी संख्या के रूप में सामने आया। खातों में जमा राशि को जायज बताने के लिए करीब 2000 अतिरिक्त रिटर्न फाइल की गई। इससे निश्चित रूप में टैक्स भी बढ़ा होगा। आने वाले समय में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी और इसके बेहतर परिणाम सामने होंगे।

जल संस्थान का वसूली लक्ष्य 66.25 करोड़, अभियान तेज

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देहरादून। पानी के बिलो को लेकर डूब चुके 16 करोड़ रुपये का जल संस्थान अब आखिरी बार जनरल ऑडिट कराएगा। यदि अब भी ये चार हजार दो सौ ग्यारह परिवार अपने ठिकानों पर नहीं मिले और इन्होंने जल संस्थान का बकाया दर्ज नहीं किया तो जल संस्थान इस रकम को बोगस डिमांड में डालने पर विचार करेगा। वहीं, जल संस्थान ने दून में इस साल के लक्ष्य 66.25 करोड़ रुपये की वसूली के लिए अभियान तेज कर दिया है।

पिछले साल जल संस्थान ने पानी के लंबे समय बिल न जमा करने वाले उपभोक्ताओं की आरसी काटकर वसूली के लिए तहसील भेजी थी। वसूली के दौरान राजस्व विभाग की टीम को चार हजार 211 लोग दिए गए पते पर नहीं मिले थे। जिनका पानी का बकाया बिल 15.87 करोड़ रुपये था। इसके बाद राजस्व विभाग ने उक्त आरसी जल संस्थान को वापस भेज दी। अब जल संस्थान ने इस रकम को बोगस डिमांड में डालने से पहले इन लोगों को विभागीय स्तर पर जनरल ऑडिट कराने का फैसला किया है। अब जल संस्थान की टीम इन पतों पर दोबारा निरीक्षण के लिए जाएगी, साथ जो लोग निर्धारित पते पर मिलेंगे उनसे पानी के बिल की वसूली की जाएगी। साथ ही जो लोग बकायेदार अब भी जल संस्थान के हाथ नहीं लगे तो बोर्ड बैठक में उक्त रकम को बोगस में डालने के लिए विचार किया जाएगा। उधर, जल संस्थान ने इस साल के वसूली लक्ष्य को पूरा करने के लिए भी अभियान शुरू कर दिया है। इस कड़ी में जल संस्थान की ओर से अभियान चलाया गया और बिल जमा नहीं करने वाले कई लोगों के पानी के कनेक्शन काट दिए गए।
इस साल वसूली का लक्ष्य
शाखा, कुल लक्ष्य
उत्तर शाखा, 16.10 करोड़
दक्षिण शाखा, 26.21 करोड़
पित्थुवाला शाखा, 13.11 करोड़
रायपुर शाखा, 10.83 करोड़
कुल, 66.25 करोड़
जल संस्थान की महाप्रबंधक नीलिमा गर्ग ने बताया कि जिन लोगों ने लंबे समय से पानी के बिल जमा नहीं किए हैं, उनसे जल संस्थान शीघ्र पैसा जमा करने की अपील कर रहा है। ऐसा न करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।

एक और किसान की मौत

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उधमसिंह नगर जिले में एक और किसान ने आत्मदाह की राह पकड़ ली, बैंक के कर्ज और सीबीआइ जांच के दोहरे दबाव में बाजपुर क्षेत्र के एक किसान ने खुदकशी कर ली। परिजनों ने जहर खाकर जान देने का दावा जरूर किया है, लेकिन किसान की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत की जानकारी पुलिस व तहसील प्रशासन को नहीं है। अलबत्ता क्षेत्र में किसान के अवसाद में होने और जहर खाने की चर्चा दिन भर तैरती रही।

ग्राम विक्रमपुर के रहने वाले जगदीश सुबह बिस्तर पर अचेतावस्था में मिले। परिजन उन्हें लेकर एक निजी चिकित्सालय पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

मृतक के बेटे भूपेंद्र सिंह के अनुसार उनके पिता ने रात भोजन करने के बाद कोई जहरीला पदार्थ खा लिया। रात में ही उनकी मौत हो गई। सुबह वह सो कर नहीं उठे तब परिवार को आशंका हुई। इस आशंका की बड़ी वजह यह भी कि वह गत सुबह से ही जान दे देने की बात घर वालों से कह रहे थे। उनके बैंक लोन पर आरसी कट गई थी। साथ ही फर्जी बैंक लोन के मामले में वह सीबीआइ जांच की जद में भी थे। इसका उन्हें नोटिस भी आया था। इससे वह गहरे अवसाद में थे। उन्होंने बताया कि गत सुबह उन्होंने आरसी व नोटिस समेत बैंक लोन के कागजात जला दिए थे। रात में यह घटना हो गई।

वहीं पुलिस व प्रशासन को किसान की संदिग्ध मौत से बेखबर है। तहसीलदार केपी सिंह का कहना है कि वसूली आरसी के लिए अमीन जा तो रहे हैं, लेकिन किसी तरह का उत्पीड़न नहीं किया जा रहा है। किसान की मौत की तहसील प्रशासन को जानकारी नहीं है। वहीं बाजपुर कोतवाल बीडी उनियाल ने कहा कि वह सरकारी कार्य से बाहर हैं। कोतवाली पुलिस को किसान की संदिग्ध मौत की न तो सूचना है न ही कोई तहरीर मिली है।