जनिये क्यों खास है दीपावली का पर्व, दीपावली से जुड़ी परंपराओं के बारे में यहां पढ़ें

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(हरिद्वार) दीपावली का पर्व अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व कहा जाता है। इस पर्व को महानिशा पर्व भी कहते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी व मां काली की पूजा का विधान है। बावजूद इसके दीपावली से जुड़ी कई घटनाएं हैं जो दीपावली को प्रकाशोत्सव बनाती है।

पं. देवन्द्र शुक्ल शास्त्री के नुसार त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे तब उनके आगमन की खुशार में दीप जलाकर अयोध्यावासियों ने उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई। यह भी कथा प्रचलित है कि जब श्रीकृष्ण ने आतताई नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की। राक्षसों का वध करने के लिए माँ देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्ररूप काली की पूजा का भी विधान है।

कार्तिक अमावस्या के दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी बादशाह जहांगीर की कैद से मुक्त होकर अमृतसर वापस लौटे थे। इस कारण भी दीपदान किया जाता है। कृष्ण ने अत्याचारी नरकासुर का वध दीपावली के एक दिन पहले चतुर्दशी को किया था। इसी खुशी में अगले दिन अमावस्या को गोकुलवासियों ने दीप जलाकर खुशियां मनाई थीं। 500 ईसा वर्ष पूर्व की मोहनजोदड़ो सभ्यता के प्राप्त अवशेषों में मिट्टी की एक मूर्ति के अनुसार उस समय भी दीपावली मनाई जाती थी। उस मूर्ति में मातृ-देवी के दोनों ओर दीप जलते दिखाई देते हैं। बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध के समर्थकों एवं अनुयायियों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। सम्राट विक्रमादित्य का राज्याभिषेक दीपावली के दिन हुआ था।

इसलिए दीप जलाकर खुशियां मनाई गईं। ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में रचित कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार कार्तिक अमावस्या के अवसर पर मंदिरों और घाटों पर बड़े पैमाने पर दीप जलाए जाते थे। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था। जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने भी दीपावली के दिन ही बिहार के पावापुरी में अपना शरीर त्याग दिया था। पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन टिहरी गंगातट पर स्नान करते समय ओम कहते हुए समाधि ले ली। महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। इन सभी कारणों से दीपावली की महत्ता विभिन्न सम्प्रदायों में विशेष है। यह सभी महान घटनाएं दीपोत्सव पर्व मनाने के लिए प्रेरित करती हैं।