टिहरी के युवा प्रभात ने बिना मिट्टी के उगा दी एक्जॉटिक सब्जियां

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उत्तराखंड राज्य में जहां एक तरफ पलायन एक चिंतनीय विषय है वहीं राज्य में बहुत से युवा रिर्वस माइग्रेशन कर मिसाल कायम कर रहे हैँ। ऐसे ही टिहरी जिला के युवा इस वक्त एक अलग तरह की खेती कर रहे हैं। टिहरी के दूरस्थ गांव सौर के 27 साल के युवा प्रभात रमोला है जिन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद लगभग तीन साल दूसरे शहरों में काम किया, लेकिन आखिरी में उन्होंने अपने राज्य और घर आकर काम करने का फैसला किया।

प्रभात इस वक्त हाईड्रोपोनिक्स तकनीक से खेती कर रहे हैं जिसमें बिना मिट्टी के इस्तेमाल से खेती की जाती है।आपको बतादें कि मिट्टी के बिना खेती एक ऐसी तकनीक है जिसे हाइड्रोपोनिक्स खेती के रूप में जाना जाता है। हाइड्रोपोनिक्स, परिभाषा के अनुसार, पानी आधारित, पोषक तत्वों से भरपूर घोल में पौधों को उगाने की एक विधि है। हाइड्रोपोनिक्स मिट्टी का उपयोग नहीं करता है, इसके बजाय जड़ प्रणाली को दूसरे माध्यमों से सहयोग दिया जाता है जैसे कि पेर्लाइट, रॉकवूल, मिट्टी के छर्रों, पीट काई, या वर्मीक्यूलाइट।

क्या है हाइड्रोपोनिक्स तकनीक

हाइड्रोपोनिक्स कृषि की एक शाखा है जहां पौधों को मिट्टी के उपयोग के बिना उगाया जाता है। पोषक तत्व जो पौधे सामान्य रूप से मिट्टी से प्राप्त होते हैं, उन्हें इसके बजाय पानी में घोल दिया जाता है, और उपयोग किए गए। हाइड्रोपोनिक प्रणाली के प्रकार पर निर्भर करते हुए, पौधे की जड़ों को इस मिक्सचर में डाल दिया जाता है, पोषक तत्व के घोल से पेड़ की जड़ो को जरुरी पोषण मिल जाता है, ताकि पौधे जरुरी तत्व प्राप्त कर सकें जो इसके विकास के लिए जरूरी है।

हाईड्रोपोनिक खेती के बारे में बात करते हुए प्रभात हमे बताते हैं कि, “तीन साल निजी क्षेत्र में काम करने के बाद, एक दिन मैंने उत्तराखंड में बेरोजगारी और पलायन के बारे में सुना। इसलिए मैंने कुछ ऐसा अनोखा करने का फैसला किया जो रोजगार दे सकें और पलायन को रोक सके। इसलिए मैंने 2018 में अपने गाँव जाड़ीपनी में वापस जाने का फैसला किया। कुछ निष्कर्षों के बाद मैंने जैविक खेती करने का फैसला किया, फिर कुछ समय के शोध और प्रशिक्षण के बाद, एक दिन मैंने इस बिना मिट्रटी की खेती के तकनीक के बारे में पाया। मैनें इस तकनीक पर काम करना शुरू कर दिया, गूगल,यूट्यूब,पीडीएफ सब कुछ मैंने पढ़ा है कि मिट्टी के बिना कैसे पेड़ों को विकसित किया जाए, फिर 2018 में मुझे उत्तराखंड बायोटेक केंद्र,हल्दी (उधमसिंह नगर) से 2 दिन का हाइड्रोपोनिक्स प्रशिक्षण का निमंत्रण मिला।”

इस प्रकार की खेती करने के पीछे प्रभात का आइडिया क्या था? इसपर वह कहते हैं कि, “जब मैंने जैविक खेती शुरू की तो किसी ने मेरे इस काम की सराहना नहीं की, तब मैंने इस हाइड्रोपोनिक्स खेती पर काम करना शुरू किया।मेरे लिए राह आसान नहीं थी लेकिन नामुमकिन भी नहीं थी। क्योंकि युवाओं को वापस पहाड़ियों की ओर आकर्षित करने के लिए हमें कुछ मजबूत कारणों की आवश्यकता थी, जिनमें कुछ प्रेरणा और अच्छी कमाई भी हो। हाइड्रोपोनिक्स में हम विदेशी सब्जियां जैसे लेट्यूस, केल, चेरी टमारो, स्ट्रॉबेरी आदि उगाते हैं जिनकी बाजार दर बहुत अच्छी है (लगभग 200 रुपये प्रति किलो)।

इस तकनीक के अलावा प्रभात ने बिना केमिकल फर्टिलाइजर और पेस्टीसाइड का उपयोग किए बिना सफलतापूर्वक खेती की है। जिसमें उन्होंने ब्रोकोली, रेड कैबेज और मीठे मटर उगाया है।

पायलट सेटअप के इस तकनीक का प्रयोग सफलतापूर्वक करने के बाद अब आने वाले समय में प्रभात गाँव में ग्रीनहाउस सैटअप पर बड़े स्तर पर हाइड्रोपोनिक खेती करने वाले हैं। जिसमें वह अपने गांव के अधिकतम शिक्षित बेरोजगार युवाओं के साथ हाथ मिलाते हुए उनके साथ काम करने का लक्ष्य रखते हैं।प्रभात कहते हैं कि, “इस पूरे काम में मेरे परिवार के सदस्य और हार्टिकल्चर डिपार्टमेंट ने मेरा पूरा सहयोग किया है।”

हाइड्रोपोनिक्स खेती के लाभ-

1. आप पूरे साल घर के अंदर और बाहर दोनों जगह यह खेती कर सकते हैं।
2. पानी की बचत और पौधों के पोषक तत्वों को नियंत्रित करता है। अधिक पौधों को एक सीमित क्षेत्र में उगाया जा सकता है और फसल का स्वाद बढ़ाया जाता है।
3.फसल जल्दी उगती है और पैदावार तेजी से बढ़ती है।
4. निराई के लिए कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है।
5. मिट्टी में पैदा होने वाले कीटों को समाप्त किया जाता है, जिससे कीटनाशकों की कोई जरुरत नहीं होती।

प्रभात जैसे युवा ना केवल राज्य के लिए रिवर्स माइग्रेशन के क्षेत्र में काम कर रहे बल्कि अपने साथ-साथ बहुत से बेरोजगारों को जीवन जीने की राह दे रहें हैं।