पहाड़ों में महिलाओं के लिये खुशी, सेवा और उम्मीद की मिसाल है ‘आशा’

आंगनबाड़ी
Mother and Child

तीस साल की खाशती देवी पिछले आठ सालों से आशा (Accredited Social Health Activist) के तौर पर कपकोट, बागेश्वर के सामा गांव में काम कर रही हैं। इन आठ सालों में आशा ने छह किलोमीटर के दायरे में फैले करीब 250 परिवारों को 200 स्वस्थ बच्चों को दुनिया में लाने में मदद की है।

खाशती देवी के खुद तीन बच्चे हैं जिनकी उम्र 5-11 साल के बीच है। खाशती के लिये उनके बूढ़े सास-ससुर प्रेरणा और हिम्मत का स्रोत बने हैं। खाशती हर रोज सुबह-सुबह अपना गुलाबी कोट पहन कर सामा गांव की गर्भवती महिलाओं का हाल जानने निकल पड़ती है। आमतौर पर उनका दिन शाम करीब पांच बजे खत्म हो जाता है, लेकिन प्रसव की तारीख नजदीक होने पर दिन खत्म होने का कोई ठिकाना नही है।

वो कहती है कि “मै कई किरदार निभाती हूं। कुछ लोगों के लिये मैं बड़ी बहन हूं, गांव के बुजुर्गों के लिये बहु और बच्चों के लिये उनकी आंटी, और मैं इन सभी जिम्मेदारियों को पूरा करने की कोशिश करती हूं। “

खाशती के काम का प्रमुख हिस्सा जच्चा-बच्चा की देखभाल का है। इसके अलावा रिपोर्ट तैयार करना, टीके लगवाना और साफ सफाई के बारे में जानकारी देने का काम भी वो करती हैं।

सामा गांव से बागेशवर जिला अस्पताल 51 किमी और सबसे नजदीकी अस्पताल 30 किमी दूर कपकोट में है।  इस कारण से खाशती ने अब तक करीब आधा दर्जन से ज्यादा कामयाब डिलिवरियां गांव में ही कराई हैं।

वो कहती हैं कि “ये मेरे लिये हमेशा आसान नही होता है। मैं खुद की करी हर डिलिवरी से कुछ नया सीखती हूं और कोशिश करती हूं परिवार के लोग अपने नये सदस्य के साथ-साथ मुझे भी अपने दिलों में जगह दें।”

खाशती देवी कोई आम आशा कार्यकर्ता नही है। वो राज्यभर में फैली उन हजारों स्वास्थ कर्मचारियों की मेहनत को दिखाती हैं जो हर रोज महिलाओं के जीवन को आरामदेह बनाने के लिये कड़ी मेहनत करती हैं।

आशा कर्मचारियों के बारे में खाशती कहती हैं कि, “जब भी मैं किसी नवजात बच्चे, उसकी मां और परिवार वालों के चेहरों पर मुस्कुराहट देखती हूं मुझे अपनी मेहनत सार्थक होती लगती है। इन लोगों के प्यार और सम्मान के बराबर शायद ही कुछ और हो।”