क्या कोरोना से हम सही सबक़ ले रहे हैं?

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कोरोना
FILE/Representative
कोरोना ने मानो जैसे दुनिया को रोक दिया है। पिछले एत साल में इस बात केा अंदाजा पूरी दुनिया को हो गया है कि  कोरोना कितनी घातक बीमारी है। कोरोना ने हमें कई बातों पर सोचने को मजबूर कर दिया है। फिर चाहे वो लॉकडाउन से पर्यवरण में हुए सुधार हों, या  साफ़ सफ़ाई को लेकर हमारा उदासीन रवैया। इस बीमारी ने भारत में ख़ासतौर पर कई नीतिगत क्षेत्रों में हमारे दिवालियेपन को भी ज़ाहिर कर दिया है। इसमें सबसे आगे है जन स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली। देश में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली को लेकर बड़ी बहस छिड़ी हुई है। कोरोना लॉकडाउन ने मज़दूरों और उनको लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक उदासीनता की जो तस्वीरें दिखाई हैं, वो लंबे समय तक हमारे ज़हन में रहेंगी। स्वास्थ्य सेवाओं, राजनीतिक उदासीनता, पर्यावरण आदि पर हो रही बहस अपनी जगह सही है और यह ज़रूरी है कि हम इनसे आने वाले समय के लिये सबक़ भी लें। लेकिन, क्या इतनी बड़ी आपदा के बावजूद,हम देश के सामने खड़ी सबसे बड़ी चुनौती के सही तरह से पहचान रहे हैं?
अमरीका, ब्रिटेन जैसे विकसित देश हों, भारत जैसा विकासशील देश या अफ़्रीका के पिछड़े देश, किसी भी देश के पास सीमित संसाधन होते हैं। इसका उदाहरण अमरीका में देखने को मिला है, जहां बेहतरीन स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के बावजूद कोरोना ने अमरीका को घुटनों पर ला दिया। तो आख़िर इन सभी के पीछे कारण क्या है? क्या आपने सोचा है कि आख़िर हमारी 125 करोड़ की जनसंख्या देश को मज़बूत करने में क्या भूमिका निभा रही है? बात कोरोना से लेकर कर अन्य विषयों तक ले जाते हैं। चाहे देश में राजनीतिक नेतृत्व किसी भी पार्टी का हो, और देश कितनी ही तरक़्क़ी कर ले, लेकिन यह नामुमकिन है कि बिना जनसंख्या पर बात करे देश तरक्की कर सके। हम सोशल मीडिया और टीवी डिबेट के लिये इसे नकारात्मक सोच कह सकते हैं लेकिन सच यही है।
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भारत की 125 करोड़ की आबादी उसके संसाधनों पर निरंतर दबाव बना रही है और आने वाले समय में बनाती रहेगी। डाटा और आँकड़ों के खेल में मैं नहीं जाना चाहूँगा। आम तौर पर ही अगर बात करें तो शहरों में आप कितनी मर्ज़ी सड़के बना लें, लेकिन जब हर साल लाखों की तादाद में शहरों की जनसंख्या बढ़ती है तो यह नाकाफ़ी ही होंगी। सरकारें जितने मर्ज़ी रोज़गार के मौक़े पैदा कर लें, लेकिन वो नाकाफ़ी ही रहेंगे। जितने मर्ज़ी अस्पताल बना लें लेकिन वो लोगों के लिये कम ही पड़ेंगे। आप गंगा को साफ़ करने के लिये अलग मंत्रालय बनाकर हज़ारों करोड़ खर्च कर सकते हैं, लेकिन, वो कभी पूरी तरह साफ़ नहीं हो सकेगी। यह महज चंद उदाहरण हैं, ऐसी सैंकड़ों मिसालें हैं जो विकास को जनसंख्या के सामने बौना साबित करती हैं।
यह शायद विडंबना ही होगी कि इतने सालो में अलग अलग सरकारों ने कई तरह की नई चुनौतियों को पहचाना और उनसे लड़ने के लिये मंत्रालय बनाकर करोड़ों रुपये खर्च किये, लेकिन, जनसंख्या को लेकर किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम उठाया हो, ऐसा नहीं दिखता। इसका क्या कारण हो सकता है? क्या यह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है? क्या बढ़ती जनसंख्या राजनीतिक दलों के लिये चुनावी बिसात पर मोहरे से ज़्यादा कुछ नहीं है?
वहीं एक वर्ग ऐसा भी है जो देश की जनसंख्या को उसकी शक्ति कहता है। यह कुछ हद तक सही हो सकता है पर हमें एक पुरानी कहावत को नहीं भूलना चाहिये, ‘किसी भी चीज की अति हानिकारक होती है’। आज के समय में बड़ी आबादी के कारण हमारे यहाँ लेबर सस्ती है। इसे यूँ भी कहा जा सका है कि मज़दूरों को उनके हक़ के पैसे नहीं दिये जाते हैं। मज़दूर ही क्यों, प्रोफेशनल्स और कर्मचारियों के साथ भी यही होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, भारत का दुनिया जहां के कॉल सेंटरों का घर होना। क्या यह सच नहीं है कि आज के समय में हम मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पादों और विकसित देशों के लिये डंपिंग ग्राउंड और सस्ती लेबर फ़ोर्स के अलावा कुछ और नहीं हैं? अगर हमारी जनसंख्या इतनी बड़ी बाज़ार की ताक़त है तो ऐसा क्यों है कि चाहे कोई गाड़ी का मॉडल हो या कोई इलैक्ट्रोनिक उपकरण, भारत में कभी पहले लॉंच नहीं किया जाता। गाड़ी हो या खाने का सामान, जो क्वालिटी भारत में मिलती है वो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में मिलने वाले उन्ही उत्पादों से काफ़ी पीछे होती है।
यह बहस लंबी हो सकती है, लेकिन अगर कोरोना जैसी महामारी भी हमें जनसंख्या के इस पहलू पर सोचने को मजबूर नहीं कर सकती तो, निःसंदेह हमारे लिये आने वाला सफ़र काफ़ी दिक़्क़तों भरा होने वाला है।