वोकल फॉर लोकल: उत्तराखंड का ‘मधु ग्राम’ स्वरोजगार की मिसाल

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‘वोकल फॉर लोकल
नैनीताल जिले का ज्योली गांव ‘वोकल फॉर लोकल’ का उद्धारण है। करीब 100 परिवारों की आबादी वाले इस गांव के 50 फीसद परिवार सीधे एवं शेष 40 फीसद परिवार भी परोक्ष तौर पर मधु यानी शहद के उत्पादन से जुड़े हैं, और छह माह के मधु उत्पादन कार्य में मिलकर 50 टन तक शहद का उत्पादन कर लेते हैं। इस तरह प्रति परिवार दो से ढाई लाख रुपये तक कमा रहे हैं। ये स्थानीय स्तर पर सैलानियों एवं स्थानीय लोगों को आज के मिलावट के दौर में भी शुद्ध शहद उपलब्ध कराते हैं, साथ ही डीलरों के माध्यम से विदेशों को निर्यात भी करते हैं। इसीलिए इस ग्राम को ‘मधु ग्राम’ तक कहा जाने लगा है, हालांकि ग्रामीणों की उनके गांव को शासकीय दस्तावेजों में यह नाम दिये जाने की मांग अभी पूरी नहीं हुई है।
– गांव के 90 फीसद परिवार जुड़े हैं शहद उत्पादन से 
– छह माह में 50 टन शहद का उत्पादन कर प्रति परिवार कमाते हैं दो से ढाई लाख
– विदेशों को निर्यात किया जाता है यहां से शहद
हल्द्वानी-नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग पर मधु नगरी कहे जाने वाले ज्योलीकोट कस्बे से करीब पांच किमी दूर स्थित है ज्योली गांव। गांव के पूर्व प्रधान एवं वर्तमान में प्रधान पति शेखर भट्ट बताते हैं करीब 1995 के आसपास गांव के उमेश भट्ट, उमेश पांडे, प्रमोद पांडे, कंचन पांडे व उन्होंने दो से पांच बाक्स से व्यावसायिक तौर पर मौन पालन की शुरुआत की थी। हालांकि वर्तमान में गांव में करीब 100 में से 50 परिवार सीधे तौर पर करीब ढाई से तीन हजार बाक्सों के जरिये मौन पालन कर रहे हैं। ये लोग छह माह में यूपी के बरेली, बदायूं से लेकर राजस्थान होते हुए हल्द्वानी-रामनगर व चोरगलिया के ग्रामीण एवं जंगली क्षेत्रों में सरसों, लाही, लीची, शीशम, करी पत्ता, सूर्यमुखी आदि के बगीचों व वनों के पास अपनी मधुमक्खियों को ले जाकर मौन उत्पादन करते हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन की अनुपम मिसाल हैं मधुमक्खियां
मधुमक्खियां लोकतांत्रिक व्यवस्था में अनुशासन की अनुपम मिसाल हैं। वे न केवल मधु एवं मोम का उत्पादन करती हैं, वरन फल एवं खाद्यान्न उत्पादन की मात्रा एवं गुणवत्ता में भी वृद्धि करने में सहायक होती हैं। हालांकि पहाड़ में परंपरागत तौर पर घरों में सदियों से मौन उत्पादन किया जाता रहा है, किंतु मौन पालकों की मानें तो पुराने दौर की भारतीय प्रजाति की मधुमक्खियां व्यवसायिक तौर पर मधु उत्पादन के लिए लाभदायक साबित नहीं होती हैं। इस लिहाज से यह भी मिथक ही है कि पहाड़ पर मधु उत्पादन की बेहतर संभावनाएं हैं, क्योंकि मौन पालकों के अनुसार पहाड़ भले फूलों के लिए जाने जाते हैं, किंतु यहां के फूलों में मधु उत्पादन कम होता है। यहां तक कि राज्य वृक्ष बुरांश के शहद से भरपूर बताये जाने वाले फूलों से भी मधु मक्खियां शहद नहीं बना पाती हैं। इन्हीं कारणों से ज्योलीगांव के मौन पालकों को पहाड़ों की जगह यूपी से लेकर राजस्थान तक प्रवास करना पड़ता है। फिर भी ऐसी विषम परिस्थितियों के बावजूद पहाड़ से मौन उत्पादन का कार्य कर रहे हैं और दूर देश जाकर भी अपने गांव लौटते हैं और सुविधाविहीन होने के बावजूद स्वरोजगार का संदेश देते हैं। यह बड़ी बात है।