धूम सिंह नेगी को मिला जमनालाल बजाज पुरस्कार

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देहरादून , चिपको आंदोलन के नायक धूम सिंह नेगी को प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरुस्कार। हेंवलघाटी के इस सपूत ओर चिपको आंदोलन से जुड़े हुए गांधीवादी धूम सिंह नेगी को उनके द्वारा सामाजिक कार्यों और शिक्षा के क्षेत्र मे दिए गए योगदान को देखते हुए उपराष्ट्रपति श्री वेंकैया नायडू ने जमुना लाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया और नगद राशि के रूप में 10 लाख रुपए प्रदान किए. टिहरी के साथी पत्रकार शीशपाल गोसाई का कहना है कि, ‘धूम सिंह नेगी को जमना लाल बजाज पुरस्कार मिलना, जमीनी कार्यकर्ताओ की जीत है, जो अपने लिये नहीं , दूसरों के लिए जीते हैं यह पुरस्कार, गुरुजी धूम सिंह नेगी जी का नहीं है। हेंवलघाटी, नरेन्द्रनगर, फोकट, चम्बा का नहीं है। न ही टिहरी का।सारे पहाड़ का है।उन जमीनी लोगों का है। जो गुरुजी जैसे जीते हैं। लोगों के लिए।जो वास्तव में काम करते हैं। गाते नहीं है।जो काम के बदले फल की इच्छा नहीं रखते हैं। जिनमें रत्ती भर लालच नहीं होता।

प्रधानाअघ्यापक की नोकरी छोड़ कर धूम सिंह नेगी ने हेंवल घाटी में संघर्ष करने लग गए थे। उन्होंने डैम विरोध में श्री सुंदर लाल बहुगुणा जी का दिल से साथ दिया। चिपको आंदोलन में आगे आये। बीज बचाओ आंदोलन चलाया। सबको संदेश दिया। कि, अपने अपने परंपरागत बीज अपनाओ उन बीजों की रक्षा करो ,कटल्डी चुने पत्थर का दोहन करने वालों का विरोध किया।सरकार को उनकी मांग में झुकना पड़ा। उनके साथी कुंवर प्रशुन होते। आज यह खबर पाकर खुश होते। वे गांधी जी के सच्चे प्रतिनिधि है।गांधी जी के चार पुत्र थे। पांचवे मानद पुत्र श्री जमना लाल बजाज थे। उनके पौत्र श्री राहुल बजाज हैं। यह पुरस्कार, देश का बड़ा पुरस्कार है। और सबसे बड़ी बात जिन लोगों को यह मिलता है,वे वास्तविक लोग होते हैं।टिहरी गढ़वाल के वह तीसरे व्यक्ति हैं जिन्हें इस अहम पुरस्कार का गौरव मिला है।

संसार के बड़े विज्ञानी प्रोफेसर श्री खडग सिंह वल्दिया ने भी अपनी पुस्तक में श्री धूम सिंह नेगी के कामों की सराहना की है। वह लिखते हैं कि,सुंदर लाल बहुगुणा, धूम सिंह नेगी जी प्रभावित से होकर, उन्हें मिलने जाजल आये। और अपने आंदोलन से जुड़ने का आग्रह किया। धूम सिंह नेगी ने बहुगुणा जी से कहा ” जितना समय मिलेगा उतना मैं चिपको आंदोलन को दूँगा।”देखो भाई यह काम फुरसत का नहीं है। अंततः 1974 में प्रधाना ध्यापक से त्याग पत्र देकर वे चिपको आंदोलन में कूद पड़े। सुंदरलाल बहुगुणा के अनशनों में साथ दिया। आंदोलनो में भाग लिया। उनके साथ जेल यात्राएं की।