यहां बिखरी है बुरांश के फूलों की लालिमा, करा रहे होली और बिस्सू का अहसास

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(देहरादून) जौनसार बावर के साहिया और चकराता क्षेत्र के जंगलों में खिले बुरांस के फूलों की लालिमा एक तरफ जहां पर्यटकों को आकर्षित कर रही है, वहीं दूसरी ओर रंगों के त्योहार और बिस्सू पर्व के नजदीक होने का अहसास भी करा रही है। जौनसार में बिस्सू पर्व पर बुरांस को देवता को अर्पित करने के बाद घर सजाने की परंपरा वर्षों से है।

मौसम के मिजाज में परिवर्तन के चलते दिन का तापमान बढ़ने पर साहिया और चकराता के जंगलों में बुरांस के फूल खिल गए हैं। जंगलों में हर तरफ फूल की लालिमा पर्यटकों को रूकने को मजबूर कर देती है। ग्रामीण बच्चे फूलों को तोड़कर घरों तक ला रहे हैं। लालिमा यह अहसास भी करा रही है कि होली पर्व नजदीक आ गया है।

जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर में अप्रैल माह में होने वाले बिस्सू पर्व पर बुरांस को देवता को अर्पित करने के बाद घर सजाने की परंपरा पौराणिक है। वैसे बुरांस के फूल खिलने का समय मध्य मार्च है और मई तक बुरांस की लालिमा लोगों का मन मोहती है, लेकिन मौसम का मिजाज बदलने पर इस बार थोड़ा पहले ही बुरांस खिलना शुरू हो गए हैं। वर्तमान में जंगलों में बुरांस की लालिमा बढ़ गयी है।

ग्रामीण संतन सिंह, अजब सिंह, पूरण सिंह, सरदार सिंह, देवी सिंह, नारायण सिंह आदि बताते हैं कि बुरांस का जनजाति क्षेत्र जौनसार बावर के साथ पुराना नाता है। क्षेत्र के अप्रैल में होने वाले मुख्य पर्व बिस्सू पर्व में हर गांव के लोग फुलियात के दिन सुबह स्नान करने के बाद जंगलों से बुरांस लाकर पहले देवता को अर्पित करते हैं, फिर घरों को सजाते हैं।

ग्रीष्म काल में हर परिवार में लोग शीतल पेय के रूप में मेहमानों को बुरांस का जूस देते हैं। कोरुवा, कोठा तारली, चकराता छावनी परिषद के जगलों के अलावा लोखंडी, कुनावा, डांडा, पुरोड़ी, चिलमिरी, ठाणा डांडा जंगलों में बुरांस के खिलने से लालिमा हर किसी को आकर्षित कर रही है।