श्राद्ध : पितरों के निमित्त श्रद्धा ज्ञापित करने का पर्व

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हरिद्वार, सनातन धर्म में श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है। श्राद्ध पर्व पितरों के प्रति श्रद्धा ज्ञापित करने का पर्व है। हालांकि सनातन धर्म में अनेक रीति-रिवाज, व्रत-त्यौहार व परंपराएं हैं। किन्तु इन सबके अतिरिक्त श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है। इस बार श्राद्ध पर्व 13 से 28 सितम्बर तक होंगे।
सनातन धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का वर्णन है। इसमें अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है।
पं. देवेन्द्र शुक्ल के मुताबिक देवपूजा से पूर्व पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। बताया कि जिस तिथि में व्यक्ति की मृत्यु हुई हो उसी तिथि में श्राद्ध करना चाहिए। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथि याद नहीं है तो अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है। बताया कि पिता के लिये अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिये उपयुक्त मानी जाती है। द्वादशी को संन्यासी का श्राद्ध व दुर्घटना अथवा अकाल मृत्यु से मरने वाले व्यक्ति का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए। अमावस्या को महालया भी कहा जाता है। इस कारण अमावस्या को सभी का श्राद्ध किया जा सकता है।
श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक करने का विधान बताया गया है। यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान तथा आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है।