मीडिया, ट्रंप और मोदी: क्या खोया क्या पाया?

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कुछ दिन पहले अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप और सीएनएन के वाइट हाउस रिपोर्टर जिम अकोस्टा के बीच तनातनी की तस्वीरें हम लोगों के ज़हन में ताज़ी हैं। इस तीखी नोकझोंक के चलते वाह्इट हाउस ने जिम का वाह्ईट हाउस पास निरस्त कर दिया। आधिकारिक कारण बताया गया जिम ने एक सरकारी कर्मी के साथ सही बरताव नही किया। हांलाकि इसके बाद अमेरिकी मीडिया में इस आरोप के खिलाफ अखबार और टीवी से लेकर सोशल मीडिया पर कैंपेन शुरू हो गया। जिम की कंपनी सीएनएन ने इस लड़ाई को एक कदम आगे बढ़ाते हुए इसे मीडिया के आज़ादी पर हमला करार दिया और राष्ट्रपति ट्रंप पर केस दर्ज करा दिया।

डोनल्ड ट्रंप का मीडिया से इस तरह का व्यवहार कोई नई बात नही है। इससे पहले भी कई बार वो मीडिया संस्थानों के साथ साथ पत्रकारों से तीखी बहसों में उलझ चुके हैं। ट्रंप इससे पहले कई महिला पत्रकारों पर भी भड़क चुके हैं। अमेरिकी मीडिया में इस तरह का माहौल शायद पहली बार ही आया हो जब राष्ट्रपति और मीडिया के बीच का विवाद कानूनी शिकायतों का रूप अख्तियार कर चुका हैं। ये बात और हैरान करने वाली हो जाती है जबकि ट्रंप से पहले राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा के मीडिया से अच्छे संबंध रहे।

अब बात करते हैं दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की। इन दिनों भारत में भी मीडिया एक अलग दौर से गुज़रता दिखाई दे रहा है। जिस मीडिया से लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में काम करने की अपेक्षा की जाती है वो इन दिनों दो धड़ों में बंटा हुआ है। इसमें एक पक्ष है सरकार के विरोधी स्वरों का और दूसरा है सत्तापक्ष का खुलकर साथ देने वालो का। मीडिया के इस दो फाड़ होने में सत्ता में बैठे नेताओं का भी बड़ा रोल रहा है।  इसमें सबसे अहम है मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी की सोशल मीडिया युनिट का। इन दिनों भारतीय मीडिया में माहौल ये है कि अगर आपने सरकार और खासतौर पर प्रधानमंत्री के कामों पर सावल पूछ रहे हैं तो तुरंत मीडिया का एक हिस्सा आपको राष्ट्रविरोधी घोषित कर देगा और दूसरा आपकी बातों को अपने अजेंडे पर घुमाना शुरू कर देगा।

इस सबके बीच सोशल मीडिया पर अभिवयक्ति की आज़ादी की कीमत भी आपको चुकानी पड़ सकती है। जहां अपने विचार वय्क्त करने के साथ ही आपके ऊपर न जाने कहां कहां और किन किन लोगों से बहस नही गालियों की बौछार शुरू हो जाती है। इस सबके चलते कई लोगों ने सोशल मीडिया से परहेज करना शुरू कर दिया है। आलम ये हो गया है कि “फेक न्यूज़” नाम इन दिनों बड़ी बड़ी गोष्ठियों में चर्चा का विषय बन गया है। दुनियाभर में फेक न्यूज पकड़ने वाली कंपनियां सक्रिय हो चुकी हैं। फेसबुक, गूगल और व्हॉट्सएप जैसी कंपनियों को सरकार ने फेक न्यूज़ से निपटने के लिये कदम उठाने के निर्देश दिये हैं।

यहां मुद्दा ये भी है कि क्या अपनी इस खोई साख के पीछे काफी हद तक खुद मीडिया ही जिम्मेदार है? जिस तरह अमेरिका में राष्ट्रपति और एक निजि चैनल के पत्रकार के बीच हुए टकराव में अधिक्तर मीडिया संस्थान साथ आकर खड़े हो गये हैं ऐसी कोई मिसाल हाल के दिनों में भारतीय मीडिया में देखने को नही मिली है। सभी मीडिया संस्थान कहीं न कहीं अपने अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं। इस स्टूडियो जर्नलिस्म को दौर में खबर और अजेंडे के बीच का फासला न के बराबर रह गया है।

2019 में भारत में आम चुनाव हैं। इन चुनावों में जहां मोदी और बीजेपी के सामने अपने करिशमें को बरकरार रखने की चुनौती है वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने अपनी खोई हुई राजनीतिक ज़मीन को वापस हासिल करने का लक्ष्य। किसी भी चुनाव के तरह इन चुनावों में भी मीडिया एक अहम भूमिका निभायेगा। राजनीति और मीडिया का चोली दामन जैसा साथ रहा है। लेकिन इस साथ को कहां विराम लगाकर अपने मूल मकसद को साधना है ये सीमा तय करना बहुत ज़रूरी है। ये मीडिया संचालको को तय करना है कि वो आने वाले समय में और खासतौर पर लोकसभा चुनावों में किस तरह की भूमिका निभाना चाहते है? राजनीतिक दलों के ऐजेंटों की तरह या सही और परिपक्व खबरें दिखा कर लोगों को सही फैसला लेने के लिये मज़बूत करने वाले प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ की तरह।